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राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता और राम-भक्ति का विकास

राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता और राम-भक्ति का विकास

मध्यकालीन हिन्दी साहित्य की सर्वाधिक सशक्त सांस्कृतिक काव्य-धारा रामभक्ति-काव्य है। इस धारा के काव्य में राम की भक्ति और महिमा गान का शाश्वत स्वर व्याप्त है।भारतीय जीवन-संगीत में राम शब्द अति प्राचीनकाल में उसी प्रकार अन्तर्व्याप्त हैं, जिस प्रकार गंगा जल भारत की धरती में अन्तर्व्याप्त है। कितने ही मत-मतान्तर इस देश में फैले कितने ही धर्म यहाँ चले या बाहर से आए, सब पर राम की महिमा का प्रभाव रहा। राम शब्द के साथ मनुष के जन्म का हर्षोल्लास पर्व सम्पन्न होता है और इसी शब्द से अंतिम यात्रा भी पूर्ण होती है।

भारत के सभी मत-मतान्तरों (धर्मों) का उदय एक ही मूल स्रोत वेदों से हुआ है। इसी स्रोत की गहराई में राम शब्द भी गूंज रहा है। यद्यपि पश्चिम के कुछ विद्वानों ने इस सत्य को झुठलाने की चेष्टा की है, किन्तु वे अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सके।

वेदों में राम-कथा

ऋग्वेद के दशम मण्डल में केवल राम का ही उल्लेख नहीं मिलता, बल्कि इक्ष्वाकु दशरथ, जनक, सीता आदि का भी उल्लेख मिलता है। प्रसिद्ध विद्वान नीलकंठ में राम-कथा सम्बन्धी लगभग 150 मंत्रों का मंत्ररामायण नाम से संकलन किया है। यूँ तो  "राम" की ऐतिहासिक प्राचीनता तो वेदों से सिद्ध होती हो है, साथ ही भारत के इन प्राचीनता आर्ष ग्रन्थों से राम के विष्णु स्वरूप का भी परिचय मिलता है।

बाल्मीकि रामायण और महाभारत में राम भक्ति

रामकथा का पूर्ण विस्तार तथा करुणामय वर्णन वाल्मीकि रामायण में किया गया है। यह इस प्रकार का पहला उपलब्ध ग्रन्थ है। विद्वानों के मतानुसार इसकी रचना ईसा के ग्यारह शती पूर्व हुई थी। कुछ विद्वान इसका रचनाकाल ईसा से तीन शती पूर्व मानते हैं। परन्तु इस मत से सभी सहमत हैं कि महात्मा बुद्ध से पहले यह महाकाव्य रचा जा चुका था, क्योंकि इसमें बुद्ध का किसी भी रूप में उल्लेख नहीं मिलता है। महाभारत के आरण्यक, द्रोण एवं शांति पर्वो में बाल्मीकि रामायण की रामकथा के प्रसंग वर्णित हैं।

यह भी सिद्ध हो चुका है कि महाभारत की रचना के समय रामकथा लोक जीवन में प्रचलित थी। वाल्मीकि ने राम को अलौकिक महापुरुष के रूप में चित्रित किया है और महाभारत में उन्हें अवतार के रूप में देखा गया है। स्पष्ट है कि रामायण और महाभारत की रचना के समय राम भक्ति का जन-जीवन में प्रसार हो चुका था।

पुराणादि ग्रंथों में राम-भक्ति

राम-भक्ति की सरस भावना रामाख्यान के माध्यम से अगस्त्य संहिता, राघवीय संहिता, रामपूर्व तापनीय उपनिषद, रामोत्तर तापनीय उपनिषद, रामरहस्योपनिषद आदि ग्रन्थों में भी चित्रित हुई है। अध्यात्म रामायण, आनन्द रामायण, भुशुण्डि रामायण, हनुमत, संहिता, राघवोल्लास, भागवत पुराण, कर्म आदि ग्रन्य भी राम की महिमा और राम भक्ति की प्राचीनता सिद्ध करते हैं। इन ग्रन्थों में इस राम-कथा की रोचक काव्य-मय अभिव्यक्ति मिलती है।

