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रथयात्रा विशेष: भगवान जगन्नाथ का मूल स्थान "शिवरीनारायण"

रथयात्रा विशेष: भगवान जगन्नाथ का मूल स्थान "शिवरीनारायण"


रथयात्रा भारत के प्रमुख उत्सवों में से एक है। बहुत कम लोग जानते हैं कि छत्तीसगढ़ के शिवरीनारायण का सम्बन्ध जगन्नाथ पुरी से है। प्रो. अश्विनी केशरवानी का यह लेख भगवान जगन्नाथ की शिवरीनारायण से पुरी तक की यात्रा का वर्णन करता है। आइए, इसे विस्तार से जानते हैं।


स्कन्द पुराण में शबरीनारायण (वर्तमान शिवरीनारायण) को श्रीसिन्दूरगिरिक्षेत्र कहा गया है। प्राचीन काल में यहाँ शबरों का शासन था। द्वापरयुग के अन्तिम चरण में श्राप के कारण जरा नाम के शबर के तीर से श्रीकृष्ण घायल हुए। इसके बाद उनकी मृत्यु हो गई। लोगों ने वैदिक रीति से उनका दाह संस्कार किया। उनका मृत शरीर नहीं जला।


शबर के तीर से घायल श्रीकृष्ण

इसके बाद उन्होंने मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित कर दिया। आज भी कई स्थानों पर लोग मृत शरीर के मुख को जलाकर समुद्र या नदी में प्रवाहित करते हैं। जरा को बहुत पश्चाताप हुआ। उसे श्रीकृष्ण के मृत शरीर को समुद्र में प्रवाहित करने का समाचार मिला। वह तुरन्त उस मृत शरीर को ले आया। उसने श्रीसिन्दूरगिरि क्षेत्र में एक जलस्रोत के किनारे बाँस के पेड़ के नीचे रखकर उसकी पूजा शुरू कर दी। आगे चलकर वह उसके सामने बैठकर तन्त्र मन्त्र की साधना करने लगा। इसी मृत शरीर को आगे चलकर नीलमाधव कहा गया। 14वीं शताब्दी के उड़िया कवि सरलादास ने इसी नीलमाधव को पुरी ले जाकर स्थापित करने की बात कही है।

डॉ. जे. पी. सिंहदेव और डॉ. एल. पी. साहू अपनी पुस्तकों 'कल्ट ऑफ जगन्नाथ' और 'कल्चरल प्रोफाइल ऑफ साउथ कोसला' में लिखते हैं कि भगवान नीलमाधव की मूर्ति को शबरीनारायण से पुरी लाने वाले पुरी के राजपुरोहित विद्यापति नहीं थे। तान्त्रिक इन्द्रभूति उसे सम्भल पहाड़ी की एक गुफा में ले गए थे। वे मूर्ति के सामने बैठकर तन्त्र मन्त्र की साधना करते थे।

यहीं उन्होंने वज्रयान बौद्ध धर्म की स्थापना की। उन्होंने तिब्बत जाकर लामा सम्प्रदाय की भी स्थापना की। बंगाल की राजकुमारी लक्ष्मींकरा इन्द्रभूति की बहन थीं। उन्होंने बाद में पटना के राजा जैलेन्द्रनाथ से विवाह किया। इन्द्रभूति के वंशजों ने तीन पीढ़ी तक नीलमाधव के सामने बैठकर तन्त्र मन्त्र की साधना की। बाद में उन्होंने उस मूर्ति को पुरी ले जाकर भगवान जगन्नाथ के रूप में प्रतिष्ठित किया। पहले जगन्नाथ पुरी के इस मन्दिर में तान्त्रिकों का नियन्त्रण था। आदि गुरु शंकराचार्य ने उनसे शास्त्रार्थ किया और मन्दिर को उनके प्रभाव से मुक्त कराया।

जरा अपने नीलमाधव को न पाकर खूब विलाप करने लगा। उसने अन्न और जल त्याग कर मृत्यु का वरण करने का निश्चय किया। तभी भगवान नीलमाधव ने उसे अपने नारायणी रूप के दर्शन कराए। उन्होंने यहाँ गुप्त रूप से विराजित होने का वरदान दिया। उन्होंने यह भी वरदान दिया कि प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को जो कोई मेरे दर्शन करेगा वह सीधे बैकुण्ठ धाम जाएगा। तब से यह गुप्तधाम कहलाया।

