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धर्म और राजनीति

धर्म और राजनीति

प्रायः 'धर्म' को 'रिलीजन' (पंथ/मजहब) के संकीर्ण अर्थ में ले लिया जाता है। जबकि संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में मूलतः 'धर्म' का अर्थ है वह नैतिक, सामाजिक और विधिक आधार जो व्यवस्था और न्याय का संवाहक है। भारत में 'धर्म का शासन' कभी 'थियोक्रेसी' (धर्मतंत्र) नहीं रहा, बल्कि 'रूल ऑफ लॉ' ( नैसर्गिक,विधि/नैतिकता का शासन) रहा है।

इतिहास के विस्तीर्ण मैदान में, जहाँ मानवीय चेतना के स्रोत फूटते हैं, वहाँ से दो अविरल धाराएँ प्रवाहमान हुईं। एक धारा में थी, नैतिक कर्तव्य और सनातन नियम का मधुर कंपन, दूसरी धारा में थी, शासन और शक्ति के संचालन का प्रचण्ड आवेग।

ये दोनों, धर्म (नैतिक विधान) और राजनीति (शासन की कला) कभी समानान्तर बहतीं, कभी गहरे संगम में मिल जातीं, तो कभी टकराकर ऐसा तूफान खड़ा कर देतीं कि सभ्यता का तट ही पलट जाता। यह कोई साधारण सहचर्य नहीं, बल्कि मानव नियति का वह गूढ़ रहस्य है जो स्वयं को अनेक रूपों में प्रकट करता रहा है।

यहाँ एक मौलिक स्पष्टीकरण आवश्यक है, भारतीय संदर्भ में प्रायः 'धर्म' को 'रिलीजन' (पंथ/मजहब) के संकीर्ण अर्थ में ले लिया जाता है। जबकि मूलतः 'धर्म' का अर्थ है वह नैतिक, सामाजिक और विधिक आधार जो व्यवस्था और न्याय का संवाहक है।

भारत में 'धर्म का शासन' कभी 'थियोक्रेसी' (धर्मतंत्र) नहीं रहा, बल्कि 'रूल ऑफ लॉ' ( नैसर्गिक,विधि/नैतिकता का शासन) रहा है । यदि इस यात्रा का प्रारम्भ हम उस आदि-काल से करें, जब मानव की चेतना आकाश के तारों और अन्तरात्मा के आलोक के बीच झूल रही थी, तब धर्म (कर्तव्य) और राजनीति दोनों एक ही व्यक्तित्व में समाहित थे ।

जैसे-जैसे सभ्यता का वृक्ष फला-फूला, हमें वशिष्ठ और विश्वामित्र के पौराणिक संवाद के रूप में धर्म और राजनीति दिखाई देती है।

वशिष्ठ और विश्वामित्र, ये दो नाम केवल दो ऋषि नहीं, बल्कि दो विश्व-दृष्टियों के प्रतीक हैं। वशिष्ठ वे हैं जो ब्रह्म (ज्ञान) में स्थित हैं, जिनका अधिकार अंतर्ज्ञान से, तप से, शान्ति से उद्भूत है।

विश्वामित्र वे हैं जो क्षत्रिय तेज (शक्ति) से प्रारम्भ कर तप के बल पर स्वयं को ब्रह्म-पद तक ले जाते हैं। उनका संघर्ष केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि ज्ञान और शक्ति के उस सनातन एकीकरण का प्रयास है। कौन समाज का वास्तविक धुरन्धर है? प्रश्न यह नहीं था।

प्रश्न यह था कि शक्ति (राजनीति) ज्ञान और नैतिकता (धर्म) के अधीन रहकर ही वैध और कल्याणकारी बन सकती है। भारतीय चिंतन में राजा स्वयं धर्म नहीं था; वह धर्म का संरक्षक और सेवक था। यह स्पष्ट विभाजन शक्ति को निरंकुश हो जाने से बचाता था।