वाराह-पुराण, अग्रि पुराण, वामन पुराण, लिंग पुराण, ब्रह्म पुराण, गरुड़ पुराण, स्कन्द पुराण, पद्म पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण आदि में भी राम-कथा के रोचक प्रसंग चित्रित हुए हैं। इन सभी पुराणों में राम का परमब्रह्म ईश्वरीय स्वरूप चित्रित हुआ है। संसार के अनेक विद्वानों ने राम-कथा पर अनुसंधान किए हैं। महापुरुष तथा अवतारी स्वरूप में राम प्राचीनता मान्यता का वे भी खंडन नहीं कर सके।

"राम" भारतीय संस्कृति के पर्याय

हिन्दी के जो समीक्षक पाश्चात्य चिन्तन के आधार पर भारतीय-धर्म-साधना का मूल्यांकन करते हैं, वे भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रीय अस्मिता की उपेक्षा करके एकांगी दृष्टि प्रस्तुत करते हैं और इस प्रकार के निरर्थक प्रश्नों में लोगों को उलझा देते हैं कि राम ऐतिहासिक पुरूष थे या मात्र काल्पनिक ? किन्तु इस प्रकार के प्रश्नों का कोई औचित्य नहीं हैं क्योंकि राम शब्द वैदिक काल से ही भारतीय संस्कृति और साधना का पर्याय बन कर भारतीय साहित्य में प्रयुक्त होता जा रहा है।

भारतीय संस्कृति किसी पाश्चात्य देश से उखाड़ कर यहाँ लगाया गया पौधा नहीं है। "राम" इस संस्कृति रूपी पादप का सदाबहार पुष्प है। इस कथन को कल्पना और अलंकारिक अतिरंजना मात्र समझना भूल होगी। वैदिक धर्म में राम हैं, वेदों से रस लेकर विकसित परवर्ती शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध एवं जैन धर्मों में "राम" हैं। मध्यकालीन विचारों की टकराहट में भारत से बाहर गए बौद्ध धर्म ने बहुत कुछ पुराना छोड़ा, नया अपनाया, किन्तु उसके "त्रिपिटक" में भी राम कथा के अंश विद्यमान हैं।

बौद्ध जातक कथाओं में "दशरथ जातक" एवं अनामर्क जातक भी राम-कथा के लिए सर्वविदित है। जैन धर्म में "राम" की मान्यता बौद्ध धर्म से भी अधिक मिलती है। प्रसिद्ध जैन काव्य "पठम-चरियम्" (विमलसूरि) "राग-चरियम्" व "सिया-चिरयम्" (भुवनतुंग सूरि,) "पदम् चरित" (रविषेण) "उत्तर पुराण" (गुणभद्र) "पउमचरिउ" (स्वयंभू), "महापुराण" (पुष्पदंत) आदि में राम-कथा का महिमा-मय विस्तार हुआ है।

जैन-लेखकों की दृष्टि वैष्णव कवियों का अनुसरण नहीं करती, किन्तु जीवन के महान आदशों और मूल्यों की स्थापना के लिए भारत के हर धर्म में राम-कथा और राम की भक्ति को आधार बनाया है। अनेक मत-मतांतर इस देश में रहें, राम-भक्ति का किसी ने विरोध नहीं किया। जिसने भी भारत को अपनी जन्म भूमि माना है, हिमालय से रामेश्वरम् तक की धरती से प्यार किया है, गंगा के पवित्र पानी को जिसने भी अपना समझा है, उसने राम से प्यार किया है।

मध्यकाल के अनेक मुस्लिम हिन्दी कवि विष्णु के अवतार के कृष्ण के रूप पर तो रीझे ही हैं, राम से भी उनका अनुराग कम नहीं रहा। फलतः मुस्लिम काल में ही राम का सर्वाधिक प्रचार प्रसार हुआ और उसी के फलस्वरूप राम-रहीम की एकता की अनुभूति हर भारतवासी को हो सकी। भारत का हर गाँव गोस्वामी तुलसीदास के समय में ही राम-रहीम की एकता की अनुभूति हर भारतवासी को हो सकी।

