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उत्तराखण्ड की लोकचेतना में बसी रामायण  और उसकी अद्भुत नाट्य परम्परा

उत्तराखण्ड की लोकचेतना में बसी रामायण   और उसकी अद्भुत नाट्य परम्परा


रामायण की पावन कथा सम्पूर्ण भारतवर्ष के रोम-रोम में बसी है। श्री सन्तोष कुमार जी का यह भावसौन्दर्य से परिपूर्ण लेख उत्तराखण्ड के गढ़वाल क्षेत्र में प्रचलित रामायण की अत्यन्त विलक्षण और समृद्ध लोक नाट्य परम्परा की विशद विवेचना करता है। इस लेख में यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त 'रम्माण' से लेकर स्थानीय गढ़वाली रामलीला तक का अद्भुत चित्रण है। यह लेख पहाड़ी लोकचेतना द्वारा रामकथा में अपने स्थानीय रीति रिवाजों, लोकगीतों और देवी देवताओं को पिरोकर उसे पूर्णतः आत्मसात करने का और उसे लौकिक रूप प्रदान करने का वृत्त है। केवट के तम्बाकू प्रसंग से लेकर सीता स्वयंवर के व्यंग्य तक, यह लेख रामायण के एक सर्वथा नवीन और अनसुने आयाम को हमारे सम्मुख प्रस्तुत करता है।


भारतवर्ष की सनातन और सांस्कृतिक विरासत में रामायण केवल एक साहित्यिक रचना मात्र नहीं है, अपितु यह एक ऐसी सदानीरा गंगा है, जिसने इस देश की लोकचेतना को युगों से अपने पावन जल से सींचा है। भगवान श्रीराम का चरित्र भारतीय जनमानस में इतना गहराई से रचा बसा है कि वह किसी एक ग्रन्थ या एक भाषा की सीमाओं में कभी आबद्ध नहीं रहा।

वाल्मीकि रामायण से जो पावन सुरसरिता निकली, उसने भारत के हर अंचल में अपनी एक अलग-अलग और विशिष्ट पहचान गढ़ी है। भारत की पावन धरा पर जितने विविध भौगोलिक क्षेत्र हैं, जितनी भिन्न भाषाएं हैं और जितनी समृद्ध परम्पराएँ हैं, उतनी ही रामायण भी है।

इसी कड़ी में देवभूमि उत्तराखण्ड, जिसे तपस्वियों और देवताओं की भूमि कहा जाता है, वहाँ भी रामकथा ने पहाड़ी संस्कृति के सुरों में अपना अनूठा स्वर मिलाया है। गढ़वाल की इस नाट्य परम्परा का अध्ययन केवल रामकथा का अध्ययन नहीं है, अपितु यह उस असीम और अथाह लोक श्रद्धा का भी अध्ययन है जिसने राम को महलों से निकालकर अपने ग्रामीण जीवन का एक आत्मीय अंग बना लिया।


देवभूमि में मिलता है रामायण का अद्भुत स्वरुप 

ऐसी ही एक अत्यन्त विलक्षण और अद्भुत लोक नाट्य परम्परा हमें गढ़वाल क्षेत्र में देखने को मिलती है। यह परम्परा हमारी एक ऐसी अमूल्य धरोहर है जो आधुनिकीकरण की आंधी और समय के तेज प्रवाह के साथ-साथ अपनी चमक कुछ खोती जा रही है। आज गढ़वाल की यह रामायण आधारित नृत्य नाटिका पुरानी पीढ़ियों की स्मृतियों और केवल मौखिक वृत्तान्तों में ही सिमट कर रह गई है।

इस बहुमूल्य विरासत को सहेजने और बचाने की आवश्यकता आज सर्वथा अनिवार्य और अवश्यम्भावी हो गई है। गढ़वाल क्षेत्र के अनेक अंचलों में आज भी कई प्रसिद्ध रामायण आधारित नृत्य नाटिकाएं पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ मंचित की जाती हैं। इनमें गढ़वाल की विश्वविख्यात 'रम्माण' (अर्थात् रामायण का मेला) परम्परा का स्थान सर्वोपरि है।