भारतीय चिंतन ने इस प्रश्न का उत्तर ‘सामंजस्य’ में दिया। यहाँ राजा का परम दायित्व था 'धर्म की रक्षा' करना, अर्थात न्याय और नैतिक व्यवस्था को बनाए रखना। वह धर्म का संरक्षक था, स्वयं धर्म नहीं।

धर्म राज्य का आधार था, परन्तु राज्य किसी एक पंथ या संप्रदाय का संचालक नहीं। यह एक पवित्र विभाजन था, जैसे आकाश और पृथ्वी का, अलग-अलग होना पर एक दूसरे के बिना अधूरे रहना।

अशोक के शिलालेख इसी समन्वय के साक्षी हैं, जहाँ ‘धम्म’  एक सार्वभौमिक नैतिक संहिता , राजकीय नीति का मार्गदर्शक सूत्र बन गया। यह किसी धर्मतंत्र की स्थापना नहीं, बल्कि राज्य को लोक-कल्याण के नैतिक पथ पर अग्रसर करना था।

वहीं कौटिल्य ने इस सम्बन्ध को यथार्थ के धरातल पर उतारा। धर्म (नैतिकता) महत्वपूर्ण है, परन्तु राज्य के ‘सप्ताङ्ग’ (सात अंगों) के समक्ष उसकी एक सीमा है, क्योंकि राज्य का धर्म ही समाज की समग्र रक्षा करना है। यह सन्तुलन भारतीय सभ्यता की विशिष्ट देन थी।

जहाँ भारत ने सामंजस्य का मार्ग चुना, वहीं पश्चिम और इस्लामी जगत में यह सम्बन्ध अक्सर संघर्ष के रंग में रंगा रहा। यूरोप में चर्च (एक संस्था के रूप में 'रिलीजन') की शक्ति इतनी विस्तीर्ण हुई कि वह सम्राटों की राजसत्ता को चुनौती देने लगी।

कैनोसा का दृश्य, जहाँ सम्राट हेनरी चतुर्थ तीन दिन तक बर्फीली ठण्ड में पोप के समक्ष खड़ा रहा, यह दर्शाता है कि धार्मिक संस्था किस सीमा तक राजनैतिक सत्ता पर हावी हो सकती थी। यह पंथ का राजनीति पर वैभवशाली, किन्तु भयावह आधिपत्य था।

इस्लामी जगत में प्रारम्भिक ‘खिलाफत’ धार्मिक और राजनैतिक नेतृत्व के एकत्व का आदर्श रूप था। किन्तु शीघ्र ही ‘सल्तनत’ (राजनीतिक शक्ति) और ‘खिलाफत’ (धार्मिक अधिकार) के बीच दरार पड़ने लगी।

ऑटोमन सुल्तानों ने इस दरार को पाटने का प्रयास किया और स्वयं को खलीफा भी घोषित कर दिया। यहाँ पंथ और राजनीति फिर से एक व्यक्ति में समाहित हो गए, पर यह एकता अब राजनीतिक व्यावहारिकता का परिणाम थी, आदर्श का नहीं।

धर्मनिरपेक्षता: एक भिन्न अवधारणा

फिर आया वह दौर जब पश्चिमी मानव ने तर्क को सर्वोपरि माना। पुनर्जागरण, सुधार आन्दोलन और प्रबोधन ने चर्च के एकाधिकार को चुनौती दी। वेस्टफेलिया की संधि ने राष्ट्र-राज्य को सर्वोच्च सत्ता घोषित किया।

फ्रांस और अमेरिका ने चर्च और राज्य के बीच एक दीवार (सेपरेशन) खड़ी कर दी। ऐसा लगा मानो धर्म अब अन्ततः निजी जीवन के कोने में सिमट गया है और राजनीति का मैदान पूर्णतः लौकिक हो गया है। पर यह एक  भ्रम था।

बीसवीं और इक्कीसवीं सदी ने इस भ्रम को तोड़ दिया। धर्म (पंथ के रूप में) एक नए, अधिक सूक्ष्म और शक्तिशाली रूप में लौटा है। पोप अब सीधे तलवार नहीं उठाते, किन्तु उनकी आवाज़ वैश्विक नैतिकता का कम्पास बन गई है। इस्लामी जगत में यह चित्र और भी बहुरंगी है।

