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रामकथा की यह अनन्त यात्रा

रामकथा की यह अनन्त यात्रा

 


रामकथा केवल भारतीय भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, अपितु यह सम्पूर्ण विश्व की सांस्कृतिक धरोहर का एक अभिन्न अंग बन चुका है। डॉ. अदिति गौड़ जी द्वारा रचित यह शोधपरक आलेख यह स्पष्ट करता है कि किस प्रकार राम की कथा ने लोक नाट्य, मूक अभिनय और सुमधुर गायन के माध्यम से भारत सहित थाईलैंड, कम्बोडिया, लाओस और जापान जैसे देशों में अपनी गहरी छाप छोड़ी है। यह लेख अत्यन्त सुन्दरता से दर्शाता है कि जब भारतीय अपने देश से दूर गए, तो वे अपने साथ केवल अपनी स्मृतियां ही नहीं, अपितु अपने आराध्य श्रीराम की उस अनन्त यात्रा को भी ले गए जिसने आज पूरे विश्व में एक विशाल सांस्कृतिक सेतु का निर्माण कर दिया है।


लोकमानस में भगवान श्रीराम के मर्यादा पुरुषोत्तम, धीरोदात्त और निरन्तर संघर्षशील चरित्र की अपार व्याप्ति और सहज स्वीकृति का अनुमान इस एक तथ्य से भलीभांति लगाया जा सकता है कि हमारे समाज में असंख्य स्त्री पुरुषों के नामों के आदि, मध्य या अन्त में 'राम' शब्द अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ मिल ही जाता है। राम जन्म, रामचरन, राममूर्ति, बाबुराम, रामदुलारी और रामरती जैसे नाम इसके साक्षात् प्रमाण हैं।

रामकथा: एक वैश्विक सांस्कृतिक सेतु
रामकथा: एक वैश्विक सांस्कृतिक सेतु 

इसी प्रकार देश के अनगिनत नगरों, ग्रामों एवं कस्बों के नाम भी राम के पावन नाम से जुड़कर निरन्तर शोभायमान हैं। रामपुर, रामनगर, रामगढ़, श्रीरामपुर और रामबाज़ार इसके प्रमुख उदाहरण हैं। आज भी समाज में यह स्पष्ट देखने को मिलता है कि लोकजीवन में प्रायः किसी सामाजिक अथवा पारिवारिक आयोजन तथा मनुष्य की नित्य दिनचर्या में 'जय श्रीराम', 'राम-राम' अथवा 'श्रीराम' बोलकर अत्यन्त आत्मीय अभिवादन करते हुए शुभ कार्यों का शुभारम्भ किया जाता है।

यहाँ तक कि किसी भी प्रकार के दुःख अथवा गहन शोक की अभिव्यक्ति में भी मनुष्य के मुख से स्वतः ही 'हे राम' उच्चारित होता है। लोकजीवन में राम इतने गहरे रचे बसे हैं कि 'राम कहानी कहना', 'राम बुलावा आना' और 'राम रूठ जाना' जैसे ढेरों लोक मुहावरों का प्रयोग नित्य दैनिक व्यवहार में देखने को मिलता है।

स्वतन्त्रता संग्राम, साहित्य सृजन और विविध कलाओं के साथ ही नहीं, अपितु महान आध्यात्मिक परम्पराओं में भी भारत की पावन धरती एक अत्यन्त गौरवशाली इतिहास का निर्माण करती है। भारत में रामलीला मंचन की ऐतिहासिक शुरुआत 18वीं शताब्दी में उत्तर भारत की धरती कानपुर से मानी जाती है। कानपुर में रामलीला का यह पुनीत सूत्रपात वर्ष 1774 में हुआ था।


कानपुर- जनमानस के मध्य प्रचलित रामलीला का प्रारंभ स्थल 

इस महान परम्परा की शुरुआत संचेड़ी के राजा ने विशेष रूप से करवाई थी। सबसे पहले उन्होंने जाजमऊ क्षेत्र में धनुष यज्ञ की रामलीला का भव्य आयोजन करवाया था और उसी के बाद से धीरे-धीरे रामलीला ने लोक नाट्य के रूप में देश विदेश में अपनी एक विशिष्ट और अमिट पहचान बनाई है। लोकजीवन में एक प्राचीन किंवदन्ती यह भी प्रचलित है कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम के वनगमन के उपरान्त अयोध्यावासियों द्वारा 14 वर्ष की सुदीर्घ वियोग अवधि में राम की बाल लीलाओं का अत्यन्त भावपूर्ण अभिनय करके अपना समय व्यतीत किया गया था।

