लोककलाओं का प्राणाधार - श्रीरघुनाथचरित
April 19, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल पंचमी | मंगलवार
नक्षत्र: मृगशिरा | योग: शोभन | करण: बव
पर्व विशेष : | तदनुसार 21 अप्रैल 2026

छत्तीसगढ़ के उत्तर पश्चिम सीमांत भाग में स्थित कोरिया जिले का भरतपुर तहसील प्राकृतिक सौदंर्य, पुरातत्वीय धरोहर एवं जनजातीय/सांस्कृतिक विविधताओं से परिपूर्ण भू-भाग है। जन मानस में यह भू-भाग राम के वनगमन मार्ग तथा महाभारत कालीन दंतकथाओं से जुड़ा हुआ है। नवीन सर्वेक्षण से इस क्षेत्र से प्रागैतिहासिक काल के पाषाण उपकरण प्रकाश में आए हैं।
इसके अतिरिक्त शैलाश्रयों की विस्तृत श्रृंखला भी ज्ञात हुए हैं जिनमे से कुछ चित्रित भी हैं। ज्ञात पाषाण उपकरण तथा शैलचित्रों से ज्ञात होता है कि पाषाण युग में यहां आदिमानव संचरण करते थे। इस अंचल का प्राकृतिक भूगोल आदि मानवों के संचरण के लिए उपयुक्त स्थल रहा है। सोन नदी के प्रवाह के विस्तृत क्षेत्र में पल्लवित आदि मानवों की संस्कृति से लेकर निरंतर ऐतिहासिक युग तक यह अंचल सांस्कृतिक समन्वय से प्रभावित होता रहा है।
ऐतिहासिक काल में यह भू-भाग त्रिपुरी के कलचुरियों के द्वारा शासित रहा है। रियासत काल में भरतपुर ’चांगभखार’ के नाम से जाना जाता था। दुर्गम वन तथा विभिन्न प्रकार के वन्य पशुओं के लिए यह प्रख्यात था। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात् नवीन जिलों के पुनर्गठन के फलस्वरूप सरगुजा जिले का एक भाग (उत्तरी पश्चिम भाग कोरिया जिले के रूप में आकारित हुआ है। विस्तृत सर्वेक्षण तथा अन्वेषण से इस क्षेत्र के अज्ञात पुरास्थल तथा धरोहर क्रमशः प्रकाश में आ रहे हैं जिससे छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास की रूपरेखा और सांस्कृतिक विरासत के विविध तथ्यों पर नवीन प्रकाश पड़ने के साथ साथ ऐतिहासिक पर्यटन के ये स्थल चिन्हित हो रहे हैं।
भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं को गुहा में भी निवास करने की आज्ञा दी थी। गुहा के लिये संस्कृत शब्द लयनम् (प्राकृत लेण) विश्राम गृह या आराम के लिए प्र्रयुक्त होता रहा। पुरातत्व प्रमाणों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि लयनम् पर्वत खोदकर तैयार किये जाते , जिनमें भिक्षु रहा करते थे। संभवतः मौर्य सम्राट अशोक के शासन काल में भिक्षुओं के निवास स्थान पर बल नहीं दिया जाता था और उन्हे भ्रमण करते रहने का आदेश रहा हांगा । इसी कारण अशोक ने किसी प्रकार की बौद्ध गुफा का निर्माण नहीं किया ।1

हरचौका की शैलोत्कीर्ण गुफ़ा
शुंग काल में बौद्ध कला की उत्तरोत्तर बृद्धि तथा विकास होता गया। भारतवर्ष के पूर्वी भाग (उड़ीसा) तथा पश्चिमी भाग में अनेक गुफायें खोदी गईं जो साधुओं के लिये निवास स्थान हेतु प्रयुक्त हैं। बौद्ध मत में भिक्षु समूह तथा सामूहिक प्रार्थना को ध्यान में रखकर गुहा निर्माण किया जाता था। उस समय गुफाओं का दान एक धार्मिक कृत्य माना गया।2
पांचवी शताब्दी के बाद अधिकतर बौद्ध विहार मैदानों में बनने लगे। पर्वतों को काटकर दोनों प्रकार की गुफायें तैयार की जाती पर दोनों में मूलतः अन्तर था । पर्वत की तलहटी में सर्वप्रंथम बरामदा तैयार किया जाता। उसमें एक प्रवेश मार्ग होता जिससे होकर आंगन में पहुंचते हैं। आंगन के चारों ओर बरामदा तथा कमरे रहते हैं।3
समरबहादुर सिंह द्वारा लिखित पुस्तक से प्राप्त जानकारी के अनुसार चांगभखार तहसील में घघरा ग्राम के पास एक प्राचीन गुफा की जानकारी थी जिसे सीतामढ़ी कहते हैं। मूर्ति के चारों तरफ परिक्रमा करने के लिये जगह है। शिवरात्रि में यहां पर दर्शनार्थी प्रतिवर्ष पूजा करने आते हैं। इसके अलावा ग्राम छतौड़ा और कंजिया में भी सीतामढ़ी होने की जानकारी दी गई है।4
ग्राम हरचौका के किनारे की चट्टान काटकर गुफा बनाने का उललेख है। इन गुफाओं में कई देवी देवताओं की मूर्तियां हैं। गुफा के अन्दर छोटी-छोटी कई कोठरियां हैं जिनके अन्दर शिवलिंग की मूर्तियां प्रदर्शित होने की जानकारी दी गई हैं।5 ग्राम हरचौका में हीरालाल रायबहादुर ने एक अभिलेख होने की जानकारी दी है।6 जे.डी. बेगलर ने भी हरचोका की गुंफाओं के बारे में जानकारी दी है। उनके अनुसार मवई नदी के किनारे गुफा मंदिरों का निर्माण चट्ान काटकर बनवाया गया था। इनमें से कुछ स्तंभ कल्चुरी तथा कुछ चौहान राजवंश द्वारा बनाये जाने की जानकारी दी है। ये 12वीं शताब्दी के होने की जानकारी दी है।7
कोरिया जिला छत्तीसगढ़ का उत्तरी सीमान्त जिला है। बैकुंठपुर इस जिले का जिला मुख्यालय है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व तक यह स्वतंत्र रियासत था। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पूर्व तक यह सरगुजा जिले के अंतर्गत सम्मिलित था। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात् कोरिया, छत्तीसगढ़ राज्य का 17वें जिले के रूप में आकारित हुआ है। कोरिया जिला प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण जिला है। इसका अधिकांश भाग पर्वत श्रेणी तथा वनों से घिरा हुआ है। कोयला इस जिले की महत्वपूर्ण खनिज संपदा है तथा कोयला आधारित उद्योग यहां स्थापित है।

हरचौका की शैलोत्कीर्ण गुफ़ा में स्थापित शिवलिंग
कोरिया जिला का प्राचीन इतिहास आदि मानवों के संचरण, उनके द्वारा प्रयुक्त विविध प्रकार के पाषाण उपकरण तथा सर्वेक्षण से ज्ञात चित्रित शैलाश्रयों के माध्यम से प्रकाशित होता है। इस जिले के ग्राम लावाहोरी के समीप घोड़बंधा, ग्राम तिलोली के समीप गढ़ादेवी,, ग्राम भंवरखोह के समीप कोहबउर. आदि स्थलों में प्रागैतिहासिक काल के शैलचित्र ज्ञात हुए हैं। इन शैलचित्रों का वर्ण्य विषय बनैले पशु तथा आखेट दृश्य हैं। ये शैलचित्र गहरे गेरुआ लाल रंग से निर्मित है। शैलाश्रयों से प्राप्त पशु आकृतियां ज्यामितिय रेखाओं के जटिल रेखांकनों से निर्मित हैं। ऐसा ज्ञात होता है कि इन चित्रों में पशुओं के बाह्य अंगों को चित्रित करने का प्रयास तत्कालीन गुफामानवों के द्वारा किया गया है। प्रागैतिहासिक काल में प्राकृतिक शैलाश्रय, सघन वनक्षेत्र और आखेट के लिए वन्य पशुओं की सुलभता, तथा प्राकृतिक जल स्रोतों की सहज उपलब्धता के कारण यह भूभाग आदिममानवों के द्वारा संचारित था। अन्चेषण से प्रागैतिहासिक काल के पाषाण उपकरण विशेषकर सूक्ष्म पाषाण उपकरण यहां नदी नालों के तटवर्ती भागों से प्राप्त होते हैं। कोरिया जिले में ऐतिहासिक काल के स्थापत्य अवशेष अपेक्षाकृत अत्यल्प हैं। इस जिले के ज्ञात स्मारक स्थलों में हरचौका के निकट भवर नदी के तट पर शैलाश्रय गुफा मंदिर एवं घघरा का प्राचीन मंदिर (लगभग 11वीं-12वीं ईसवी) में निर्मित ज्ञात हैं। इसी जिले के केसगंवा नामक स्थल से जैन तीर्थंकरों की स्वतंत्र प्रतिमाएं सर्वेक्षण से ज्ञात है। कला शैली के आधार पर उपरोक्त जैन प्रतिमाएं 8वीं-9वीं सदी ईसवी की प्रतीत होती हैं। ऐतिहासिक काल के अवशेषों के माध्यम से इस भू-भाग में त्रिपुरी के कलचुरि तथा बिहार के पालों की राजनैतिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव का अनुमान होता है। त्रिपुरी के कलचुरियों के पश्चात् कोरिया जिले का इतिहास को जानने के लिए पुरावशेषों का अभाव है। केन्द्रीय प्रमुख सत्ता के अवसान के पश्चात् कोरिया में लगभग 13वीं-14वीं सदी ईसवी में क्षेत्रीय राजवंशों का प्रभाव गिरिदुर्गां के सामरिक संरचना में निर्मित द्वार, भवन एवं स्मारक अवशेषों से अनुमानित होता है। समेकित रूप से प्राचीन झारखंड अथवा रेंड, कन्हर एवं हसदो नदी से सिंचित भू-भाग लगभग 7वीं-8वीं सदी ईसवी में सिरपुर के सोमवंशी तत्पश्चात् 9वीं-10वीं सदी ईसवी से 12वीं सदी ईसवी तक त्रिपुरी के कलचुरि एवं बिहार के पाल नरेशों के शासन के अंतर्गत सम्मिलित रहा है।
