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प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी: रानी अब्बक्का देवी

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भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक नाम हैं जो शौर्य, साहस और स्वाधीनता संग्राम के अमर नायक हैं, किंतु जब हम स्वतंत्रता संग्राम से सम्बंधित महिलाओं की चर्चा करते हैं तो प्रायः झलकारी बाई, रानी लक्ष्मीबाई जैसे कुछ ही नाम सामने आते हैं। इतिहास के पन्नों में एक ऐसा ही नाम कहीं दब गया है, "रानी अब्बक्का चौटा", जिन्होंने सोलहवीं शताब्दी में पुर्तगालियों के विरुद्ध लगभग चार दशकों तक निरंतर संघर्ष किया। रानी अब्बक्का चौटा को भारत की प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी के रूप में स्मरण किया जाता है। वे केवल एक रानी ही नहीं, बल्कि कुशल प्रशासक, व्यापार नीति की ज्ञाता थीं। उनका जीवन साहस, रणनीति और नेतृत्व की अद्भुत प्रेरक गाथा है।


रानी अब्बक्का: प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी

रानी अब्बक्का का जन्म लगभग 1525 ईस्वी में हुआ। वे चौटा वंश से संबंधित थीं, जो एक प्राचीन तुलु राजवंश था और दक्षिण भारत के तटीय कर्नाटक, अर्थात तुलुनाडु, के कुछ हिस्सों पर शासन करता था। चौटा वंश की राजधानी पुत्तिगे थी, जबकि उलाल, जो वर्तमान कर्नाटक में स्थित है, एक महत्त्वपूर्ण बंदरगाह और सहायक राजधानी के रूप में विकसित हुआ। विवाह के पश्चात अब्बक्का उलाल की शासक बनीं और यहीं से उनके राजनीतिक तथा सैन्य नेतृत्व आरंभ होता है।

अब्बक्का को बचपन से ही एक भावी शासक और सेनानायक के रूप में प्रशिक्षित किया गया था। चौटा वंश मातृवंशीय प्रणाली का पालन करता था, जिसमें संपत्ति और सत्ता माता से पुत्री को हस्तांतरित होती थी, इस कारण बचपन से ही अब्बक्का को उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया गया। उन्हें युद्ध कला और सैन्य प्रशिक्षण, राज्य प्रशासन और कूटनीति, व्यापार और आर्थिक प्रबंधन, राजनयिक कौशल और सैनिक रणनीति और गुरिल्ला युद्ध तकनीक जैसे विषयों में शिक्षा दी गई। यही प्रशिक्षण आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत सिद्ध हुआ और उन्हें एक संगठित, दूरदर्शी और पुर्तगालियों के विरुद्ध प्रतिरोध का केंद्र बना सका।

सोलहवीं शताब्दी में वास्को द गामा के 1498 में भारत आगमन के बाद पुर्तगाल एक नई औपनिवेशिक शक्ति के रूप में भारतीय तटों पर उभरा और उसने समुद्री व्यापार तथा किलों पर अपना वर्चस्व स्थापित करना प्रारंभ किया। उलाल उस समय एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण बंदरगाह था, जहाँ से मसालों, विशेष रूप से काली मिर्च, इलायची तथा चावल का खूब व्यापार होता था। यह अरब सागर के व्यापार मार्गों के लिए सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। पुर्तगाली उलाल को अपने नियंत्रण में लेकर इस व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना चाहते थे।

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मसालों का व्यापार

जब अब्बक्का उलाल की शासक बनीं, तब तक पुर्तगाली उनके क्षेत्र में धीरे धीरे हस्तक्षेप बढ़ा चुके थे। उन्होंने कर वसूली और सुरक्षा शुल्क के नाम पर उलाल से भारी धनराशि की मांग शुरू कर दी। अधिकांश समकालीन राजाओं ने विभिन्न कारणों से पुर्तगालियों से समझौता कर लिया, लेकिन अब्बक्का ने किसी भी प्रकार के समझौते से स्पष्ट इनकार कर दिया। उन्होंने न केवल उनकी अनुचित मांगों को ठुकराया, बल्कि समय रहते उनके विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध का मार्ग भी चुना।


