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भुंजिया जनजाति के आराध्य श्रीराम

भुंजिया जनजाति के आराध्य श्रीराम


भारत के सघन वनप्रदेशों में बसे ग्राम्यजीवन ने प्रभु राम की अनेकों स्मृतियों को सहेजकर रखा है। ऐसी ही एक स्मृति को श्री गुलाब ठाकुर जी का यह लेख छत्तीसगढ़ की भुंजिया जाति की रसोई से अगाध राम प्रेम के सौरभरूप में हमारे सम्मुख प्रस्तुत करता है। इसमें लेखक बता रहे हैं कि भुंजिया समाज श्रीराम को अपना परम सखा और रक्षक मानता है। तो आइये जानें कि भुंजिया जाति में लाल बंगला की अनोखी परम्परा क्या है? और लक्ष्मण रेखा के अद्भुत प्रसंग से इसका क्या सम्बन्ध है?


भारत के अन्य भागों के विपरीत यहाँ के विस्तृत और सघन वनप्रदेशों में बसे भारतीयों के लिए राम कोई अलौकिक पुरुष नहीं है। वे उनके ईश्वर नहीं हैं। वे तो उनके बंधु हैं, उनके सखा हैं। यह एक बड़ा कारण है कि अपने आत्मीय जनों की पीड़ा वनवासी राम से देखी नहीं गई, और उन्होंने उन्हीं के बीच हाथ उठाकर धरती को निशाचरों से विहीन करने की प्रतिज्ञा कर डाली। और रघुवंशी होने के नाते अपना वचन उन्होंने पूरा भी किया, किन्तु अवध की सेना बुलाकर नहीं, प्रत्युत लोगों को ही संगठित व साहसी बनाकर।

यह बड़ा कारण है कि लोक ने राम में अपने सबसे बड़े रक्षक और उन्नायक को देखा है। और यह श्रद्धा ही अविरल भगति के रूप में जनमानस में फूट पड़ी। यह भक्ति अनादिकाल से आजतक छत्तीसगढ़ के वन्यग्रामों में उसी विशुद्ध पवित्र भाव में डूबी दिखाई देती है, जो भाव केवट और शबरी के कवियों ने वर्णित किए हैं। इसलिए भले ही हम केवट या शबरी की भक्ति को प्रत्यक्ष न देख पाए हों, पर आज भी उस भावधारा को पोसने वाले भगतों में हम उनके दर्शन कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ के रामनामी समाज को देखिए। यह समाज अपने सम्पूर्ण शरीर पर भगवान राम का पावन नाम गुदवालेता है, ताकि जब तक देह रहे, उसके रोम-रोम में राम विराजमान रहें। इसी प्रकार मुंडा जाति की श्रुतिपरम्परा में प्रचलित रामायण में भी राम और सीता के जीवन चरित्र का जो अनूठा चित्रण मिलता है, वह राम के साथ लोक के अनन्य अनुराग को दर्शाता है।


रामनामी समुदाय- राम का नाम ही है जिनके जीवन का आधार

रामकथा आज भी लोकगीतों, लोककथाओं और पारम्परिक नृत्यों में पूरी तरह रची बसी है।  राम लोक के लिए आत्मनिर्भरता, वनसम्पदा की रक्षा और स्वाभिमान के सबसे बड़े प्रतीक हैं। इसी महान परम्परा को सहेजने वाली एक अत्यन्त विशिष्ट परम्परा छत्तीसगढ़ की भुंजिया जाति में हमें दिखलाई पड़ती है। यह समुदाय छत्तीसगढ़ के कई प्रमुख जिलों,  जैसे - गरियाबंद, महासमुंद, और धमतरी जिलों के सुदूर वन ग्रामों में अपना जीवन यापन करता है।

इन भुंजिया लोगों की यह दृढ़ मान्यता है कि प्राचीन काल में वे साक्षात् श्रीराम की सेना में पूरे सम्मान के साथ शामिल थे और उन्हें तीर तथा धनुष चलाने का कठोर प्रशिक्षण स्वयं भगवान श्रीराम ने ही दिया था। भुंजिया समाज के लोगों का तीर और धनुष आज भी उनके आराध्य श्रीराम का ही साक्षात् प्रतीक माना जाता है। भुंजिया समाज में एक आदर्श महापुरुष और परम आराध्य देव के रूप में श्रीराम की नित्य पूजा अर्चना की जाती है।


छत्तीसगढ़ के सुदूर वनग्रामों में रहती है अधिकांश भुंजिया जाति

भुंजिया समाज श्रीराम को अपना वह अभिन्न सखा मानता है जो हर संकट में उनके साथ खड़ा रहता है। उनके लोक विश्वास के अनुसार, वनवास काल के दौरान जब श्रीराम दक्षिण कोसल अर्थात् आज के छत्तीसगढ़ के दुर्गम वनों में निवास कर रहे थे, उस कठिन समय में निशाचरों, भयानक राक्षसों और दुष्ट शक्तियों से यहाँ के लोकजीवन की उन्होंने ही रक्षा की थी।

श्रीराम के इसी रक्षक और लोकमंगलकारी स्वरूप के कारण यहाँ का सम्पूर्ण वनवासी समाज भगवान राम को अपना ईष्ट मानता है। भुंजिया जाति की यह अगाध लोकमान्यता है कि श्रीराम उनके परम सखा हैं, जो समय-समय पर उनकी रक्षा करने हेतु इस धरती पर अदृश्य रूप से अवतरित होते हैं और उनके साथ ही वनों में निवास करते हैं।

