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छत्तीसगढ़ के लोकव्यापी राम

छत्तीसगढ़ के लोकव्यापी राम


मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का चरित्र केवल ग्रन्थों में आबद्ध नहीं है, अपितु वह भारत की लोक संस्कृति का जीवन-स्पन्दन है। डॉ० नीलेश कुमार तिवारी जी द्वारा रचित यह आलेख छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में श्रीराम की इसी समग्र व्याप्ति का अत्यन्त सुन्दर, और सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है। यह लेख हमें दिखाता है कि किस प्रकार माता कौसल्या की इस पावन भूमि (दक्षिण कोसल) में जन्म के सोहर से लेकर मृत्यु के अन्तिम सत्य तक, और कृषि कार्य से लेकर वनवासियों के गीतों तक सब कुछ पूर्णतः राममय है। यह आलेख सम्पूर्ण समाज को एक सांस्कृतिक, और आत्मीय सूत्र में पिरोने वाली राम की एकात्म दृष्टि का साक्षात् दर्शन कराता है।


मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम भारतीय सनातन संस्कृति के आधार स्तम्भ हैं। राम का रामत्व ही भारतीय संस्कृति की सुदृढ़ आधारशिला है। मनुष्य जाति को मर्यादा की शिक्षा देने के लिए उनके अतिरिक्त अन्य कोई वैदिक, लौकिक, अथवा पौराणिक चरित्र दृष्टिगोचर नहीं होता जो सर्वाधिक प्रभावशाली हो।

छत्तीसगढ़ प्रदेश के सन्दर्भ में यदि राम की चर्चा आती है, तो वह यहाँ के लोकधर्मी तत्त्वों के उल्लेख के बिना अपूर्ण मानी जाएगी। राम का छत्तीसगढ़ से अभिन्न सम्बन्ध है। आज का यह छत्तीसगढ़ प्रदेश पूर्व में दक्षिण कोसल के नाम से विख्यात था।

यहाँ के राजा महाराज भानुमन्त की पुत्री भानुमती का विवाह अयोध्या के रघुवंशी राजा दशरथ के साथ सम्पन्न हुआ, जिन्हें कौसल्या नाम से जाना गया। रानी कौसल्या की कोख से प्रभु राम का जन्म हुआ। राम के राम बनने की प्रक्रिया का हमारा यह छत्तीसगढ़ प्रदेश साक्षात् साक्षी रहा है।

कौशल्या माता मंदिर है आमजन की आस्था का बड़ा केंद्र 
कौशल्या माता मंदिर है आमजन की आस्था का बड़ा केंद्र 

उन्होंने वनवास की आज्ञा को शिरोधार्य करके दक्षिणापथ की दिशा में प्रयाण किया। प्रयागराज के पवित्र संगम में स्नान करके दक्षिण कोसल की उत्तरी सीमा अर्थात् सरगुजा में प्रवेश किया। कोरिया जिले में स्थित सीतामढ़ी हरचौका को भगवान राम के छत्तीसगढ़ में प्रवेश का प्रारम्भिक स्थान माना जाता है। यहाँ माता सीता के रुकने के प्रमाण पाए जाते हैं। लखनपुर के पास स्थित रामगढ़ की पहाड़ियों में सीताबेंगरा गुफा में भी राम, लक्ष्मण, और सीता जी ने निवास किया है।

सरगुजा सम्भाग में बहुत सारे गांव, और नगर राम, लक्ष्मण, तथा सीता जी के नाम पर हैं जो इस बात के प्रमाण हैं कि यहाँ इनका आगमन, और निवास हुआ है। यथा रघुनाथपुर, लखनपुर, सीतामढ़ी, रामानुज नगर, और रामानुजगंज आदि। शिवरीनारायण को शबरी प्रसंग का लीला स्थल माना जाता है। राजिम में माता जानकी ने कुलेश्वरनाथ का जलाभिषेक किया है।

सिहावा क्षेत्र में मुनियों, और वनवासियों को दर्शन लाभ प्रदान करके बस्तर क्षेत्र में प्रवेश किया जिसे पूर्व काल में दंडकारण्य कहा जाता था। सुकमा, और कोंटा से लेकर भद्राचलम तक विस्तृत दंडकारण्य प्रदेश में प्रभु राम ने विविध लीलाएं कीं।

कहने का तात्पर्य यह है कि हमारा छत्तीसगढ़ राम वन गमन का सहचर रहा है। राम ने यहाँ की लोक भावना, और संस्कृति में अपनी मोहक गन्ध छोड़ी है। यहाँ की लोक परम्पराओं, और जीवनचर्या में राम जी का गहरा प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। लोगों के नाम में राम शब्द जोड़ा जाता है। यथा दयाराम, सालिकराम, कृपाराम, और मायाराम आदि। यहाँ भेंट होने पर राम राम, और जय राम के सम्बोधन से अभिवादन किया जाता है।

