गणपति उत्सव दर्पण के रचनाकार मेदिनी प्रसाद पाण्डेय
September 25, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल अष्टमी | रविवार
नक्षत्र: उत्तराषाढ़ा | योग: सुकर्मा | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 18 अक्टूबर 2026

भारतीय संस्कृति में अन्य प्राकृतिक उपादानों की तरह नदियों का भी अपना अलग महत्व है। वेद-पुराणों में नदियों की यशोगाथा विद्यमान है। नदियाँ हमारे लिए प्राणदायिनी माता की तरह हैं। नदियों के साथ हमारे सदैव से भावनात्मक संबंध रहे हैं, औऱ हमने नत-मस्तक होकर उनके प्रति अपनी श्रद्धा व आस्था का प्रदर्शन किया है।
नदियाँ केवल जल-प्रदायिनी एवं मोक्षदायिनी ही नहीं हैं, बल्कि संस्कारदायिनी भी हैं। जिस तरह शिशु माँ के सान्निध्य में अँगुली पकड़कर चलना सीखता है। उसी तरह नदियों के बहते जल का वेग हमें जीवन के हर मोड़ पर गतिशील बने रहने का संदेश देता है। माँ के ममत्व से जिस तरह बच्चे तृप्त होते हैं, उसी तरह पावन नदियों का जल ग्रहण कर हम अपनी तृष्णा की तृप्ति करते हैं। जिस तरह माँ के गोद में बच्चे स्वयं को सुरक्षित व संरक्षित महसूस करते हैं, उसी तरह नदियों के सान्निध्य में हम अपनी सभ्यता व संस्कृति को भी सुरक्षित व संरक्षित बनाए रखने में समर्थ होते हैं।
देव-संस्कृति, मानवीय संस्कृति, सृष्टि विकास की संस्कृति एवं लोक संस्कृति भी नदियों के कछारों, तटों एवं सौंधी माटी के बीच ही प्रस्फुटित और प्रफुल्लित हुई है। संसार की नदियाँ माता तुल्य हैं, इस संबंध में महाभारत के भीष्म पर्व (9/37/8) का यह श्लोक दृष्टव्य है- ‘विश्वस्य मातर सर्वा सर्वाश्चैव महाफलाः’।
मूल शब्द: भारतीय संस्कृति, छत्तीसगढ़, नदियाँ, महानदी, अरपा
परिचय
भारतीय सभ्यता और संस्कृति में नदियों का खासा महत्व रहा है। सभ्यता एक स्थान विशेष से जुडी होती है। उसके कर्म और व्यवहार सभ्यता का हिस्सा बनते हैं। एक अच्छी सभ्यता से समाज विकसित होता है और वह कुछ सिद्धान्त निर्मित करते हैं। जीवन के इन सिद्धान्तों में अव्वल होते हैं- प्रकृति से उसका लेना-देना, पंचतत्वों से उसका रिश्ता। ये सब मिलकर संस्कृति का निर्धारण करते हैं। दुनिया की तमाम सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति सिन्धु-गंगा-जमुना आदि नदियों के किनारों पर फली-फूली है। इसलिए हम खुद को ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ से जोड़ते हैं। देखा जाए तो नदी किनारे रहने वाले समाज के जन्म से मरण तक, जो भी संस्कार होते थे, उससे संस्कृति का निर्माण होता था। इसलिए नदियों का मानव सभ्यता के विकास में अमिट प्रभाव है। इसके बिना सभ्यता और संस्कृति की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। चाहे पुरानी मानव सभ्यताओं का जिक्र कर लें या नए शहरीकरण की बात करें, नदियों के बगैर कुछ भी मुमकिन नहीं है। भारत में नीर, नारी और नदी, तीनों का गहरा सम्बन्ध और सम्मान था। इन तीनों को हमारे ऋषि-मुनियों ने पोषक माना है। इसलिए नारी और नदी को माँ का दर्जा दिया गया है, और नीर, यानी जल को जन्म से ही जोड़कर देखा जाता है।
