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पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

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भारतीयता के साकार रूप हैं हमारे राम

भारतीयता के साकार रूप हैं हमारे राम


कोसलेन्द्र राम का हमारे जनजीवन से अत्यन्त गहरा सम्बन्ध है। श्री योगेन्द्र निर्मल जी द्वारा लिखित इस आलेख में राम के ननिहाल छत्तीसगढ़ में जन्म से लेकर मृत्यु तक के समग्र लोकव्यवहार में राम की उपस्थिति को उद्घाटित किया गया है।


प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
हृदय राखि कोसलपुर राजा।।

"राम" मात्र 2 अक्षरों का एक साधारण शब्द नहीं है, अपितु यह सम्पूर्ण भारतवर्ष के प्रत्येक जनमानस के अन्तर्मन में बसा हुआ एक परम पावन तत्त्व है। छत्तीसगढ़ भगवान श्रीराम का ननिहाल है और यहाँ के कण-कण में, जन-जन में तथा प्रत्येक मनुष्य के मन में साक्षात् राम निवास करते हैं।

भगवान श्रीराम हमारे लोकगीतों में मिलते हैं, लोकपर्वों में मिलते हैं और जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारे लोकजीवन में इतनी गहराई से घुल-मिल गए हैं कि राम तत्त्व को हमारे जीवन से अलग कर पाना सर्वथा असम्भव है। हमारे प्रदेश में शिशु के जन्म के पश्चात् जो नामकरण संस्कार किया जाता है, उसे मुख्य रूप से 'छट्ठी' के पावन पर्व के रूप में माना जाता है। इ

स अवसर पर रामायण की कथा का आयोजन किया जाता है और उसी कथा के मध्य बालक का नामकरण सम्पन्न होता है। यदि ग्रामों में लोगों के नामों पर दृष्टि डाली जाए, तो उनमें 'राम' अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ प्राप्त होता है। हरिराम, दानीराम और सुखीराम जैसे नाम इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

रामकथा और नामकरण संस्कार 
रामकथा और नामकरण संस्कार 

ग्रामों में कुछ लोगों के नाम अत्यन्त विचित्र भी हुआ करते थे, जैसे दुखूराम और भिखारीराम। यदि इन नामों का विच्छेद करके इनके मूल रूप पर ध्यान दिया जाए, तो 'दुखू' अर्थात् दुःख और 'भिखारी' अर्थात् भिक्षा मांगने वाला।

ये दोनों ही शब्द अत्यन्त नकारात्मक और पीड़ादायक प्रतीत होते हैं, परन्तु जब इन शब्दों के साथ राम का पावन नाम जुड़ जाता है, तो ये नाम भी अत्यन्त सम्मानजनक बन जाते हैं और समाज उन्हें पूर्ण सहजता के साथ स्वीकार कर लेता है।

यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि राम का नाम अन्तर्मन में किस गहराई तक विराजमान है। शिशु के जन्म पर गाए जाने वाले पारम्परिक सोहर गीतों में भी राम का नाम अत्यन्त उल्लास के साथ गाया जाता है। सोहर गीत की एक पारम्परिक पंक्ति है:

"अवध म जन्मे मोर राम लालना ह"

हमारे मन में राम कितने गहरे समाए हुए हैं, इसका साक्षात् अनुभव हम अपने दैनिक लोकजीवन में नित्य कर सकते हैं। हमारे आपसी अभिवादन में 'जय राम', 'सियाराम' और 'सीताराम' जैसे अत्यन्त आत्मीय शब्द समाहित हैं, जिनके उच्चारण मात्र से हम किसी अनजान व्यक्ति को भी अपना बना लेते हैं।


रामनाम का अभिवादन और प्रफ्फुल्लित मन 

ग्रामों में 'महाप्रसाद' या 'सीताराम' बनाने की एक अत्यन्त अनूठी परम्परा रही है। 'महाप्रसाद' या 'सीताराम' का यह आत्मीय सम्बन्ध बनाते समय किसी भी व्यक्ति की जाति नहीं देखी जाती है और न ही अमीरी गरीबी का कोई भेद रखा जाता है।

जो व्यक्ति एक बार सीताराम या महाप्रसाद के रूप में मित्र बन जाता है, वह मानो जीवन भर के लिए उस परिवार का एक अभिन्न हिस्सा बन जाता है। इस प्रकार भगवान श्रीराम हम सभी को एकता और समानता के एक अटूट सूत्र में बांध गए हैं।

हमारे छत्तीसगढ़ प्रदेश में ग्रामों, नगरों और विभिन्न स्थानों के नामों में भी राम तत्त्व स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। रामपुर, रामटोला, रामनगर, रामचुआ और सुकमा जिले का रामाराम इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। इस प्रकार भगवान श्रीराम छत्तीसगढ़ के कण-कण में विद्यमान हैं।

हमारे प्रदेश के सुमधुर लोकगीतों में भी भगवान श्रीराम का पुनीत तत्त्व निरन्तर प्रवाहित होता है। फाल्गुन मास में गाए जाने वाले फाग गीतों में हम पूरे उत्साह के साथ गाते हैं:

"जहां सीताराम के है जोड़ी रे, उहां बाजे नगाड़ा दो जोड़ी।।"

इसी प्रकार सावन के मास में मनाए जाने वाले सावनाही पर्व में अथवा घरों के आँगन में जब भी कोई पारम्परिक चौक पूरा जाता है, तो उस कलाकृति के मध्य में भगवान राम का नाम अत्यन्त अगाध आस्था और पूर्ण श्रद्धा के साथ लिखा जाता है।

