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रानी लक्ष्मीबाई: स्वाभिमान, संघर्ष और बलिदान की गाथा

रानी लक्ष्मीबाई: स्वाभिमान, संघर्ष और बलिदान की गाथा


भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में 1857 की क्रान्ति एक युगान्तरकारी घटना थी। इस महायज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाली वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम शौर्य और बलिदान का पर्याय बन चुका है। आज उनके बलिदान दिवस पर यह विशेष आलेख उनके जीवन के अनछुए पहलुओं, उनके अदम्य साहस और अद्वितीय युद्ध कौशल को रेखाङ्कित करता है। यह लेख केवल एक ऐतिहासिक वृत्तान्त नहीं है, अपितु नारी शक्ति के उस चरमोत्कर्ष की गाथा है जिसने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं। आइए, उस महानायिका को नमन करें जिसने पराधीनता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए शस्त्र उठाए और मरते दम तक अपनी मातृभूमि की आन की रक्षा की।


भारत की पावन वसुन्धरा ने युगों युगों से ऐसी ओजस्वी नारियों को संरक्षण दिया है जिन्होंने समय आने पर चण्डी का रूप धरकर दुष्टों का संहार किया है। हमारी संस्कृति में नारी केवल कोमलता का प्रतीक नहीं है, अपितु वह शक्ति का पुञ्ज भी है।

पौराणिक काल की गाथाओं में जगज्जननी दुर्गा का उल्लेख मिलता है जिन्होंने महिषासुर का दमन कर देवताओं को अभय प्रदान किया। त्रेतायुग में महाराज दशरथ की रानी कैकेयी ने देवासुर संग्राम में अपने शौर्य से इन्द्र को भी चकित कर दिया था।

द्वापर के पृष्ठों में सत्यभामा का शौर्य अंकित है जिन्होंने नरकासुर के वध में सक्रिय भूमिका निभाई। इसी परम्परा को ऐतिहासिक युग में रानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती, कित्तूर की रानी चिनम्मा, रानी अबक्का चौटा, अवन्ती बाई लोधी, झलकारी बाई, ऊषा देवी, सावित्रीबाई फूले, भीखा जी कामा और फातिमा शेख जैसी वीरांगनाओं ने जीवित रखा।

इन महानायिकाओं ने अपनी मातृभूमि की स्वतन्त्रता और समाज सुधार के लिए अपने व्यक्तिगत सुखों का परित्याग कर संघर्ष का मार्ग चुना। इनमें झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम शौर्य, नारी अस्मिता और प्रखर राष्ट्रभक्ति के शिखर के रूप में जाना जाता है।

भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में वर्ष 1857 की क्रान्ति का स्थान स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। इस प्रथम स्वतन्त्रता महासंग्राम को अपनी वीरता से सींचने वाली प्रमुख महानायिका लक्ष्मीबाई ही थीं। प्रति वर्ष 18 जून का दिन उनके सर्वोच्च बलिदान के स्मरण का अवसर है।

यह केवल एक तिथि नहीं है, अपितु भारतीय नारी के शौर्य और देशभक्ति के चरमोत्कर्ष का प्रतीक है। रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवम्बर 1828 को पवित्र नगरी वाराणसी में मोरोपन्त ताम्बे और भागीरथी बाई के घर हुआ था। उनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था, जिसे परिजन प्रेम से मनु पुकारा करते थे।

बचपन से ही मनु को था अस्त्र-शस्त्र से प्यार
बचपन से ही मनु को था अस्त्र-शस्त्र से प्यार

 

होनहार बीरवान के होत चिकने पात वाली लोकोक्ति उन पर पूर्णतः सिद्ध होती थी। मनु ने बचपन में गुड़ियों से खेलने के स्थान पर शस्त्र संचालन, घुड़सवारी और मल्लविद्या को अपना मित्र बनाया। अल्पायु में ही माता के निधन के पश्चात उनके पिता ने ही उनका पालन पोषण किया।

बिठूर में पेशवा बाजीराव के संरक्षण में रहते हुए उन्हें नाना साहब और तात्या टोपे जैसे महान योद्धाओं का साथ मिला। मोरोपन्त ताम्बे ने तत्कालीन सामाजिक रूढ़ियों को त्यागकर अपनी पुत्री को उच्च शिक्षा और युद्ध कला में प्रवीण बनाया जो उस समय के समाज में एक क्रान्तिकारी कदम था।

वर्ष 1842 में मणिकर्णिका का विवाह झाँसी के मराठा महाराज गंगाधर राव नेवलकर के साथ सम्पन्न हुआ। विवाह के उपरान्त उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। झाँसी की रानी बनने के पश्चात उन्होंने राजकाज में अपनी प्रखर बुद्धि और योग्यता का परिचय दिया।

उनके जीवन में दुखों का पहाड़ तब टूटा जब वर्ष 1853 में महाराज का निधन हो गया। महाराज के निधन के साथ ही क्रूर ब्रिटिश सत्ता की गिद्ध दृष्टि झाँसी पर पड़ गई। तत्कालीन गवर्नर जनरल की क्रूर नीति हड़प नीति के अन्तर्गत रानी के दत्तक पुत्र दामोदर राव को झाँसी का वैध उत्तराधिकारी मानने से अस्वीकार कर दिया गया।

