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छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में रचे-बसे हैं भाँचा राम

छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में रचे-बसे हैं भाँचा राम


भारतवर्ष के हृदय में बसा छत्तीसगढ़ माता कौसल्या की पावन जन्मभूमि और भगवान श्रीराम का प्रिय ननिहाल है। डॉ. पद्मा साहू जी का यह भावप्रवण लेख इसी पुनीत भूमि की लोक संस्कृति में रचे बसे श्रीराम के अत्यन्त आत्मीय स्वरूप की सरस विवेचना करता है। लेखिका कहती हैं कि छत्तीसगढ़ में श्रीराम भक्तों के आराध्य नहीं बल्कि जनमानस के अत्यन्त दुलारे भांजे हैं। आज भी इस अंचल में भांजों के चरण स्पर्श करने की अनूठी परम्परा पूरी श्रद्धा के साथ जीवित है। विवाह के मंगलगीतों से लेकर सोहर, ददरिया, फाग और लोकनाट्य नाचा तक, छत्तीसगढ़ की माटी के कण-कण में और यहाँ के लोकजीवन के हर स्पन्दन में वनवासी राम रचे-बसे हैं।


भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का स्थान सर्वोपरि और अत्यन्त वन्दनीय है। किन्तु जब हम छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में श्रीराम के स्वरूप का अवलोकन करते हैं, तो यहाँ उनका एक अत्यन्त आत्मीय, लौकिक और पारिवारिक रूप उभरकर सामने आता है। प्राचीन काल में दक्षिण कोसल के पावन नाम से विख्यात यह धरा माता कौशल्या की जन्मस्थली है।

इसी महान् ऐतिहासिक और पारिवारिक सम्बन्ध के कारण छत्तीसगढ़ में भगवान श्रीराम को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के सर्वशक्तिमान स्वामी के साथ-साथ एक अत्यन्त दुलारे भांजे के रूप में अगाध सम्मान और नेह दिया जाता है। इस अंचल की यह एक अद्भुत और पुनीत परम्परा रही है कि यहाँ आज भी लोग अपने सगे भांजे को श्रीराम का साक्षात् स्वरूप मानकर पूरे आदर के साथ उसके चरण स्पर्श करते हैं।

छत्तीसगढ़ में प्रचलित है भांजे-भांजी के पैर पड़ने की परंपरा 
छत्तीसगढ़ में प्रचलित है भांजे-भांजी के पैर पड़ने की परंपरा 

प्रभु श्रीराम यहाँ के निवासियों के लिए केवल एक पौराणिक या शास्त्रीय पात्र भर नहीं हैं, बल्कि वे यहाँ के दैनन्दिन जनजीवन के हर संस्कार, हर लोकगीत और हर उल्लास की मूल अभिव्यक्ति के शाश्वत आधार हैं।

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति अत्यन्त समृद्ध, बहुरंगी और भावपूर्ण है। यहाँ के लोकजीवन में विवाह (बिहाव) जैसे पवित्र संस्कार और उसकी विविध लौकिक रस्मों में श्रीराम की उपस्थिति सर्वथा अनिवार्य मानी जाती है। विवाह के मंगलमय अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीतों में यहाँ की ग्रामीण महिलाएं दूल्हे को साक्षात् राम और दुल्हन को साक्षात् सीता के रूप में ही सम्बोधित करती हैं। उनके लिए घर आंगन में होने वाला हर विवाह मानो राम और जानकी का ही दिव्य विवाह है।

इस पुनीत भाव को हम यहाँ के एक अत्यन्त लोकप्रिय और सुमधुर विवाह गीत के माध्यम से भली-भांति समझ सकते हैं: "एक तेल चढ़ गे हो हरियर-हरियर, मड़वा म दुलरू तोर बदन कुम्हलाए। राम लखन के ओ राम लखन के तेल ओ चढ़त हे दाई, कहवाँ के दियना होवै अंजोर।" इन पंक्तियों में जब दूल्हे को हल्दी और तेल चढ़ाया जाता है, तो उसे राम लखन के तेल चढ़ने का पावन और अलौकिक रूपक दे दिया जाता है। यह सहज लोकभावना यह प्रमाणित करती है कि भगवान राम यहाँ के हर घर के आंगन में एक आत्मीय पारिवारिक सदस्य के रूप में निरन्तर बसते हैं।

