अवसाद और मानसिक अस्थिरता के कालखण्ड में : युवाओं के समक्ष स्थितप्रज्ञ राम का आदर्श
May 06, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार
नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

ओडिशा के पवित्र श्रीक्षेत्र पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मान लेना इसके वास्तविक स्वरूप को सीमित करना होगा; असल में यह भारतीय संस्कृति की उस समावेशी विचारधारा का जीता-जागता प्रमाण है जो सबको साथ लेकर चलती है। प्रस्तुत लेख इसी ऐतिहासिक महापर्व के बहुआयामी स्वरूप पर एक विस्तृत विमर्श है। इसमें इस बात पर गहराई से प्रकाश डाला गया है कि किस तरह यह उत्सव राजसत्ता, आम जनमानस और स्थानीय परंपराओं को एक ही धागे में पिरोता है।
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति उसकी समन्वय और समावेशी भावना है। यहाँ धर्म पूजा अथवा अनुष्ठानों तक सीमित रहने के स्थान पर समाज, कला, लोकजीवन, नैतिक मूल्यों तथा सांस्कृतिक एकता को जोड़ने वाली जीवन दृष्टि बन जाता है। इस परम्परा का बड़ा उदाहरण ओड़िशा के पवित्र श्रीक्षेत्र पुरी में हर वर्ष मनाई जाने वाली श्रीजगन्नाथ रथयात्रा है। यह महोत्सव भारतीय सभ्यता की लोकआस्था, सामाजिक समरसता तथा सांस्कृतिक समावेशिता का सार्वजनिक प्रतीक है।

आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को महाप्रभु श्रीजगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रत्नसिंहासन से उतरते हैं। वे विशाल रथों पर सवार होकर बड़ादांडा मार्ग से गुण्डिचा मन्दिर की ओर प्रस्थान करते हैं। उस समय पूरा पुरी शहर एक बड़े गतिशील तीर्थ में बदल जाता है। ईश्वर स्वयं भक्तों के बीच आते हैं। यह अवधारणा भक्ति की गहराई तथा भारतीय चिन्तन की उदारता को दर्शाती है। रथयात्रा की विशेषता यह है कि इसमें दर्शन मन्दिर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता। लाखों श्रद्धालु बड़ादांडा पर खड़े होकर महाप्रभु के दर्शन करते हैं। लोग जगन्नाथ को लोकदेवता, विश्वनायक और पूरे समाज के आराध्य के रूप में पूजते हैं। इस उत्सव में धार्मिक विधियाँ, पारम्परिक शिल्पकला, संगीत, नृत्य, लोककला, राजकीय परम्परा तथा सामाजिक सहभागिता का सुन्दर मेल दिखाई देता है।

स्कन्द पुराण के पुरुषोत्तम माहात्म्य और ब्रह्म पुराण में इस क्षेत्र को पवित्र तीर्थ माना है। पूर्वी गंग वंश के शासक अनन्तवर्मन चोडगंगदेव ने 12वीं शताब्दी में वर्तमान जगन्नाथ मन्दिर का निर्माण शुरू करवाया था। उनके उत्तराधिकारियों ने इस कार्य को पूरा किया। इस पुरुषोत्तम क्षेत्र की धार्मिक महत्ता इससे बहुत पुरानी है। प्रारम्भिक काल में यहाँ नीलमाधव की पूजा प्रचलित थी। इसका गहरा सम्बन्ध स्थानीय सवरा (शबर) जनजाति की आस्थाओं से था। बाद में वे वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध तत्वों का संगम बन गए।
जगन्नाथ प्रतिमाएँ नीम की लकड़ी से बनी होती हैं। यह शिल्प भारतीय मूर्तिकला में अनूठा है। हर 12, 19 या कभी-कभी 8 वर्ष बाद नवकलेवर संस्कार होता है। इसके तहत सेवक पुरानी प्रतिमाओं को कोइली बैकुंठ में विसर्जित कर नई लकड़ी से नई प्रतिमाएँ बनाते हैं। यह प्रक्रिया शरीर की नश्वरता और आत्मा की शाश्वतता का दार्शनिक प्रतीक है। सेवक पूजा अनुष्ठानों के बीच गुप्त रूप से 'ब्रह्मपदार्थ' का स्थानान्तरण पुरानी प्रतिमा से नई प्रतिमा में करते हैं।