ऐसी मान्यता है कि तभी से इस महान परम्परा का प्रचलन आरम्भ हुआ। कुछ विद्वानों के मतानुसार रामलीला अभिनय की परम्परा के मुख्य प्रतिष्ठापक गोस्वामी तुलसीदास जी हैं। आज सम्पूर्ण देश में जिस रामलीला का मंचन किया जाता है, उसकी पटकथा मुख्य रूप से गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित महान महाकाव्य 'रामचरितमानस' की अमर कथा और उसके सुमधुर संवादों पर आधारित है।


रामलीला के मंचन का आधार बनी 'रामचरितमानस'

उन्होंने समाज में जन मनोरंजनकारी नाटकों का घोर अभाव पाकर इसका श्रीगणेश किया था। इससे पूर्व यह महर्षि वाल्मीकि के महान महाकाव्य 'रामायण' की पौराणिक कथाओं पर आधारित हुआ करती थी। ऐसा कहा जाता है कि रामलीला का सुव्यवस्थित मंचन तुलसीदास जी के शिष्यों ने 16वीं शताब्दी में सबसे पहले आरम्भ किया था। उस समय के तत्कालीन काशी नरेश ने रामचरितमानस को पूरा करने के बाद रामनगर में रामलीला कराने का महान संकल्प लिया था।

महाकाव्य पूर्ण होने पर तुलसीदास जी श्रीराम का मुकुट, धनुष बाण, खड़ाऊं और कमंडल जैसी दिव्य वस्तुएं लेकर वहाँ गए और रामचरितमानस पर आधारित रामलीला का मंचन होने लगा। काशी नरेश ने वहाँ जो रामलीला का मंचन करवाया वह निरन्तर 22 दिनों तक चला और दशहरे के अन्तिम दिन लंका नरेश रावण का विशाल पुतला जलाया गया।

हमारे विशाल देश में लोक नाटकों की अनेक विभिन्न शैलियां निरन्तर प्रचलित हैं जिनमें से रामलीला भी एक प्रमुख शैली है। लोक नाटक की सबसे प्राचीन शैली 'कुट्टीयाट्टम' है जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में संस्कृत रंगमंच में प्रयोग की जाती थी। रामलीला में गुजरात की भवाई, कर्नाटक के यक्षगान और शास्त्रीय नृत्य की कई अन्य शैलियों को भी बहुत ही सुन्दरता के साथ शामिल किया गया है।

इसमें सुमधुर संगीत और पारम्परिक नृत्य को भावपूर्ण संवादों के साथ मिलाकर रंगमंच पर प्रस्तुत किया जाता है। रामलीला में कलाकारों की आकर्षक पोशाकें, आभूषण, मुखौटे, मुखसज्जा और मंच की साजसज्जा विशेष महत्त्व रखते हैं। दक्षिण पूर्व एशिया के प्राचीन इतिहास में कुछ ऐसे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रामाणिक तथ्य मिलते हैं जिनसे यह ज्ञात होता है कि इस क्षेत्र में प्राचीनकाल से ही रामलीला का प्रचलन अनवरत जारी था।

जावा के सम्राट वलितुंग के एक प्राचीन शिलालेख में एक बड़े समारोह का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है जिसके अनुसार सिंजालुक ने पारम्परिक नृत्य और गीत के साथ रामायण का अत्यन्त मनोरंजक प्रदर्शन किया था। इस शिलालेख की ऐतिहासिक तिथि 907 ईस्वी है। इसके अतिरिक्त थाई नरेश ब्रह्मत्रयी लोकनाथ की राजभवन नामावली में भी रामलीला का स्पष्ट उल्लेख है जिसकी प्रामाणिक तिथि 1458 ईस्वी है।

रामलीला रंगमंचीय दृष्टि से मुख्य रूप से 3 प्रकार की होती है, जिनमें सचल लीला, अचल लीला और रंगमंच लीला प्रमुख हैं। काशी नगरी के 4 अलग-अलग स्थानों में अचल लीलाएं आयोजित होती हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा स्थापित रंगमंच की अनेक विशेषताओं में से एक यह भी है कि उसमें स्वाभाविकता और मनोहरता की सृष्टि के लिए अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट और लंका जैसे अलग-अलग स्थान बना दिए गए थे और प्रत्येक स्थान पर उसी से सम्बन्धित सब लीलाएं दिखाई जाती थीं।