यहाँ हर उत्सव का हिस्सा है श्रीराम
यहाँ हर उत्सव का हिस्सा हैं श्रीराम 

विवाह के पश्चात जब घर में किसी नवजात शिशु का जन्म होता है, तो उस परम आनन्द के समय भी छत्तीसगढ़ की संस्कृति अपनी शाश्वत परम्परा के अनुसार श्रीराम को ही सर्वप्रथम स्मरण करती है। नवजात बच्चे के जन्म पर जब नामकरण संस्कार या छट्ठी का मंगल आयोजन होता है, तब यहाँ सोहर गीत गाने की अत्यन्त सुमधुर परम्परा है। इन सोहर गीतों में ग्रामीण महिलाएं उस नवजात शिशु की निश्छल और कोमल छवि में भगवान श्रीराम का ही बाल स्वरूप निहारती हैं।

इसी पुनीत कारण से भगवान राम यहाँ के लोगों के हृदय में जन्म जन्मान्तर के लिए बस जाते हैं। सोहर गीतों के कुछ अत्यन्त भावपूर्ण और लोकप्रचलित उदाहरण इस प्रकार हैं: "राम जनम लिन्हे भगवान जनम लिन्हे। चईत राम नवमी में राम जनम लिन्हे। सुइन आवय नेरुवा छिनै, नेरुआ छिनौनी देबो मन के मड़ौनी, चईत राम नवमी में राम जनम लिन्हे।"

एक अन्य गीत में माता कौशल्या के अपार आनन्द का अत्यन्त सजीव वर्णन मिलता है:
"कौशिल्या रानी जने हे ललन, अवध म बाजे बधाई।
कोसलपुर म राम जनम ले, हरखित मन नर नारी॥"

और इसी अवर्णनीय उल्लास को आगे बढ़ाते हुए लोककंठ स्वतः ही गा उठते हैं: "धीरे-धीरे बाजत हे आनन्द बधाई हो, काखर भये सिरीराम, काखर भये लछिमन हो, काखर भरत भुआल तिरलोकी घर सोहर हो।" सुख और आनन्द के अन्य सामाजिक उत्सवों में भी राम की विराट व्याप्ति सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। रंगों और उमंग के पावन पर्व होली में जब फाग गीत गाए जाते हैं, तब भी छत्तीसगढ़ का लोकमानस अवध की उल्लासपूर्ण होली को ही अपने आंगन में साकार कर लेता है: "हाँ रे अवध मा राम खेलैं होली, भरत सत्रुहन मिल फगुआ गावैं, लखन रहे रंग घोरी।"

इसके अतिरिक्त, जब छत्तीसगढ़ के कर्मठ कृषक खेतों में कड़ी धूप और पसीने के बीच अपना कृषि कार्य करते हैं, तो वे अपनी शारीरिक थकान और सारे दुःख दर्द को भुलाने के लिए ददरिया गीत गाते हैं। ददरिया को यहाँ के लोकगीतों का सिरमौर कहा जाता है, और श्रम की इस सुमधुर अभिव्यक्ति में भी श्रीराम का पावन चरित्र पूर्णतः समाहित रहता है:"राम धरे बरछी लखन धरे बान, सीता माई ल खोजन बर निकलगे हनुमान जी, करार गोंदा फूल।"
यह पंक्तियां स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि किसान अपने कठिन श्रम के बीच भी राम, लक्ष्मण और हनुमान जी के महान् जीवन संघर्ष को याद कर अपने भीतर असीम ऊर्जा और नवचेतना का संचार करते हैं।

लोकजीवन के संघर्षशील दिनों के प्रेरणास्त्रोत है श्रीराम
लोकजीवन के संघर्षशील दिनों के प्रेरणास्त्रोत है श्रीराम 

