आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद शुक्ल द्वितीया | शनिवार

नक्षत्र: हस्त | योग: शुभ | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 12 सितंबर 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद शुक्ल द्वितीया | शनिवार

नक्षत्र: हस्त | योग: शुभ | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 12 सितंबर 2026

सूर्योदय से सूर्यास्त व जन्म से मृत्यु तक सर्वव्यापी राम

सूर्योदय से सूर्यास्त व जन्म से मृत्यु तक सर्वव्यापी राम


श्री महेन्द्र कुमार पटेल जी द्वारा लिखे गए इस लेख में छत्तीसगढ़ की लोकपरम्पराओं के उदाहरण से श्रीराम की सर्वव्यापकता को दर्शाने का प्रयास किया गया है। लेखक कहते हैं कि छत्तीसगढ़ के निवासियों की भोर "राम-राम" से होती है, लोगों का अभिवादन राम-राम से होता है। खेतों की नपाई से लेकर सुमधुर लोकगीतों में भी राम है, व्यक्ति के नाम में भी राम है। यहाँ तक कि मृत्यु में भी रामनाम है। भारत में राम की सर्वव्यापकता का इससे बड़ा प्रमाण भला क्या होगा?


भारत की संस्कृति का कोई स्वव्यापी तत्त्व हो, तो वह राममय है। नानाविध परम्पराओं में राम नानाविध रूपों में हमें देखने-सुनने को मिलते हैं। और यदि छत्तीसगढ़ की बात करें, तो यहाँ के रोम-रोम में राम रचे बसे हैं। एक साधारण ग्रामीण जन की दिनचर्या का आरम्भ अत्यन्त आत्मीयता से 'हे राम' या 'राम-राम' के पवित्र सम्बोधन से होता है। दिनभर के कठोर परिश्रम के पश्चात् रात्रि में सोने से पूर्व भी यहाँ का व्यक्ति 'हे भगवान' या 'हे राम' कहकर ही अपनी आँखें मूंदता है।


राम के नाम से होता है दिन का प्रारंभ

राम का नाम यहाँ के निवासियों के मन में इतनी गहराई से बसा है कि जीवन की पहली श्वास से लेकर अन्तिम श्वास तक राम का ही नाम गुंजायमान रहता है। मनुष्य की जीवन यात्रा का अन्तिम सत्य भी राम के नाम से जुड़ा है और जब किसी की अन्तिम यात्रा निकलती है तो वह भी 'राम नाम सत्य है' के सन्देश के साथ ही पूर्ण होती है।

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार माता कौशल्या इसी पावन भूमि की बेटी थीं। दक्षिण कोसल अर्थात् वर्तमान छत्तीसगढ़ माता कौशल्या का मायका होने के कारण भगवान श्रीराम का परम पावन ननिहाल है। इसी अगाध नाते और पारिवारिक भावना के वशीभूत होकर सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ के लोग श्रीराम को अपना परम प्रिय भांजा मानते हैं। समाज में भांजे को साक्षात् भगवान श्रीराम का ही एक जीवन्त स्वरूप मानकर पूर्ण श्रद्धा के साथ पूजा जाता है।

विभिन्न मांगलिक और धार्मिक अवसरों पर भांजे को प्रणाम करने तथा उसके पाँव पखारने की एक अत्यन्त पुनीत परम्परा सदियों से चली आ रही है। आरती उतारने के साथ भांजे को विशेष रूप से वस्त्र और उपहार दान देने की महान परम्परा है, जिसे 'भांचा दान' कहा जाता है। अनेकों परिवार भांजे का पालन पोषण कर उसे उत्तम शिक्षा और श्रेष्ठ संस्कार प्रदान करते हैं। यदि भांजे से कभी कोई बड़ी भूल हो जाए, तो उसे कभी भी कठोरता से डांटा नहीं जाता है।


छत्तीसगढ़ में है भांचा दान की परंपरा 

विवाह संस्कार के बाद मामा और मामी अपने भांजे से विशेष रूप से यह भावपूर्ण आशीर्वाद ग्रहण करते हैं कि "हमें जीवन के अन्त में मिट्टी देकर कृतार्थ करना"। मृत्यु के पश्चात् समाधि की मिट्टी को विशेष रूप से भांजे के पैरों से ही दबवाया जाता है। मोक्ष की प्राप्ति तक भांजे के रूप में राम की उपस्थिति यहाँ अनिवार्य मानी गई है।