ईरान का धर्माधिकारी शासन, सऊदी अरब का राजशाही-धर्म गठजोड़, तुर्की की धर्मनिरपेक्षता-राजनीतिक इस्लाम द्वन्द्व, और मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे संगठनों का वैश्विक नेटवर्क है। अमेरिका में, जहाँ चर्च और राज्य अलग-अलग हैं, वहाँ भी राष्ट्रपति बाइबल पर हाथ रखकर शपथ लेते हैं और ईसाई दक्षिणपंथ का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।

किन्तु इस पूरे विश्व-मंच पर भारत की भूमिका सर्वाधिक शिक्षाप्रद और आदर्श है। यहाँ की धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी ‘पृथक्करण’ नहीं, बल्कि ‘सर्वधर्म-समभाव’ की कोमल भावना है। इसे समझने के लिए हमें फिर से 'धर्म' के मूल अर्थ पर लौटना होगा।

भारत में राज्य 'पंथ' (Religion) से निरपेक्ष हो सकता है, लेकिन 'धर्म' (न्याय, नैतिकता, कर्तव्य) से नहीं। जब राजा का कर्तव्य ही 'धर्म की रक्षा' करना है , यानी सभी नागरिकों के प्रति न्याय करना, निरपराध की रक्षा करना , तो वह स्वभावतः सभी पंथों के प्रति निष्पक्ष (निरपेक्ष) रहता था।

यही नैसर्गिक धर्मनिरपेक्षता थी। आधुनिक भारत का संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत इसी परंपरा का लिखित कानूनी विस्तार है। एक ऐसा सूक्ष्म रेशमी धागा है, जो विविधता को बाँधे रखता है। पर इस सूत्र को थामे हुए चलना सबसे कठिन है।

और इसी कठिनाई का सबसे कटु प्रमाण है जून, 1984 का वह अभागा अध्याय, "ऑपरेशन ब्लू स्टार"। इस घटना को केवल 'धर्म और राजनीति के टकराव' के रूप में देखना एक अपर्याप्त दृष्टिकोण होगा।

वास्तव में यह ‘अधर्म’ और ‘राज्य के धर्म (कर्तव्य)’ के बीच एक दुखद संघर्ष था। एक ओर था स्वर्ण मंदिर, सिख आस्था का हृदय, शान्ति और प्रार्थना का प्रतीक, जिसे एक दुर्भाग्यपूर्ण राजनीतिक समीकरण ने अधर्म की हिंसा के गढ़ में परिवर्तित कर दिया था।

दूसरी ओर था भारतीय राज्य, जिसका मूल धर्म (कर्तव्य) राष्ट्रीय अखंडता और अपने सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। निरपराध लोगों को हानि पहुँचाना किसी भी पंथ का सच्चा धर्म नहीं हो सकता, विशेष रूप से सिख धर्म का तो कतई नहीं, इस अधर्म को रोकना सरकार  का कर्तव्य था।

जब सेना के टैंकों ने मंदिर परिसर में प्रवेश किया, तब केवल ईंट-पत्थर नहीं टूटे। गोलाबारी ने केवल भवनों को ही क्षत-विक्षत नहीं किया, क्षत-विक्षत हुई एक सामूहिक चेतना।

यह घटना उस भयानक दुविधा का प्रतिबिम्ब थी, जहाँ राज्य के संवैधानिक धर्म (कर्तव्य) और एक धार्मिक स्थल की पवित्रता बनाए रखने के लिए धर्म की ओट में अधर्म कर रहे लोगो के बीच एक भीषण टकराव हो गया।

इसके परिणाम और भी विध्वंसक थे। ऑपरेशन ब्लू स्टार केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं रह गई, यह भारतीय लोकतंत्र के धर्मनिरपेक्ष-समभाव वाले चेहरे पर एक गहरा जख्म बन गया।