कोरिया जिला 220 26, .अक्षांश उत्तर.से 230 55, तक.एवं 810 35, से 820 47, देशांश पूर्व के मध्य स्थित है। भरतपुर तहसील इस जिले का उत्तर/पूर्वी सीमांत भाग है। वर्ष 2014 में भरतपुर तहसील के ग्रामों का पुरातत्वीय सर्वेक्षण संपन्न किया गया है। इस सर्वेक्षण में मुख्य रूप से अंचल के नदी तटवर्ती क्षेत्रों के आसपास के स्थल एवं ग्रामों पर विशेष ध्यान केन्द्रित किया गया था । सर्वेक्षण से ज्ञात महत्चपूर्ण शैलोत्कीर्ण गुफाओं की सम्यक जानकारी क्रमशः निम्नानुसार हैः-
ग्राम घघरा में बस्ती के मध्य मुख्य सड़क के बायें तरफ एक पत्थर से बना मंदिर विद्यमान है। इसके अलावा ग्राम से उत्तर में लगभग दो किमी. दूरी पर रापां नदी के बायें तट पर पत्थर से बनी हुई गुफा विद्यमान है जिसे स्थानीय लोग सीतामढ़ी के नाम से जानते हैं। इसका विवरण निम्नानुसार हैं -
यह गुफा उत्तराभिमुखी है जो चट्टानों को काटकर बनाई गयी है। इस गुफा में बाहर तरफ एक लम्बा बरामदा है तथा बरामदे के अन्दर तरफ एक मध्य में कमरा है जिसके चारों तरफ प्रदक्षिणा पथ निर्मित है। बरामदे में बाहर तरफ दो स्तंभ हैं तथा कुल 3 प्रवेश द्वार हैं। मध्य का द्वार 103 सेमी. तथा पूर्वी किनारे का 87 से.मी. एवं पश्चिमी किनारे का 96 सेमी. चौड़ा है।
(1) कक्ष क्रंमांक एक-यह कक्ष गुफा के मध्य में उत्तराभिमुखी स्थित है। इसकी पूर्वी भित्ति की लम्बाई 166 सेमी, दक्षिणी भित्ति की लम्बाई 175 सेमी. तथा पश्चिमी भित्ति की लम्बाई 166 सेमी. है। कक्ष के मध्य में शिवलिंग जलहरी सहित स्थापित हैं जिसकी प्रणालिका पूर्व दिशा की तरफ है। जलहरी का माप 58 ग.58 से.मी. हैं तथा प्रणालिका की लम्बाई 20 से.मी. है। इसमें नियमित पूजा होती है। जलहरी की ऊंचाई 47 से.मी. तथा शिवलिंग की ऊंचाई 13 से.मी. तथा व्यास 53 से. मी. है।
इस कक्ष के दोनों पार्श्व में एक चबूतरा निर्मित है। दायें तरफ निर्मित चबूतरे का आकार 260 ग. 88 से.मी. एवं बायें पार्श्व के चबूतरे का आकार 260 ग 113 सेमी है। इस चबूतरे के पश्चिमी किनारे पर दो प्रस्तर स्तंभ निर्मित है। कक्ष की सम्मुख भित्ति की लम्बाई 5.00 मीटर तथा पिछली भित्ति की बाहर से लम्बाई 5.00 मीटर है। कक्ष की पीछे तरफ एक 8.08 मीटर लम्बा तथा 74 सेमी चौड़ा गलियारा है जो कमरे का प्रदक्षिणा पथ का कार्य करता है। इस कमरे के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ एक अलिंद में मानवाकार द्वारपाल की स्थानक प्रतिमाएं भित्ति में उत्खचित हैं। प्रतिमाएं द्विभुजी हैं। दायें तरफ की प्रतिमा दायें हाथ में त्रिशूल तथा बाएं हाथ में खड्ग धारण किए हुये प्रदर्शित है। बायीं ओर निर्मित प्रतिमा के दायें हाथ में त्रिशूल तथा बायां हाथ कमर में रखा है। प्रतिमा सादी तथा अलंकरण विहीन हैं। दायें तरफ के द्वारपाल का माप 164 ग 75 से.मी. तथा बाएं तरफ के द्वारपाल का माप 144 ग 72 से.मी. है।
(2) कक्ष क्रमांक दोः-यह कक्ष गुफा के अंदर निर्मित विशाल प्रदक्षिणा पथ के दायें तरफ पूर्व दिशा में निर्मित है जिसका मुख पश्चिमी दिशा की तरफ है। प्रवेश द्वार की ऊंचाई 130 से.मी. चौड़ाई 63 से.मी. तथा भित्ति की मोटाई 30 से.मी. है। कक्ष की दोनों पार्श्व भित्तियों की लम्बाई 182 से.मी. तथा पिछली भित्ति की लम्बाई 174 से.मी. है। इस कक्ष में दिन में भी अंधेरा बना रहता है।

हरचौका की गुफ़ा एवं नदी
(3) कक्ष कमांक तीनः- यह कक्ष गुफा के अंदर पश्चिमी किनारे तरफ लगभग मध्य में निर्मित की गई है। इसका मुख पूर्व दिशा की तरफ है। प्रवेश द्वार की ऊंचाई 114 से.मी. तथा चौड़ाई 64 से.मी. है एवं भित्ति की मोटाई 36 से.मी. है। कक्ष की दोनों पार्श्व भित्तियों की लम्बाई 175 से.मी. तथा पिछली भित्ति की लम्बाई 180 से.मी. है। प्रवेशद्वार के दोनों तरफ पूर्वी भित्ति की लम्बाई 57 से.मी. एक तरफ है। कक्ष के मध्य में शिवलिंग जलहरी सहित स्थापित है। प्रवेश द्वार के दोनों पार्श्व में एक-एक आदमकद द्वारपाल की प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं। इन प्रतिमाओं की बनावट भी लगभग, मध्य में स्थित कक्ष क्रं. 1 के बाहर निर्मित प्रतिमाओं के सदृश्य है। दायें तरफ उत्कीर्ण प्रतिमा का माप 141 ग 70 से.मी. तथा बाएं तरफ उत्कीर्ण प्रतिमा का माप 143 ग 60 से.मी. है।
(4) कक्ष कमांक चारः- यह कक्ष गुफा के उत्तर-पूर्वी कोने में स्थित है जो गुफा के बरामदे से संलग्न है। इसकी छत विनष्ट स्थिति में है। इस कक्ष के दायें पार्श्व से गुफा के भीतर से पानी निकलने की नाली चट्टान को काटकर बनायी गयी है। बरामदे के उत्तर-पूर्वी कोने में एक कमरा है जिसकी छत नष्ट होने से यह खुला है। इसका प्रवेश द्वार 52 से.मी. चौड़ा है। इसकी पिछली भित्ति 92 से.मी. लम्बी, पूर्वी भित्ति 97 से.मी. तथा पश्चिमी भित्ति 77 से.मी. लम्बी है। इस कक्ष के मध्य में कोई भी प्रतिमा नहीं है। इसके पीछे भित्ति के किनारे से नदी में जाने हेतु आधुनिक समय में सीढ़ियां निर्मित की गई हैं। बरामदे का आकार 7.47 मीटर लम्बा पूर्व-पश्चिम में एवं 5.60 मीटर चौड़ा उत्तर-दक्षिण में है। इस सम्पूर्ण बरामदे के पूर्वी भित्ति में एक पश्चिमाभिमुखी कमरा निर्मित है तथा पश्चिमी भित्ति में एक कमरा पूर्वाभिमुखी एवं मध्य में एक कमरा है। मध्य के कमरे का मुख उत्तर दिशा की तरफ है।
इस गुफा का निर्माण काल 10-11 वीं शताब्दी ई. संभावित है। गुफा के मध्य में स्थित कक्ष के सामने बरामदे में अंदर की पंक्ति में कुल 3 स्तंभ खडे़ हैं तथा दोनों पार्श्व में एक-एक भित्ति स्तंभ निर्मित किए गए हैं। कोरिया जिले में निर्मित गुफाओं में से यह पूर्णतः सुरक्षित हैं तथा मंदिर की संज्ञा दी जा सकती है। स्थानीय ग्रामवासियों द्वारा यहॉं पर विशेष अवसरों पर पूजा अर्चना की जाती है तथा सामने से रॉंपा नदी प्रवाहित होने से कारण यहॉं पर दर्शनार्थियों को विशेष सुविधा होती है। सुरम्य जंगल होने से इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। इस गुफा का संरक्षण पुरातत्व विभाग द्वारा कराया जाकर इसकी सुरक्षा के उपाय किया जाना आवश्यक है।
ग्राम के उत्तर दिशा में मवई नदी के बायें तट पर प्रस्तर निर्मित चट्टानों के मध्य छोटे-छोटे कमरों से युक्त गुफाएं बनी हैं। ये गुफाऐं कुछ पूर्व दिशा की तरफ तथा कुछ उत्तर दिशा की तरफ हैं। पूर्वाभिमुखी गुफाओं को विस्तृत विवरण निम्नानुसार हैं -
पूर्व दिशा की तरफ निर्मित गुफाओं के लगभग मध्य में प्रवेश करने के लिए सीढ़ीदार रास्ता निर्मित किया गया है। सीढ़ी से उतरने के बाद एक लम्बा बरामदा है जिसकी दक्षिण में लम्बाई 7.33 मीटर तथा चौड़ाई 3.64 मीटर है। बरामदे के मध्य में दो प्रस्तर के स्तंभ हैं जो छत का भार थामे हैं। बरामदे का पूर्वी किनारा खण्डित है जिसकी छत टूट जाने से यह खुला है।
इस बरामदे से संलग्न कुल 5 कमरे निर्मित हैं जिनमें से एक दक्षिण दिशा में तथा तीन कमरे पश्चिम में एवं एक कमरा उत्तर में हैं। इनका विवरण अलग निम्नानुसार है :-
(1) कक्ष कमांक एकः- यह कक्ष उत्तराभिमुखी हैं जिसका प्रवेशद्वार 80 से.मी. चौड़ा है। इस कक्ष की ऊपरी छत नष्ट हो चुकी है जिससे ऊपरी भाग खुली स्थिति में हैं। इस कमरे की पिछली भित्ति की लम्बाई 208 से.मी., पूर्वी भित्ति 165 से.मी. तथा पश्चिमी भित्ति 160 से.मी. है। उत्तरी भित्ति की लम्बाई प्रवेश द्वार के दोनों तरफ 74-74 से.मी. है। कक्ष के मध्य में एक प्रस्तर निर्मित जलहरी शिवलिंग सहित स्थापित है। जलहरी आयताकार है जिसकी प्रणालिका पूर्व दिशा की तरफ है। कमरे में प्रवेश करने के लिए लगभग 30 से.मी. ऊंची तथा 36 से.मी. चौड़ी भित्ति निर्मित है। शिवलिंग की ऊंचाई 14 से.मी., मोटाई 50 से.मी. तथा जलहरी की ऊंचाई 48 से.मी. है।