भुंजिया जाति के परिवारों में एक अत्यन्त अनूठी परम्परा लाल बंगला की है, जिसका सीधा और ऐतिहासिक सम्बन्ध राम और लक्ष्मण से है। लाल बंगला को लेकर कई लोककथाएं प्रचलित हैं। उनमें से एक लोककथा के अनुसार त्रेतायुग में दुष्ट रावण द्वारा माता सीता का छलपूर्वक हरण करने के बाद जब राम-लक्ष्मण उनकी खोज में निकले, तो वे भुंजिया लोगों की बस्ती पहुँचे। वहाँ लोगों ने उन दोनों भाइयों का स्वागत-सत्कार किया गया और उन्हें प्रेमपूर्वक भोजन कराया गया।

भोजन के बाद पुरुषों ने माता सीता की खोज में श्रीराम के साथ जाने हेतु अपनी प्रबल इच्छा व्यक्त की। किन्तु राम और लक्ष्मण द्वारा बताई गई सीताहरण की दुखद घटना को सुनकर उनके मन में एक बड़ा भय उत्पन्न हुआ। उन्होंने विचार किया कि उनके सीता की खोज में चले जाने के बाद उनके घरों में भी केवल महिलाएं ही रुकेंगी। तो जिस तरह माता सीता को कुटिया में अकेले पाकर रावण द्वारा छल से उनका हरण कर लिया गया था, कहीं ऐसा न हो कि हम भी अपनी पत्नियों को वनों में अकेले छोड़कर जाएं और कोई दुष्ट दानव उनका भी हरण न कर ले।

अपने मन की इस दुविधा और डर को दूर करने के लिए लोगों ने लक्ष्मण जी से सहायता मांगी। उन्होंने लक्ष्मण जी से यह विनम्र आग्रह किया कि जिस प्रकार उन्होंने सीता माता की रक्षा के लिए उनकी कुटिया के चारों ओर एक लक्ष्मण रेखा खींचकर उन्हें सुरक्षित किया था, ठीक वैसे ही वे हमारी महिलाओं की सुरक्षा हेतु भी एक अभेद्य सुरक्षा घेरा बना दें।

उनके इस निश्छल प्रेम और आग्रह को देखकर लक्ष्मण जी ने उनका यह निवेदन सहर्ष स्वीकार कर लिया। उन्होंने पुरुषों को अपने घर के निकट एक पृथक और अतिरिक्त कक्ष बनाने को कहा, जहाँ उनकी अनुपस्थिति में स्त्रियां सुरक्षित रूप से रह सकें। जब वह अतिरिक्त कक्ष बनकर तैयार हो गया, तो उसके बाद उस कक्ष के चारों ओर लक्ष्मण जी ने अपने दिव्य बाण से तीन बार रेखा खींचकर उसे पूर्णतः सुरक्षित और अभेद्य कर दिया।

इस विशेष आवास को दूर से ही आसानी से पहचाना जा सके, इस हेतु इसे गाढ़े लाल रंग से रंग दिया गया। इसी लाल रंग के कारण इसे लोक भाषा में लाल बंगला कहा गया। भुंजिया जनजाति के लोगों द्वारा यह माना जाता है कि उस प्राचीन काल में इस पवित्र घेरे को यदि कोई भी बाहरी या दुष्ट व्यक्ति छूने का दुस्साहस करता, तो वह अपने आप ही भस्म होकर जल जाता था।

कालान्तर में यह परम्परा बन गई और आज भी अनेकों लाल बंगले एक सांकेतिक लक्ष्रेखा, बांस के घेरे या मिट्टी के चौड़े चबूतरेनुमा घेरे के अंदर पूर्णतः सुरक्षित दिखाई देते हैं। आज के समय में इस लाल घेरे का मुख्य अर्थ विषम गोत्रीय लोगों और अनजान बाहरी व्यक्तियों को लाल बंगले में प्रवेश से दूर रखने हेतु एक सुरक्षा घेरे का रह गया है। पर जो भी हो, यह पावन लाल बंगला आज भी छत्तीसगढ़ में भुंजिया जनजाति के हर घर में देखने को मिलता है।


लाल बंगला- भुंजिया जाति का रसोईघर

यहाँ बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश पूर्णतः वर्जित होता है। इस पवित्र लाल बंगले में केवल घर की महिलाएं ही प्रवेश करती हैं और वहीं पूरी शुद्धता के साथ भोजन का निर्माण करती हैं। इसके साथ ही वे अपने आराध्य देवताओं समेत श्रीराम की पूजा अर्चना भी इसी लाल बंगले के भीतर करती हैं। यदि हम यह कहें कि भुंजिया परिवार का लाल बंगला केवल रसोईघर न होकर भारत का रघुनन्दन के प्रति अगाध प्रेम और श्रद्धा का जीता-जागता स्मारक है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। 

-गुलाब ठाकुर
(लेखक लोक-संस्कृति के अध्येता, कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो अपनी लेखनी और सेवा कार्यों से राष्ट्रीय गौरव व सामाजिक विषयों पर निरंतर लिखते हैं।)

 

 

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