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जनजातीय समाज द्वारा इस्लामी आक्रमण का प्रतिकार

जनजातीय समाज द्वारा इस्लामी आक्रमण का प्रतिकार

जब हम भारत के स्वाधीनता संग्राम की चर्चा करते हैं, तो अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध अपने संघर्ष का ही ब्यौरा देते हैं। इस दौरान हम अपने उस संघर्ष को विस्मृत कर देते हैं, जो हमने 9वीं सदी से 18वीं सदी तक इस्लामी आक्रमणकारियों के विरुद्ध किया था। और अंग्रेजों के विरुद्ध भी अपने संघर्ष का इतिहास हम 1857 से 1947 तक का ही बताते हैं। तो क्या उसके पहले मध्य काल में मुगलों के विरुद्ध कोई स्वाधीनता के लिए लड़ाई नही लड़ी गई? हममें से यदि आज ज्यादातर लोगों को इसका पता नहीं है, तो इसका कारण भी इतिहास के प्रति हमारी दोषपूर्ण दृष्टि ही है। इस दोषपूर्ण दृष्टि के अनेक दुष्प्रभाव हमें आज भी लोक में दिखलायी पड़ते हैं।


अंग्रेजो के विरुद्ध 1857 क्रांति

यह सब क्यों हुआ, क्योंकि इतिहास को देखने का हमारा दृष्टिकोण ही गलत रहा है। और इसीलिए इतिहास में जनजातीय समाज के योगदान को जानने के अपने प्रयासों में भी हम इन बातों पर विचार नहीं कर पाते। अतएव अब हम पहले जनजातीय समाज द्वारा इस्लामी आक्रमण के प्रतिकार में दिए गए योगदानों पर चर्चा करेंगे।

जनजातीय समाज द्वारा इस्लामी आक्रमण का प्रतिरोध: जैसा कि हमने अभी ही कहा कि जब हम भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की बात करते हैं, तो लगभग 900 सालों के इस्लामी आक्रमण और सल्तनतों के समय के संघर्ष को भूला देते हैं। पर हमारे इतिहास का यह बड़ा ही महत्त्वपूर्ण काल है। भारत ने इस्लाम का जो प्रतिरोध किया, वह विश्व में अभूतपूर्व था।

राजपूताने में मेवाड़ राजकुल, दक्षिण में विजयनगरम् साम्राज्य और दक्कन में शिवाजी के नेतृत्व में संघर्ष को फिर भी अब काफी सम्मान मिलने लगा है। लेकिन लोग अब भी नहीं जानते कि कैसे राजपूताने में भीलों ने मुगलों को जीतने नहीं दिया। भारत के मध्यवर्ती भाग में गोंडों ने मुगलों का जिस वीरता से सामना किया, वह भी इतिहास में धूँधला-सा हो गया है। पर लोकगाथाओं ने हमारे इतिहास के उन उजले पृष्ठों को बचाकर रखा है, जिनके माध्यम से हम राणा पुंजा भील, रानी दुर्गावती सरीखे जनजातीय योद्धाओं के वीरतापूर्ण संघर्ष का विवरण पाते हैं।

महाराणा प्रताप और पुंजा भील - अकबर द्वारा चित्तौड़गढ़ पर अधिकार करने के बाद महाराणा प्रताप के सामने बहुत-सी आपत्तियाँ खड़ी हुई। अकबर के विरुद्ध संघर्ष के काल में उनके सगे सम्बन्धियों, यहाँ तक कि उनके भाई शक्तिसिंह ने भी उनका साथ छोड़ दिया था।

हल्दीघाटी का युद्ध: महाराणा प्रताप और राजा मान सिंह का इतिहास
महाराणा प्रताप और अकबर की सेना के बीच युद्ध

महाराणा प्रताप जंगलों में भटक रहे थे, तभी उन्हें पुंजा भील मिले। पुंजा भील ने उन्हें दिलासा दिया कि वे चिन्ता न करें और भील उनके साथ हैं। वे मुगलो से लड़ेंगे। इसके बाद हल्दीघाटी का प्रसिद्ध युद्ध हुआ, जिसके बारे में भला कौन नहीं जानता।

