जनजातीय समुदायों में दीपावली पर्व
October 20, 2025
संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल चतुर्थी | शुक्रवार
नक्षत्र: मघा | योग: व्यतिपात | करण: वणिज
पर्व विशेष : | तदनुसार 17 जुलाई 2026

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामराज्य केवल एक पौराणिक अवधारणा नहीं है, अपितु यह सुशासन, न्याय और लोककल्याण का सर्वोच्च ऐतिहासिक प्रतिमान है। श्री कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल जी ने अपने इस सारगर्भित लेख में रामायण और रामचरितमानस के आधार पर रामराज्य की विस्तृत विवेचना की है। यह लेख स्पष्ट करता है कि एक आदर्श शासक कैसा होना चाहिए और उसके राज्य में प्रजा, शासनतन्त्र और प्रकृति के मध्य कैसा अद्भुत सन्तुलन होना चाहिए। वर्तमान परिदृश्य में जब सम्पूर्ण विश्व सुशासन की खोज में है, तब यह लेख रामराज्य के शाश्वत आदर्शों को आत्मसात करने की महती प्रेरणा प्रदान करता है।
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और उनका पावन जीवनादर्श सम्पूर्ण सृष्टि के सुचारु संचालन के लिए एक शाश्वत सूत्र है। वे भारत की आत्मा के रूप में राष्ट्र की रग-रग में प्रवाहित होकर हमारा सतत पालन-पोषण कर रहे हैं। एक आदर्श पुत्र, भाई, पति, शिष्य और राजा के रूप में श्रीराम ने अपने समस्त कर्तव्यों का जिस अद्वितीय निष्ठा से पालन किया, वह उन्हें जन-जन के हृदय में स्थापित करता है।
गुरुभक्ति, मातृभक्ति, प्रजापालन और मातृभूमि के प्रति निष्ठा से परिपूर्ण श्रीराम का जीवन मानवता को धर्म-मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। राम किसी भौतिक सीमा में आबद्ध नहीं हैं अपितु वे घट-घट वासी हैं। इसी सर्वव्यापकता को गोस्वामी तुलसीदास जी ने स्पष्ट किया है,
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥
प्रभु श्रीराम अखिल विश्व को रामराज्य का दिव्य पथ प्रशस्त करते हैं। इहलोक से लेकर परलोक तक श्रीराम की महिमा सम्पूर्ण मानवता को एकसूत्रता में बांधती है। उनके द्वारा स्थापित रामराज्य आज भी शासन के सर्वश्रेष्ठ और लोककल्याणकारी प्रतिमान के रूप में जनमानस में जीवन्त है। एक आदर्श राजा की प्रजापालन की नीतियां कैसी होनी चाहिए, इसके अनन्त स्रोत श्रीराम के चरित्र में दृष्टिगोचर होते हैं।
यद्यपि रामराज्य का पूर्ण वर्णन मानवीय दृष्टि से असम्भव है, तथापि महर्षि वाल्मीकि और गोस्वामी तुलसीदास जी के वर्णनों के आधार पर हम इस आदर्श राज्य की रूपरेखा को भली-भांति समझ सकते हैं।

राम दरबार
वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड में मारीच रावण को प्रभु श्रीराम के उदात्त चरित्र का परिचय देता है। वह बताता है कि श्रीरामचन्द्र जी न तो पिता द्वारा निष्कासित हैं और न ही उन्होंने कभी धर्म की मर्यादाओं का उल्लंघन किया है। वे लोभ और दूषित आचार-विचार से सर्वथा मुक्त हैं,
न च पित्रा परित्यक्तो नामर्यादः कथंचन।
न लुब्धो न च दुःशीलो न च क्षत्रियपांसनः॥
मारीच आगे कहता है कि माता कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले श्रीराम धर्म के समस्त गुणों से पूर्णतः सम्पन्न हैं। उनका स्वभाव किसी प्राणी के प्रति कठोर नहीं है अपितु वे सर्वदा प्राणिमात्र के कल्याण में तत्पर रहते हैं,
न च धर्मगुणहीनः कौसल्यानन्दवर्धनः।
न च तीक्ष्णो हि भूतानां सर्वभूतहिते रतः॥
सीता हरण के लिए उन्मादित रावण को चेतावनी देते हुए मारीच श्रीराम को साक्षात् धर्म का मूर्तिमान स्वरूप बताता है। वह स्पष्ट करता है कि श्रीराम सत्यपराक्रमी हैं और जिस प्रकार इन्द्र देवताओं के अधिपति हैं, उसी प्रकार श्रीराम सम्पूर्ण जगत् के शासक हैं,
रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्य पराक्रमः।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानाम् इव वासवः॥
भगवान राम अस्त्र-शस्त्र के साथ-साथ वेद और शास्त्रों के भी प्रकांड विद्वान थे। वाल्मीकि रामायण में उनके राज्याभिषेक के प्रसंग में प्रजा ने श्रीराम की सांगोपांग वेदविद्वता की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हुए अपनी सहर्ष स्वीकृति प्रदान की थी, “सम्यग् विद्याव्रतस्नातो - यथावत्- सांगवेदवित्”।
अयोध्या के शासनतन्त्र में अमात्य, मन्त्रिपरिषद्, राजपुरोहित और सभा की सुव्यवस्थित संरचना थी जिसका सर्वोच्च नियामक तत्त्व केवल धर्म ही था। इसी धर्मनिष्ठ स्वरूप के कारण श्रीराम के राज्य में सर्वत्र सुख-समृद्धि, शान्ति, आरोग्य, समन्वय और आत्मानुशासन व्याप्त था।
राज्य का प्रत्येक नागरिक अपने-अपने स्वधर्म का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए प्रसन्नता से जीवन निर्वाह करता था। समाज में कहीं भी भेदभाव या कलह का लेशमात्र भी स्थान नहीं था और कल्याण के सभी सम्भव कार्य रामराज्य के स्वाभाविक अंग थे।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में रामराज्य की भव्यता और सामाजिक समरसता का अत्यन्त हृदयग्राही वर्णन किया है। उनके अनुसार रामराज्य एक ऐसी आदर्श व्यवस्था है जहाँ किसी भी प्राणी को दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट नहीं सताते। सभी नागरिक परस्पर प्रेमभाव रखते हुए वेदानुकूल अपने-अपने धर्म का आचरण करते हैं,
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