लोग जब भी एक दूसरे से मिलते हैं, तो 'राम-राम' या 'जय श्रीराम' कहकर ही नमस्कार करते हैं। 2 सगे भाइयों की जोड़ी को राम और लक्ष्मण की जोड़ी कहकर पुकारा जाता है। इसी प्रकार पति और पत्नी एक दूसरे के प्रति पूर्ण समर्पित हों, तो समाज उस नवदम्पति को राम और सीता का उत्कृष्ट उदाहरण देकर सम्मानित करता है। कृषि कार्य में भी भगवान राम रचे बसे हैं।

किसान खेत में अन्न की बुआई का शुभारम्भ 'राम' कहकर ही करता है। धान की मिंजाई के पश्चात् पारम्परिक रूप से नापते समय किसान गिनती कभी 1 से आरम्भ नहीं करता। वह पहली गिनती 'राम' बोलकर ही आरम्भ करता है।


छत्तीसगढ़ में राम नाम से गिनती आरम्भ करने की है परंपरा

गांव-गांव में भगवान राम के मन्दिर हैं और पूरा वर्ष रामकथा तथा श्रीरामचरितमानस के पाठ से गुंजायमान रहता है। सन्तान के जन्म का उल्लास हो या मृत्यु का शोकपूर्ण वातावरण, दोनों ही अवसरों पर रामकथा का आयोजन कराया जाता है। प्रसिद्ध ददरिया लोकगीतों में भगवान राम का गुणगान होता है। विवाह के पारम्परिक लोकगीतों, कर्मा नृत्य और महिलाओं के सुआ लोकगीतों में भी रामायण के प्रसंगों को पिरोया गया है।

राम के प्रति आस्था को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाने के लिए यहाँ एक अत्यन्त सुन्दर परम्परा है। लोग अपने नवजात बच्चों के नामों के आगे या पीछे 'राम' शब्द जोड़ते हैं। इसके पीछे यह भावना होती है कि राम का पावन नाम जुड़ने से उनका बच्चा भी साक्षात् राम की ही तरह एक संस्कारवान मनुष्य बनेगा। बालकों के नाम रामकुमार, रामलाल, रामदयाल, रामप्रसाद और रामगोपाल जैसे सुन्दर रखे जाते हैं।

समाज का बड़ा वर्ग अपने मूल नाम के अन्त में राम जोड़ता है, जैसे जयराम, दयाराम, गंगाराम, राजाराम और आनंदराम। महिलाओं के नामकरण में भी राम का पूरा प्रभाव दिखाई देता है। रामबाई, रामबती, रामकली, रामप्यारी जैसे कई नाम लोकप्रचलित हैं। 

सगुण साकार राम के साथ ही छत्तीसगढ़ में निर्गुण राम की उपासना का अत्यन्त उत्कृष्ट रूप विद्यमान है। राम की महिमा को समर्पित यहाँ का रामनामी सम्प्रदाय इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस सम्प्रदाय के लोग भगवान की अनन्य भक्ति में इस हद तक लीन होते हैं कि वे अपने सम्पूर्ण शरीर पर 'राम-राम' का नाम गोदना के रूप में स्थायी रूप से लिखवाते हैं।

ये लोग अपना सम्पूर्ण जीवन केवल राम की निर्मल भक्ति करने और समाज में राम के पावन आदर्शों का निरंतर प्रचार व प्रसार करने में ही व्यतीत करते हैं। भगवान श्रीराम ने अपने 14 वर्षों के वनवास काल में से लगभग 12 वर्ष इसी विशाल दंडकारण्य में व्यतीत किए थे। इसी कारण इस प्रान्त में अनेक पौराणिक स्थल रामायण से जुड़े हुए हैं।


राजिम- भगवान कुलेश्वर नाथ का मन्दिर

तुरतुरिया आश्रम में लव और कुश के जन्म की कथा मिलती है। राजिम में भगवान कुलेश्वर नाथ का मन्दिर स्थित है। सरगुजा जिले के रामगढ़ में सीताकुंड विद्यमान है। इसके अतिरिक्त रामपुर, सीतापुर और जनकपुर जैसे स्थान रामकथा के साक्ष्य हैं। इस प्रकार छत्तीसगढ़ के उदाहरण में भी हम यही पातें हैं कि सम्पूर्ण लोकजीवन, संस्कारों और परम्पराओं में राम बसे हैं।

-महेन्द्र पटेल
(लेखक छत्तीसगढ़ के लब्धप्रतिष्ठ नवाचारी शिक्षक व समाजसेवी हैं, जो अपनी लेखनी से शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार और सामाजिक चेतना में निरंतर वैचारिक योगदान करते हैं।)

 

 

Follow us on social media and share!