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पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

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रक्षाबन्धन : भारतीय मानस में रक्षासूत्र का दर्शन

रक्षाबन्धन : भारतीय मानस में रक्षासूत्र का दर्शन

समूची मानव संस्कृति में त्यौहारों का अपना एक विशेष महत्त्व है। ये त्यौहार आनन्द-उल्लास और मेल-जोल के साधन होने के साथ-साथ जीवन दर्शन को अभिव्यक्त करने के भी साधन होते हैं। चूँकि भारतवर्ष अपने आदिकाल से अबतक एकात्म जीवनदृष्टि रखता आया है, इसलिए हमारे सभी त्यौहारों में हमें स्वार्थ की जगह परमार्थ के भाव दिखते हैं, व्यष्टि की जगह समष्टि के कल्याण के भाव मिलते हैं। त्यौहारों की इस विशिष्ट भारतीय परम्परा में श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबन्धन का पर्व भी एक ऐसा ही त्यौहार है, जो भारतीय मानस के एकात्मजीवन दर्शन को अभिव्यक्त करते हुए व्यष्टि और समष्टि के सम्बन्धों को व्याख्यायित करता है। 

यूँ तो हमारी संस्कृति में रक्षासूत्र बड़े सामान्य है। माँ अपनी सन्तान को रखड़ी पहनाती है, पुजारी लोगों को रक्षासूत्र बान्धते हैं, प्रजा रज्य के कल्याण के लिए उसके प्रतिनिधि राजा को राखी बान्धते हैं। पर श्रावण पूर्णिमा पर इसका विशेष महत्त्व है। क्योंकि इश दिन हम इसे सामाजिक-पारिवारिक मेलजोल के उद्देश्य के लिए बृहत्स्तर पर मनाते हैं। काल के प्रवाह में यद्यपि इस पर्व का अर्थ आज केवल भाई-बहन के पारस्परिक स्नेह-सम्बन्धों तक सीमित मान लिया गया है, किन्तु ऐसा है नहीं। जब हम आज प्रचलित लोक-परम्पराओं, वैदिक संहिताओं और पौराणिक आख्यानों का गहन अनुशीलन करते हैं, तो हमें इसके अत्यंत विस्तीर्ण, सार्वभौमिक दर्शन की अनुभूति प्राप्त होती है। हमें पता-चलता है कि यह केवल भाई-बहन के पर्व से कहीं विस्तृत अर्थ में सृष्टि के चराचर कण-कण के प्रति कल्याण-कामना का लोकोत्सव है। तो आइये हम इस पर्व के मूल भावों को जानने का प्रयास करें।

1. मूल मान्यता और दार्शनिक अधिष्ठान
हमारी परम्परा में रक्षाबन्धन शास्त्रीय और लौकिक दोनों ही माहात्म्य यह प्रतिपादित करते हैं व्यक्ति जिसकी रक्षा, दीर्घायु, यश और सर्वांगीण कल्याण की कामना करता है, वह उसे रक्षासूत्र बाँधता है। यह धागा रक्षासूत्र बाँधने वाले की तपस्या, स्नेह और आत्मिक ऊर्जा से अभिमंत्रित होकर सामने वाले व्यक्ति के लिए एक रक्षाकवच बनाता है, ऐसी हमारी मान्यता है। इसी कारण, भारतीय परम्परा में रक्षासूत्र बाँधने वाला पात्र सदैव पूज्य माना जाता है और रक्षासूत्र बन्धवाने के बाद व्यक्ति बांधने वाले को बेंट अर्पित करता है। जैसे जब प्रजा राजा को राखी बान्धती थी, तो कृतज्ञतावश राजा उन्हें किछ भेंट करता था। भाई-बहन के सन्दर्भ में भी यही बात है कि बहन जब भाई की कलाई पर राखी बाँधती है, तो वह शक्तिस्वरूपा होकर उसके जीवन की समस्त विघ्न-बाधाओं से सुरक्षा के लिए अपनी आत्मिक ऊर्जा का संचार करती है। और इसीलिए बहन की इस आत्मीयता, इस स्नेह के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए भाई उसे भेंट अप्रित करता है।