यदि हम अपने बचपन का स्मरण करें, तो हमें खेलने के लिए जो भी खिलौना मिलता था, उसमें तीर और धनुष अनिवार्य रूप से होता था। बाल्यकाल से ही प्रत्येक परिवार में यह महान आदर्श सिखाया जाता है कि यदि पुत्र हो तो साक्षात् राम के जैसा हो, यदि भाई हो तो भरत और राम के जैसा हो, यदि परिवार हो तो रघुकुल के जैसा हो और यदि राज्य हो तो रामराज्य के जैसा हो।


तीर धनुष का खेल रामादर्श को समझने का एक माध्यम 

बचपन की एक और अत्यन्त रोचक बात स्मरण आती है कि जब कभी हमारे पैरों अथवा हाथों में जकड़न आ जाती थी या झुनझुनी भर जाती थी,तो हाथों के सुन्न पड़ जाने पर उस स्थान पर अंगुली से राम का नाम और पैरो के सुन्न पड़ने पर उस स्थान पर रावण का नाम लिखते थे। जब हम कठोर परिश्रम करते हुए थक जाते हैं, तो हमारे मुख से स्वतः ही 'राम' निकल पड़ता है।

दुःख की घड़ी में हम 'हे राम' का स्मरण करते हैं। यदि कोई ऐसा कार्य है जो हमारे प्रयासों से सिद्ध नहीं हो पा रहा है, तो हम उसे ईश्वर पर यह कहकर छोड़ देते हैं कि "अब राम ही जाने"। इस प्रकार भगवान श्रीराम हमारे समस्त लोक व्यवहारों में सर्वत्र व्याप्त हैं।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के महान ग्रन्थ के रूप में जन-जन तक राम को पहुँचाने का भगीरथ कार्य किया और वहीं से रामलीला मंचन और राम मंडली की पुनीत परम्परा का आरम्भ हुआ। हमारे छत्तीसगढ़ प्रदेश के प्रत्येक ग्राम में एक रामलीला मंडली अवश्य होती है, जो रामकथा का सजीव मंचन करती है और दशहरे का पावन उत्सव आयोजित करती है।

ग्रामों में एक अत्यन्त अनोखी परम्परा और भी देखी जाती है, जिसे रामसत्ता का आयोजन कहा जाता है। जब कभी वर्षा नहीं होती है और अकाल की स्थिति उत्पन्न होती है, तो उस संकट काल में अखंड रामायण और रामसत्ता का विशेष आयोजन किया जाता है।

उस समय सम्पूर्ण ग्रामवासी पूरी रातभर जागकर श्रीराम का संकीर्तन और भजन गाते हैं। इसी प्रकार विवाह के शुभ अवसर पर "सियावर रामचन्द्र की जय" के जयकारे पूरे हर्षोल्लास के साथ लगाए जाते हैं। यह इस बात को दर्शाता है कि भगवान श्रीराम ने मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में समाज को कितना महान सन्देश दिया है।

कृषि कार्य में भी राम का नाम पूरी तरह से रचा बसा है। जब हम खेतों से अपनी नई फसल काटकर लाते हैं और उसे नापते हैं, तो उस गिनती का पहला नाम हम 'राम' कहकर पुकारते हैं। उसके पश्चात् 2, 3 और आगे की गिनती गिनते हुए 20 काठा तक जाते हैं, जो 1 खाड़ी कहलाता है।

हमारे अन्न की नाप राम के नाम से ही आरम्भ होती है। ग्रामों में एक 'रामकोठी' भी होती है, जिसमें किसी भी प्रकार की आपदा या संकट के समय के लिए खाद्यान्न एकत्र करके सुरक्षित रखा जाता है। जीवन के अन्तिम समय में भी व्यक्ति को रामायण और गीता का पावन पाठ सुनाया जाता है।

मनुष्य के जीवन का अन्तिम सफर भी "राम नाम सत्य है" के वैराग्यपूर्ण सन्देश के साथ ही सम्पन्न होता है। छत्तीसगढ़ के राम हमारे अपने भांजे हैं, इसलिए यहाँ भांजे का चरण स्पर्श करना और उनके पैर पखारना अत्यन्त पुण्य का कार्य माना जाता है।


रामकथा के अवसर पर द्वारसज्जा की भी परंपरा है प्रचलित 

रायगढ़ और जांजगीर चांपा क्षेत्रों में निवास करने वाला रामनामी सम्प्रदाय भी इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इस सम्प्रदाय के लोगों का सम्पूर्ण शरीर ही साक्षात् राम का है। इस सम्प्रदाय के लोग अपने सम्पूर्ण शरीर पर राम नाम का गोदना गुदवाकर भगवान के प्रति अपनी अनन्य आस्था प्रकट करते हैं।

इस प्रकार यह कहना बिल्कुल उचित ही है कि भगवान श्रीराम ने हमारे प्रदेश के लोक व्यवहार और दिनचर्या के प्रत्येक पक्ष को गहराई से प्रभावित किया है। राम केवल हमारे मन्दिरों में नहीं, अपितु यहाँ की माटी, लोकगीतों, परम्पराओं और श्वासों में रचे बसे हैं। उनका यह महान और मर्यादित आदर्श हम सभी के लिए सदैव वन्दनीय और अनुकरणीय है। 

-योगेन्द्र निर्मल 
(लेखक सहकारिता विभाग, छत्तीसगढ़ शासन में सहकारी निरीक्षक हैं, जो अपने प्रशासनिक अनुभवों के साथ निरन्तर रचनात्मक लेखन और साहित्य सृजन भी करते हैं।)

 

 

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