सामाजिक समरसता के प्रतीक भगवान श्रीराम
April 14, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार
नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का चौदह वर्ष का वनवास केवल एक राजपुत्र की वन-यात्रा नहीं थी, अपितु भारतवर्ष को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोने का एक महाभियान था। प्रस्तुत लेख में डॉ. जयमती कश्यप जी ने छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल (दंडकारण्य) में श्रीराम के वनवासी स्वरूप का अत्यन्त सजीव चित्रण किया है। भगवान राम ने वनवासियों के मध्य एक साधारण मनुष्य की भाँति जीवन व्यतीत करते हुए न केवल उनके दुःख-सुख को साझा किया, अपितु वनवासी स्त्रियों का सम्मान कर उच्च आदर्श की स्थापना भी की। आज भी दंडकारण्य के लोक-गीतों और दैनन्दिन जीवन में वनवासी राम किस प्रकार रचे-बसे हैं, यह लेख उसी अनन्य आत्मीयता का हृदयग्राही दर्शन कराता है।
छत्तीसगढ़ के दक्षिणी भूभाग में स्थित दंडकारण्य का विस्तृत वन-प्रदेश प्राचीन काल से ही शान्ति, साधना और प्राकृतिक सौन्दर्य का अनुपम केन्द्र रहा है। सघन वृक्षों से परिपूर्ण यह क्षेत्र जहाँ एक ओर ऋषि-मुनियों की पावन तपोभूमि था, वहीं दूसरी ओर यह अनेक भोले-भाले वनवासियों का प्रशान्त निवास-स्थान भी था। यद्यपि यहाँ आसुरी शक्तियों का भारी आतंक था, तथापि वनवासियों का जीवन अपनी सहज गति से प्रवाहित होता था।

दंडकारण्य:ऋषि-मुनियों की पावन तपोभूमि
त्रेतायुग में जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने राजसिंहासन त्यागकर वनवास की ओर प्रस्थान किया, तब वे इसी दंडकारण्य की पावन भूमि पर पधारे। उन्होंने एक दम्भी राजा या चमत्कारी ईश्वर के रूप में नहीं, अपितु एक साधारण वनवासी के रूप में प्रवेश किया। उनका यह आगमन दंडकारण्य के लोक-जीवन के लिए एक मंगलकारी घटना बन गया।
वनवास की उस सुदीर्घ अवधि में श्रीराम, माता सीता और अनुज लक्ष्मण ने वनवासियों के साथ अत्यन्त आत्मीयता से जीवन व्यतीत किया। उन्होंने राजसी सुख-सुविधाओं का त्याग कर प्राकृतिक कन्द-मूल को ही अपना मुख्य आहार बनाया। वनवासियों की भाँति ही उन्होंने प्रकृति के साथ सन्तुलन स्थापित किया और केवल अनिवार्य वस्तुओं का ही उपयोग किया।

श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के दौरान
लम्बे समय तक वनवासियों के मध्य रहने के कारण दोनों कई सकारात्मक प्रभाव पड़ा। श्रीराम ने वनवासियों के साथ इस प्रकार घुल-मिल कर जीवन जिया कि वहाँ के निवासियों ने उन्हें कभी पराया नहीं समझा। आज भी छत्तीसगढ़ में राम जी को भांजा माना जाता है। अपने भांजे के चरण पखारे जाते है।
श्रीराम ने समाज के प्रत्येक वनवासी के सुख-दुःख को अपना व्यक्तिगत सुख-दुःख माना। किसी भी विपत्ति के समय श्रीराम ने उन्हें असीम धैर्य धारण कर संकटों का सामना करने की प्रेरणा दी। दंडकारण्य प्रवास के दौरान श्रीराम ने स्त्रियों के प्रति अगाध सम्मान का जो अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया, उसका वनवासी समाज की चेतना पर अत्यन्त व्यापक प्रभाव पड़ा। उन्होंने वनवासी माताओं और बहनों को अपनी माता-बहन के समान ही पवित्र आदर दिया।
श्रीराम के इस पावन आचरण ने इस अञ्चल में स्त्रियों के प्रति आदर का ऐसा सुदृढ़ भाव उत्पन्न कर दिया जो आज भी इस अंचल में दृष्टिगोचर होता है। यह श्रीराम के उच्च चरित्र का ही प्रताप है कि इस विस्तृत वनवासी क्षेत्र में स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अपराध या अपमानजनक कृत्य आज भी न के बराबर देखने को मिलते हैं।