(2) कक्ष कमांक दोः-यह कक्ष पश्चिम दिशा का दक्षिणी किनारे का है जिसका मुख पूर्व दिशा की तरफ है। इस कक्ष की दक्षिणी तथा उत्तरी भित्ति की लम्बाई 133 से.मी. तथा पश्चिमी भित्ति की लम्बाई 180 से.मी हैं। कक्ष के मध्य में शिवलिंग जलहरी सहित स्थापित हैं। जलहरी का माप 72ग72 से.मी. है तथा इसकी प्रणालिका उत्तर दिशा की तरफ है जिसकी लम्बाई 28 से.मी. तथा चौड़ाई 21 से.मी. है। इस कमरे के प्रवेशद्वार की चौड़ाई 65 से.मी. तथा भित्ति की मोटाई 40 से.मी. है। कक्ष में स्थापित शिवलिंग की ऊंचाई 15 से.मी., व्यास 49 से.मी. तथा जलहरी की ऊंचाई 44 से.मी. है। कक्ष क्रं. दो एवं तीन के प्रवेशद्वार के मध्य 155 से.मी. का अन्तर है।
(3) कक्ष कमांक तीन :- यह कक्ष पश्चिम दिशा के मध्य में स्थित है जो पूर्वाभिमुखी है। इस कक्ष की दक्षिणी भित्ति की लम्बाई 155 से.मी. पश्चिमी भित्ति की लम्बाई 174 से.मी. तथा उत्तरी भित्ति की लम्बाई 134 से.मी. है। पूर्वी भित्ति की लम्बाई प्रवेश द्वार के दायें तरफ 57 से.मी. तथा बाएं तरफ 51 से.मी. है। कक्ष के मध्य में शिवलिंग जलहरी सहित स्थापित है। जलहरी का माप 63 ग 63 से.मी. तथा ऊंचाई 44 सें.मी. है। शिवलिंग की ऊंचाई 15 से..मी. तथा व्यास 54 से.मी. है। जलहरी की प्रणालिका उत्तर दिशा की तरफ है जिसकी लम्बाई 24 स.ेमी. तथा मोटाई 20 से.मी. है।
(4) कक्ष कमांक चारः-यह कक्ष पश्चिमी पंक्ति में सबसे उत्तरी किनारे पर स्थित है जो पूर्वाभिमुखी है। इस कक्ष की दक्षिणी भित्ति की लम्बाई 154 से.मी. पश्चिमी भित्ति की लम्बाई 190 से.मी. तथा उत्तरी भित्ति की लम्बाई 170 से.मी. है। पूर्वी भित्ति की लम्बाई प्रवेश द्वार के दायें तरफ 50 से.मी. तथा बाएं तरफ 46 स.ेमी. है। कक्ष के प्रवेश द्वार की चौड़ाई 66 से.मी. तथा भित्ति की मोटाई 36 से.मी. है। कक्ष के मध्य में शिवलिंग जलहरी सहित स्थापित हैं। जलहरी का माप 69.ग 68 स.ेमी. तथा ऊंचाई 42 से.मी. है। शिवलिंग की ऊंचाई 20 से.मी तथा व्यास 57 से.मी हैं। कक्ष क्रं. 3 एवं 4 के प्रवेशद्वार के मध्य 209 से.मी. का अन्तर है। इस कक्ष के उत्तरी भित्ति के किनारे मध्य में एक गड्ढा है जो पूजा का जल एकत्रित करने हेतु निर्मित किया गया होगा।
(5) कक्ष क्रमांक पॉचः-यह कक्ष बरामदे से संलग्न उत्तर दिशा में निर्मित है। इसका मुख दक्षिण दिशा की तरफ है। इसकी पश्चिमी भित्ति की लम्बाई 157 से.मी. उत्तरी भित्ति की लम्बाई 180 से.मी. तथा पूर्वी भित्ति की लम्बाई 143 सें.मी. है। दक्षिणी भित्ति की लम्बाई प्रवेश द्वार के दायें तथा बायें तरफ 53 से.मी है। इस कक्ष का प्रवेश द्वार 70 से.मी. चौड़ा तथा भित्ति की मोटाई 25 से.मी. है। कक्ष के मध्य में शिवलिंग जलहरी सहित स्थापित हैं। जलहरी की ऊंचाई 37 से.मी. तथा माप 63 ग .63 से.मी. है। शिवलिंग की ऊंचाई 16 से.मी. तथा व्यास 50 से.मी. है।
कक्ष क्रं. 5 के पूर्व में एक आयताकार चबूतरा है जिसका माप उत्तर दक्षिण में 340 से.मी. तथा पूर्व-पश्चिम में पीछे तरफ 255 से.मी. तथा दक्षिण दिशा की तरफ 284 से.मी. है। इसके मध्य में पश्चिमी भित्ति के किनारे एक प्रस्तर की चौकी निर्मित हैं जिसका माप 50. ग 50 से.मी. है। इस चबूतरे का पूर्वी किनारा 312 से.मी. लम्बा है।
इस बरामदे से उत्तर दिशा की तरफ पत्थर काटकर एक गलियारा बनाया गया है जिसकी औसत चौड़ाई 90 से.मी. है। बरामदे में प्रवेश के लिए. निर्मित सीढ़ी से लगभग 8.80 मीटर दूरी पर उत्तर दिशा में गलियारा के दायें तरफ दो कक्ष निर्मित हैं जिनकी पहचान कक्ष क्रं. 6 एवं कक्ष. क्रं. 7 किया गया है। इनका मुख पश्चिम दिशा की तरफ है। विवरण निम्नानुसार है-

घघरा की गुफ़ा
(6) कक्ष कमांक छः- यह आयताकार कक्ष पश्चिमाभिमुखी है। इसके प्रवेश द्वार की चौड़ाई 80 से.मी. है। कक्ष के दक्षिणी भित्ति की लम्बाई 120 से.मी. पूर्वी भित्ति की लम्बाई 173 से.मी. तथा उत्तरी भित्ति की लम्बाई 165 से.मी. है। जलहरी के मध्य में एक शिवलिंग स्थापित है जिसकी प्रणालिका उत्तर दिशा की तरफ है।
(7) कक्ष कमांक सातः- यह कक्ष भी आयताकार है जो पश्चिमाभिमुखी है। इसका प्रवेशद्वार 80 से.मी. चौड़ा है जिसकी भित्ति की मोटाई 24 से.मी. है। कक्ष की दक्षिणी तथा उत्तरी भित्ति 100 से.मी. एवं पूर्वी भित्ति 148 से..मी., तथा प्रवेश द्वार के दायें तरफ 22 से.मी., एवं बायें तरफ 66 से.मी. लम्बाई में है। कक्ष क्रं 6 एवं 7 की छत नष्टप्राय है जिससे दोनों कक्ष खुले हैं। इन दोनों कक्ष के सामने से पश्चिम की तरफ लगभग 4.60 मीटर की दूरी पर गलियारे से जुड़कर नदी में जल लेने के लिए बनाया गया होगा तथा इसी गलियारे के द्वारा पूर्वी दिशा में निर्मित कक्षों के पूजा का जल निकालकर नदी में प्रवाहित किया जाता रहा होगा।
उत्तर दिशा में निर्मित गुफाओं का विवरण निम्नानुसार हैः-
ग्राम हरचौका में मवई नदी के बायें तट पर निर्मित गुफाओं के पूर्व में कुल संख्या लगभग 10-12 रही होगी जो एक बरामदे से संलग्न थे। बरामदा वर्तमान में भग्नप्रायः है। पूर्व में कुल संख्या लगभग 10-12 रही होगी। जिसमें से वर्तमान में यहां लगभग 10 शेष हैं। बरामदे की पूर्व-पश्चिम में लम्बाई 12.35 मीटर तथा चौड़ाई 13.14 मीटर है। इस बरामदे में कुल 10 प्रस्तर चौकी हैं जिनके ऊपर स्तंभ स्थापित थे। वर्तमान में कुल 4 स्तंभ शेष हैं।
(1) कक्ष कमांक एकः-यह कक्ष उत्तरी बरामदे के पूर्वी किनारे पर स्थित है। इसका मुख पश्चिम दिशा की तरफ है। इसके प्रवेश द्वार की चौड़ाई 60 से.मी. तथा भित्ति की मोटाई 21 से.मी है। इस कक्ष की पिछली भित्ति 125 से.मी. लम्बी, दक्षिणी भित्ति 86 से.मी. तथा उत्तरी भित्ति 79 से.मी. है। पश्चिमी भित्ति प्रवेश द्वार के दायें तरफ 20 से.मी. तथा बाएं तरफ 30 से.मी. लम्बी है। कक्ष के पिछली भित्ति के सहारे एक प्रस्तर की जलहरी स्थापित है जिसमें प्रणालिका उत्तर दिशा की तरफ है। जलहरी का माप 56 ग 52 से.मी. है। जलहरी में एक आयताकर गड्ढा है जिसके ऊपर सूर्य प्रतिमा स्थापित है। इसका माप 73. ग 34 ग .12 से.मी. हैं।
(2) कक्ष कमांक दोः-बरामदे के दक्षिणी किनारे पर कुल 5 कक्ष एक पंक्ति में निर्मित हैं। यह कक्ष दक्षिण-पूर्व के कोने में स्थित पहला कक्ष है जो उत्तराभिमुखी है। इस कक्ष का प्रवेशद्वार 87 से.मी. चौड़ा है तथा इसकी भित्तियां 39 से.मी. मोटी है। गर्भगृह की पूर्वी तथा दक्षिणी भित्ति की लम्बाई 180 से.मी. तथा पश्चिमी भित्ति की लम्बाई 178 से.मी. है। गर्भगृह के मध्य में एक प्रस्तर निर्मित जलहरी स्थापित हैं जिसकी प्रणालिका पूर्व दिशा की तरफ है। जलहरी का माप 61 .ग 58 से.मी. तथा ऊंचाई 56 से.मी. है। जलहरी के मध्य में शिवलिंग स्थापित हैं जिसकी लम्बाई 14 से.मी. तथा व्यास 58 से.मी. है।
(3) कक्ष कमांक तीनः-बरामदे के दक्षिणी किनारे पर निर्मित यह दूसरा कक्ष है। इसका मुख भी उत्तर दिशा की तरफ है। इस कक्ष का प्रवेशद्वार 66 से.मी. चौड़ा है तथा इसकी भित्तियां 27 से.मी. मोटी हैं। कक्ष की पूर्वी भित्ति की लम्बाई 153 से.मी., दक्षिणी भित्ति की लम्बाई 182 से.मी. तथा पश्चिमी भित्ति की लम्बाई 170 से.मी. है। गर्भगृह के मध्य में एक प्रस्तर निर्मित जलहरी स्थापित है जिसका माप 73 ग.71 से.मी. है तथा ऊंचाई 17 से.मी. है। जलहरी के मध्य स्थापित शिवलिंग की ऊंचाई 33 से.मी. तथा व्यास 59 से.मी. है।
(4) कक्ष कमांक चारः-बरामदे के दक्षिणी किनारे पर निर्मित यह तीसरा कक्ष है। यह भी उत्तराभिमुखी है। इस कक्ष का प्रवेशद्वार 70 से.मी. चौड़ा है तथा इसकी भित्तियॉं 39 से.मी. मोटी है। कक्ष के पूर्वी, पश्चिमी तथा दक्षिणी भित्ति की लम्बाई 180 से.मी. है। गर्भगृह के मध्य में एक प्रस्तर निर्मित जलहरी स्थापित है जिसका माप 72 ग 68 से.मी. तथा ऊंचाई 25 से.मी. है। जलहरी के मध्य में शिवलिंग स्थापित है। इसकी ऊंचाई 17 से.मीं. तथा व्यास 58 से.मीं. है।
(5) कक्ष कमांक पॉचः-बरामदे के दक्षिणी किनारे पर निर्मित यह चौथा कक्ष है जो उत्तराभिमुखी है। इस कक्ष का प्रवेश द्वार 63 से.मी. चौड़ा है तथा इसकी भित्तियां 44 से.मी. मोटी है। कक्ष की पूर्वी भित्ति 184 से.मी., दक्षिणी भित्ति 180 से.मी. तथा पश्चिमी भित्ति 178 से.मी. है। कक्ष के मध्य में केवल जलहरी स्थापित है जिसका माप 69 ग 66 से.मी. तथा ऊंचाई 29 से.मी. है। इसमें एक द्विभुजी प्रतिमा स्थापित है जिसका माप 65 ग 30 ग 18 से.मी. है।
