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जनमानस के राम

जनमानस के राम


राम भारतवर्ष की आत्मा और हमारी सांस्कृतिक समग्रता का मूल आधार है। रामकृष्ण गोविन्द भावे जी ने अपने इस लेख में यह गम्भीर विश्लेषण प्रस्तुत किया है कि श्रीराम किस प्रकार 'जन जन के राम' बने। इसके लिए लेखख कहते हैं कि वाल्मीकि रामायण से लेकर तुलसीदास जी के श्रीरामचरितमानस तक, और मराठी के 'गीत रामायण' से लेकर मीरा बाई के भजनों तक, श्रीराम की व्याप्ति सर्वत्र है। वे लिखते हैं कि श्रीराम का अवतार केवल रावण वध के लिए नहीं था, अपितु मानवीय मूल्यों की स्थापना, और सम्पूर्ण मानवता को एक आन्तरिक, और सांस्कृतिक सूत्र में बाँधने के लिए हुआ था।


राम राम!! 

भारतीय जनमानस में श्रीराम की छवि अजर, अमर, और अटूट है। भगवान विष्णु के अवतार राम अन्य सभी अवतारों से भिन्न हैं। वैसे सभी अवतारों का अपना प्रयोजन था, और काल तथा परिस्थितियों के अनुसार वे भिन्न थे, इसलिए अवतारों के स्वरूप भी भिन्न रहे। नर रूप अवतारों में भगवान नृसिंह सीधे अपने लक्ष्य पूर्ति के समय प्रकट हुए, और हिरण्यकशिपु के संहार का कार्य पूर्ण कर दिया।

राजा बलि का अहंकार नष्ट करने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया, और उसे सीधा पाताल लोक का मार्ग दिखा दिया। भगवान परशुराम योद्धा के रूप में क्रोध, और संहार भरी सक्रियता से अपनी लक्ष्य पूर्ति में लगे रहे। बुद्ध अहिंसा, और धर्म पालन के अवतार थे, तो कल्कि कलियुग में पाप नाश के अवतार होंगे।

त्रेतायुग और द्वापर युग के अवतार थोड़े भिन्न थे। त्रेतायुग में सातवें अवतार के रूप में भगवान राम प्रकट हुए, और द्वापर युग में भगवान योगीराज श्रीकृष्ण ने आठवें अवतार के रूप में जन्म लिया। जनमानस में व्याप्ति के दृष्टिकोण से ये दोनों अवतार जनसामान्य के हृदय में विशेष स्थान रखते हैं।

भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं श्रीराम
भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं श्रीराम

यद्यपि दोनों ने सामान्य मनुष्य जीवन में प्रवेश कर अपना कार्य सम्पन्न किया, परन्तु दोनों की जीवन स्थितियां भिन्न थीं। ऐसा कहा जाता है कि श्रीराम का संघर्ष मानवीय मूल्यों के लिए था, तो श्रीकृष्ण का मानवता के लिए। जहाँ श्रीराम स्वयं 'धर्म' स्वरूप हैं, वहीं श्रीकृष्ण धर्म स्थापना के लिए अवतरित हुए थे - धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।

भगवान राम का जन्म राजोचित वातावरण में माता कौशल्या, और पिता दशरथ के सुशोभित भवन में हुआ। उन्हें अपने माता पिता, और तीनों माताओं का अपार स्नेह प्राप्त हुआ। वे सामान्य वीरोचित वातावरण, और व्यवस्थाओं में पले बढ़े। जबकि भगवान श्रीकृष्ण कारागृह में जन्म लेकर वसुदेव, और देवकी से विलग होकर नन्दबाबा, और यशोदा माता के पास पले।