युद्ध के दौरान चेतक की टांग टूट गई। महाराणा प्रताप को युद्धभूमि छोड़ना पड़ा। एक ओर लाखों की संख्या में मुगलिया फौज तो दूसरी ओर कुछ हजार भील योद्धा। पर मुगलों को जीत नहीं मिल सकी।


महाराणा प्रताप के साथ जनजातीय भील योद्धा।

इतिहास में हम यही पढ़ते हैं कि हल्दीघाटी का युद्ध अनिर्णित रहा, पर क्या वास्तव में ऐसा था? नहीं, क्योंकि भले ही इस युद्ध में मुगलों की हार नहीं हुई, पर कुछ हजार लड़ाकों ने उनकी लाखों की सेना को जीतने भी नहीं दिया। और तभी हम गीत गाते हैं कि

गूँज उठी थी हल्दीघाटी घोड़ों की इन टापों से।
भीलों की एक सेना लेकर राणा लड़ता मुगलों से॥

तो पुंजा भील के नेतृत्व में भीलों का यह योगदान क्या स्वतंत्रता का संघर्ष नहीं कहा जाना चाहिए?

महारानी दुर्गावती: भारत के मध्यवर्ती प्रदेश में गोंडों का साम्राज्य था। इसके अन्तर्गत ही गढ़ा मण्डला की रानी थी दुर्गावती। उस दौर में अकबर से सन्धि कर उसका दरबारी बनना प्रतिष्ठा का विषय माना जाने लगा था। आमेर के राजा भारमल ने तो सन्धि करने के लिए अपनी बेटी का विवाह ही अकबर से कर दिया था। पर महारानी दुर्गावती को जब यह सन्देश मिला कि मुगल बादशाह को उनके राज्य से कोई मतलब नहीं है, बस सन्धि के रूप में अपना हाथी भेट करे तथा अपने मन्त्री आधार सिंह को मुगल दरबार में भेजें। शर्त बड़ी सरल थी। कोई बड़ी हानि भी नहीं थी। लेकिन महारानी दुर्गावती ने इन शर्तों को मानने से इंकार कर दिया था। क्यों? क्योंकि उनके पूर्वजों ने ही गजनी को हराया था, तो भला सन्धि कर वह अपनी मातृभूमि के गौरव को धूल में कैसे मिला सकती थी।


गढ़ मंडला का मदन महल

उन्होंने युद्ध किया। यह युद्ध हल्दीघाटी के युद्ध से भी 8 साल पहले लड़ा गया था। हाथों में तलवारें लिए वे मुगल सेना का साक्षात् दुर्गा बनकर संहार करने लगी। मुगल सैनिक भौंचक्के-से रह गए थे। लेकिन महारानी के पक्ष में संख्याबल नहीं था। महारानी दुर्गावती ने वीरगति प्राप्त की। इसके पहले उन्होंने 12 साल शासन किया। और उनके शासनकाल में यदि हम गोंड साम्राज्य के कर प्रणाली, जलसंग्रहण की व्यवस्था, न्यायप्रियता, प्रजावत्सलता आदि का अध्ययन करें, तो हर क्षेत्र में दुर्गावती खरी उतरती हैं।


रानी दुर्गावती और अकबर की सेना

किन्तु हममें से कितने महारानी दुर्गावती के बारे में वैसा ही जानते हैं, जैसा हम झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के बारे में जानते हैं? झाँसी की रानी पर तो टीवी सीरियल बने, फिल्म बनी; पर क्या रानी दुर्गावती पर बनी? नहीं बनी। इसलिए लोगों का ध्यान भी उनकी ओर नहीं गया। पर इससे यह नहीं झूठलाया जा सकता कि भारत में जब-जब विदेशी आक्रमण हुए, जनजातीय समाज ने उनका पूरजोर प्रतिकार किया। और न केवल लड़े बल्कि सब मिलकर लड़े।
 

लेख:
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर,
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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