(6) कक्ष कमांक छः-यह कक्ष बरामदे के दक्षिणी तथा पश्चिमी कोने में निर्मित है। इसके पूर्वी भित्ति की लम्बाई 110 से.मी., दक्षिणी भित्ति की लम्बाई 165 से.मी. तथा पश्चिमी भित्ति की लम्बाई 250 से.मी. है। इस कक्ष का ऊपरी छत भाग खण्डित है जिससे ऊपरी हिस्से का पानी इसकी भित्ति से होकर अंदर बहता है। कक्ष की पूर्वी भित्ति के किनारे एक प्रस्तर का पंचदेवीपट्ट निर्मित है जिसका माप 72 ग.105 ग 15 से.मी. है। इसी कक्ष में एक और प्रतिमा रखी है जो सिंहवाहिनी दुर्गा है। इसका माप 110ग 46 ग.16 से.मी. है। एक द्विभुजी देवी भी रखी है जिसका माप 73 ग 35 ग 13 से.मी. है। यह भी सिंहवाहिनी है। इसके अलावा एक विष्णु की चतुर्भुजी प्रतिमा स्थापित हैं जिसका माप 80. ग 42 ग 15 से.मी. है। ये सभी प्रतिमाएं पूजित स्थिति में होने से क्षरित हैं।
(7) कक्ष कमांक सातः-यह कक्ष बरामदे के पश्चिमी किनारे का दक्षिण तरफ से पहला कक्ष है जो छत से ढ़का है। इसका प्रवेशद्वार पूर्वाभिमुखी है। इसकी आंतरिक भित्तियां दक्षिण तरफ की 180 से.मी., पश्चिम तरफ की 187 से.मी. तथा उत्तर दिशा की 170 से.मी. है। इस कक्ष का प्रवेश द्वार 58 से.मी. है तथा भित्ति की मोटाई 43 से.मी. है। कक्ष के मध्य में एक प्रस्तर निर्मित जलहरी स्थापित है। इसका माप 54 ग 53 तथा ऊंचाई 39 से.मी. है। जलहरी के मध्य में शिवलिंग स्थापित हैं। शिवलिंग की ऊंचाई 13 से.मी. तथा व्यास 57 से.मी. है।
(8) कक्ष कमांक आठः-यह कक्ष बरामदे के पश्चिमी किनारे का दक्षिण से दूसरा कक्ष है। इसका प्रवेशद्वार पूर्वाभिमुखी है। प्रवेशद्वार 62 से.मी. चौड़ा है तथा भित्तियों की मोटाई 27 से.मी. है। इस कक्ष की दक्षिणी भित्ति 102 से.मी., पश्चिमी भित्ति 144 से.मी. तथा उत्तरी भित्ति 110 से.मी. है। कक्ष की पिछली भित्ति के सहारे एक प्रस्तर चौकी स्थापित है जिसका माप 63 ग 59 से.मी. तथा ऊंचाई 16 से.मी. है। इसकी प्रणालिका उत्तर दिशा की तरफ है। जलहरी में उमामहेश्वर की प्रस्तर प्रतिमा स्थापित है जिसका माप 64 ग 40 ग 18 से.मी. है। इस कक्ष का प्रवेशद्वार तथा कमरे की छत नष्ट प्राय होने से खुला हुआ है।
(9) कक्ष कमांक नौः- यह कक्ष बरामदे के बाहर पश्चिमी दिशा की ओर तीसरे नम्बर का है। इसकी छत नष्टप्राय है। इसका प्रवेशद्वार पूर्व दिशा की तरफ हैं जिसकी चौड़ाई 59 से.मी..है। कक्ष की दक्षिणी भित्ति की लम्बाई 135 स.ेमी. पश्चिमी भित्ति की लम्बाई 146 से.मी. तथा उत्तरी भित्ति 135 से.मी. लम्बी है। इस कक्ष में वर्तमान में कोई भी पूजित प्रतिमा नहीं है।
(10) कक्ष कमांक दसः-यह कक्ष पश्चिम तथा उत्तर दिशा के कोने का खुला हुआ कक्ष है। वर्तमान में इसकी छत नष्ट प्राय है। इसकी दक्षिणी भित्ति 233 से.मी. लम्बी तथा पश्चिमी भित्ति 307 से.मी. एवं उत्तरी भित्ति 233 स.ेमी. लम्बी हैं। इसके अंदर भी कोई पूजित प्रतिमा नहीं है। इस कक्ष के पूर्वी दिशा तरफ भी कुछ कमरे निर्मित रहे होगें लेकिन वर्तमान में नष्ट प्राय है।
बरामदे में दो पंक्ति में स्तंभ निर्मित थे जिसमें से अंदर की पंक्ति में पांच तथा बाहर की पंक्ति में भी पांच स्तंभ थे जिसमें से मात्र 3 स्तंभ पूर्वी किनारे पर तथा एक स्तंभ पश्चिमी किनारे पर विद्यमान है शेष नष्ट प्राय है। वर्तमान में इस बरामदे की छत बाढ़ के कारण तथा वर्षा ऋृतु में पानी के बहाव के कारण नष्ट हो चुकी है। इस बरामदे से संलग्न कक्षों में स्थापित शिवलिंग तथा प्रस्तर प्रतिमाओं की स्थानीय लोग नियमित पूजा करते हैं।
बरामदे के सामने उत्तर दिशा की तरफ मवई नदी की तरफ 390 सेंटीमीटर चौड़ा खाली स्थान है। जिसमें पूर्व दिशा की तरफ निर्मित कक्षों का रास्ता इसी में खुलता है जिससे दर्शक नदीं के बायें तरफ से बाहर निकलते रहे होगें । इस चौडे़ स्थान तथा रास्ते के पूर्व दिशा में भी एक कक्ष निर्मित है। इसका मुख पश्चिम दिशा की तरफ है जिसकी भित्ति 172 से.मी. लम्बी तथा पूर्वी भित्ति की चौड़ाई 184 से.मी. है। इस कक्ष के मध्य में शिवलिंग जलहरी सहित स्थापित है। जिसकी प्रणलिका उत्तर दिशा की तरफ है। इस कक्ष के पीछे तथा दक्षिण में प्रस्तर की चौड़ी पट्टी निर्मित है। दक्षिण दिशा की पट्टी में बाहर तरफ एक गणेश की प्रतिमा उत्कीर्ण है।
कोरिया जिले में अभी तक ज्ञात सभी गुफाओं में से इसका आकार तथा क्षेत्रफल एवं कक्षों की संख्या सर्वाधिक है। वर्तमान में इस सभी कक्षों के चारों तरफ नदी के पानी से बहाव को रोकने के लिए स्थानीय लोगों द्वारा एक ऊंची पत्थर की दीवाल बना दी गई है जिसका प्रवेशद्वार दक्षिण दिशा की तरफ है तथा घेरे के अन्दर का पानी निकलने के लिए नदी की तरफ एक छिद्र निर्मित है। इन गुफाओं का निर्माणकाल लगभग 11-12 वीं शताब्दी ई. संभावित है। यह गुफा मवई नदी के तट पर स्थित होने से छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले का अंतिम ग्राम है क्योंकि मवई नदी के दायें तरफ का हिस्सा सीधी जिले के अन्तर्गत आता है जो अब मध्यप्रदेश की सीमा में है।
इस नदी के बाढ़ से सुरक्षा के लिए दीवार से घेर कर बंद कर दिया गया है। यहां के अधिकांश गुफाओं की छत ढह गई हैं तथा कुछ क्षतिग्रस्त स्थिति में हैं। इस गुफा से सम्बंधित कोई भी अभिलेख वर्तमान में उपलब्ध नहीं हैं। स्थापत्य संरचना के आधार पर इसका निर्माण काल लगभग घघरा में निर्मित गुफा के समकालीन प्रतीत होता है।
यह ग्राम जनकपुर से पश्चिम में शहडोल रोड पर लगभग 40 कि.मी. दूरी पर ओदारी नदी के किनारे दायें तट पर तथा मोरइली नाले के दायें तरफ एक पहाड़ी चट्टान के ऊपर सीतामढ़ी नामक गुफा निर्मित है। जनकपुर से शहडोल रोड पर लगभग 25 कि.मी.की दूरी पर चॉंटी से बाएं तरफ लगभग 7 कि.मी. की दूरी में स्थित है। ग्राम कंजिया भरतपुर तहसील के पश्चिमी किनारे पर 230 39’ अक्षांश उत्तर, 810 40’ देशांश पूर्व में शहडोल जिले की सीमा से लगा हुआ अंतिम ग्राम है। इस ग्राम के पश्चिम में ओदारी नदी लगभग 3 कि.मी. दूरी पर बहती है जो तहसील, जिला तथा राज्य की सीमा बनाती है। नदी के उस पार मध्यप्रदेश का शहडोल जिला है।
ग्राम कंजिया से लगभग 2 कि.मी. दूरी पर दक्षिण-पूर्व में पहाड़ी की तलहटी में चट्टानों को काटकर बनायी गई गुफा है। इस गुफा का मुख पश्चिम दिशा की तरफ है। इस गुफा में दो बरामदे निर्मित थे जिसमें से वर्तमान में बाहर की बरामदे की छत टूटकर नष्ट हो चुकी है। अंदर के बरामदे में एक पंक्ति में चार स्तंभ निर्मित हैं जो अष्टकोणीय है। इसके ऊपर छत विद्यमान है लेकिन उत्तरी किनारे पर टूटी है। इस गुफा में कुल 3 कमरे निर्मित हैं जिनका विवरण निम्नानुसार है।
(1) कक्ष कमांक एक :- यह कमरा गुफा के अंदर वाले बरामदे के उत्तरी-पूर्वी केने में स्थित है। इसका मुख पश्चिम दिशा की तरफ है। प्रवेश द्वार की चौड़ाई 70 से.मी. तथा उंचाई 145 से.मी. है एवं भित्ति की मोटाई 37 से.मी है। कमरे की उत्तरी तथा पूर्वी भित्ति 190 से.मी. लम्बी एवं दक्षिणी भित्ति 185 से.मी लम्बी है। इस कमरे की फर्श से छत तक की ऊंचाई 170 से.मी. है। कमरे के मध्य में एक पत्थर की चौकी स्थापित है जिसका माप 62 ग 60 से.मी. है। इसके ऊपर शिवलिंग स्थापित है।

कंजिया की गुफ़ा
इस कक्ष के बायें तरफ भित्ति में दो अलिंद निर्मित हैं जिनमें से एक अलिंद अपेक्षाकृत बड़ा है तथा दूसरा छोटा है। छोटे अलिंद का माप 103 ग 57 से.मी. है। इसके निचले भाग में चौकी स्थापित हैं जिसका माप 37 ग 55 से.मी. है। इसके 50 से.मी. दूरी पर बायें तरफ एक बड़ा अलिंद है। दूसरे अलिंद की ऊंचाई 163 से.मी. तथा चौड़ाई 77 से.मी. है। इसमें चौकी निर्मित हैं जिसका माप 57 ग 88 से.मी. है। संभावना हैं कि इनमें कोई प्रतिमा स्थापित रही होगी लेकिन वर्तमान में दोनों गड़ढों में एक-एक पत्थर की चौकी रखी है।