बालरूप श्रीराम को मिला सबका अपार स्नेह

श्रीकृष्ण ने अपनी बाल लीलाओं, और चमत्कारों से लोगों को अत्यन्त प्रभावित किया, जिससे लगता था कि वे केवल प्रतिभा सम्पन्न ही नहीं, अपितु साक्षात् अवतारी पुरुष हैं। वहीं सातवें अवतार भगवान श्रीराम ने अपने शुद्ध बालोचित व्यवहार, और अपनी बाल लीलाओं से माता पिता, और अन्य जनों का मन मोह लिया। अपनी ठुमकती चाल से, बाल हठ में चन्द्रमा को खिलौने के रूप में मांगने, और फिर थाली के जल में उस चन्द्रमा की छवि देखकर सन्तुष्ट तथा आनन्दित होने वाले राम अपने आसपास के जनों को भी मुदित करते थे।

श्रीराम का सम्पूर्ण जीवन ही एक आदर्शमय जीवन रहा है। श्रीराम भारतीय जनमानस में प्रकारान्तर से रचे बसे हुए हैं, सभी के लिए वे सर्वथा अनुकरणीय हैं। महर्षि वाल्मीकि ने नारद मुनि से उस व्यक्तित्व के विषय में जानना चाहा जो अत्यन्त गुणी, वीर, धर्मज्ञ, सत्यशील, दृढ़, सदाचारी, धैर्यवान, अक्रोधी, परनिन्दा से सदैव दूर रहने वाला, और अजेय हो।

इस पर नारद जी ने राम का नाम लिया, और कहा कि वे मनोहर, सागर के समान गम्भीर, हिमालय के समान धैर्यवान, प्रजापालक, धर्म रक्षक, और सुदर्शन हैं। सन्त तुलसीदास जी राम का अर्थ 'रम् कर्त्तरि' अर्थात् हर्षदाता के रूप में बताते हुए बालकांड में कहते हैं -

जो आनन्द सिन्धु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी।।
सो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा।।

इसके पश्चात् वाल्मीकि जी ने रामायण अर्थात् राम के अभियान या चरित्र की कालजयी रचना की। वस्तुतः वह संस्कृत में थी। आदि कवि की यह रचना निरन्तर लोकप्रिय होती गई। देवभाषा संस्कृत अभिजात्य वर्ग की भाषा मानी जाती रही है, जिसकी पहुँच जनसाधारण तक नहीं हो पाती थी। परन्तु भगवान श्रीराम के चरित्र, उनके प्रति आस्था, और रामायण की विषयवस्तु को जन जन तक पहुँचाने के पुनीत प्रयासों में अनेक विधाओं, और रचनाओं को प्रोत्साहित किया गया।

इसी कारण रामचरित जनमानस का अविरल अंग बनता चला गया। संवत् 1631 (ईस्वी सन् 1574-1575) के रामनवमी के दिन महाकवि सन्त तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस की रचना आरम्भ कर संवत् 1633 में रामविवाह की तिथि को सातों कांड पूर्ण किए। अवधी भाषा की इस रचना ने जनमानस में क्रान्ति ला दी, और रामचरित के प्रति लोगों की श्रद्धा को और भी दृढ़ बना दिया।

इस ग्रन्थ की सरल, सरस, मधुर भाषा, और पदों की उत्कृष्ट गेयता ने इसे सामान्य ग्रामीण की पहुँच के दायरे में ला दिया। इससे जनसामान्य स्वयं को श्रीराम के और भी निकट अनुभव करने लगा। फिर तो मानो रामकथा के साहित्य में नवीन रचनाओं, और विभिन्न भारतीय तथा विदेशी भाषाओं के सृजन की एक होड़ सी लग गई। श्रीराम लोगों के हृदय में प्रेम, श्रद्धा, और भक्ति के रूप में पूर्णतः बस गए। बालकांड में गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है -

नाना भाँति राम अवतारा।
रामायन सत कोटि अपारा।।

राम के अनेक अवतार हैं, और शत कोटि अपार रामायण हैं। डॉ शोभा निगम ने अपने ग्रन्थ 'वाल्मीकि कथा, रामायण के पात्र एवं उनका रूपान्तरण' में जयदेव के संस्कृत नाटक 'प्रसन्नराघव' की प्रस्तावना में नट और सूत्रधार के संवाद का उल्लेख किया है। नट सूत्रधार से पूछता है कि ये सभी कवि श्रीराम का ही बार बार वर्णन क्यों करते हैं।

