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वि-उपनिवेशीकरण की ओर बढ़ता भारत: पुरातात्विक धरोहरों की घर वापसी

वि-उपनिवेशीकरण की ओर बढ़ता भारत: पुरातात्विक धरोहरों की घर वापसी


भारत विश्व की सबसे प्राचीन और जीवन्त सभ्यताओं में अग्रगण्य है। लगभग 5000 वर्षों से भी अधिक प्राचीन भारतीय सभ्यता ने अपने वेदों, उपनिषदों, बौद्ध दर्शन, संगम साहित्य, नालंदा, तक्षशिला जैसे महान ज्ञानपीठों, चोल स्थापत्य कला और राजा भोज जैसे महान विद्याव्यसनी राजाओं के माध्यम से सम्पूर्ण जगत को सदैव एक वैचारिक और सांस्कृतिक दिशा प्रदान की।


भारत का यह गौरवमयी इतिहास उसकी कलाकृतियों और ग्रन्थों में सुरक्षित रहा है। किन्तु विदेशी पराधीनता का कालखण्ड भारतवर्ष के लिए केवल आर्थिक दोहन और सम्पत्ति की लूट का युग नहीं था, वरन यह हमारी अमूल्य सांस्कृतिक थाती की अनियंत्रित लूट का भी एक अत्यन्त त्रासद दौर था । वर्ष 1600 में स्थापित एक विदेशी फिरंगी वाणिज्यिक मण्डल ने व्यापार के कपटपूर्ण बहाने से भारत की पावन भूमि पर अपने चरण रखे थे।

इसके पश्चात वर्ष 1757 के पलासी युद्ध के भीषण परिणामों के बाद उस विदेशी मण्डल ने भारत में धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक सत्ता और दमनकारी शासन स्थापित कर लिया। इस राजनीतिक पराधीनता के परिणामस्वरूप भारत की असंख्य देवमूर्तियाँ, प्राचीन पाण्डुलिपियाँ, राजाओं के शिलालेख, सुवर्ण आभूषण और अमूल्य पुरातात्त्विक धरोहरें बलपूर्वक पारसमुद्री देशों और यूरोपीय राजधानियों में भेज दी गईं।

आज अकेले उस श्वेतद्वीप के सुप्रसिद्ध प्राच्य संग्रहालय में ही भारत से सम्बन्धित लगभग 8000 से अधिक अनमोल वस्तुएँ बन्दी गृह की भाँति संरक्षित बताई जाती हैं।इन लूटी गई कलाकृतियों में अमरावती स्तूप की कलात्मक मूर्तियाँ, भगवान बुद्ध की अनेकों पाषाण प्रतिमाएँ, सनातन धर्म की पावन देव-प्रतिमाएँ और अनेक विस्मृत हो चुके हिन्दू-बौद्ध सांस्कृतिक अवशेष सम्मिलित हैं, जो आज भी अपनी मूल मातृभूमि की माटी को स्पर्श करने के लिए व्याकुल हैं।

लन्दन संग्रहालय में रखी भारत की धरोहर
लन्दन संग्रहालय में रखी भारत की धरोहर

इन्हीं अपहृत और बन्दी बनाई गई अमूल्य धरोहरों में धार नगरी की माँ वाग्देवी सरस्वती की दिव्य प्रतिमा ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह परमारकालीन शिल्पकला और भारतीय मूर्तिकला का एक सर्वोत्कृष्ट और अनूठा उदाहरण मानी जाती है। ग्यारहवीं शताब्दी में महान विद्याप्रेमी राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला ज्ञानपीठ से इस प्रतिमा का सीधा सम्बन्ध बताया जाता है।

पुरावृत्तवेत्ताओं और शोधकर्ताओं के अनुसार प्राचीन काल में भोजशाला समूचे आर्यावर्त में संस्कृत अध्ययन, काव्यशास्त्र, व्याकरण और दर्शन शास्त्र का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण वैश्विक केन्द्र थी।

माँ वाग्देवी की यह अलौकिक प्रतिमा लगभग 1.2 मीटर ऊँची है, जिसमें ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी को हाथ में ग्रन्थ, अक्षमाला और बोध के पवित्र प्रतीकों के साथ अत्यन्त जीवन्त रूप में दर्शाया गया है। पराधीनता के काल में क्रूर विदेशी अधिकारियों द्वारा इस पावन प्रतिमा को छल-बल से भारत से दूर श्वेतद्वीप भेज दिया गया।