यह ज्ञातव्य है कि रंगशाला पूरी तरह खुली होती थी और पात्रों को संवाद जोड़ने में पूर्ण स्वतन्त्रता रहती थी। देश में रामलीला की अयोध्या, बृज, हाड़ौती, असमी, मधुबनी, कर्नाटक और पर्वतीय शैलियां विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। रामकथा भारत भर की विभिन्न भाषाओं में अभिव्यक्त हुई है और उस स्थान की कुछ निजी विशिष्टताएं भी उसमें अनायास ही समाहित हो गई हैं।

प्रयागराज और ग्वालियर जैसे प्राचीन शहरों में मूक अभिनय शैली में रामलीला का भव्य मंचन होता है जहाँ सूत्रधार रामचरितमानस की चौपाइयां गाता है और कलाकार बिना कुछ बोले शान्त भाव से रामायण की प्रमुख घटनाओं का सजीव मंचन करते हैं। उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा और कुमायूं अंचल में संगीतमय गायन शैली विकसित हुई जिसमें खड़ी बोली और ब्रज भाषा के साथ पारम्परिक ठुमरी, दादरा, भजन और शास्त्रीय रागों को बड़े सुन्दर ढंग से प्रदर्शित किया जाता है। रामलीला का रंगमंच प्रायः मन्दिरों के प्रांगण में, ऊँचे चबूतरों या बांस और कपड़ों से बनाया जाता है।

जब कोई भारतीय अपने देश को छोड़कर किसी अन्य देश में जाता है तो वह वहाँ भी अपनी प्राचीन परम्पराओं को पूरी तरह जिन्दा रखने का अनवरत प्रयास करता है। प्रवासी भारतीय विदेशों में अपना एक लघु भारत बना लेते हैं और सभी पारम्परिक त्योहारों को पूरी निष्ठा के साथ मनाते हैं। दक्षिणी और दक्षिण पूर्वी एशिया के लगभग सभी देशों में किसी न किसी रूप में रामलीला अनवरत होती है।


लोकमानस में व्याप्त श्रीराम

लाओस में महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण का सुन्दर मंचन होता है जहाँ उनके राष्ट्रीय महाकाव्य 'फरा लाख फरा राम' में रामकथा दृष्टिगोचर होती है। इसमें लाख का अर्थ साक्षात् लक्ष्मण से है। सूरीनाम देश में पात्रों के नाम थोड़े बदल जाते हैं और राम को रामत्जान्द्रे व सीता को सियेता कहा जाता है। वहाँ की स्थानीय और विदेशी भाषा के मधुर मिश्रण से तैयार यह रामलीला एक अलग ही आकर्षण पैदा करती है।

जापान के 12वीं शताब्दी के लोकप्रिय कथा संग्रह 'होबूत्सुशू' में संक्षिप्त रामकथा संकलित है जो चीन की प्राचीन भाषाओं के ग्रन्थों पर आधारित है। मॉरीशस में प्रतिवर्ष रामलीला करवाई जाती है जिसमें भाग लेने हेतु भारत से भी अनेक कलाकार विशेष रूप से आमन्त्रित किए जाते हैं। कम्बोडिया जैसे बौद्ध देश में भी रामायण को 'रीमकर' कहा जाता है। वहाँ राम 'प्रीहलीक' और सीता 'नेयांग सेडा' के नाम से जानी जाती हैं।

इंडोनेशिया की अत्यन्त अद्भुत मान्यता है कि इस्लाम जहाँ उनका धर्म है वहीं रामायण उनकी मूल संस्कृति है। वहाँ के प्रम्बनान मन्दिर में सुमधुर नृत्य नाटिका के रूप में रामायण लगभग पूरे वर्षभर चलती है जिसमें एक साथ 800 से भी अधिक कलाकार पूरी तन्मयता के साथ हिस्सा लेते हैं। थाईलैंड का राष्ट्रीय महाकाव्य 'रामाकीन' है और वहाँ छाया रामलीला को 'नंग' तथा मुखौटा रामलीला को 'खौन' कहा जाता है। म्यांमार की रामलीला 'यामपवे' कहलाती है जिसमें हास परिहास और विदूषक की उपस्थिति अनिवार्य रूप से होती है।

-डॉ० अदिती गौड़
(लेखिका प्रतिष्ठित शिक्षाविद् व हिंदी साहित्य की मर्मज्ञ हैं, जो अपनी लेखनी से जनजातीय अंचल की साहित्यिक चेतना और भाषाई शोध में वे लम्बे समय से कार्यरत हैं।)

 

 

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