यह हमें याद दिलाता है कि जब राजनीतिक लक्ष्य और धार्मिक भावनाएँ टकराते हैं, तो उसकी आग में सर्वप्रथम मानवता, न्याय और सामूहिक विश्वास ही झुलसते हैं।

आज का भारत इसी जटिल समीकरण से निरंतर जूझ रहा है। हिंदुत्व की राजनीति सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नए प्रतिमान गढ़ रही है, जिसमें 'धर्म' को अक्सर 'पंथ' के स्तर पर संकुचित स्वरूप में देखा जा रहा है।

समान नागरिक संहिता का विवाद वास्तव में राज्य और व्यक्तिगत पंथ-आधारित कानूनों के बीच नए सामंजस्य की खोज है। हर चुनाव में पंथ एक अदृश्य, किन्तु सबल मतदाता के रूप में उपस्थित रहता है।

इस विशाल यात्रा के पश्चात् हम कहाँ खड़े हैं? वशिष्ठ (ज्ञान/नैतिकता) और विश्वामित्र (शक्ति/कार्यपालन) का संवाद आज भी जारी है, केवल उसके पात्र और मंच बदल गए हैं।

धर्म (नैतिक आधार) और राजनीति (शासन) दो ऐसी नदियाँ हैं जो मानव सभ्यता के मैदान को सींचती हैं। जब ये सामंजस्य से बहती हैं, तो समृद्धि और न्याय की फसल लहलहाती है। जब ये टकराती हैं, तो बाढ़ का विनाश छा जाता है।

भविष्य का मार्ग शायद ‘सचेतन सहअस्तित्व और पारस्परिक संयम’ में है। वह मार्ग जहाँ धर्म (पंथ) राजनीति को नैतिक दिशा दे, उसे केवल शक्ति का खेल न बनने दे, बल्कि सेवा और करुणा का साधन बनाए।

और जहाँ राजनीति, धर्म (पंथ) को उसके उच्च आध्यात्मिक और सामाजिक सेवा के उद्देश्य में स्वतंत्रता दे, पर उसे सांप्रदायिक द्वेष या हिंसा का हथियार न बनने दे। साथ ही, राज्य को अपने व्यापक धर्म (रूल ऑफ लॉ, संवैधानिक नैतिकता) पर दृढ़ रहना होगा।

यह कोई सरल सूत्र नहीं। यह एक कला है, वही कला जिसका प्रारम्भिक स्वर हमें वशिष्ठ और विश्वामित्र के संवाद में सुनाई देता था, ज्ञान और शक्ति का समन्वय। आज यह कला और भी जटिल हो गई है, क्योंकि मंच पूरा विश्व है और दर्शक करोड़ों की संख्या में।

अपने स्वार्थ में हर निर्णय की व्याख्या करने वाले विवेचकों से चैनल, अखबार, वैश्विक संस्थान भरे हुए हैं। नैसर्गिक राजनीति की राह तलवार की धार पर सफर है। परन्तु आशा का दीपक बुझा नहीं है।

जिस दिन 'धर्म' अपने शुद्ध नैतिक-आध्यात्मिक ऊर्जा के व्यापक अर्थ में लौटेगा और 'राजनीति' अपने वास्तविक लोककल्याण के ध्येय में, उस दिन ये दोनों नदियाँ फिर से सहयोगिनी बन जाएँगी।

तब यह संगम मानवता के लिए अमृत बनेगा, विष नहीं। यही हमारी सामूहिक चेतना की परम आकांक्षा होनी चाहिए। धर्म (पंथ) व्यक्ति के आंतरिक उत्थान का वैयक्तिक पथ दर्शक हो, समाज का सामूहिक राजनीतिक हथियार नहीं।

एक ऐसा भविष्य जहाँ आस्था और अधिकार, शक्ति और करुणा, नैतिकता और शासन मिलकर मानव गरिमा के महामंदिर का निर्माण कर सकें, उसका निर्माण ही धर्म की राजनीति है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
प्रबुद्ध आलोचक, व्यंग्यकार, कवि
A २३३, ओल्ड मिनाल रेजिडेंसी, भोपाल ४६२०२३
मो. 7000375798

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