वाग्देवी-ज्ञान की अधिष्ठात्री
वाग्देवी - ज्ञान की अधिष्ठात्री

वर्तमान समय में माँ सरस्वती की यह मूल प्रतिमा उसी विदेशी प्राच्य संग्रहालय की निर्जीव वीथियों में रखी हुई है। हाल ही में मध्यप्रदेश की इन्दौर न्यायपीठ द्वारा भोजशाला परिसर से सम्बन्धित पुरातात्त्विक साक्ष्यों, ऐतिहासिक तथ्यों और वैज्ञानिक सर्वेक्षणों पर गम्भीरता से विचार किए जाने के बाद यह विषय पुनः सम्पूर्ण राष्ट्र के वैचारिक विमर्श के केन्द्र में आ गया है।

यदि यह पवित्र स्थल मूल रूप से माँ सरस्वती का मन्दिर और एक महान ज्ञानपीठ था, तो वहाँ से अन्यायपूर्वक ले जाई गई माँ वाग्देवी की इस पावन प्रतिमा की पुनर्वापसी की माँग ऐतिहासिक, नैतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से प्रत्येक भारतवासी के लिए अत्यन्त स्वाभाविक और न्यायसंगत बन जाती है।

भारत भूमि से कपटपूर्वक बाहर ले जाई गई प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों की यह सूची अत्यन्त लम्बी और हृदयविदारक है। कोहिनूर हीरा, जिसे कभी पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के समृद्ध राजकीय कोष का सर्वोच्च गौरव माना जाता था, वह आज विदेशी राजमुकुट का एक हिस्सा बनकर रह गया है। इसी प्रकार अमरावती स्तूप की लगभग 120 से अधिक प्राचीन मूर्तियाँ आज भी सुदूर श्वेतद्वीप में बन्द हैं।

भारत का अमूल्य हीरा- कोहिनूर
भारत का अमूल्य हीरा- कोहिनूर

तमिलनाडु के प्राचीन मन्दिरों से प्राचीन काल में चुराई गई चोलकालीन कांस्य प्रतिमाएँ वर्ष-प्रतिवर्ष विदेशी और अमरीकी संग्रहालयों में केवल एक व्यापारिक वस्तु की भाँति प्रदर्शित की जाती रहीं। अन्तर्राष्ट्रीय पुरातात्त्विक आंकड़ों और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रतिवेदनों के अनुसार वर्ष 1970 के पश्चात भारत से 50000 से अधिक अमूल्य कलाकृतियों की अवैध तस्करी होने की आशंका व्यक्त की गई है, जो हमारी सुरक्षा प्रणालियों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।

किन्तु बदलते हुए समय के साथ परिस्थितियाँ भी बदली हैं। केवल वर्ष 2014 के बाद से भारत अपनी लगभग 640 से अधिक प्राचीन कलाकृतियाँ और देवमूर्तियाँ विदेशों से सफलतापूर्वक वापस लाने में सफल रहा है। इनमें अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और श्वेतद्वीप से सम्मानपूर्वक लौटाई गई पावन मूर्तियाँ शामिल हैं। इस सफलता को वर्तमान भारत की सुदृढ़ सांस्कृतिक राजनीतिक नीति और राष्ट्रीय गौरव की एक बहुत बड़ी विजय माना जा रहा है।

अमेरिका ने भारत को 2024 में 297 वस्तुएं लौटायी
अमेरिका ने भारत को 2024 में 297 वस्तुएं लौटायी

इसी क्रम में, हाल ही में नीदरलैण्ड देश द्वारा भारत को चोलकालीन पाण्डुलिपियाँ और अन्य महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक सामग्रियाँ लौटाने के समाचार ने इस दिशा में एक नई राष्ट्रव्यापी आशा और चेतना को जाग्रत किया है। ये प्राचीन पाण्डुलिपियाँ दक्षिण भारत के प्रतापी चोल साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, धार्मिक कृत्यों और समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं से जुड़ी हुई अत्यन्त महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ियाँ मानी जाती हैं।

चोल साम्राज्य नौवीं शताब्दी से लेकर तेरहवीं शताब्दी तक दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के एक बहुत बड़े भूभाग पर अपना सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभाव रखने वाला एक अत्यन्त शक्तिशाली नौसैनिक साम्राज्य था। चोल साम्राज्य की महान सांस्कृतिक और स्थापत्य सम्बन्धी उपलब्धियाँ आज भी तमिल सभ्यता और सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति की अनुपम पहचान मानी जाती हैं।