भारतीय संस्कृति में भी पोषण करनेवालों को ‘माँ’ और शोषण करने वालों को ‘राक्षस’ कहा गया है। देवता और दानव के बीच अन्तर की यह सोच, जो अनादिकाल से चली आ रही है, यहीं से आई है। दरअसल, नदियों के किनारे, नदियों के साथ, जो जैसा व्यवहार करता था, उसी के आधार पर उसे देवता या दानव, मनुष्य बोलने लगते थे।आज हम नदियों के किनारे जरूर हैं, किन्तु नदियों के करीब नहीं हैं। हमें इन्हें अपनी सभ्यता मानते हैं, किन्तु इनके साथ हम अपना व्यवहार मैला ढोने वाली गाड़ियों-जैसा करते हैं। देखा जाए, तो पहले जो एक दानव या कुछ दानवों की कुचेष्टा थी, आज वह पूरे समाज में व्याप्त हो गई है। आज वह कुचेष्टा पूरे समाज को रोगी बना चुकी है। इससे पहले कि नदियों को प्रदूषित कर इनसान शारीरिक व्याधियों का घर बने, नदियों को मैला ढ़ोने वाली गाड़ियाँ बनाने की बुरी सोच ने ही इनसान को मानसिक रोगी बना दिया है। जब यह काम एक पूरा समाज करता है, तो वह नदियों की सभ्यता में आई गिरावट का मानक होता है। इसलिए आज जब हम अपने आस-पास की नदियों का अवलोकन करते हैं, तो ऐसा लगता है कि हमने अपनी सभ्यता और संस्कृति को ही भुला दिया है। जल हमारा जीवन तो है, लेकिन हम उस जीवन का दोहन करते हैं। नदी और नारी के प्रति सम्मान में भयंकर ह्रास आया है, यानी समाज में ‘माँ’ का स्थान ही संकट में है। इस स्थिति में हम जिस विकासवाद की बातें करते हैं, वे हमें विनाश की ओर ही ले जाएँगे।
आज हम जल-संरक्षण, वर्षा-जल संचयन की लम्बी-लम्बी बातें करते हैं, लेकिन इन सबके मूल में यही है कि प्रकृति की धारा, यानी नदी से हमारा रिश्ता सुधरे और पुराने रूप में आए। क्या हम इसके लिए तैयार हैं? शायद नहीं। क्योंकि जहाँ एक तरफ लम्बी-चौड़ी योजनाओं का दावा है, वहीं दूसरी तरफ पोल खोलती हकीकत भी है कि नदियों की स्वच्छता, अविरलता के नाम पर करोड़ों रूपये फूँके गए, लेकिन अब भी उसमें कल-कारखानों के कचरे बगैर परिशोधन के गिरते है।
नदियों के प्रति जो हमारी आस्थाएँ हैं, उनके मूल में कहीं-न-कहीं इनको पोषक मानने का भाव है, उनको स्वच्छ, निर्मल और अविरल रखने की सोच है। बेशक आस्था में वे आडम्बर न हों, जिनसे नदियाँ मैली होती हैं। लेकिन नदियों के किनारे जाकर उन्हें पूजने का महत्त्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है। इसलिए हम अपनी ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ में आए ह्रास की भरपाई तभी कर सकते हैं, जब हम नदियों से आस्था और वैज्ञानिक समझ के साथ जुड़ेंगे। इसलिए इसमें सबकी भागीदारी को जोड़ना होगा।
छत्तीसगढ़ की नदियाँ और उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक महत्ता
भारत के हृदय में स्थित छत्तीसगढ़ में समृद्ध सांस्कृतिक पंरपरा और आकर्षक प्राकृतिक विविधता है। यदि हम वर्तमान छत्तीसगढ़ एवं पूर्व के दक्षिण कोसल पर दृष्टि डालें तो हमें ज्ञात होता है कि छत्तीसगढ़ नदियों की जल-सम्पदा से परिपूर्ण है और यहाँ छत्तीसगढ़ की गंगा कही जाने वाली महानदी, बस्तर की भाग्य-विधात्री इन्द्रावती, सदानीरा शिवनाथ, सोन, खारून, रेण, अरपा, पैरी, जौंक, हसदो, माड़, ईव, कैलो, शबरी, नारंगी, शंखिनी, डंकनी, कोतरी, संकरी, मनियारी, मदंगा, नर्मदा, गोदावरी आदि अनेक ऐसी नदियाँ हैं, जो छत्तीसगढ़ की भूमि को उर्वरा बनाकर कृषि-संस्कृति को परिपुष्ट बनाती हैं। इन नदियों से संबंधित अनेक जल-प्रपात एवं बाँध छत्तीसगढ़ के धान के कटोरे को सदा सींचते रहते हैं, और छत्तीसगढ़ को विद्युत भी प्रदान करते हैं।
महानदी