पुर्तगालियों का उलाल क्षेत्र में हस्तक्षेप

1555 ईस्वी में पुर्तगाली एडमिरल डॉम अल्वारो दा सिल्वीरा ने उलाल पर आक्रमण किया। सिल्वीरा को विश्वास था कि एक छोटे तटीय राज्य की महिला शासक उसके सामने टिक नहीं पाएगी, परंतु अब्बक्का ने अपने कुशल सैन्य नेतृत्व और रणनीति से इस आक्रमण को पूरी तरह विफल कर दिया और पुर्तगाली सिल्वीरा को पराजित कर पीछे हटने के लिए विवश किया। यह विजय रानी अब्बक्का की सैन्य प्रतिभा और आत्मविश्वास का प्रमाण था, जिसने पुर्तगालियों को यह स्पष्ट संदेश दिया कि उलाल को कब्ज़ा करना उनके लिए आसान लक्ष्य नहीं है।

इसके बाद के वर्षों, लगभग 1557 से 1568 तक, अब्बक्का ने पुर्तगालियों के अनेक आक्रमणों को विफल किया और निरंतर प्रतिरोध की नीति अपनाए रखी। वे नियमित सेना के साथ साथ गुरिल्ला युद्ध कौशल का भी प्रयोग करती थीं। स्थानीय भूभाग, समुद्री तटों और बंदरगाहों की उनकी समझ, उनके सबसे बड़े सामरिक हथियार थे। वे घात लगाकर छापामार हमले करतीं, पुर्तगाली जहाजों और चौकियों पर अचानक आक्रमण कर उन्हें भारी क्षति पहुँचातीं और फिर सुरक्षित स्थानों पर लौट जातीं।

1568 ईस्वी में पुर्तगालियों ने अब्बक्का को निर्णायक रूप से परास्त करने के उद्देश्य से एक विशाल सैन्य अभियान चलाया। उन्होंने मैंगलोर का किला अपने अधीन कर लिया और उलाल पर भीषण आक्रमण की योजना बनाई। पुर्तगालियों को विश्वास था कि इस बार अब्बक्का की पराजय निश्चित है, लेकिन अब्बक्का की रणनीति अत्यंत चतुर और अप्रत्याशित सिद्ध हुई। कथाओं और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उन्होंने एक मस्जिद में शरण लेकर शत्रु को भ्रमित किया और फिर रात के अंधेरे में लगभग दो सौ चुने हुए सैनिकों के साथ पुर्तगाली शिविर पर अचानक टूट पड़ीं। इस भीषण युद्ध में पुर्तगाली जनरल पेसु और उसके लगभग सत्तर सैनिक मारे गए, शेष सैनिक प्राण बचाकर भागने पर विवश हो गए। इस युद्ध को रानी अब्बक्का की सबसे प्रसिद्ध युद्धों के रूप में स्मरण किया जाता है।


रानी अब्बक्का अपने किले से देखती हुई:चित्र 

रणभूमि की नायिका होने के साथ साथ रानी अब्बक्का एक दूरदर्शी और कुशल प्रशासक भी थीं। उन्होंने उलाल को एक प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह के रूप में सुदृढ़ किया। उनके शासनकाल में काली मिर्च, अन्य मसालों, इलायची, चावल, नारियल और नारियल तेल के व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। उन्होंने व्यापारिक गतिविधियों को प्रोत्साहित कर राज्य की आर्थिक शक्ति को मजबूत बनाया, जिससे युद्ध की तैयारियों, नौसैनिक क्षमता और सैनिक संगठन की निरंतरता बनी रही।

अपने राज्य की सुरक्षा और सामरिक शक्ति के लिए अब्बक्का ने प्रभावी राजनयिक संबंधों का एक विस्तृत जाल तैयार किया। उन्होंने कालिकट के जमोरिन से गठबंधन किया, जो स्वयं भी पुर्तगालियों के विरुद्ध संघर्षरत एक शक्तिशाली हिंदू शासक था। दक्कन क्षेत्र में स्थित बीजापुर के सुल्तान से भी उन्होंने समझौता किया, जो उस समय एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति थी। उलाल के बंदरगाह पर आने वाले अरब व्यापारियों के साथ उन्होंने सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे, जिससे व्यापार के साथ साथ नौसैनिक सहयोग और सूचना तंत्र की मजबूती में सहायता मिली। अब्बक्का ने हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों को अपने ध्वज तले संगठित किया, विभिन्न जातियों और वर्गों के लोगों को अपनी सेना में स्थान दिया और विशेष रूप से मोगवेरा, स्थानीय मछुआरा समुदाय, के साथ मजबूत नौसैनिक गठबंधन बनाया, जो समुद्र में उनकी शक्ति का मुख्य आधार बने।