इस अत्यन्त समृद्ध लोककला की महत्ता को देखते हुए ही वर्ष 2008 में इसे यूनेस्को की वैश्विक अमूर्त धरोहर का प्रतिष्ठित दर्जा प्राप्त हुआ था। कई मूर्धन्य विचारकों और साहित्यकारों ने गढ़वाल में प्रचलित रामायण की इन मौखिक परम्पराओं को लिपिबद्ध करने का महनीय कार्य किया है। इन प्रबुद्ध लेखकों में डॉ. कुशल सिंह भंडारी का नाम प्रमुख है जिन्होंने रम्माण का अंग्रेजी अनुवाद किया।

इसी प्रकार देवेन्द्र प्रसाद चमोली की "गढ़वाली रामायण", श्याम प्रसाद धामी की "गढ़वाली रामायण" जो मूल संस्कृत रामायण का गढ़वाली भाषा में अत्यन्त सुन्दर अनुवाद है, और गुनानन्द डंगवाल पथिक जी की "गढ़ भाषा लीला रामायण" विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन सभी साहित्यिक कृतियों में से गढ़वाली रामायण को लोक परम्परा में पुनः स्थापित करने में गुनानन्द डंगवाल पथिक जी की भूमिका अत्यन्त ऐतिहासिक और क्रान्तिकारी रही थी।


गढ़वाली रामायण - गढ़वाली भाषा में रामायण का अनुवाद 

उन्होंने गाँव-गाँव जाकर रामायण की इस लोक परम्परा का निरन्तर प्रचार प्रसार किया और टिहरी राजशाही के कड़े विरोध के बावजूद गढ़वाली रामायण का मंचन दोबारा पूरे उत्साह के साथ प्रारम्भ करवाया। वर्ष 1977 में 'गढ़ साहित्य संस्कृति विकास परिषद' की स्थापना करके पथिक जी ने कई दशकों तक रामलीला का सफल मंचन करवाया। गढ़वाल में रामायण परम्परा का निर्वाह अलग-अलग तरह से किया जाता है।

इस लोकनाट्य में गढ़वाली, हिन्दी और अवधी भाषाओं के साथ-साथ रामचरितमानस की मूल चौपाइयों का भी अत्यन्त सुमधुर उपयोग किया जाता है। राम जन्म के पावन प्रसंग के समय "भये प्रगट कृपाला दीनदयाला" और राम-परशुराम संवाद के प्रसंग में "नाथ सम्भुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥" जैसे ओजस्वी छन्दों और चौपाइयों का प्रयोग बहुत ही भव्यता के साथ किया जाता है।

उत्तराखण्ड की यह रामायण परम्परा रामचरितमानस और स्थानीय लोक साहित्य को आपस में गूंथकर बनाई गई है, जिसमें पहाड़ी संस्कृति का अनूठा समावेश पद पद पर देखने को मिलता है। रामायण के पारम्परिक पात्रों को लेते हुए भी इसमें पहाड़ी संस्कृति के कई लोक आयामों को बड़ी ही सहजता से शामिल किया गया है।

गढ़वाली रामायण परम्परा में किसी भी कार्य के शुभारम्भ से पूर्व केवल रामायण के ईष्ट पात्रों का ही नहीं, अपितु स्थानीय कुल देवताओं का भी पूरी श्रद्धा के साथ आह्वान किया जाता है। इनमें प्रमुखता से 'भूमिया' या 'भूमियाल' (अर्थात् भूमि के देवता जिन्हें पूरे गाँव के रक्षक के रूप में पूजा जाता है) और भगवान 'नरसिंह' का आह्वाहन सर्वोपरि है।