छत्तीसगढ़ की महानदी भारत की महान नदियों में से एक है औऱ इसका अपना एक अलग पौराणिक, आध्यात्मिक, व्यापारिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक इतिहास है। महानदी के उद्गम के संबंध में कतिपय पौराणिक आख्यान व जन-श्रुतियाँ भी प्रचलन में हैं। महानदी का उल्लेख महाभारत के भीष्म पर्व 9/34, मार्कण्डेय पुराण 57/22, वामन पुराण 13/26, पद्म पुराण 83/48 में उपलब्ध होता है।
महानदी का नाम पैरी संगम के बाद चित्रोत्पला होने का राजिम महात्म्य में स्पष्ट उल्लेख है। रिजर्ड जैकिन्स के अनुसार 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में महानदी का नाम चित्रोत्पला अस्तित्व में था। कनिंघम के अनुसार महाभारतकालीन शासक चित्रवाहन या उसकी पुत्री चित्रोत्पलावती के नाम के आधार पर महानदी का नाम चित्रोत्पला पड़ गया। राजिम महात्म्य में यह भी उल्लेख मिलता है कि महानदी का पैरी अर्थात् प्रितोद्धारिणी के संगम के पूर्व का नाम उत्पलेश है और चित्रोत्पला उसके बाद का नाम है। डॉ. विष्णु सिंह ने अपने राजिम नामक ग्रन्थ में उल्लेख किया है कि सोमेश्वर देव वर्मन के महदा ताम्रपत्र में महानदी का नाम चित्रोत्पला अंकित है। ऐतिहासिक भूगोल के पृष्ठ 54 में अंकित है कि इस एक नदी की धारा दो भागों में विभाजित थी, जो भिन्न-भिन्न नामों से जानी जाती थी। पं. तुलसीप्रसाद शर्मा ने उल्लेख किया है कि गणेश घाट सिंहावा में भगवान का जलहरी चित्र अंकित है, जिसे भगवान श्रीराम ने स्वयं स्थापित किया था। इसके ऊपर पानी बहने से इसका नाम चित्रोत्पला पड़ा। गणेशघाट पर गणेश जी की मूर्ति होने के कारण इसे गणेशघाट कहा जाने लगा।
महानदी का उद्गम स्थल सिंहावा किसी समय ऋषि-मुनियों की तपश्चर्या का केंद्र था और इस पर्वत पर सप्त ऋषियों ने कठोर तप किया था। श्रृंगी ऋषि, अगस्त ऋषि, मुचकुन्द ऋषि, अंगिरा ऋषि, लोमश ऋषि, शरभंग ऋषि, कंक ऋषि आदि ने अपने आश्रम बनवाये थे और यह पर्वत धार्मिक एवं आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख केन्द्र था।
महानदी की उत्पत्ति के संबंध में जन-श्रुति है कि एक बार सिंहावा के ऋषि-मुनियों ने गंगा-स्नान करने की योजना बनाई और इस यात्रा में उन्होंने श्रृंगी ऋषि को भी शामिल करना चाहा। किन्तु श्रंगी ऋषि योग साधना में लीन होने के कारण इस यात्रा में शामिल नहीं हो सके। गंगा-स्नान कर जब ऋषि-समूह वापिस आया तो उन्होंने अपने साथ लाये गंगा जल को श्रंगी ऋषि पर छिड़क दिया। ऋषि का ध्यान भंग हुआ तो उनका पाँव पास में रखे कमण्डल से टकरा गया और कमण्डल में भरा गंगा जल कमण्डल के लुढ़क जाने से सिंहावा पर्वत की ऊँचाई से नीचे तक गिरता चला गया और गणेश घाट तक पहुँच गया। गणेशघाट बड़ा ही रमणीक स्थल है। इस स्थल पर महानदी की चौड़ाई सबसे कम है। महानदी अपने प्रवाह के साथ-साथ देव-संस्कृति एवं पुरातात्विक सम्पदा को भी उद्घाटित करती चली है। गणेश घाट में एक विशाल प्रस्तर में गणेश जी की मूर्ति अवस्थित है, जिसकी नियमित पूजा-अर्चना की जाती है। यहाँ अन्य देवी-देवताओं की भी मूर्तियाँ हैं, जिनमें एक चतुर्भुज हनुमान जी की भी मूर्ति है। कहा जाता है कि गणेश घाट के ऊपर किसी तपस्वी का आश्रम था। यहाँ के लोक-जीवन में मोकला माँझी की गाथा भी प्रचलित है। (कर्णेश्वर धाम महिमा पृष्ठ 10) डॉ. नरेश सिंह बघेल।