(2) कक्ष कमांक दोः- यह कक्ष गुफा के आंतरिक बरामदे के दक्षिण दिशा की तरफ है जिसकी ऊपरी छत खण्डित है। इसका प्रवेश द्वार उत्तर दिशा की ओर है। प्रवेश द्वार की चौड़ाई 63 से.मी. तथा भित्ति की मोटाई 30 से.मी. है। इसकी पूर्वी भित्ति की लम्बाई 192 से.मी. दक्षिणी भित्ति की लम्बाई 187 से.मी. तथा पश्चिमी भित्ति की लम्बाई 195 से.मी. है। इसकी पिछली भित्ति की भूतल से ऊंचाई 183 से.मी. है। कमरे के पश्चिमी किनारे पर एक वर्गाकार 47 ग 47 से.मी. आकार का गड्ढा है। संभवतः इस कमरे के मध्य में भी जलहरी में प्रतिमा (शिवलिंग) स्थापित रहा होगा जिसका जल बहकर इस गड्ढे में एकत्रित होता रहा होगा। वर्तमान में इसमें एक लोहे का त्रिशूल गड़ा हुआ है।
(3) कक्ष कमांक तीनः- यह कक्ष गुफा के बाहर बाहरी बरामदे के बाहर बाएं तरफ अर्थात दक्षिण दिशा की तरफ निर्मित की गई है। इसकी प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें दो कमरे एक के बाद एक क्रमशः संलग्न निर्मित हैंं। बाहरी कक्ष का प्रवेश द्वार 59 से.मी. चौड़ा तथा भित्ति की मोटाई 43 से.मी. है। इसकी पूर्वी भित्ति 180 से.मी. लम्बी तथा पश्चिमी भित्ति 182 से.मी. लम्बी है। इसके अंदर के कमरे का प्रवेशद्वार भी 59 से.मी. चौड़ा तथा इसकी भित्ति की मोटाई 40 से.मी. है। इसके अंदर की पूर्व दिशा की भित्तिं 176 से.मी. लम्बी, पिछली भित्ति 170 से.मी. तथा पश्चिमी भित्ति की लम्बाई 184 से.मी. है। इस कक्ष के मध्य में एक पत्थर की जलहरी शिवलिंग सहित स्थापित है जिसमें पानी निकलने की प्रणालिका पश्चिम दिशा की तरफ है।
जलहरी का माप 50 ग 50 से.मी. वर्गाकार तथा ऊंचाई 29 से.मी. है। इस कक्ष की ऊपरी छत नष्ट हो चुकी है। भूतल से छत तक की कुल ऊंचाई 177 से.मी. है। इन दोनों कक्षों की छत नष्टप्राय है। बाहरी कक्ष के अंदर प्रवेशद्वार के समीप एक पत्थर की सीढ़ी निर्मित है जिसकी लम्बाई 77 से.मी. तथा चौड़ाई 25 से.मी. है।
इस कक्ष में प्रवेश द्वार के बाहर 385 से.मी. दूरी पर पश्चिम की तरफ चट्टान काटकर समतल किया गया है जो 225 से.मी. चौड़ा है। इसके मध्य में एक आयताकार पत्थर की चौकी निर्मित है जिसका माप 88 ग 74 से..मी. है। इसके सामने उत्तर दक्षिण लम्बाई में (6.00 मीटर ़ 225) त्र 8.25 मीटर लम्बा समतल रास्ता है जो गुफा के उत्तरी किनारे से बाहर होकर पीछे की तरफ पहाड़ी की ओर घूम गया है। इसकी चौडा़ई सामने की तरफ 108 से.मी. तथा उत्तर दिशा की तरफ निर्मित गलियारे की लम्बाई लगभग 10 मीटर है। यह गलियारा पीछे की अपेक्षा दक्षिण की तरफ 220 से.मी. लम्बा मुड़ गया हैं जिसकी चौड़ाई 76 से.मी. है। इसके ऊपर चट्टान है।
गुफा के अंदर के बरामदे में उत्तर दिशा की तरफ भी एक अलिंद है जिसकी ऊंचाई 84 से.मी. तथा चौड़ाई 67 से.मी. है। इसी प्रकार बाहरी बरामदे की उत्तरी भित्ति में भी दो अलिंद निर्मित हैं। अंदर की तरफ निर्मित अलिंद का माप 50 ग 20 से.मी. तथा बाहर की तरफ निर्मित अलिंद का माप 54 ग 20 से.मी. है। गुफा के अंदर तथा बाहरी बरामदे के दो भागों में एक भित्ति के द्वारा विभाजित किया गया है।
यह गुफा पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं तथा संरक्षण में लेकर विकास एवं अनुरक्षण कार्य अत्यावश्यक है। स्थापत्य कला की दृष्टि से इसका निर्माण 10-11 वीं शताब्दी ई. प्रतीत होता है। इस गुफा के सामने तथा आसपास के क्षेत्र में पाषाण कालीन सूक्ष्म उपकरण बहुतायत से प्राप्त हुये हैं।

कंजिया की गुफ़ा
ग्राम कंजिया में सीतामढ़ी के आसपास विविध आकार प्रकार के लघु पाषाण उपकरण अत्यधिक मात्रा में प्राप्त होते हैं। संभवतः इसी गुफा के आसपास आदिमानव लघु पाषाण उपकरणों का निर्माण करते रहे होंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि यहां सूक्ष्म पाषाण उपकरण निर्माण करने का कार्यशाला रहा होगा।
ग्राम छतोड़ा जनकपुर से कोटाडोल रोड पर लगभग 45 कि.मी. दूरी पर 230 46’ अक्षांश उत्तर तथा 820 09’ देशांश पूर्व ’में स्थित है। ग्राम छतोड़ा में बस्ती के पहले मुख्य सड़क मार्ग से बायें तरफ लगभग एक फर्लांग अंदर खेतों के मध्य से कच्चा रास्ता है। जहॉं पर रास्ते के दायें तरफ सघन वनों के किनारे में प्रस्तर निर्मित चट्टान है जो कि समतल भूमि पर स्थित है। चट्टान में पूर्व दिशा की तरफ चट्टानों को काटकर गुफा बनाया गया है जिसका विवरण निम्नानुसार हैं।ः-

छतौड़ा की गुफ़ा
गुफा के बाहर तरफ एक लम्बा बरामदा है जिसकी लम्बाई 6.00 मीटर है। तथा चौड़ाई 2.00 मीटर है। बरामदे में प्रवेश करने के लिए तीन प्रवेश द्वार का अनुमान होता है क्योंकि दो स्तम्भों के चिन्ह दिखाई पड़ते हैं तथा दोनों किनारे पर भित्ति के अवशेष हैं। तीनों प्रवेश द्वार की चौड़ाई लगभग 70 से.मी. है तथा इनके मध्य स्थित स्तम्भों की चौकी का माप 40 ग 40 से.मी. है। इसके ऊपर स्थापित स्तंभ खण्डित हैं। प्रवेश द्वार के दायीं ओर 3.10 मीटर तथा बायीं ओर 3.25 मीटर लम्बी भित्ति के अवशेष हैं। बरामदे में दोनों किनारे पर एक-एक चबूतरा है। दायें तरफ का चबूतरा 200 से.मी. तथा 165 से.मी. लम्बा है जबकि बायें तरफ का चबूतरा 185 से.मी. तथा 165 से.मी. लम्बा है। बरामदे की पिछली भित्ति की ऊंचाई 190 से.मी. है। वर्तमान में बरामदे की छत का हिस्सा टूटकर नष्ट हो गया है तथा दायें किनारे पर थोड़ा सा शेष है। इसकी धरातल का भाग गहराई में होने से वर्षा ऋृतु में पानी भर जाता है क्योंकि बाहर का मैदान इसकी सतह से ऊंचा है।
बरामदे के मध्य में एक प्रवेश द्वार पश्चिम की तरफ है। इसकी ऊंचाई 143 से.मी. तथा चौड़ाई 73 से.मी. है। प्रवेश द्वार के अंदर कुल 3 कमरें एक दूसरे से संलग्न निर्मित हैं जिनका प्रवेश द्वार अंदर की तरफ मध्य की भित्ति में है। मध्य के कक्ष का आकार आयताकार है जो पूर्व-पश्चिम में 327 से.मी. लम्बा तथा 175 से.मी. चौड़ा है। इस कक्ष के दोनों तरफ एक-एक कक्ष और निर्मित हैं जिनमें जाने के लिए मध्य की भित्ति में प्रवेश द्वार है। दक्षिणी प्रवेश द्वार का माप 138 से.मी. ऊंचा तथा 69 से.मी. चौड़ाई है। उत्तरी प्रवेश द्वार का माप 125 से.मी. ऊंचा तथा 74 से.मी. चौड़ा है तथा इसकी भित्ति की मोटाई 40 से.मी. है। मध्य के कक्ष की पिछली भित्ति 180 से.मी. चौड़ी है। इस भित्ति में एक युगल प्रतिमा उत्खचित हैं जिसका माप 44 ग 40 ग 10 से.मी. है। इस प्रतिमा में अलंकरण नहीं हैं।
दक्षिणी तरफ निर्मित कक्ष का आकार पूर्व-पश्चिम में 342 से.मी. लम्बा तथा 194 से.मी. चौड़ा है। इसकी दक्षिणी भित्ति की लम्बाई 340 से.मी., पूर्वी भित्ति की लम्बाई 180 से.मी. तथा पश्चिमी भित्ति की लम्बाई 170 से.मी. है। इसी प्रकार उत्तरी भित्ति प्रवेश द्वार के पश्चिम तरफ 138 स.ेमी. लम्बी तथा पूर्व तरफ 120 से.मी. लम्बी है। इस कक्ष की आंतरिक भित्तियों में किसी प्रकार का अलंकरण नहीं है।
उत्तरी कक्ष का आकार पूर्व-पश्चिम में 307 से.मी. तथा उत्तर दक्षिण में 193 से.मी है। इसकी उत्तरी भित्ति 293 से.मी. लम्बी, पश्चिमी भित्ति 180 से.मी. तथा पूर्वी भित्ति 190 से.मी है। इस कक्ष की दक्षिणी भित्ति जो कि मध्य कक्ष से संलग्न है। इसकी प्रवेश द्वार से पश्चिम तरफ 140 से.मी. लम्बी तथा पूर्व दिशा की तरफ 95 से.मी. लम्बी है जिसकी मोटाई 40 से.मी. है। अंदर के तीनों कमरों के ऊपर पत्थर की चट्टान सुरक्षित है।
स्थानीय ग्रामवासियों के अनुसार इस गुफा में यदा-कदा भालू रहते हैं तथा नवरात्रि पर्व में ग्रामीणों द्वारा कमरों के अन्दर जवारा बोया जाता है। स्थल के अवलोकन के आधार पर यह गुफा भी 11-12 वीं शताब्दी ई. में निर्मित प्रतीत होती है।
यह ग्राम भरतपुर से कोटाडोल रोड पर लगभग 40 किमी. दूरी पर घासीदास अभयारण्य के बाद कच्चे रास्ते पर स्थित है। यहाँ पर चट्टान को काटकर दो प्रस्तर स्तंभों के मध्य तीन प्रवेशद्वार युक्त गुफा का निर्माण किया गया था। इसमें बाहर तरफ एक लम्बा बरामदा है जिसके दोनों किनारे पर एक प्रस्तर का चबूतरा निर्मित है। इस बरामदे के मध्य में एक प्रवेश द्वार है जिसके अन्दर कमरा निर्मित है।