राम शब्द शिष्टाचार, और सम्मान का पर्याय है। यह आदि, और अन्त का भी सूचक है। फसल की मिसाई के बाद अनाज को कोठी में सुरक्षित रखने से पूर्व उसका माप किया जाता है। जब भी गिनती करते हैं तो एक संख्या के स्थान पर राम कहा जाता है। घर में शिशु के जन्म के अवसर पर गाई जाने वाली सोहर राम जी को ही समर्पित होती है। ठीक इसी प्रकार व्यक्ति की इहलीला समाप्त हो जाने पर उसे राम नाम सत्य है के उद्घोष के साथ अन्तिम विदाई दी जाती है।

ग्रामीण अंचल में स्थापित राम कोठी रामराज्य की सहकार भावना की द्योतक है। यहाँ प्रातः काल को राम राम की बेला कहा जाता है। छत्तीसगढ़ राम जी का ननिहाल है, अतः वे यहाँ के भान्जे हैं। यहाँ प्रत्येक भान्जे में राम का दर्शन करके उनके चरण पूजे जाते हैं। उन्हें श्रद्धा भाजन का केन्द्र मानकर मान दान के रूप में अन्न, वस्त्र, और भूमि आदि का दान किया जाता है।


रामनामी समुदाय- राम का नाम ही है जिनका जीवन 

सारंगढ़, जांजगीर चाम्पा, सक्ती, और रायगढ़ जिलों में रामनामी नाम की एक विशेष जाति निवास करती है जो निर्गुण राम की उपासना करती है। इस समुदाय के लोग अपने पूरे शरीर पर राम नाम का गोदना गुदवाते हैं। अपने घर के मन्दिर में प्रतिमा के स्थान पर श्रीरामचरितमानस ग्रन्थ को स्थापित करते हैं। उनके वस्त्र, और मोर मुकुट आदि में भी राम शब्द अंकित रहते हैं। ये किसी भी परिस्थिति में राम नाम को विस्मृत नहीं करना चाहते। राम इनकी जीवनचर्या के अनिवार्य अंग हैं।

छत्तीसगढ़ में जब समय पर वर्षा नहीं होती है तो ग्रामीण अंचल में राम सप्ताह का आयोजन किया जाता है। इसमें 24 घंटे, दो दिन, चार दिन, अथवा एक सप्ताह तक अनवरत राम नाम का संकीर्तन किया जाता है। यह इस विश्वास को दर्शाता है कि विपत्ति में प्रभु राम ही एकमात्र आशा हैं।

फसल की मिसाई के बाद जब कृषक कृषि कार्य से निवृत्त हो जाते हैं तब गांव गांव में नवधा रामायण का आयोजन किया जाता है। पूरे सप्ताह भर विभिन्न गांवों से आने वाली रामायण मण्डलियां प्रभु राम के उज्ज्वल चरित्र का गान करके जन समुदाय को नवधा भक्ति में सराबोर कर देती हैं।

रामानुजगंज से लेकर कोंटा तक दशहरे का पर्व पूर्ण हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। 75 दिन तक बस्तर में चलने वाला दशहरा पर्व पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। राम, और रामायण यहाँ की लोक संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। यहाँ रामलीला के मंचन की समृद्ध परम्परा पाई जाती है।


विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा में भी है रामनाम का महत्त्व

छत्तीसगढ़ के पारम्परिक गीतों, और नृत्यों में भी राम की अनुगूंज प्रतिध्वनित होती है। करमा, और ददरिया में राम को साक्षी मानकर गायक अपनी बात समाज को सुनाता है। रामनवमी के पावन अवसर पर यहाँ वैवाहिक कार्यक्रम आयोजित करने की परम्परा है, जो राम के प्रति गहरी आस्था, और निष्ठा को दर्शाता है।

छत्तीसगढ़ का लोक तत्त्व राम से उपजकर राम में मिल जाने का आकांक्षी है। गोस्वामी तुलसीदास की लोक मंगल भावना यहाँ की संस्कृति में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। राम का उदार चरित्र यहाँ के सीधे सादे, और सरल लोगों के व्यवहार में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

यदि यह कहा जाए कि छत्तीसगढ़ के निवासी ही राम की विरासत के सच्चे प्रतिनिधि हैं तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहाँ का कण कण राम का यशोगान करता है। यहाँ के लोक तत्त्व की आत्मा में राम का निवास है। राम के पावन स्पर्श को दक्षिण कोसल ने आज तक सहेज कर रखा है।

-डॉ० नीलेश कुमार तिवारी
(लेखक प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, स्वर्णपदक प्राप्त संस्कृत मर्मज्ञ एवं साहित्यकार हैं, जो अपनी शोधपरक लेखनी से प्राचीन भारतीय वांग्मय और आधुनिक साहित्य विमर्श में निरंतर वैचारिक योगदान करते हैं।)

 

 

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