महानदी के प्रवाह से संबंधित एक किम्वदन्ती है कि श्रृंगी ऋषि का पाँव कमण्डल में लगने से गंगा जी कुपित हो उठी थीं और वे बड़े वेग के साथ प्रवाहित होने लगीं। सिंहावा से बहने वाली धारा को महामाया कहा गया, जो पूर्व में फरसिया गांव तक पहुँच गईं। फरसिया में महामाया का भव्य मंदिर है। श्रृंगी ऋषि को महानदी अर्थात महामाया का उसी दिशा में निरंतर प्रवाहित होना शुभ नहीं लगा और उन्होंने महानदी को समझाया कि वे क्रोधित होकर नहीं, बल्कि शान्त भाव से बहें और अपने बहने की दिशा परिवर्तित कर दें। इससे उन्हें मान-सम्मान व यश प्राप्त होगा औऱ उनका लोक-मंगलकारी स्वरूप सामने आएगा। अतः श्रृंगी ऋषि के आग्रह पर महानदी को वापिस आना पड़ा। उनके वेग को देखकर श्रृंगी ऋषि को लगा कि कहीं ऐसा न हो कि यह नदी क्रोध में आकर सिंहावा पर्वत को ही कहीं न बहा ले जावे? अतः उन्होंने महानदी को प्रवाहित होने की दिशा का ज्ञान कराया। श्रृंगी ऋषि के परामर्श से महानदी पश्चिम दिशा में दुधावा, कांकेर, रुद्री, गंगरेल, डोंगाघाट से राजिम की ओर प्रवाहित हुई। महानदी का सीता नदी एवं बालुका (बाल्मीकि) नदी से मिलन सिंहावा पर्वत के निकट ही हो गया था और महानदी इन दोनों नदियों की जल-राशि को भी स्वयं में समाहित कर अपने गन्तव्य की औऱ बढ़ चली थी। महानदी अपने बाँधों को समेटे हुये ग्रामों के डुबान की भी कथा कहते हुए चलती हैं। देवखूँट ग्राम आज दुधावा बाँध के कारण डुबान में आ गया है।
आज से लगभग सौ साल पूर्व यह देवखूँट गाँव एक पावन गाँव के रूप में विख्यात था। यहाँ नदी के ऊपर चार मन्दिर थे। दो बड़े मन्दिर थे। इनमें से एक मन्दिर से छोटा सा शिलालेख है, जिसके ऊपर वाघराज अंकित हैं। वाघराज 12वीं-13वीं शताब्दी में काँकेर का राजा था। सिंहावा का एक ग्राम साँकरा है। यहाँ की भूमि अच्छी उर्वरा है और यहाँ दो फसलें ली जा सकती हैं। इस उर्वरा भूमि का सिंचन महानदी ही करती है। यहाँ एक प्राचीन किला भी है।
नगरी के पास महानदी के डूब क्षेत्र में हजार वर्ष पुराने विष्णु एवं शिव मंदिर के अवशेष मिले हैं, जो यहाँ की पुरातात्विक सम्पन्नता की पुष्टि करते हैं। महानदी, नगरी मुख्यालय से लगभग 30 किमी. दूर दक्षिण-पूर्व दिशा में घने वनों से आच्छादित दुर्गम पहाड़ियों के मध्य से प्रवाहित होती है। देवखूँट के विष्णु व शिव मन्दिर के पुरावशेष वर्षों से जल-निमग्न थे जिनमे से केवले शिव के मन्दिर का शीर्षस्थ भाग ही बाहर दिखलाई पड़ता था। प्राचीन समय की चारो ओर बिखरी ईंटें यहाँ ईंट के मन्दिर का संकेत करती हैं। बिखरी पुरातात्विक सामग्री में उमा-महेश्वर की अत्यंत कलात्मक चतुर्भुजी प्रतिमा मिली है, जो अपने आयुधों व वाहनों के साथ सुसज्जित हैं। इस प्रतिमा में शिव का समस्त परिवार विद्यमान है।
यहाँ विष्णु मन्दिर के पुरावशेष के साथ गरुड़ासन्न लक्ष्मी-नारायण की गदा, शंख, चक्र धारी प्रतिमा भी मिली है। विष्णु अभय मुद्रा में जबकि लक्ष्मी जी चक्र, पदम्, शंख लिए वरद मुद्रा मंण हैं। पुरातत्त्वविद् डॉ. हेमू यदु इस प्रतिमा को दसवीं शती के आसपास की मानते हैं। यहाँ मिली कुछ अन्य प्रतिमाओं को देखकर अनुमान होता है कि ये प्रतिमायें दो अलग काल-खण्डों की हैं।
महानदी और उसकी सहायक नदियों में अनेक बाँध बनाये गए हैं, जो इस क्षेत्र की विस्तृत कृषि-भूमि को सिंचित करते हुए यहाँ के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं।
बिलासपुर की प्रमुख नदियाँ और उनके तट पर बसे तीर्थ