भरतपुर तथा समीपस्थ अन्य स्थल पर्यावरण तथा प्राकृतिक भौगोलिक संरचना शैलोत्कीर्ण गुफाओं की बहुलता की दृष्टि से उल्लेखनीय है। इन गुफाओं का निर्माण तकनीक अघ्ययन का विषय है। इस स्थल में विकसित शैलोत्कीर्ण गुफा निर्माण के पश्चात परवर्ती काल में छत्तीसगढ़ में इस परम्परा के उदाहरण नहीं मिलते हैं। प्राचीन दक्षिण कोसल में शैलोत्कीर्ण गुहा स्थापत्य की परम्परा के अंतिम ज्ञात उदाहरण भरतपुर क्षेत्र में कल्चुरियों के काल तक मिलते हैं। छत्तीसगढ़ में 11-12वीं शताब्दी के पश्चात शैलोत्कीर्ण गुहा स्थापत्य का अवसान हो जाता है।
स्रोत संदर्भ :-
डॉ. कामता प्रसाद वर्मा,
भूतपूर्व उप संचालक संचालनालय संस्कृति एवं पुरातत्व रायपुर (छ0ग0)
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प्राचीन मथुरा में गज लक्ष्मी
October 17, 2025
कृष्ण का विश्वरूप: माध्यम -चित्रकला
October 16, 2025
कठपुतलियों की ऐतिहासिकता
October 15, 2025
अहोई अष्टमी : मातृत्व और संतान सुख का पर्व
October 12, 2025
हिमाचल प्रदेश में मंदिर निर्माण शैलियाँ
October 10, 2025
सुजननिकी (यूजैनिक्स): हिन्दुओं में विवाह प्रणाली का मूलभूत आधार-एक परिचर्चा
October 08, 2025
शिवलिंग की प्रतीकात्मकता
October 07, 2025
भारतीयता की पहचान
October 06, 2025
वीरता और त्याग की प्रतीक: रानी दुर्गावती
October 05, 2025
मेरे पिता लाल बहादुर शास्त्री
October 02, 2025
झालावाड़ संग्रहालय की दो अद्वितीय अर्द्धनारीश्वर और चामुण्डा नवग्रह मूर्तियाँ अर्द्धनारीश्वर
October 01, 2025
लोकदेवी पतई माता
September 30, 2025
गोलू – शक्ति का प्रतीकात्मक उत्सव
September 29, 2025
बागबाहरा कलां की तीन देवियाँ
September 27, 2025
इतिहास और लोकसाक्ष्य
September 26, 2025
बुचीपुर की महामाया माई
September 26, 2025
आदि शक्ति माँ सरई श्रृंगारिणी देवी
September 25, 2025
छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्ति स्थल
September 24, 2025
बिंझवार समाज की कुल देवी विंध्यवासिनी माई
September 23, 2025
जीवन काल में शक्ति संजोने का पर्व नवरात्रि
September 22, 2025
वाचिक परम्परा और लोक-विवेक
September 19, 2025
ब्रज के प्रमुख लोकवाद्य
September 18, 2025
छत्तीसगढ़ के सुघ्घर प्राकृतिक ठउर ओनाकोना
September 16, 2025
भारतीय प्राचीन कथाओं में सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना
September 13, 2025
गुजरात की काष्ठ कला
September 12, 2025
भारतीय संज्ञा प्रज्ञा विज्ञान का परिचय
September 11, 2025
वृन्दावन के पौराणिक ब्रह्मकुंड का साँझी मेला
September 10, 2025
“कैथल के स्मारक: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन”
September 09, 2025
झाँसी जनपद का इतिहास
September 08, 2025
पितर पूजन का पर्व : पितृ पक्ष
September 07, 2025
“ईन्द पर्वः झारखण्ड का विशिष्ट सांस्कृतिक उत्सव”
September 06, 2025
धर्म और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक : डॉ राधाकृष्णन
September 05, 2025
ओणम-दानशीलता का उत्सव
September 05, 2025
छत्तीसगढ़ी में हाना (मुहावरे/लोकोक्ति)
September 04, 2025
जब पर्वों के माध्यम से राष्ट्रीय जागरण किया गया
August 30, 2025
लद्दाख का सांस्कृतिक महत्त्व
August 29, 2025
भारतीय संस्कृति में स्वास्तिक शब्द
August 28, 2025
भारतीय संस्कृति का स्वरूप
August 27, 2025
बस्तर का तीजा व्रत एवं तीजा जगार
August 26, 2025
मानव संस्कृति और मैथिलीशरण गुप्त का काव्य
August 25, 2025
भारतीय संस्कृति की इन्द्रधनुषी उड़ान
August 24, 2025
भारतीय चिंतन में अवतारवाद
August 23, 2025
उड़िया लोक साहित्य
August 22, 2025
राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता और राम-भक्ति का विकास
August 21, 2025
वैदिक काल की सरस्वती नदी, जो लुप्त हो गई
August 20, 2025
पर्यटन और भारतीय साहित्य
August 19, 2025
थाईलैण्ड- भारतीय संस्कृति जहां आज भी जीवित है
August 18, 2025
यत्र विश्वं भवत्येक नीड़म्
August 17, 2025
मधुर नाद और मंगल ज्योति का केरलीय उत्सव-तृश्शूर पूरम
August 16, 2025
आज़ादी के लिए प्राणों की परवाह न करने वाली वनबाला दयावती : स्वतंत्रता दिवस विशेष
August 15, 2025
हिन्दू एवं बौद्ध धर्मों में मानव-कल्याण-चिन्तन तथा करुणा की विश्व-संस्कृति
August 15, 2025
"अखंड भारत दिवस 14 अगस्त" अखंड भारत के साधक पेशवा बाजीराव
August 14, 2025
संतान की कुशलता की कामना का पर्व
August 14, 2025
भोजपुरी लोकगीत-शैली : पवाँरा
August 14, 2025
हमारे सांस्कृतिक प्रतीक-स्वस्तिक और मंगल कलश
August 13, 2025
छोटा नागपुर में करम-पर्व
August 11, 2025
'सत्यं-शिवं-सुन्दरं' का आदर्श और हमारा जीवन
August 09, 2025
सामाजिकता और संस्कृति
August 08, 2025
सामाजिकता और संस्कृति
August 07, 2025
मध्य हिमालय की लोक संस्कृति
August 06, 2025
सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य एवं पुस्तकालय
August 05, 2025
नीलकंठ संस्कृति
August 04, 2025
इंडोनेशिया में भारतीय संस्कृति
July 30, 2025
नागपंचमी और नगमतिहा: गुरु मंत्र के जागरण की पावन परंपरा
July 29, 2025
इंद्र राजा और लोक अनुष्ठान
July 27, 2025
संगीत और नृत्य का संगम प्रो. कल्याणदास महंत
July 26, 2025
भारतीय शिक्षण परंपरा और नारी सम्मान का अद्भुत अभियान चलाने वाले : ईश्वर चंद्र विद्यासागर जी
July 20, 2025
जनिये बस्तर के घोटुल को
July 19, 2025
भारतीय संस्कृति में पक्षियों का स्थान
July 18, 2025
राजिमधाम की अधिष्ठात्री देवी माता राजिम
July 17, 2025
सरगुजा के लोकनृत्य का प्रमुख पात्र "खिसरा"
July 13, 2025
लोकसाहित्य में लोकसंस्कृति
July 08, 2025
हिंदवी स्वराज के जनक, शिवाजी महाराज: वीर रस के महाकवि भूषण की कलम से
June 17, 2025
जीवन काल में शक्ति संजोने का पर्व नवरात्रि
April 15, 2024
नव संकल्पों से हो नव वर्ष का स्वागत
April 09, 2024
भारत की सांस्कृतिक सेना के शिल्पी डॉ. हेडगेवार
April 09, 2024
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव रखने वाले डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार
April 01, 2024
भारत की ऋषि और कृषि चेतना का पर्व है होली
March 24, 2024
भारतीय इतिहास की हृदयविदारक घटना : शहीद दिवस
March 23, 2024
बसंती चोले के तीन राष्ट्रभक्त दीवाने
March 23, 2024
छत्तीसगढ़ी नाचा और गम्मत : हमारी धरोहर
March 21, 2024
ब्रज होरी आई रस भरी
March 13, 2024
समग्र क्रांति के अग्रदूत : महर्षि दयानंद सरस्वती
March 06, 2024
राष्ट्र संस्कृति से आप्लावित पण्डित दीनदयाल जी का राजनैतिक दर्शन
February 11, 2024
उंराव जनजाति है भगवान राम की वंशज
February 09, 2024
छत्तीसगढ़ी संस्कृति में रचे बसे लोकगीत
February 05, 2024
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता लाला लाजपत राय
January 28, 2024
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की स्वतंत्रता का गणतंत्र
January 26, 2024
श्रीराम भक्त स्वामी विवेकानंद
January 25, 2024
भारतीय संस्कृति के परम आदर्श एवं युग पुरुष श्रीराम
January 22, 2024
सामाजिक समरसता की पावन भूमि खल्लारी
January 19, 2024
एक सौ इकसठ वर्ष की कानूनी लड़ाई एवं महत्वपूर्ण घटनाक्रम
January 17, 2024
राजिम धाम में मकर संक्रांति की प्राचीन परम्परा
January 15, 2024
श्रीराम के अनन्य भक्त संत शिरोमणि जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य
January 14, 2024
स्वामी विवेकानन्द की धर्म की अवधारणा
January 12, 2024
अवध वहीं जहाँ राम गुण आचरण
January 10, 2024
राजिमधाम की अधिष्ठात्री देवी माता राजिम
January 07, 2024