भारत के हर गाँव में गोस्वामी तुलसीदास के समय में ही राम-रहीम की एकता के गहन सूत्र में बंध गया था, जिसके फलस्वरूप हर ग्रामवासी गाँव के सैयद बाबा और राम को एक पूजता था, चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो। राम शब्द का यही सांस्कृतिक जादू है। जिसे न समझने वाले लोग ही विघटन का बीज बोते रहे हैं।

दक्षिण भारत में राम भक्ति

केवल उत्तर भारत में ही नहीं, दक्षिण भारत में भी राम कथा और उसके माध्यम से राम-भक्ति का प्राचीनकाल से ही प्रचार प्रसार रहा है। आन्ध्र प्रदेश का दण्डकारण्य तो राम-कथा का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण केन्द्र ही रहा है। अयोध्या में राम का जन्म हुआ तो दंडकारणय उनकी प्रवास-स्थली रही। आंध्र प्रदेश का भद्राचलम् स्थान भी राम-भक्ति का प्रतीक बना हुआ है, जहाँ राम के अनेक मंदिर हैं।

भास्कर रामायण, रंगनाथ रामायण, गोपीनाथ रामायण, श्रीमद् आंध्र वाल्मीकी रामायण आदि श्रेष्ठ राम-कथा ग्रन्थों की रचना आंध्र प्रदेश में ही हुई थी। दक्षिण की अन्य भाषाओं में भी राम कथा काव्य मिलता है। तेरहवीं शती में मलयालम भाषा में रामचरित् की रचना राम कवि ने की। अच्चपिल्लई ने इसी शती में रामकथाप्पटटू नामक काव्य लिखा।

इनके पश्चात् कण्णशपणिकर ने कण्णश्श रामायण, पूनम नंदूमतिरि ने रामायण चम्पू, एलुतच्छन ने अध्यात्म रामायण तथा केरल वर्मा ने केरल रामायण की रचना करके राम-कथा की लोकप्रियता का परिचय दिया। कर्नाटक में गुणभद्र ने जैन परम्परा के अन्तर्गत राम-कथा पर "उत्तर-पुराण" काव्य लिखा। कन्नड़ भाषा में नरहरि कृत तोरबे रामायण ब्राह्मण परम्परा का श्रेष्ठ राम काव्य है। इसी भाषा में प्रसिद्ध "पम्प रामायण" की भी रचना हुई।

जनजातीय समुदाय में राम भक्ति

केवल उच्च वर्षों या धार्मिक सम्प्रदायों में ही मध्यकाल से अब तक राम-कथा का आदर पूर्ण स्थान नहीं रहा, बल्कि जनजातीय समुदायों में भी राम-कथा अत्यन्त लोकप्रिय रही है। उत्तर भारत की संथाल जाति, छोटानागपुर की असुर जाति, मध्यप्रदेश की बैगा भूमियां एवं मुंडा जातियां नर्मदा घाटी में बसी परधान जाति तथा मध्य क्षेत्र में फैली केवट और भील जातियों में राम-कथा अत्यन्त लोकप्रिय रही है। राम की इसी लोकप्रियता में वे तत्व अन्तर्निहित हैं, जो राम भक्ति को भारत की सांस्कृतिक आत्मा और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बना देते हैं।

राम-भक्ति और दक्षिण के आलवार संत

वेदों से जनजातीय लोक जीवन तक प्रचलित राम-कथा के राम वैष्णव-भक्ति का केन्द्र तब बने जब दक्षिण के आलवार सन्तों ने उन्हें विष्णु का अवतार मानकर पूजना प्रारम्भ किया। आलवार भक्तों की संख्या बारह बताई जाती है, जिनमें पाँचवें अवतार भक्त नाम्माल्वार माने गए हैं। इन्हें राम की पादुका का अवतार बताया गया है। ये व्यंकाचल में साधना करते थे। वहाँ उन्होंने ही सर्वप्रथम राम की मूर्ति की स्थापना की थी। उन्होंने "सहस्रगीति" नामक एक पुस्तक लिखी, जिसमें दशरथ-पुत्र राम की भक्ति भावना का चित्रण हुआ है। सातवें आलवार संत केरल के राजा फुलशेखर थे, जिनकी राम-भक्ति भी बहुत प्रसिद्ध है।