अंग्रेजों ने झाँसी को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने का षड्यन्त्र रचा। इस कठिन परिस्थिति में रानी विचलित नहीं हुईं। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध सिंहगर्जना करते हुए यह ऐतिहासिक उद्घोष किया कि मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी। उन्हें विवश होकर झाँसी का किला छोड़कर रानी महल में जाना पड़ा, परन्तु उन्होंने अपना साहस और संकल्प नहीं छोड़ा।


विपरीत परिस्थितियों में भी रानी ने किया अंग्रेजों का प्रतिकार 

वर्ष 1857 में समूचे भारत में स्वाधीनता की ज्वाला धधक उठी। झाँसी में भी हिंसा की अग्नि फैल गई। रानी लक्ष्मीबाई अपनी दूरदर्शिता से भांप गई थीं कि अंग्रेज कूटनीति के माध्यम से उनके राज्य को हड़पने की अन्तिम चेष्टा कर रहे हैं।

उन्होंने समाज की महिलाओं को संगठित करना आरम्भ किया और ‘दुर्गा दल’ का गठन किया। इस सैन्य दल में समाज के सभी वर्गों की शक्तिशाली महिलाएँ सम्मिलित थीं। झलकारी बाई, मुन्दरी बाई और जूही जैसी वीरांगनाएँ इस दल की मुख्य स्तम्भ थीं।

इन जाँबाज महिलाओं ने समय समय पर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में लक्ष्मीबाई की सक्रिय सहायता की और अपनी वीरता का प्रदर्शन किया। झाँसी पर केवल अंग्रेजों का ही संकट नहीं था, अपितु पड़ोसी राज्यों ओरछा और दतिया ने भी अवसर पाकर आक्रमण कर दिया। रानी ने अपने शौर्य और पराक्रम से उन्हें धूल चटा दी।


दुर्गा दल ने किया था अंग्रेजों की नाक में दम 

वर्ष 1858 में ब्रिटिश सेनापति ह्यूरोज ने विशाल सेना के साथ झाँसी के किले को घेर लिया। रानी ने स्वयं अपनी सेना का कुशल नेतृत्व किया और अंग्रेजों का मुकाबला किया। जब किले का पतन निकट दिखा, तब वे अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बाँधकर और हाथों में नंगी तलवार लेकर किले की ऊँची दीवार से अपने वफादार घोड़े बादल के साथ नीचे कूद गईं।

वे कालपी और फिर ग्वालियर की ओर कूच कर गईं। वहाँ उन्होंने तात्या टोपे और अली बहादुर के साथ मिलकर ग्वालियर के किले पर अधिकार प्राप्त किया। लक्ष्मीबाई केवल युद्ध कला में ही निपुण नहीं थीं, अपितु वे हिंसक पशुओं के मनोविज्ञान को भी भलीभाँति समझती थीं।

एक बार महाराज के दरबार में दो अत्यन्त हिंसक और भूखे बाघ लाए गए। वे पिंजरे में इतने आक्रामक थे कि उन्हें नियन्त्रित करना असम्भव लग रहा था। लक्ष्मीबाई ने निर्भय होकर पिंजरे के निकट जाकर अपनी आँखों के प्रभाव और विशिष्ट ध्वनि संकेतों से उन बाघों को शान्त कर दिया।

उनकी इस निडरता को देखकर अंग्रेज अधिकारी भी दंग रह गए थे। ग्वालियर के निकट कोटा की सराय में 18 जून 1858 को रानी का अंग्रेजों के साथ अन्तिम और भीषण युद्ध हुआ। युद्ध के मैदान में वे रणचण्डी की भाँति शत्रुओं पर टूट पड़ीं। उनकी वीरता को देखकर अंग्रेज सेनापति भी चकित रह गया था।


अंग्रेजों पर सिंहनी की तरह झपटती रानी लक्ष्मीबाई 

युद्ध के दौरान एक अंग्रेज सैनिक ने पीछे से उनके मस्तक पर तलवार से प्रहार किया जिससे उनके सिर का दाहिना भाग कट गया। ऐसी भीषण पीड़ा और गम्भीर चोट के बावजूद उन्होंने पलटकर उस अंग्रेज सैनिक के टुकड़े टुकड़े कर दिए। वे तब तक लड़ती रहीं जब तक ब्रिटिश सेना पीछे हटने पर विवश नहीं हो गई।

इस युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देते हुए मात्र 29 वर्ष की आयु में उन्होंने वीरगति प्राप्त की। रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उनकी वीरता का लोहा मानते हुए अंग्रेज जनरल ह्यूरोज ने स्वयं कहा था कि यहाँ वह महिला सोई हुई है, जो विद्रोहियों में एकमात्र मर्द थी।

अन्तिम क्षणों में भी उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनका पवित्र शरीर अंग्रेजों के हाथ नहीं लगना चाहिए। उनके वफादार सैनिकों ने एक सन्यासी की कुटिया में ले जाकर उनका अन्तिम संस्कार किया। लक्ष्मीबाई का बलिदान आने वाली प्रत्येक पीढ़ी के लिए राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत बन गया।


वीरता की अमर मूर्ति -रानी लक्ष्मीबाई 

कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कालजयी पंक्तियाँ आज भी प्रत्येक भारतीय की धमनियों में राष्ट्रप्रेम का संचार कर देती हैं :

बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

- डॉ पद्‌मा साहू ‘पर्वणी’

 

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