मणिपुर का शेर बीर टिकेंद्रजीत सिंह
December 29, 2023
भारतीय सांस्कृतिक गौरव पर चिन्तन का माह है दिसम्बर
December 25, 2023
प्रखर राष्ट्रवादी स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती
December 23, 2023
सद्कर्म की प्रेरणा देती है भगवद्गीता
December 22, 2023
गोवा मुक्ति संग्राम में स्वयंसेवकों की भूमिका
December 19, 2023
संगीत और नृत्य का संगम प्रो. कल्याणदास महंत
December 14, 2023
अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति करने वाले : वीर नारायण सिंह
December 10, 2023
डॉ. आम्बेडकर का राष्ट्रवाद
December 06, 2023
मध्यकालीन अंधकार में प्रकाश पूंज गुरु नानकदेव
November 27, 2023
कार्तिक की कीर्ति कथा है आंवला नवमी
November 22, 2023
छत्तीसगढ़ का सुरहुति तिहार दीपावली
November 12, 2023
छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति का दर्पण है सुआ गीत
November 02, 2023
बस्तर अंचल में रामलीला मंचन की परम्परा
October 21, 2023
बिंझवार समाज की कुल देवी विंध्यवासिनी माई
October 19, 2023
आदि शक्ति माँ सरई श्रृंगारिणी देवी
October 15, 2023
ग्रामीण संस्कृति का केन्द्र पीपल चौरा
October 07, 2023
एकात्म मानववाद की विचारधारा देने वाले : पं. दीनदयाल उपाध्याय
September 25, 2023
छत्तीसगढ़ का प्रमुख पर्व : तीजा तिहार
September 18, 2023
हर जेल यात्रा में ग्रंथ तैयार करने वाले सेनानी साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी
September 09, 2023
मैय्या मोरी मैं नहीं माखन खायो
September 06, 2023
संतान की कुशलता की कामना का पर्व : कमरछठ
September 05, 2023
बीहड़ वन में गुफ़ा निवासिनी सुंदरा दाई
September 01, 2023
स्वतंत्रता आंदोलन में एस. सत्यमूर्ति का योगदान
August 19, 2023
अमृत काल में स्वामी विवेकानंद की प्रासंगिकता - पुस्तक चर्चा
August 19, 2023
अंगारों के हाथ न सौंपो फूलों के संसार को : स्व: हरि ठाकुर
August 16, 2023
रायपुर में सशस्त्र क्रांति का प्रयास
August 15, 2023
छत्तीस भाषाओं के ज्ञाता थे छत्तीसगढ़ के हरिनाथ डे
August 12, 2023
छत्तीसगढ़ों में से एक गढ़ : बिन्द्रानवागढ़
August 07, 2023
भारतीय शिक्षण परंपरा और नारी सम्मान का अद्भुत अभियान चलाने वाले : ईश्वर चंद्र विद्यासागर
July 28, 2023
उत्सवप्रिय छत्तीसगढ़ का हरेली तिहार
July 17, 2023
जनकपुरी से जुड़ा है हरेली का तिहार
July 16, 2023
राष्ट्रीय एकात्मता का प्रतीक : विवेकानन्द शिला स्मारक
July 05, 2023
अकबर की सेना के छक्के छुड़ाने वाली वीरांगना : रानी दुर्गावती
June 24, 2023
द स्वरस्वती इपोक : पुस्तक चर्चा
May 17, 2023
भारत के स्वतंत्रता सेनानियों पर स्वामी विवेकानंद का प्रभाव
May 11, 2023
राजकुमार सिद्धार्थ से बुद्ध होने की यात्रा
May 05, 2023
बाबा साहेब के व्यक्तित्व पर बचपन में मिले धार्मिक संस्कारों का प्रभाव
April 14, 2023
चिरमिरी बरतुंगा कालरी में 14 वीं शताब्दी का सती मंदिर
March 29, 2023
बुचीपुर की महामाया माई
March 27, 2023
बारहमासी लोकगीत : छत्तीसगढ़
March 18, 2023
रामसाय की सुरमोहनी भरथरी गायिका सुरुज बाई खांडे
March 12, 2023
भारतवर्ष का शाश्वत प्रतीक - स्वामी विवेकानन्द
January 12, 2023
जानिए बस्तर के घोटुल को
January 09, 2023
स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्रध्यान : विशेष आलेख
December 25, 2022
कैसा कलयुग आया
December 04, 2022
शौर्य और श्रृंगार का लोकनृत्य
November 28, 2022
इतिहास एवं पुरातत्व के आईने में महासमुंद
November 21, 2022
धर्म-संस्कृति रक्षक भगवान बिरसा मुंडा
November 15, 2022
राष्ट्ररक्षा का भाव ही वनवासी समाज का मूल स्वभाव
November 15, 2022
मनुष्य की पहचान उसके अच्छे गुणों से : गुरु नानक देव
November 08, 2022
भारतीय संस्कृति में गोमय का महत्व
October 25, 2022
छत्तीसगढ़ का पांच दिवसीय देवारी तिहार
October 23, 2022
शिव-पार्वती के विवाह का मंगलगान छत्तीसगढ़ी गौरा गीत
October 21, 2022
नारी मनोव्यथा की अभिव्यक्ति सुआ गीत
October 17, 2022
बागबाहरा कलां की तीन देवियाँ
October 07, 2022
जीवन का सुख
September 25, 2022
मुख से राम तू बोल के देख
September 18, 2022
छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक वैभव : भोजली गीत
September 09, 2022
नागरिक निर्माण में शिक्षकों की अकल्पनीय भूमिका
September 05, 2022
जब तक नहीं विचार मिलेगा : सप्ताह की कविता
September 04, 2022
छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक वैभव : बांसगीत
September 03, 2022
हेमाद्रि संकल्प और ऋषि पंचमी
September 01, 2022
याद रखनी चाहिए भारत विभाजन की त्रासदी
August 14, 2022
छत्तीसगढ में मित्रता का प्राचीन पर्व
August 12, 2022
छत्तीसगढ़ी कविताओं में मद्य-निषेध
June 26, 2022
विदेशी यात्रियों की दृष्टि में छत्तीसगढ़
May 26, 2022
कुल उद्धारिणी चित्रोत्पला गंगा महानदी
May 20, 2022
लोक मानस में रचा बसा पर्व : अक्षय तृतीया
May 04, 2022
पंडो जनजाति का लाटा त्यौहार
April 25, 2022
महानदी तट पर स्थित चंद्रहासिनी देवी
April 10, 2022
होली के रंग, प्रीत के संग
March 20, 2022
भगवा ध्वज लहराया है
March 13, 2022
पौराणिक आस्था का मेला शिवरीनारायण
March 03, 2022
बस राम लिखूं
February 27, 2022
विजयी भारत के प्रेरणास्रोत : छत्रपति शिवाजी महाराज
February 19, 2022
सरगुजा के लोकनृत्य का प्रमुख पात्र "खिसरा"
February 08, 2022
स्वतंत्रता संग्राम में पूर्वोत्तर की प्रतिनिधि यौद्धा : रानी गाईदिन्ल्यू
January 26, 2022
सोनाखान जमींदारी
January 19, 2022
संसार को भारत के ‘स्व’ से परिचित कराने वाले स्वामी विवेकानंद
January 12, 2022
दक्षिण कोसल के वनों की पहचान : साल वृक्ष
January 11, 2022
गोवा मुक्ति संग्राम में छत्तीसगढ़ की भूमिका एवं योगदान
January 06, 2022
कला एवं संगीत को समर्पित एशिया महाद्वीप का एकमात्र विश्वविद्यालय
December 28, 2021
गुरु घासीदास की जन्मस्थली गिरौदपुरी
December 18, 2021
अन्याय के प्रति लड़ने का संदेश देती है गीता
December 14, 2021
बाबासाहेब के निर्वाणकाल की व्यथा : पुण्यतिथि विशेष
December 06, 2021
लोक देवता करमपाठ
November 23, 2021
मध्यकालीन अंधकार में प्रकाश स्तंभ गुरु नानकदेव
November 19, 2021
छत्तीसगढ़ का सीतानदी अभयारण्य
November 17, 2021
भगवा ध्वज लहराए : सप्ताह की कविता
November 14, 2021
फणिनागवंशियों के नगर पचराही का पुरातात्विक वैभव
November 02, 2021
नित वाणी में तेज भरो माँ!
October 10, 2021
बहुआयामी प्रतिभा के धनी : डॉ बल्देव
October 06, 2021
पत्थर और छेनियाँ
October 03, 2021
भारत माता के बहादुर लाल : लाल बहादुर शास्त्री
October 02, 2021
नमामि गंगे
September 26, 2021
पंडित दीनदयाल उपाध्याय : एक युगदृष्टा
September 25, 2021
कोडाखड़का घुमर का अनछुआ सौंदर्य एवं शैलचित्र
September 21, 2021
राजभाषा के 72 साल : आज भी वही सवाल?
September 14, 2021
कृषि और ऋषि संस्कृति का लोक-पर्व : नुआखाई
September 11, 2021
रींवा उत्खनन से प्रकाशित मृतिका स्तूप
September 08, 2021
गौधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व पोला तिहार
September 06, 2021
माँझीनगढ़ के शैलचित्र एवं गढ़मावली देवी जातरा
September 04, 2021
बस्तर का बांस शिल्प
September 03, 2021
छत्तीसगढ़ में मैत्री का पारंपरिक त्योहार : भोजली
August 23, 2021
महादेव ने जहाँ पत्थर पर डमरु दे मारा : सावन विशेष
August 16, 2021
आज़ादी के लिए प्राणों की परवाह न करने वाली वनबाला दयावती : स्वतंत्रता दिवस विशेष
August 15, 2021
नागपंचमी के दिन गुरु मंत्र सिद्ध करने वाले नगमतिहा
August 13, 2021
जानिए मूल निवासी दिवस क्या है और मनाने की परम्परा क्यों प्रारंभ हुई?