आज भी यहाँ भगवान नारायण का स्वरूप विद्यमान है। उनके चरणों को स्पर्श करता रोहिणी कुण्ड भी यहाँ है। इसकी बड़ी मान्यता है। प्राचीन कवि श्री बटुकसिंह ने रोहिणी कुण्ड को एक धाम माना है। साहित्यकार पण्डित मालिकराम भोगहा ने शबरीनारायण माहात्म्य में इसे मुक्ति का एक साधन बताया है:

रोहिणि कुंडहि स्पर्श कर चित्रोत्पल जल न्हाय।
योग भ्रष्ट योगी मुकति पावत पाप बहाय।।

पुरी के जगन्नाथ मन्दिर और शबरीनारायण मन्दिर में काफी समानता है। दोनों मन्दिर तान्त्रिकों के नियन्त्रण में थे। आदि गुरु शंकराचार्य और स्वामी दयाराम दास ने शास्त्रार्थ करके इन्हें तान्त्रिकों के प्रभाव से मुक्त कराया। शबरीनारायण में नाथ सम्प्रदाय के तान्त्रिकों का नियन्त्रण था। शबरीनारायण से होकर जगन्नाथ पुरी जाने का मार्ग था। यहाँ के तान्त्रिक शेर बनकर यात्रियों को डराते थे। वे यात्रियों को मारकर खा जाते थे। यात्री इस मार्ग से जाने में डरते थे।

शिवरीनारायण का मंदिर
शबरीनारायण मन्दिर

एक बार स्वामी दयाराम दास ग्वालियर से तीर्थाटन करते हुए रत्नपुर पहुँचे। रत्नपुर के राजा उनकी विद्वता से बहुत प्रसन्न हुए। राजा ने उन्हें शबरीनारायण के मन्दिर और मठ की व्यवस्था करने का दायित्व सौंपा। स्वामी दयाराम दास जब शबरीनारायण पहुँचे तब तान्त्रिक उन्हें डराने के लिए शेर बनकर झपटे। शेर के रूप में तान्त्रिक उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके। बाद में तान्त्रिकों के गुरु कनफड़ा बाबा के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ। इसमें कनफड़ा बाबा की हार हुई। वे डर के कारण जमीन के भीतर चले गए। इस तरह शबरीनारायण के मठ और मन्दिर नाथ सम्प्रदाय के तान्त्रिकों के प्रभाव से मुक्त हुए। जगन्नाथ पुरी जाने वाले यात्रियों को तान्त्रिकों के भय से मुक्ति मिली। यहाँ रामानन्दी सम्प्रदाय के वैष्णवों का प्रभाव स्थापित हुआ।

स्वामी दयाराम दास यहाँ के मठ के पहले महन्त हुए। तब से आज तक इस वैष्णव मठ में 14 महन्त हो चुके हैं। वे सभी बड़े धार्मिक और ईश्वर भक्त थे। उनकी प्रेरणा से लोगों ने अनेक मन्दिर बनाए और महानदी के किनारे घाटों का निर्माण किया। लोगों ने मन्दिर की व्यवस्था के लिए जमीन दान में दी। उन्होंने इस क्षेत्र में भक्ति भाव का विस्तार किया। कनफड़ा बाबा जिस स्थान पर जमीन के भीतर गए थे वहाँ स्वामी दयाराम दास ने एक गाधी चौरा बनवाया।


शिवरीनारायण मंदिर गर्भगृह

प्रतिवर्ष माघ शुक्ल त्रयोदशी और आश्विन शुक्ल दशमी को शिवरीनारायण के महन्त इस गाधी चौरा में बैठकर पूजा करते हैं। वे प्रतीकात्मक रूप से यह बताते हैं कि वैष्णव सम्प्रदाय तान्त्रिकों के प्रभाव से ऊपर है। शिवरीनारायण के दक्षिणी द्वार के एक छोटे मन्दिर में तान्त्रिकों के गुरु कनफड़ा बाबा की पगड़ीधारी मूर्ति है। बस्ती के बाहर नाथ गुफा के नाम से एक मन्दिर है। ये बातें इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं। वर्तमान में शिवरीनारायण के इस वैष्णव मठ के 15वें महन्त राजेश्री डॉ. रामसुन्दरदास हैं। वे प्रतिवर्ष गद्दी महोत्सव का आयोजन करते हैं। इसमें एक वर्ष श्रीरामकथा और दूसरे वर्ष श्रीमद्भागवत कथा होती है।