दक्षिण के आचार्यों का योगदान

आलवरों के पश्चात् दक्षिण भारत के ही श्री सम्प्रदाय एवं ब्राह्मण सम्प्रदायों का राम-भक्ति के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान रहा। ब्राह्मण सम्प्रदायों के प्रवर्तक मध्वाचार्य तो हनुमान के अवतार ही माने जाते हैं। राम-भक्ति के अन्य प्रबल प्रचारक रामानुजाचार्य हुए, जिन्होंने विशिष्टाद्वैतवाद चलाया। उन्होंने यादवाचल पर राम की मूर्ति की स्थापना करके राम-भक्ति का प्रचार किया। रामानुजाचार्य की तेरहवीं पीढ़ी में हुए राघवानंद और फिर उनके शिष्य रामानंद ने उत्तर भारत में राम-भक्ति का व्यापक प्रचार किया।

रामानंद ने सीता और राम को इष्टदेव के रूप में शक्ति का विषय बनाया तथा जाति-पाँति एवं ऊँच-नीच के बन्धनों को तोड़तें हुए राम-भक्ति का द्वार सब लोगों के लिए खोला। उन्होंने संस्कृत में "वैष्णव मताब्ज भास्कर" तथा "श्री रामचरित पद्धति" नामक ग्रंथ लिखें एवं "रामराक्षस्त्रोत, योग-चिन्तामणि" आदि ग्रंथों की हिन्दी भाषा में रचना की।

ऊँच-नीच एवं सगुण निर्गुण में समन्वय स्थापित करके रामानंद ने राम-भक्ति को मानव समता का जो आदर्श दिया, उसी का प्रकाश कवीर की निर्गुण भक्ति के निराकर "राम" और सिखा धर्म के प्रवर्तक गुरुनानक देव की वाणी में अन्तर्व्याप्त हुआ। वही प्रकाश तुलसी के सगुण-भक्ति के दशरथी राम में अनन्त विस्तार पाकर देश-काल सीमा का अतिक्रमण कर गया। फलतः आज राम शब्द किसी एक जाति या धर्म या क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह हर भक्त हृदय की शाश्वत अन्तर्ध्वनि बन गया है।

इसी अन्तर्ध्वनि का सहारा लेकर महात्मा गाँधी ने आधुनिक भारत को स्वाधीनता के प्रभात में पहुंचाया और इली "राम" का आदर्श आज विश्व के अनेक जनतंत्रीय एवं साम्यवादी देशों को भी जागृति के नए सोपनों पर चढ़ा रहा है। अतः "राम" किसी एक धर्म, जाति या देश के नहीं हैं चे समस्त मानव जाति के लिए पूज्य और आदर्श हैं।

हिन्दी काव्य में उनकी भक्ति की सांस्कृतिक धारा प्रवाहिक करने वाले महाकवि तुलसीदास हैं, जिनका "रामचरितमानस" महाकाव्य एवं विनय पत्रिका गीत काव्य केवल कविता के ग्रंथ ही नहीं है बल्कि समस्त मानव जाति को उत्पीड़न, विषमता और राजसत्ता के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने वाले महान् शास्त्र हैं।

इन महान् काव्यों में मानव मूल्यों की जितनी व्यावहारिक और श्रेष्ठ व्याख्या मिलती है, उतनी विश्व-साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है। ये ग्रंथ केवल हिन्दू संस्कृति या मात्र भारतीय आदर्शों के महान् काव्य ही नहीं हैं, बल्कि समस्त विश्व की मानव जाति के लिए आदर्श जीवन-मूल्यों के महाशास्त्र हैं, जिनके मूल में "राम" की भक्ति-गंगा प्रवाहिक है।

डॉ. रामगोपाल शर्मा "दिनेश"
राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता और राम-भक्ति का विकास
"संस्कृति: अंक-03"

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