August 09, 2021
सर्व अनिष्ट से ग्राम रक्षा का लोक पर्व सवनाही बरोई
August 04, 2021
केशकाल के प्राचीन शिवालय : सावन विशेष
August 02, 2021
एक ऐसा स्थान जहाँ के पत्थर बोलते हैं
July 20, 2021
अद्वितीय वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई : पुण्यतिथि विशेष
June 18, 2021
स्थापत्य कला में गजलक्ष्मी प्रतिमाओं का अंकन : छत्तीसगढ़
June 17, 2021
महाराणा प्रताप महान, अकबर नहीं : विश्लेषण
June 13, 2021
मैं धरती-आबा हूं! भगवान बिरसा मुंडा
June 09, 2021
सरोवरों-तालाबों की प्राचीन संस्कृति एवं समृद्ध परम्परा : छत्तीसगढ़
June 02, 2021
हिंदू धर्म उद्धारक शाक्यवंशी गौतम बुद्ध
May 27, 2021
भीषण गर्मी में प्यास बुझाता प्राकृतिक जलस्रोत गेल्हा चूआ
May 17, 2021
धन धान्य एवं समृद्धि के लिए कठोरी पूजा
May 08, 2021
राजिम त्रिवेणी स्थित कुलेश्वर मंदिर एवं संरक्षण प्रक्रिया
May 05, 2021
केवला रानी : देवार लोकगाथा
May 01, 2021
छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला में हनुमान
April 27, 2021
लोक देवी रामपुरहीन डोंडराही माता
April 22, 2021
सतबहनिया में से एक सियादेवी : नवरात्रि विशेष
April 20, 2021
जहाँ विराजी है मलयारिन माई : नवरात्रि विशेष
April 18, 2021
वन डोंगरी में विराजित गरजई माता : नवरात्रि विशेष
April 17, 2021
कलचुरी शासकों की कुलदेवी महामाया माई रायपुर : नवरात्रि विशेष
April 16, 2021
करेला भवानी माई : नवरात्रि विशेष
April 14, 2021
केरापानी की रानी माई : नवरात्रि विशेष
April 13, 2021
आराध्या भक्त शिरोमणी माता कर्मा
April 07, 2021
सामाजिक संदर्भ में लोक गाथा दसमत कैना
April 03, 2021
देश विदेश के डाक टिकटों में राम
March 26, 2021
खरदूषण की नगरी खरोद का पुरातत्वीय वैभव
March 22, 2021
छत्तीसगढ़ के प्राचीन मंदिरों की द्वारशाखा के सिरदल में विशिष्ट शिल्पांकनों का अध्ययन
March 19, 2021
आदिमानवों द्वारा निर्मित गुहा शैलचित्र : लहूहाता बस्तर
March 14, 2021
गढ़धनौरा गोबराहीन का विशाल शिवलिंग एवं पुन्नी मेला
March 11, 2021
जानी अनजानी कथा केशकाल की
March 07, 2021
छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला में बालि-सुग्रीव युद्ध का अंकन
March 03, 2021
रामायण साहित्यों में विज्ञान
March 01, 2021
राजिम मेला : ऐतिहासिक महत्व एवं संदर्भ
February 27, 2021
जैव जगत एवं पुरातत्व का सजीव संग्रहालय : बार नवापारा अभयारण्य
February 25, 2021
छत्तीसगढ़ के भरतपुर तहसील की शैलोत्कीर्ण गुफ़ाएं
February 23, 2021
मल्लालपत्तन (मल्हार) की स्थापत्य कला
February 21, 2021
बस्तर की मुरिया जनजाति का प्राचीन विश्वविद्यालय घोटुल
February 13, 2021
हमारी सांस्कृतिक धरोहरें एवं परम्पराएं
February 05, 2021
बस्तर की वनवासी संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग : साजा वृक्ष
February 01, 2021
छत्तीसगढ़ का एक ऐसा वन्यग्राम जहाँ गांधी जी की पुण्यतिथि को प्रतिवर्ष भरता है मेला
January 30, 2021
छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम 1857 से पूर्व प्रारंभ हुआ : विशेष आलेख
January 26, 2021
इन पुतरन के सीस पर वार दिए सुत चार : गुरु गोविन्द सिंह जी
January 20, 2021
स्वामी विवेकानंद एवं उनका भारत प्रेम : विशेष आलेख
January 12, 2021
लखनपुर में लाख पोखरा : तालाबों की नगरी
January 04, 2021
ओ थके पथिक! विश्राम करो, मैं बोधि वृक्ष की छाया हूँ
January 01, 2021
जशपुर के बाला साहब : जन्म दिवस विशेष
December 26, 2020
कोसल के कलचुरियों से बस्तर के सम्बन्ध
December 24, 2020
मित्रता की फ़ूलवारी : मितान
December 20, 2020
गुरु घासीदास जी के सात संदेश एवं बयालिस अमृतवाणियाँ
December 18, 2020
भारत को बाहरी विचारधाराओं, मजहबों की कोई आवश्यकता नहीं है : डॉ. बी. आर. अम्बेडकर
December 06, 2020
नानक नाम जहाज है, चढ़े सो उतरे पार : गुरु नानक जयंती विशेष
November 30, 2020
हरिहर मिलन का पर्व : बैकुंठ चतुर्दशी
November 29, 2020
करम डार परब : करमा
November 21, 2020
झांसी मेरी है, मैं उसे कदापि नहीं दूंगी : वीरांगना लक्ष्मी बाई
November 19, 2020
छत्तीसगढ़ के जनजातीय समाज में गौरी-गौरा पूजा की प्राचीन परम्परा
November 17, 2020
महाभारत के लेखक फ़ाउंटेन पेन के अविष्कारक
November 16, 2020
समय की मांग है भगवान बिरसा मुंडा का हूल जोहार : जयंती विशेष
November 15, 2020
छत्तीसगढ़ का प्रमुख जनजातीय पर्व : गौरी-गौरा पूजन
November 10, 2020
केशकाल का भव्य झरना : उमरादाह
November 08, 2020
नागा साधू द्वारा शापित नगर की कहानी
November 06, 2020
अरपा पैरी के धार, महानदी हे अपार : छत्तीसगढ़ निर्माण दिवस
November 01, 2020
जिनकी रगों में दौड़ती थी भारतभक्ति की लहरें : भगिनी निवेदिता
October 28, 2020
शक्ति का उपासना स्थल खल्लारी माता
October 27, 2020
जशपुर का परम्परागत दशहरा
October 26, 2020
कोसीर की महिषासुरमर्दनी देवी
October 25, 2020
महामाया देवी रतनपुर : छत्तीसगढ़
October 25, 2020
त्रिमूर्ति महामाया धमधा गढ़: छत्तीसगढ़ नवरात्रि विशेष
October 24, 2020
गांधी ने पहचानी थी भारत की पुरानी पूँजी
October 02, 2020
भारत माता के भक्त – भगत सिंह
September 28, 2020
पंडित दीनदयाल उपाध्याय : एक युग दृष्टा
September 25, 2020
वेब संगोष्ठी के अंतिम दिवस की रिपोर्ट
September 13, 2020
वेब संगोष्ठी के द्वितीय दिवस के सभी सत्रों की रिपोर्ट
September 11, 2020
तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम एवं द्वितीय सत्र की रिपोर्टिंग
September 08, 2020
पितर पूजन का पर्व : पितृ पक्ष
September 04, 2020
छत्तीसगढ़ के कण-कण में बसे हैं राम, यहां के लोगों की जीवन शैली राममय: सुश्री उइके
August 31, 2020
विष्णु के आठवें अवतार : योगेश्वर श्री कृष्ण
August 12, 2020
छत्तीसगढ़ी संस्कृति में मितान परम्परा
August 07, 2020
भगवान श्री राम की ऐतिहासिकता
August 05, 2020
राजगोंड़ समाज में राम
August 04, 2020
जंगल सत्याग्रह 1930 की वर्षगांठ : हरेली तिहार
July 20, 2020
दक्षिण कोसल की संस्कृति में पैली-काठा का महत्व
July 12, 2020
प्रकृति की अनुपम भेंट कांगेर वैली एवं उसकी अद्भुत गुफ़ाएं
July 08, 2020
भगवा ध्वज को गुरु का दर्जा : गुरु पूर्णिमा विशेष
July 05, 2020
छत्तीसगढ़ी लोक-संस्कृति में हाना
July 03, 2020
देश की अर्थव्यवस्था पर अंतराष्ट्रीय विशेषज्ञ श्री एस गुरुमूर्ति जी का वक्त्व LIVE
May 11, 2020
देवऋषि नारद : लोक-कल्याण संचारक और संदेशवाहक
May 06, 2020
आदि शंकराचार्य के जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ देने वाली घटना : जयंती विशेष
April 28, 2020
पंचायतन पूजा पद्धति एवं चतुर्मठ की स्थापना : आदि शंकराचार्य
April 28, 2020
दर्पण के ज़रिए समझिये समाज की सच्चाई
March 17, 2020
गुरु घासीदास केन्द्रीय विश्व विद्यालय में 5-6 नवम्बर को दो दिवसीय शोध संगोष्ठी
October 29, 2019
बीरनपाल की झारगयाइन देवी जातरा : बस्तर
October 20, 2019
बस्तर के सितरम गाँव का मंदिर जहाँ नाग हैं विरासत के पहरेदार
October 15, 2019
बारसूर का भुला दिया गया वैभव : पेदाम्मागुड़ी
October 07, 2019
बस्तर में शाक्त आस्था का केंद्र : माँ दंतेश्वरी
October 05, 2019
छत्तीसगढ़ में गाँधी का प्रवास व प्रभाव
October 02, 2019
बस्तर का तीजा व्रत एवं तीजा जगार
September 02, 2019
बावनमारी में लिंगो पेन (देव) का जन्म स्थल लिंग दरहा
August 17, 2019
भारतीय आदिवासियों में शिक्षा का प्रसार एवं वर्तमान स्थिति
August 09, 2019
छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन को गति देने में निर्णायक भूमिका निभाने वाले डॉ .खूबचन्द बघेल
July 19, 2019
बस्तर का गोंचा महापर्व : रथ दूज विशेष
July 04, 2019
रींवा गढ़ का पुरातात्विक उत्खनन
July 01, 2019
धरती के गर्भ से अनावृत हो रहा है प्राचीन नगर
June 26, 2019
अत्यावश्यक है प्राचीन पद्धति से वर्षा जल सरंक्षण
June 23, 2019
ताको नाम कबीर : कबीर पूर्णिमा
June 16, 2019
आर्य इन्वेंशन थ्यौरी और छोटू-बड़कू
June 01, 2019
दक्षिण कोसल का केदारनाथ शिवालय
May 30, 2019
ऐसा स्थान जहाँ जंगली भालू का कुनबा पीने आता है शीतल पेय
May 13, 2019
जब आपकी होली खत्म होती है तब इनकी शुरु होती है, जानिए कौन हैं ये
April 01, 2019
कोण्डागाँव का मावली मेला, जहाँ एकत्रित होते हैं देवी-देवता
March 14, 2019
ऐसा मेला जहाँ युवक-युवती गंधर्व विवाह के लिए हैं स्वतंत्र
March 05, 2019
"शुद्र कौन थे" अवलोकन एवं समीक्षा : डॉ त्रिभुवन सिंह
March 02, 2019
देखिए हिंगलाज देवी की भादो जात्रा (वीडियो)
February 09, 2019
जानिए कुंभ मेला कब से और क्यों भरता है?
February 07, 2019
ऐसे मनाया जाता है सरगुजा में लोकपर्व छेरता (छेरछेरा)
January 25, 2019
पूस पुन्नी भजन मेला : निराकार राम का साधक रामनामी सम्प्रदाय समाज
January 17, 2019
दक्षिण कोसल : कल और आज -1
January 13, 2019
स्वामीजी का वाङ्गमय पढ़कर मेरी देशभक्ति हजारों गुना बढ़ गई है : महात्मा गांधी
January 12, 2019
भक्त शिरोमणी माता राजिम जयंती पर विशेष
January 07, 2019
जानिए कौन हैं वो जो हर मौत के बाद पुराना मकान तोड़कर नया मकान बनाते हैं?
December 24, 2018
बस्तर की जनजातीय भाषा हल्बी के बारे में जानें
December 21, 2018
जानिए पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक कौन थे एवं कहाँ है उनकी जन्मभूमि?
December 14, 2018
राजा कर्ण जिनके राज्याभिषेक होने पर उनका कल्चुरी संवत प्रारंभ हुआ
December 13, 2018
क्या आपने भगवान विष्णु का युनानी योद्धा रुप देखा है?
November 22, 2018
छत्तीसगढ़ का जेठौनी तिहार
November 19, 2018
पौराणिक देवी-देवताओं की वनवासी पहचान : बस्तर
November 15, 2018
सूर्योदय से सूर्यास्त व जन्म से मृत्यु तक सर्वव्यापी राम
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April 20, 2026