रानी अब्क्का की जल सेना।

रानी अब्बक्का को विशेष रूप से इस कारण से याद किया जाता है कि वे यूरोपीय औपनिवेशिक शक्ति के विरुद्ध संगठित, सशस्त्र और दीर्घकालीन प्रतिरोध का नेतृत्व करने वाली भारत की अग्रणी महिला सेनानायिका थीं। लोककथाओं के अनुसार, उन्होंने पुर्तगालियों के विरुद्ध युद्ध में अग्निबाण, अर्थात अग्नि से युक्त तीर, जैसी पारंपरिक युद्ध तकनीकों का प्रयोग किया और इस प्रकार वे ऐसे शस्त्रों का उपयोग करने वाली अंतिम भारतीय सेनानायिकाओं में गिनी जाती हैं। उन्होंने लगभग चालीस वर्षों तक तटीय कर्नाटक क्षेत्र में पुर्तगाली विस्तारवाद को निर्णायक रूप से रोककर रखा, यही कारण है कि उन्हें तटीय भारत की रक्षक भी माना जाता है।


पुर्तगालियों के विरुद्ध अग्निबाण चलाती रानी अब्बक्का

लगभग 1570 ईस्वी के आसपास कुछ स्वार्थी और अवसरवादी तत्वों ने पुर्तगालियों से गुप्त गठजोड़ कर रानी अब्बक्का के साथ विश्वासघात किया। उनके ही कुछ निकटवर्ती लोगों ने उन्हें पकड़वाने में शत्रु की सहायता की। अंततः अब्बक्का को बंदी बनाकर पुर्तगाली जेल में डाल दिया गया। किंतु कारावास में भी उनकी निडर भावना और स्वतंत्रता की ज्वाला शांत नहीं हुई। कुछ विवरणों और किंवदंतियों के अनुसार, उन्होंने जेल से भागने का प्रयास किया और अपने सैनिकों के साथ पुनः संघर्ष संगठित करने की चेष्टा की।

रानी अब्बक्का अकेली नहीं थीं। भारत का इतिहास सैकड़ों ऐसी वीरांगनाओं से भरा है, जिनके योगदान को या तो भुला दिया गया या बहुत कम महत्त्व दिया गया। मातंगिनी हाजरा, प्रीतिलता वड्डेदार, रानी किट्टूर चेन्नम्मा, कैप्टन लक्ष्मी सहगल और 1857 की शामली की सत्ताईस वीरांगनाएँ, ये सभी भारतीय नारी शक्ति के प्रतीक हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि इन विस्मृत नायिकाओं की गाथाएँ नई पीढ़ी तक पहुँचे, इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में इनके योगदान को उचित स्थान दिया जाए, इनके जीवन पर विस्तार से विमर्श हो, और अब्बक्का, किट्टूर चेन्नम्मा तथा अन्य महिला सेनानायिकाओं पर आधारित फिल्में और वृत्तचित्र बनाए जाएँ, ताकि समाज इनसे प्रेरणा प्राप्त कर सके।

2023 Rani Abbakka Devi 1v Stamp - Phila Art
भारत सरकार ने 15 दिसंबर 2023 को रानी अब्बक्का चौटा की स्मृति में 5₹ मूल्य का स्मृति डाक टिकट जारी किया। यह टिकट भारत की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी को राष्ट्रीय सम्मान प्रदान करने का प्रतीक है। इससे पहले 15 जनवरी 2003 को उनके नाम पर एक विशेष कवर भी जारी किया गया था।

 

रानी अब्बक्का चौटा को "अभय रानी" की उपाधि दी गई थी, क्योंकि वे किसी भी शक्ति से भयभीत नहीं होती थीं। आज, जब हम अपने इतिहास को अधिक संतुलित और समग्र दृष्टि से देख पाने की स्थिति में हैं, तो हमारा कर्तव्य है कि इन विस्मृत नायिकाओं को योग्य सम्मान दिया जाए। रानी अब्बक्का का संघर्ष हमें यह सिखाता है कि निडरता, दृढ़ संकल्प और रणनीतिक बुद्धिमत्ता के साथ कोई भी व्यक्ति असंभव दिखाई देने वाली चुनौती को भी संभव में बदल सकता है, और यही संदेश आज भी प्रत्येक भारतीय के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत बना हुआ है।

लेख 
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर 
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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