छत्तीसगढ़ी संस्कृति की मूल आत्मा कहे जाने वाले सुप्रसिद्ध लोकनाट्य नाचा में भी भगवान श्रीराम का पावन नाम अत्यन्त सहजता और सम्मान के साथ पिरोया गया है। रात-रात भर चलने वाले इन लोकनाट्यों में प्रहसन और स्वस्थ मनोरंजन के बीच भी लोककलाकार अपने परम आराध्य को तनिक भी भूलते नहीं हैं। इसका एक अत्यन्त रोचक और जीवन्त उदाहरण नाचा के गीतों में देखने को मिलता है: "का साग राँधे समलिया, का साग राँधे समलिया। रमकेरिया मा राजा राम बिराजे, सेमी मा सीता मैया, का साग राँधे समलिया।"
ऐसे ही असंख्य लोकगीत और लोककथाएं हैं जिनमें राम का पावन नाम ग्रामीण अंचलों की सीधी सादी दिनचर्या और खान पान के साथ पूरी तरह घुल मिल गया है।

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और वन्य अंचलों में शरीर पर गोदना गुदाने की एक अत्यन्त प्राचीन और विशिष्ट परम्परा रही है। यहाँ के अनन्य रामभक्त अपने शरीर पर गोदना के रूप में सम्पूर्ण राम नाम पूरी श्रद्धा के साथ अंकित करवाते हैं। यह राम के प्रति उनकी अगाध भक्ति और सम्पूर्ण समर्पण का साक्षात् प्रदर्शन है। यह परम्परा यह सिद्ध करती है कि वे अपने आराध्य को केवल मन्दिरों में ही नहीं, बल्कि अपनी देह और आत्मा दोनों में स्थायी रूप से बसा कर रखना चाहते हैं।


रामनामी समुदाय- रामभक्ति की अद्भुत परंपरा  

इसके अतिरिक्त गाँव-गाँव में होने वाली रामायण गायन की मंडलियां और प्रतियोगिताएं भी एक अद्भुत सांस्कृतिक परिदृश्य निर्मित करती हैं। इन पवित्र आयोजनों में लोग रामचरितमानस की ज्ञानवर्धक चौपाइयों और स्थानीय सुमधुर भजनों के माध्यम से राम के महान् आदर्शों को केवल स्वर नहीं देते, बल्कि उन्हें अपने दैनन्दिन जीवन में पूरी पवित्रता और निष्ठा के साथ जीते भी हैं।


ग्राम्यजीवन में है रामायण मंडलियों का विशेष स्थान 

ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने अपने चौदह वर्ष के कठिन वनवास काल का अधिकांश समय इसी छत्तीसगढ़ की पावन भूमि में माता सीता और अनुज भ्राता लक्ष्मण के साथ व्यतीत किया था, जिसे तत्कालीन समय में विस्तृत दंडकारण्य कहा जाता था। यहाँ के घने वनों, वेगवती नदियों और दुर्गम पर्वतों ने प्रभु के उन पुनीत चरणों का साक्षात् स्पर्श प्राप्त किया है।

माता कौशल्या की जन्मभूमि होने के कारण यह सम्पूर्ण क्षेत्र राम का अतिप्रिय ननिहाल है और इसी अमूल्य कारण से न केवल सम्पूर्ण विश्व, अपितु विशेष रूप से छत्तीसगढ़वासी अपने आत्मीय भावों, अपनी अगाध श्रद्धा और अपनी सांगीतिक परम्पराओं में राम को अपने हृदय के सबसे निकट बसाकर रखते हैं। इस प्रकार यह पूर्णतः स्पष्ट होता है कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, यहाँ की लोकगाथाओं, लोकगीतों और लोककला के प्रत्येक आयाम में भगवान राम पूरी गहराई के साथ रचे बसे हुए हैं। प्रभु श्रीराम मात्र छत्तीसगढ़वासियों के लिए ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए एक शाश्वत आदर्श, धर्म के रक्षक और लोकमंगल के सर्वोच्च प्रतिमान हैं।

-डॉ. पद्मा साहू
(लेखिका प्रखर शिक्षाविद् व साहित्यकार हैं, जो हिंदी एवं छत्तीसगढ़ी में अपनी छंदबद्ध रचनाओं के लिए जानी जाती है। वे व्याकरणिक शोधकार्य में भी संलग्न हैं।)

 

 

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