शबरीनारायण में वैष्णव मठ के भीतर विक्रम संवत् 1927 में महन्त अर्जुनदास की प्रेरणा से भटगाँव के जमीन्दार राजसिंह ने जगन्नाथ मन्दिर का निर्माण शुरू कराया। उनके पुत्र चन्दनसिंह ने इसे पूरा कराया। उन्होंने मन्दिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों की स्थापना कराई। विक्रम संवत् 1927 में ही उन्होंने महन्त अर्जुनदास की प्रेरणा से महानदी के तट पर योगियों के निवास के लिए एक भवन बनवाया। इसे जोगीडीपा कहते हैं।

साहित्यकार और तत्कालीन शबरीनारायण तहसील के तहसीलदार ठाकुर जगमोहनसिंह ने अपनी पुस्तक 'प्रलय' में लिखा है कि जोगीडिफा बाबा गौतमदास का सुन्दर बगीचा है। यह एक ऊँची भूमि पर है जो पहले एक पहाड़ी थी। बाबा यहाँ के महन्त हैं। रथयात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा यहाँ एक सप्ताह विश्राम करते हैं। इस कारण इसे जनकपुर भी कहा जाता है। पहले रथयात्रा में पण्डित कौशलप्रसाद द्विवेदी के घर की मूर्तियों को रथ में निकाला जाता था। बाद में मठ की मूर्तियों को निकाला जाने लगा। कुछ वर्षों तक दो रथों में दोनों स्थानों की मूर्तियाँ निकाली गईं। आज केवल मठ की मूर्तियाँ ही रथ में निकाली जाती हैं।

रथयात्रा यहाँ का एक प्रमुख त्योहार है। मठ प्राचीन काल से यहाँ रथयात्रा का आयोजन कर रहा है। जानकारी के अनुसार महन्त गौतमदास ने यहाँ रथयात्रा की शुरुआत की। महन्त लालदास ने उसे व्यवस्थित किया। लोग मठ के मुख्तियार पण्डित कौशलप्रसाद तिवारी को हमेशा याद रखेंगे। उन्होंने यहाँ रामलीला, रासलीला, नाटक, रथयात्रा और माघी मेला को व्यवस्थित करने में बड़ी भूमिका निभाई है। रथयात्रा के लिए जगन्नाथ पुरी की तरह यहाँ भी प्रतिवर्ष लकड़ी का रथ बनता था। बाद में इसे बन्द कर दिया गया। अब एक लोहे का रथ बनवाया गया है। आज इसी रथ में यात्रा निकलती है। शिवरीनारायण और आसपास के हजारों श्रद्धालु यहाँ आकर रथयात्रा में शामिल होते हैं। वे रथ खींचकर पुण्य कमाते हैं। लोग जगह-जगह रथ को रोककर पूजा करते हैं। वे प्रसाद के रूप में नारियल, लाई और गजामूँग देते हैं। यहाँ मेले जैसा दृश्य होता है।

पूरे छत्तीसगढ़ में यह दिन बहुत पवित्र माना जाता है। इस दिन लोग बेटी को विदा करने, बहू को लाने, नई दुकानों की शुरुआत और गृह प्रवेश जैसे काम करते हैं। इस दिन लोग अपने परिजनों और मित्रों के घर मिठाई भेजते हैं। बच्चे नए कपड़े पहनते हैं। बड़ों की ओर से उन्हें खर्च करने के लिए पैसे मिलते हैं। उनके लिए यह एक विशेष दिन होता है। सद्भाव का प्रतीक रथयात्रा आज भी यहाँ श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है। शिवरीनारायण को छत्तीसगढ़ की जगन्नाथ पुरी कहा जाता है। राजिम में भगवान साक्षी गोपाल विराजमान हैं। मान्यता है कि शिवरीनारायण के बाद राजिम की यात्रा और भगवान साक्षी गोपाल का दर्शन करना आवश्यक है। इसके बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है। जगन्नाथ पुरी को स्वर्गद्वार कहा जाता है। वहाँ कुष्ठ रोगियों का उपचार होता है। शिवरीनारायण का भी वैसा ही महत्व है। कवि बटुकसिंह श्रीशिवरीनारायण सिन्दूरगिरि माहात्म्य में लिखते हैं:

क्वांर कृष्णों सुदि नौमि के होत तहां स्नान।
कोढ़िन को काया मिले निर्धन को धनवान।।

शिवरीनारायण में बिलासपुर रोड पर कुष्ठ रोगियों के लिए एक पुराना केन्द्र था। यहाँ कुष्ठ रोग विशेषज्ञ के रूप में डॉ. एम. एम. गौर की नियुक्ति हुई थी। बाद में उनकी सलाह पर प्रयागप्रसाद केशरवानी चिकित्सालय की स्थापना हुई। शिवरीनारायण से पाँच किलोमीटर दूर स्थित दुरपा गाँव को अंग्रेज सरकार ने लेप्रोसी गाँव घोषित किया था। इस गाँव में आना-जाना पूरी तरह प्रतिबन्धित था। शिवरीनारायण से 70 किलोमीटर दूर चाम्पा में सोंठी कुष्ठ आश्रम है। इसी तरह बिलासपुर रायपुर रोड पर बैतलपुर में भी एक कुष्ठ आश्रम है। यहाँ कुष्ठ रोगियों का इलाज होता है। वे कई प्रकार के उद्योग भी चलाते हैं। वहाँ उनके बच्चों के रहने और पढ़ने का पूरा प्रबन्ध है। शासन इस कुष्ठ आश्रम को हर प्रकार का सहयोग देता है। ऐसे मुक्तिधाम को पुरी क्षेत्र कहा गया है:

शिवरीनारायण पुरी क्षेत्र शिरोमणि जान।
याज्ञवल्क्य व्यासादि ऋषि निजमुख करत बखान।।

यहाँ भगवान नारायण के चरणों को स्पर्श करते रोहिणी कुण्ड की बहुत मान्यता है। कवियों ने इसे मोक्ष देने वाला बताया है। इस कुण्ड के कारण इसे बैकुण्ठ द्वार माना गया है। एक कवि ने लिखा है:

नारायण के कलाश्रित जानिय धामहि एक
प्रथम विष्णुपुरि नाम पुनि रामपुरि हूँ नेक
चित्रोत्पल नदि तीर महि मंडित अति आराम
बस्यो यहां बैकुंठपुर नारायणपुर धाम
भासति तहं सिंदूरगिरि श्रीहरि कीन्ह निवास
कुंड रोहिणी चरण तल भक्त अभीष्ट प्रकास।

चाम्पा में जमीन्दार रुद्रशरणसिंह ने जगन्नाथ मन्दिर बनवाया। इसी तरह सारागाँव में काशीप्रसाद राठौर के पूर्वजों ने हटरी चौक में और रगजा में घासीराम चौधरी ने सन् 1926 ईस्वी में जगन्नाथ मन्दिर बनवाया था। लोग रथ खींचकर नारियल, लाई और गजामूँग का प्रसाद ग्रहण करते हैं। जगन्नाथ पुरी और चाम्पा में विशेष रूप से मालपुआ बनाया जाता है। बस्तर में इसे गोन्चा पर्व के रूप में मनाते हैं।


जगन्नाथ मन्दिर, चांपा

छत्तीसगढ़ में रथयात्रा की तिथि को शुभ दिन माना जाता है। इस दिन लोग शुभ कार्य करते हैं। बेटी को विदा करने और बहू को घर लाने की परम्परा है। बच्चे और बड़े सभी नए कपड़े पहनकर रथयात्रा में शामिल होते हैं। इस दिन लोग रिश्तेदारों के घर मिठाई भेजते हैं। यह लोक भावना से जुड़ी परम्परा है। इससे सद्भावना बढ़ती है। इसमें जाति भेद नहीं होता। कवि ने लिखा है:

मास आषाढ़ रथ दुतीया, रथ के किया बयान।
दर्शन रथ को जो करे, पावे पद निर्वान।।

लेख:

प्रो. अश्विनी केशरवानी
डागा कॉलोनी, बरपाली चौक
चाम्पा 495671, जिला जांजगीर चाम्पा (छत्तीसगढ़)

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