महिला-पुरुष अनुपात में भारत में बस्तर का उत्कृष्ट स्थान
अपने वनवास में श्रीराम ने कभी वनवासियों पर शासन करने की लालसा नहीं रखी और न ही कभी राजपुत्र होने का लेशमात्र भी अहंकार किया। वे केवल उच्च स्तर के सिद्ध साधुओं तक ही सीमित नहीं रहे, अपितु उन्होंने समाज के सबसे अन्तिम और साधारण व्यक्ति को भी पूरे अधिकार से हृदय से लगाया। उनके निर्मल मन में ऊँच-नीच का कोई भेदभाव नहीं था।
श्रीराम का यह समदर्शी चरित्र वनवासी माताओं के हृदय पर इतनी गहराई से अंकित हो गया कि वे श्रीराम को अपना ही सगा पुत्र मानने लगीं। दंडकारण्य की प्रत्येक माता यह कल्पना करने लगी कि उसका पुत्र भी आचरण में राम के समान ही सत्यनिष्ठ हो। इसी वात्सल्य के कारण उस काल से लेकर आज तक वनवासी समाज में अपने बच्चों के नाम के पीछे राम जोड़ने की एक अटूट परम्परा बन गई। वनवासी जन आज भी अपने नाम के साथ राम लगाकर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।

बस्तर में नाम के साथ राम-लगाने की परंपरा
वनवासियों का यह दृढ़ विश्वास है कि राम शब्द मात्र एक साधारण नाम नहीं है, अपितु यह एक ऐसा पावन मन्त्र है जो मनुष्य को अनुचित कार्य करने से रोकता है। यह नाम उन्हें चरित्रहीनता, चोरी या दूसरों के धन के प्रति लालच से दूर रखता है। यही कारण था कि प्राचीन काल में बस्तर के वनवासी घरों में कभी ताले नहीं लगाए जाते थे।
समाज की प्रत्येक स्त्री को माता और बहन के रूप में देखने की जो दृष्टि श्रीराम ने दी, वह आज भी यहाँ के लोक-व्यवहार में जीवन्त है। यह राम-नाम की ही शक्ति है कि वनवासी समाज सदैव सत्य के मार्ग पर चलता है। परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे अन्याय को कायरता से सह लेते हैं। यदि कोई अनीति अपनी सीमा पार कर जाती है, तो वनवासी समाज उस अन्याय के कठोर प्रतिकार हेतु अपने तीर-धनुष उठाने में तनिक भी संकोच नहीं करता।
आज दंडकारण्य के राम वहाँ के हर व्यक्ति की अन्तरात्मा में रचे-बसे हुए हैं। वे वनवासियों के दैनिक लोक-व्यवहार, लोक-गीतों, पारम्परिक वाद्यों, पूजा-पद्धतियों और उनके सुख-दुःख के प्रत्येक क्षण में विद्यमान हैं। वनवासी जन जब मार्ग में मिलते हैं, तो वे अगाध स्नेह से राम-राम कहकर ही एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं।