बिलासपुर भारत के छत्तीसगढ़ राज्य का एक जिला है। इसका मुख्यालय बिलासपुर शहर है जो राज्य की राजधानी नया रायपुर से ९२ किलोमीटर उत्तर में स्थित है तथा प्रशासनिक एवं शहरी दोनों क्षेत्रों में राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। ऐतिहासिक रूप से बिलासपुर, रतनपुर के कलचुरी राजवंश का भाग था। आज के बिलासपुर शहर का मूल रूप १७७४ के आप-पास मराठा राजवंश के समय आया था। यह शहर समुद्री तल से औसतन २६४ मीटर (८६६ फीट) ऊंचाई पर है। वर्षाकालीन अरपा नदी इस जिले की जीवनरेखा मानी जाती है, जो मध्य भारत के मैकल पर्वत श्रेणियों से उद्गमित होती है। इस जिले की अन्य प्रमुख नदियां लीलागर और मनियारी हैं।
अरपा नदी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान
देवी- देवताओं की तरह नदियों की अपनी विशेषता होती है। नदियां, प्रकृति की अनुपम कृति मानी जाती हैं जो पेड़, पौधों से लेकर जीव, जंतुओं और मानव जीवन के लिए यह संजीवनी की भूमिका निभाती हैं।
छत्तीसगढ़ मे वैसे तो कई नदियां है, लेकिन अरपा नदी को बिलासपुर की जीवनदायनी कहा जाता है। अरपा नदी का उद्गम स्थल पेंड्रारोड मे एक किसान के खेत से माना जाता है। पेंडरारोड से निकलने वाली ये नदी शिवनाथ नदी की सहायक भी मानी जाता है। कहा जाता है कि अरपा नदी करीब सौ किलोमीटर के लंबे सफर को तय कर बरतोरी नामक जगह से कुछ दूर ठाकुरदेवा मे जाकर शिवनाथ नदी मे मिल जाती है।
इस सफर के दौरान अरपा नदी बिलासपुर जिले से होकर गुजरती है। इस नदी के बारे मे कहा जाता है कि ये बरसात के दिनों मे ही अपने जीवंत रूप धरती पर दिखाई देती है। बाकी समय ये अपने उद्गम स्थल से नीचे बहती है। बिलासपुर कि जीवनदायनी अरपा नदी आज अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है।
अरपा नदी बिलासपुर का गौरव होने के साथ साथ छत्तीसगढ़ का भी गौरव है। यह प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान है। छत्तीसगढ़ का राज्य गीत अरपा के उल्लेख से शुरू होता है। बिलासपुर में अरपा नदी किनारे पाषाण काल के अवशेष मिले हैं। इनमें पत्थर के औजार हैंडेक्स, क्लिवर, प्वाइंट्स और अन्य चीजें शामिल हैं।
अरपा में घाट की संस्कृति
अरपा में घाट की संस्कृति, इंसानी बसाहट की तरह पुरानी है। घाट व्यवस्था सामाजिक तौर पर की जाती रही है। पचरीघाट के पास जनकबाई घाट अपनी पुरातन संस्कृति की याद दिलाती है। हालांकि इसके लोकार्पण का पत्थर गायब हो चुका है और वक्त के निर्मम थपेड़ों ने घाट को जीर्ण जीर्ण दशा में पहुंचा दिया है। ब्रितानीराज में इसकी स्थापना शंकर राव बापते, गोविंद राव बापते(अब स्वर्गीय) के परिवार ने की। इसके लोकार्पण पर अरपा तट की साज सज्जा की तस्वीर बापते परिवार के पास वर्षों तक रही। दिनचर्या से लेकर समस्त संस्कारों के दौरान जमाने से यह घाट एक समाज के मिलन स्थल बने रहे। पचरीघाट जूना बिलासपुर की स्थाई पहचान है।
अरपा की कहानी दुखांत मोड़ पर पहुंच गई है। उसकी यह दशा उस पर आश्रित आबादी ने की है। बेटा जब अपनी मां की भावनाओं का निरादर करता है, तो वह उसकी करुण छाया से वंचित हो जाता है। यही हालत पेंड्रा से बिलासपुर तथा संगम मंगला पासीद तक आने वाले शहर, गांवों में निवास करने वाले लाखों लोगों की है।
निष्कर्ष