नीदरलैण्ड जैसे देश द्वारा इन चोलकालीन पाण्डुलिपियों की ससम्मान वापसी यह स्पष्ट संकेत देती है कि सम्पूर्ण विश्व अब धीरे-धीरे औपनिवेशिक लूट के काले इतिहास को अपनी नैतिक दृष्टि से पुनः देखने और समझने लगा है। यह घटना केवल एक सामान्य राजनीतिक या सरकारी लेन-देन नहीं है, अपितु यह विश्व पटल पर भारत के सभ्यतागत सम्मान की पुनर्स्थापना की दिशा में एक अत्यन्त ठोस और स्वागतयोग्य कदम है।

हाल ही में नीदरलैंड से प्राप्त पांडुलिपियाँ
हाल ही में नीदरलैंड से प्राप्त पांडुलिपियाँ

वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व के भीतर अपनी अपहृत सांस्कृतिक धरोहरों की पुनर्वापसी का एक तीव्र आन्दोलन खड़ा हो रहा है। यूनान देश अपने पर्शियन मार्बल्स की वापसी के लिए संघर्ष कर रहा है, मिस्र देश अपनी प्राचीन मम्मियों और पाषाण मूर्तियों की मांग कर रहा है, जबकि अनेक जनजातीय बहुल अफ्रीकी राष्ट्र भी उपनिवेशकालीन लूट के विरुद्ध एक संगठित और व्यापक अभियान चला रहे हैं।

ऐसी स्थिति में भारत को भी अपनी समस्त सांस्कृतिक धरोहरों की पूर्ण वापसी के लिए वैश्विक मंच पर अधिक आक्रामक, कानूनी और नीतिगत रणनीति को अपनाना होगा। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, विदेश मन्त्रालय और हमारे समस्त सांस्कृतिक संस्थानों को आपस में मिलकर एक ऐसी विस्तृत सूची तैयार करनी चाहिए, जिसमें पराधीनता के काल में देश से बाहर ले जाई गई प्रत्येक छोटी-बड़ी वस्तु का विवरण हो।

इसके साथ ही भारत के भीतर स्थित राष्ट्रीय संग्रहालयों के आधुनिकिकरण और उनके पूर्ण डिजिटलीकरण पर भी विशेष बल देना आवश्यक है, जिससे विदेशों से लौटाई गई इन अमूल्य धरोहरों का आधुनिक और वैज्ञानिक संरक्षण पूरी तरह सुनिश्चित किया जा सके।

अन्ततः, हमें यह भली-भाँति समझना होगा कि विदेशी संग्रहालयों से माँ वाग्देवी सरस्वती की प्रतिमा की घर वापसी केवल एक पाषाण मूर्ति का लौटना नहीं होगा, अपितु यह सदियों पुरानी भारतीय ज्ञान परम्परा, हमारे आहत सांस्कृतिक स्वाभिमान और ऐतिहासिक न्याय की पूर्ण पुनर्स्थापना का एक जीवन्त प्रतीक बनेगी।

जिस पवित्र तपोभूमि ने सम्पूर्ण विश्व को “सा विद्या या विमुक्तये” अर्थात विद्या वही है जो बन्धनों से मुक्ति दिलाए, का अमर सन्देश दिया, उसी विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती का एक विदेशी संग्रहालय की चहारदीवारी में बन्दी रहना स्वतन्त्र भारत की सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रभक्ति पर एक अत्यन्त गम्भीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

अब वह समय आ चुका है जब भारत को अपनी सांस्कृतिक धरोहरों की इस घर वापसी को केवल एक भावनात्मक या सीमित मुद्दा नहीं मानना चाहिए, बल्कि इसे अपने राष्ट्रीय सम्मान, सभ्यतागत अधिकार और युगों-युगों के ऐतिहासिक न्याय के एक निर्णायक प्रश्न के रूप में विश्व मञ्च पर पूरी दृढ़ता से उठाना हो।

- श्री प्रद्युम्न अवधिया
( लेखक इतिहास, संस्कृति एवं जनजातीय अध्ययन से जुड़े हुए  हैं। आप भारतीय सांस्कृतिक विमर्श और राष्ट्रीय दृष्टिकोण से विभिन्न विषयों पर लेखन एवं शोध कार्य करते हैं।)

 

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