बस्तर में अभिवादन स्वरूप राम-राम और जोहार करने की परंपरा
उनके लोक-गीतों में सुनो-सुनो मेरा राम का भाव सहज ही प्रकट हो जाता है। यहाँ तक कि उनके वाद्ययन्त्रों की धुन में भी राम-नाम की ही अनुगूंज सुनाई देती है। वनवासी समाज में कोई भी देव-पूजा राम का स्मरण किए बिना आरम्भ नहीं होती। वे सबसे पहले राम का आवाहन करते हैं और अत्यन्त सरल भाव से कहते हैं कि हे राम! आज हमारे घर में पूजा है, आप अवश्य आना। इसी अगाध श्रद्धा के साथ वे सबसे पहले राम के नाम पर एक पवित्र फल अर्पित करते हैं।
सुख का क्षण हो या दुःख का, राम सदैव अपने वनवासी सखाओं के साथ खड़े दिखाई देते हैं। जब वनवासी माताओं पर कोई भारी विपत्ति आती है, तो वे राम को अधिकारपूर्वक उलाहना देते हुए रुदन करती हैं और पूछती हैं कि जब उन पर विपत्ति आ रही थी, तब उन्होंने संकट को समय रहते क्यों नहीं रोका! वहीं दूसरी ओर, जब कोई सुखद अवसर आता है, तो वे सबसे पहले राम को याद करते हुए कहते हैं कि आज हमारे घर आ जाओ। लोक-परम्परा के अन्तर्गत जब वे अपना पारम्परिक जगार-गीत गाते हैं, तो उसे गाने से पूर्व भी वे राम का स्मरण करते हुए रामे-रामे बोलो का सस्वर गान करते हैं।
चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण होने के पश्चात् जब श्रीराम दंडकारण्य से अयोध्या की ओर वापस जाने लगे, तब वनवासी माताओं और लोक-समाज ने अपने उस आत्मीय सखा राम को अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान राम बनाकर भावभीनी विदाई दी। आज भी दंडकारण्य के लोक-समाज में जब कोई करुण रुदन होता है, तो उसमें भगवान राम का नाम ही स्पष्ट रूप से सुनाई देता है।

अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान राम बनाकर भावभीनी विदाई
यदि वनवासी महिलाओं पर कोई गम्भीर संकट आता है, तो वे पूर्ण विश्वास के साथ हे देवा राम! इस विपत्ति से हमें बाहर निकालो कहकर ही प्रार्थना करती हैं। दंडकारण्य का लोक-समाज भगवान राम का साक्षात् दर्शन प्रतिदिन उदित होते सूर्यदेव में भी करता है। प्रातःकाल मुख प्रक्षालन के पश्चात् जब वे सूर्य की ओर देखते हैं, तो वे हाथ जोड़कर हे भगवान राम! हमारी रक्षा करना कहते हुए विनती करते हैं।
उनका यह अटल विश्वास है कि जो समस्या किसी मानवीय प्रयास से नहीं सुलझती, उसे वे राम के भरोसे छोड़ देते हैं और कहते हैं कि अब आगे की राह राम जाने। यद्यपि भौतिक रूप से श्रीराम बहुत पहले ही दंडकारण्य से प्रस्थान कर गए थे, किन्तु लोक-आस्था का सत्य यही है कि राम आज भी दंडकारण्य के वनों के कण-कण में विद्यमान हैं।
मार्ग पर चलते हुए यदि पैरों में काँटा भी चुभ जाए, तो उनके मुख से अनायास ही ही राम निकल पड़ता है। सुखद समाचार मिलने पर वे हे राम अच्छा हुआ कहते हैं, और दुःखद समाचार प्राप्त होने पर हाय राम प्रभु कहकर अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं। सम्पूर्ण दंडकारण्य के वनवासियों की पावन स्मृति में यदि कोई सबसे अधिक जीवन्त है, तो वह केवल राम ही हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनकी लोक-संस्कृति को निरन्तर आलोकित कर रहे हैं।
-डॉ० जयमती कश्यप
(लेखिका प्रतिष्ठित विदुषी व जनजातीय संस्कृति की शोधार्थी हैं, जो अपनी लेखनी से बस्तर की ऐतिहासिक विरासत और गोंडी लोक-परंपराओं के संरक्षण में निरंतर वैचारिक योगदान करती हैं।)
दंडकारण्य के लोकजीवन में रचे-बसे वनवासी राम
March 28, 2026