नदी किनारे रहने वाला समाज के, जन्म से मरण तक, जो भी संस्कार होते हैं, उससे संस्कृति का निर्माण होता है। इसलिए नदियों का मानव सभ्यता के विकास में अमिट प्रभाव है। दरअसल, नदियों के किनारे, नदियों के साथ जो जैसा व्यवहार करता था, उसी के आधार पर उसे देवता, दानव या मनुष्य कहा जाता था।
छत्तीसगढ़ की नदियाँ, इस प्रदेश के लिए वरदान की तरह हैं जिनके अवदानों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। यदि महानदी छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा है, तो इन्द्रावती आदिवासी संस्कृति एवं जीवन की भाग्य विधात्री है। छ्त्तीसगढ़ को धान का कटोरा बनाने वाली यहाँ की विभिन्न नदियाँ ही हैं। छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में नर्मदा नदी की सहायक ‘बंजर’ नदी भी प्रवाहित हो रही है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ को यहाँ की नदियों का वरदान प्राप्त है।
छत्तीसगढ़ में औद्योगिक विकास निरन्तर बढ़ रहा है जिसके के कारण यहाँ की नदियां प्रदूषित हो रही हैं। कल-कारखानों से निकलने वाले विभिन्न प्रकार के विषैले पदार्थ एवं गन्दा जल नदियों के पानी के में मिल रहे हैं, जो इंसानों के साथ तमाम प्राणियों एवं जीव-जन्तुओं के लिए खतरनाक सिद्ध हो रहा है। यदि हमारी नदियाँ स्वच्छ, निर्मल, समृद्ध रहेंगी तो हम भी समृद्ध रहेंगे और हमारी सभ्यता और संस्कृति भी वैभवपूर्ण रहेगी। वस्तुतः नदियाँ ही हमारी ऊर्जा एवं जीवनदायिणी शक्ति हैं, जिसकी सुरक्षा, संग्रहण एवं संवर्धन करना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है।
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संघर्ष, साधना और विजय: निराला की कालजयी कृति ‘राम की शक्ति पूजा’
October 17, 2026
शारदीय नवरात्रि: छत्तीसगढ़ के सोनपैरी और लचकेरा ग्राम की लोकपरम्पराएँ
October 17, 2026
छत्तीसगढ़ में शाक्त परंपरा: वैदिक और लोक-आस्था का संगम
October 17, 2026
चौहान सम्राटों की इष्टदेवी: महाशक्ति चामुण्डा
October 16, 2026
जनजातीय युवती वल्ली और भगवान कार्तिकेय का विवाह
October 16, 2026
शत्रु पर विजय का वरदान प्राप्त होता है बगुलामुखी देवी मन्दिर
October 15, 2026
विज्ञान, मानवीय संवेदना एवं राष्ट्र के प्रेरणापुंज - डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
October 15, 2026
भील जनजाति की लोकआस्था में रायकुंडा की महिषासुरमर्दिनी
October 15, 2026
सप्तमातृका: छत्तीसगढ़ और बस्तर की शक्ति परम्परा
October 15, 2026
हाड़ौती अंचल के प्रमुख देवी मन्दिर
October 14, 2026
प्रतियोगी परीक्षा की विफलता से राष्ट्रपति पद तक: डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी की जीवन यात्रा
October 14, 2026
डंगचघिन दाई : दारिका नटनी की समाधि से लोकदेवी तक
October 13, 2026
राजा विक्रमादित्य की आराध्या: हरसिद्धी देवी
October 12, 2026
शक्ति उपासना का पर्व नवरात्र
October 11, 2026
सर्वपितृ अमावस्या: तर्पण और श्राद्ध का महात्म्य
October 10, 2026
भारतीय डाक सेवा की ऐतिहासिक यात्रा
October 09, 2026
पितृपक्ष: लोकजीवन में पुरखों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का पर्व
October 09, 2026
भारतीय ज्ञान परम्परा में सामाजिक समरसता
October 08, 2026
बैगा समुदाय में बच्चों के खेल
October 07, 2026
सौम्यता: भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव
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