शुभकाज से पूर्व भगवान नरसिंह और भूमिया का आह्वाहन

जहाँ भारत की अधिकतर लोक परम्पराओं में गद्य और पद्य का सामान्य समावेश दिखता है, वहीं गढ़वाल की रम्माण परम्परा में हमें बिना किसी संवाद के, केवल अद्भुत मुखौटों के साथ प्रस्तुत की जाने वाली नृत्य नाटिकाएं भी देखने को मिलती हैं, जो दर्शकों को मन्त्रमुग्ध कर देती हैं। गढ़वाली लोक परम्परा में अतिथियों का आत्मीय परिहास या मखौल उड़ाने की एक पुरानी परम्परा रही है, जिसे रामायण के कथानक में बड़ी ही सुन्दरता और कलात्मकता के साथ पिरोया गया है।

सीता स्वयंवर के प्रसंग में जब अनेक राजा अपना बल दिखाने आते हैं, तो मंच पर खड़ा हर राजा मध्य में आकर अपना बढ़-चढ़कर महिमामण्डन करता है। इस महिमामण्डन में छुपे हुए तीखे व्यंग्य के माध्यम से उन अहंकारी राजाओं का खूब मखौल बनाया जाता है। उदाहरण के लिए एक राजा पूरे दर्प के साथ मंच पर आकर कहता है: 

"कद्दू काटकर किला बनाऊं, मूली का दरवाजा।
 शकरकन्द की तोप बनाऊं, लड़े मरे सब राजा॥"

हास्य रस में भीगी ये पंक्तियाँ वास्तव में एक प्रसिद्ध बालगीत का हिस्सा हैं जो कई दशकों से गढ़वाल में खूब प्रचलित है। सामान्यतः इस गीत को बच्चों की एक कोरी कपोल कल्पना के रूप में देखा जाता है, लेकिन गढ़वाल की रामलीला में ये पंक्तियां उन अयोग्य शासकों की मूर्खता और खोखले अहंकार की बानगी के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं।


सीता स्वयंवर प्रसंग की अनोखी प्रस्तुति 

साथ-साथ ये लोक पंक्तियां पहाड़ों में सहजता से मिलने वाले अन्न और पादप जैसे कन्द मूल, मूली और शकरकन्द आदि को रामायण के भव्य कथानक से सीधे जोड़ देती हैं। इसी कारण कई विचारकों और मानवविज्ञानियों का यह दृढ़ मत है कि लोक कला और मौखिक परम्पराएं अपने प्राचीन कथानकों को प्रस्तुत करती हुई भी सदा जीवन्त और आधुनिक बनी रहती हैं।

वे नित्य ही अपने आस पास हो रहे सामाजिक बदलावों और अपनी संस्कृति के नव आयामों को उन पुरानी पौराणिक कथाओं में शामिल करके उन्हें समय के अनुकूल और आधुनिक बनाती रहती हैं। इसी क्रम में गढ़वाली रामायण में एक बेहद रोचक और अचरज भरा प्रसंग केवट और भगवान श्रीराम के मिलन का भी आता है।

इस संवाद में केवट रात की ठिठुरती ठण्ड में नदी किनारे अपने साथियों के साथ एक लोकगीत गाता है जिसमें उसके लम्बे एकान्त और जीवन के संघर्ष का सजीव वर्णन मिलता है। इसी के साथ-साथ गढ़वाल के ग्रामीण समाज की संस्कृति में प्रचलित हुक्का बीड़ी की परम्परा को भी इसमें पूरे यथार्थ के साथ शामिल किया गया है।

वाल्मीकि रामायण या रामचरितमानस में तम्बाकू का जिक्र मिलना ऐतिहासिक रूप से सम्भव नहीं है, क्योंकि तम्बाकू तो भारत में 16वीं सदी के आसपास आया था। लेकिन यह नया प्रकरण पूर्णतः उत्तराखण्ड की लोक परम्परा से लिया गया है जो मूल रामायण से बिल्कुल अलग है। इस लोकगीत को कई जगह केवट गीत कहा गया है, जिसके बोल इस प्रकार हैं:

"तम्बाकू नहीं हमारे पास कि भैया कैसी कटेगी रात।
तम्बाकू ऐसी मोहिनी जिसके लम्बे पात।
लाख टके का आदमी अरु जाय पसारे हाथ।
तम्बाकू नहीं हमारे पास कि भैया कैसी कटेगी रात।
हुक्का करे गुड़ गुड़ चिलम करे चतुराई।
तम्बाकू सारा खत्म हुआ अब तो लाओ भाई।"

इस प्रकार जब श्रीराम केवट से यह अनुनय करते हैं कि वह अपनी नाव से उन्हें नदी के पार ले जाए, तो इसी लोक धुन में संवाद होता है। श्रीराम कहते हैं: "सुनो तुम तरणी के मल्हार। हमें जाना है परली पार।" केवट हाथ जोड़कर उत्तर देता है: "सुनो तुम दशरथ राजकुमार। करो हमें भवसागर के पार।" तब श्रीराम मुस्कुराते हुए कहते हैं: "केवट पार उतार दो जाना हमें जरूर, उतराई ले लीजिए जो तुम्हें मंजूर।"


गढ़वाली रामायण का केवट मूल रामायण से है बिल्कुल अलग  

इसी प्रकार राम वन गमन के करुण परिप्रेक्ष्य में हमें एक बहुत ही भावुक गीत मिलता है "सिया दुख वन में उठाना होगा"। हिन्दी के अलावा गढ़वाली भाषा में भी कई ऐसे गीत हैं जो इस रामायण परम्परा का अटूट हिस्सा बनते रहे हैं। राम भरत संवाद के मार्मिक प्रसंग में जब श्रीराम अपने अनुज भरत को अयोध्या लौट जाने के लिए मनाते हैं, तो वे गढ़वाली में यह गीत गाते हैं "भुला म्यार भरत नी कैर अबेर, अयोध्या बढ़ी जा तू राज कर" जिसका अर्थ है कि मेरे प्यारे भाई भरत तू राज कर, अब अयोध्या लौट जा और राज सम्भाल।

इसी तरह श्रीराम अपनी पत्नी सीता जी को वन के कठोर जीवन से रोकने के लिए गाते हैं "प्यारी सीता तिल बण मा नि आण" अर्थात् प्यारी सीता तुम इस दुर्गम वन में मत आना। ये सभी गीत रामायण की महान परम्परा को जीवित रखते हुए उसमें उत्तराखण्ड के स्थानीय रीति रिवाजों, वेशभूषा और परम्पराओं को पूरी आत्मीयता के साथ शामिल करते हैं।

गढ़वाली रामायण परम्परा की इसी विराट सांस्कृतिक महत्ता और ऐतिहासिक मूल्य को देखते हुए ही इसे राज्य के सभी सरकारी विद्यालयों के पुस्तकालयों में अनिवार्य रूप से शामिल करने का एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा गया था, जिसे प्रशासन द्वारा सहर्ष स्वीकार कर लिया गया। परन्तु किसी भी परम्परा को केवल पुस्तकों में बन्द करके जीवित नहीं रखा जा सकता।

इस समृद्ध परम्परा को वास्तव में जीवित रखने के लिए गढ़वाली रामायण का नियमित मंचन और लोक गायन भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जिससे इस सांस्कृतिक विरासत को और इसके शाश्वत राम आदर्शों को आने वाली पीढ़ी दर पीढ़ी तक पूरी पवित्रता के साथ सहेजा और हस्तान्तरित किया जा सके। यह हम सबका सामूहिक दायित्व है कि रामकथा के इस अनूठे पहाड़ी सुगन्ध वाले पुष्प को कभी मुरझाने न दें।

-सन्तोष कुमार
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के पीएचडी शोधार्थी और बहुमुखी साहित्यकार हैं। ऐतिहासिक अनुसंधान के साथ वे कविता, कहानी और पटकथा लेखन में सक्रिय हैं।)

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