राम के आदर्श राज्य में धर्मानुकुल चलने वाला समाज
उस आदर्श राज्य में धर्म अपने चारों चरणों अर्थात सत्य, शौच, दया और दान के साथ सर्वत्र परिपूर्ण था। स्वप्न में भी किसी पाप का विचार नहीं पनपता था और सभी स्त्री-पुरुष रामभक्ति में लीन होकर परम गति के अधिकारी बन गए थे,
चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥
राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥
रामराज्य की विलक्षण विशेषता यह थी कि वहाँ कभी अकाल मृत्यु नहीं होती थी। प्रत्येक व्यक्ति निरोगी काया के साथ सम्पूर्ण आयु भोगकर शरीर त्यागता था। समाज में कोई भी व्यक्ति दरिद्र, दुखी, दीन या मूर्ख नहीं था,
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥
सभी नागरिक निर्दम्भ, धर्मपरायण और पुण्यात्मा थे। समाज के सभी स्त्री-पुरुष समान रूप से चतुर, ज्ञानी और कृतज्ञ थे। एक-दूसरे के गुणों का आदर करने वाले पंडितों से समाज सुशोभित था और कपट या धूर्तता का सर्वथा अभाव था,
सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥
रामराज्य में प्रकृति का भी अद्भुत और अनुपमेय सन्तुलन विद्यमान था। वनों में वृक्ष सदैव फलते-फूलते थे। पशु-पक्षियों ने अपने जन्मजात वैरभाव को पूरी तरह त्याग दिया था और हिंसक पशु भी एक-साथ अत्यन्त प्रेमपूर्वक निवास करते थे,
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन॥
खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई ॥

रामराज्य- प्रकृति के मूक प्राणियों भी समरसता विद्यमान थी
धरती सदैव हरी-भरी रहती थी और वृक्ष याचना करने पर मकरन्द टपका देते थे। गाएं मनचाहा दूध देती थीं। ऐसा प्रतीत होता था मानो त्रेतायुग में ही सत्ययुग जैसी पुनीत स्थिति उत्पन्न हो गई हो
लता बिटप मागें मधु चवहीं। मन भावतो धेनु पय स्रवहीं॥
ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी॥
प्रकृति के इसी अपूर्व समन्वय के अन्तर्गत सागर सदा अपनी मर्यादा में रहकर तटों पर रत्न बिखेर देते थे। चन्द्रमा और सूर्य लोककल्याण के लिए अपनी किरणों का सन्तुलित प्रकाश फैलाते थे और मेघ आवश्यकता के अनुरूप ही जलवृष्टि करते थे,
सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं॥
सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा॥
प्रजापालक भगवान श्रीराम ने राजसिंहासन को नहीं, अपितु धर्म की मर्यादा और अनुशासन को अपना आभूषण माना। उनके द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ सत्ता के अहंकार के नहीं, अपितु धर्मराज्य के सुदूर विस्तार के प्रतीक थे। वे वेदमार्ग के पालक और सम्पूर्ण ऐश्वर्यों में इन्द्र के समान शक्तिशाली थे,
कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥
श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥
श्रीराम का चरित्र इसलिए भी अनुकरणीय है क्योंकि उन्होंने समाज के हर वर्ग को सम्मान दिया। वनवास काल में उन्होंने बड़े राजवंशों के स्थान पर वानरों, भालुओं, भीलों और वनवासियों को सहचर बनाया। निषादराज, केवट, शबरी, सुग्रीव और हनुमान जैसे जनसामान्य उनके मित्र बने। रावण का विनाश कर विभीषण को सिंहासन सौंपा और माता तथा मातृभूमि के प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त की,

सबके आराध्य राम के ने हर वर्ग को सम्मान दिया
अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥
भगवान राम जहाँ-जहाँ से गुजरे, वहाँ-वहाँ की पावन भूमि और लोक से उनका आत्मीय सम्बन्ध सदैव के लिए स्थापित हो गया और अखंड भारतवर्ष राममय हो गया। आज जब भारतवर्ष अपने स्वत्वबोध के साथ पुनः विश्वगुरु के सिंहासन पर आसीन होने की ओर अग्रसर है, तब श्रीराम द्वारा प्रणीत नीतियां ही हमारा सच्चा मार्गदर्शन कर सकती हैं।
यह हमारा परम कर्तव्य है कि हम मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के महान आदर्शों को आत्मसात करते हुए एक नव्य-भव्य-दिव्य भारतवर्ष के निर्माण में सहभागी बनें।
-कृष्ण मुरारी त्रिपाठी ‘अटल’
(लेखक प्रखर युवा साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार हैं, जो अपनी ओजस्वी लेखनी से सांस्कृतिक व सामयिक विषयों पर निरंतर वैचारिक योगदान करते हैं।)
रामराज्य: सुशासन और मर्यादा का शाश्वत आदर्श
April 16, 2026