रथों का निर्माण एवं दार्शनिक स्वरूप
रथयात्रा का वर्तमान रूप मध्यकाल में गंग और गजपति शासकों के संरक्षण में विकसित हुआ। गजपति राजाओं ने इसे राज्य की सांस्कृतिक पहचान बना दिया। यह यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को शुरू होती है। इससे पहले स्नान पूर्णिमा पर देवताओं का सार्वजनिक स्नान होता है। इसके बाद अनासर अवधि में वे विश्राम करते हैं। नवयौवन दर्शन के बाद रथयात्रा प्रारम्भ होती है।
यहाँ मुख्य तीन रथों का विवरण इस प्रकार है:
रथ का नाम सम्बन्धित देवता
नन्दिघोष महाप्रभु जगन्नाथ
तलध्वज बलभद्र
दर्पदलन सुभद्रा
सेवक हर वर्ष नई लकड़ी और पारम्परिक शिल्प शास्त्र के अनुसार इन रथों का निर्माण करते हैं। बढ़ई, लोहार तथा चित्रकार आदि सेवक वर्ग इसमें सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। रथ निर्माण में धार्मिक अनुष्ठान और शिल्पकला का तालमेल भारतीय संस्कृति की विशेषता है। रथयात्रा एक उत्सव होने के साथ गम्भीर दार्शनिक प्रतीक है। सामान्यतः भक्त ईश्वर की खोज में तीर्थ यात्रा करता है, लेकिन पुरी में ईश्वर स्वयं भक्तों के पास आते हैं। यह व्यवस्था भक्ति आन्दोलन की उस उदार भावना को सुदृढ़ करती है जहाँ ईश्वर किसी जाति, वर्ग अथवा स्थान तक सीमित नहीं रहते।
कठोपनिषद् में रथ को मानव शरीर का प्रतीक माना है। यहाँ आत्मा स्वामी, बुद्धि सारथि और इन्द्रियाँ घोड़े हैं। पुरी की रथयात्रा इस प्रतीक को समाज के बीच लाती है। महाप्रभु का रथ पर सवार होकर जनता के बीच आना दिव्यता की लोक उपलब्धता का सन्देश देता है। पहाण्डी, रथारोहण, गुण्डिचा गमन और बाहुड़ा यात्रा के सभी चरण जीवन की यात्रा, परिवर्तन तथा पुनरागमन को दर्शाते हैं।

सामाजिक समरसता और वैश्विक प्रभाव
रथयात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि सामाजिक समावेश है। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण 'छेरा पहँरा' है। ओड़िशा के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथों की सफाई करते हैं और चन्दन जल छिड़कते हैं। राजा स्वयं को ईश्वर का प्रथम सेवक मानता है। यह परम्परा राजसत्ता और लोकचेतना के बीच समानता का सन्देश देती है। महाप्रसाद की परम्परा भी सामाजिक समानता का प्रतीक है। आनन्द बाजार में सभी जाति, वर्ग और पृष्ठभूमि के लोग बिना किसी भेदभाव के साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। बढ़ई, चित्रकार, रसोइये तथा वादक सहित विभिन्न सेवायत समुदाय मिलकर इस उत्सव को सफल बनाते हैं। यह सामूहिक श्रम और सांस्कृतिक उत्तरदायित्व का बड़ा उदाहरण है।

जगन्नाथ परम्परा जनजातीय आस्था, वैष्णव भक्ति, शैव तथा शाक्त तत्वों और बौद्ध प्रभावों का समन्वय है। पट्टचित्र कला, ओड़िशी नृत्य, लोक संगीत और रथ निर्माण की परम्परा ओड़िशा की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखती है। नवकलेवर तथा रथों का वार्षिक निर्माण परिवर्तन को पुनर्सृजन के रूप में स्वीकार करने की भारतीय दृष्टि को दर्शाता है।
पुरी की रथयात्रा मूल उत्सव है और इसका प्रभाव पूरे भारत में दिखाई देता है। यह यात्रा पश्चिम बंगाल के महेश, गुजरात के अहमदाबाद, महाराष्ट्र तथा दिल्ली आदि स्थानों पर स्थानीय रूपों में मनाई जाती है। भारतीय प्रवासी आधुनिक काल में इसका आयोजन यूरोप, अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी करते हैं। इससे सांस्कृतिक सम्बन्धों को बल मिलता है। आज की दुनिया में जहाँ विभाजन और असहिष्णुता बढ़ रही है, वहाँ रथयात्रा समावेश, सह अस्तित्व तथा मानवीय समानता का सन्देश देती है। यह आयोजन पर्यटन, सांस्कृतिक संरक्षण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देता है।
श्रीजगन्नाथ रथयात्रा इतिहास, दर्शन, लोकजीवन और सामाजिक सद्भाव का संगम है। रथों की गति, पहाण्डी की लय, छेरा पहँरा का विनम्र सन्देश, महाप्रसाद की साझी संस्कृति और गुण्डिचा यात्रा का लोकानुभव मिलकर उस भारतीय दृष्टि को प्रकट करते हैं जहाँ ईश्वर और मनुष्य के बीच दूरी नहीं होती। यह परम्परा समूचे भारत और विश्व की सांस्कृतिक सोच का गतिशील प्रतीक है। इसके माध्यम से समाज में सहभागिता का सम्बन्ध स्थापित होता है।
लेख-
श्री हर्षवर्धन राय, दिल्ली
धर्म, दर्शन और समरसता: जगन्नाथ रथयात्रा के बहुआयामी संदर्भ
July 13, 2026