इस पर सूत्रधार उत्तर देता है कि अपनी सूक्तियों का पात्र एकमात्र श्रीराम को बनाने वाले कवियों का इसमें क्या दोष है। यह तो उन गुणों का दोष है, जिन्होंने एकमात्र राम में ही अपने लिए निरन्तर सुखपूर्वक रहने का आश्रय बनाया है।

श्रीराम का जन जन के हृदय में अटल स्थान बनाने में लिखित साहित्य के साथ साथ लोक कलाओं, गायन, चित्रकला, नाटकों, और प्रवचनों आदि का भी प्रबल योगदान है। विभिन्न स्थानों की विभिन्न विधाओं ने श्रीराम को अतुलनीय स्थान प्रदान किया है। उदाहरण के लिए, मराठी के प्रतिष्ठित कवि श्री गजानन दिगम्बर माडगूलकर की ऐतिहासिक रचना ‘गीत रामायण’ के 56 गीतों का गायन, और निर्देशन सुप्रसिद्ध संगीतकार तथा गायक श्री सुधीर फड़के की प्रस्तुति के लिए रचा गया।


विविध सांस्कृतिक विधाओं के केंद्र है प्रभु राम

यह संगीतमय प्रस्तुति आकाशवाणी से 1 अप्रैल 1955 से 19 अप्रैल 1956 तक निरन्तर चलती रही, जिसने लोकप्रियता के सर्वोच्च प्रतिमान स्थापित किए। आज भी गीत रामायण के गीत अत्यन्त रुचि के साथ सुने जाते हैं, जिनमें लोगों की भक्ति पूर्णतः प्रदर्शित होती है। राम के भजन असंख्य हैं, और वे आज भी अत्यन्त श्रद्धा से सुने जाते हैं।

यहाँ श्रीकृष्ण को समर्पित भक्ति पदों की लोकप्रिय कवयित्री मीरा बाई का स्मरण सहज ही हो आता है। जिनकी एक प्रसिद्ध रचना ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ है, उन्हीं की श्रीराम पर एकमेव कही गई रचना है – ‘पायो जी मैंने राम रतन धन पायो’।

‘वाल्मीकि कथा, रामायण के पात्र एवं उनका रूपान्तरण’ ग्रन्थ की लेखिका डॉ शोभा निगम के अनुसार – “वाल्मीकि रामायण के राम महानायक थे, वे पुरुषोत्तम हैं। कवि ने उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में ही प्रस्तुत किया है। डॉ शोभा निगम इसमें लिखती हैं कि पण्डित वासुदेव पोद्दार के अनुसार राम मानव हैं, उन्हें विष्णु संज्ञा की कोई आवश्यकता नहीं है। परन्तु अनेक रामकाव्यों ने उन्हें परब्रह्म का अवतार माना।”


भारतीय जनमानस के आराध्य है श्रीराम

हम देखते हैं कि श्रीराम भारतीय जनमानस में आराध्य देव की छवि धारण करते हैं। लोग राम को पढ़ते, देखते, सुनते, और पूजते हैं, तथा अपने अन्तस को उनसे जोड़ने का पूर्ण प्रयास करते हैं। हमें यदि अपनी सांस्कृतिक धरोहर से प्रेम है, और व्यक्तिगत, पारिवारिक, तथा सामाजिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाए रखना है, तो श्रीराम जी की किसी भी एक कृति या स्वरूप का अध्ययन, और मनन अवश्य करना होगा।

तेरा राम जी करेंगे बेड़ा पार, उदासी मन काहे को डरे।

-रामकृष्ण गोविन्द भावे
(लेखक मनोविज्ञान के प्राध्यापक रहे तथा पूर्व में छत्तीसगढ़ शासन के उच्च विभाग में पूर्व अतिरिक्त संचालक के दायित्व का भी उन्होंने निर्वहन किया है। भारतीय सांस्कृतिक निधि के रायपुर चैप्टर के संयोजक भी रहे।)

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