2. पौराणिक आख्यानों में रक्षासूत्र माहात्म्य
यदि हम इतिहास और पुराणों  का अवलोकन करें, तो वहाँ भी यही दिखलाई पड़ता है कि रक्षाबन्धन बांधने वाले द्वारा बन्धवाने वाले की रक्षा की कामना से किया जाता है। इस सन्दर्भ में एक प्रचलित पौराणिक आख्यान शची व इन्द्र का है। भविष्य पुराण की इस कथा के अनुसार, जब देवराज इन्द्र देवासुर संग्राम में असुरों की सेना से निरंतर पराजित होकर हतोत्साहित हो रहे थे, तब उनकी पत्नी शची (इन्द्राणी) ने अपनी तपस्या और पातिव्रत्य की संचित ऊर्जा से एक रेशमी धागे को अभिमंत्रित किया। उन्होंने श्रावण पूर्णिमा के दिन इस महाशक्तिशाली रक्षासूत्र को इन्द्र की दाहिनी कलाई पर बाँधा। इस सूत्र की शक्ति से इन्द्र ने असुरों पर विजय प्राप्त कर स्वर्ग का खोया हुआ ऐश्वर्य पुनः प्राप्त किया। यहाँ बाँधने वाली पत्नी है और बँधवाने वाला पति है। तो यह प्रसंग इस पर्व का एख मूलभाव स्पष्ट करता है कि रक्षासूत्र बाँधने वाली शची रक्षक की भूमिका में थीं, जिन्होंने अपने संकल्प से इन्द्र को युद्ध में विजयी होने का संबल प्रदान किया।

इसी तरह महाभारत के एक आख्यान के अनुसार एक बार श्रीकृष्ण की कलाई कट गई और उससे रक्त बहने लगा। तब द्रौपदी ने अपने साड़ी का किनारा फाडकर उस स्थान पर बान्ध दिया। स्वाभाविक है कि यह सूत्र भी कृष्ण के कल्याण की कामना के लिए बांधा गया था। इस समय कृष्ण के पास देने के लिए कुछ नहीं था, तो उन्होंने उसे ऋण मान लिया और फिर चीरहरण के समय द्रौपदी के शील की रक्षा कर वे उऋण हुए। इस प्रकार इतिहास और पुराण के आख्यान यह रेखांकित करते हैं कि रक्षासूत्र सामने वाले की रक्षा की कामना से उसे बान्धा जाता है। 

3. लोक-परम्पराओं में रक्षाबन्धन और उसका समष्टिगत विस्तार
भारतीय इतिहास के विद्वान यह मानते हैं कि भारत में लोकजीवन अतीत के प्रत्येक बिन्दु पर अखण्डता से प्राहित होता रहा है। हम आज भी उन पर्वों और त्यौहारों को उसी भाव से मना रहे हैं, जिन भावों से वे आज से कम-से-कम 5 हजार वर्ष पहले भी मनाए जाते थे। भारतीय लोक-जीवन में रक्षाबन्धन का जो प्राचीन और नैसर्गिक रूप आज भी सुरक्षित है, वह इस पर्व के समष्टिगत (या संसार) विस्तार के दर्शन वाली हमारी बात को प्रामाणिकता प्रदान करता है। आशय यह है कि इन समाजों में यह पर्व केवल मानव-संबंधों तक सीमित न रहकर सम्पूर्ण चराचर जगत, प्रकृति और कृषि-संसार को अपनी आत्मीयता में समाहित कर लेता है:

छत्तीसगढ़ की कोरवा जाति और 'राखी खूँटा':  छत्तीसगढ़ के सघन वनांचल में निवास करने वाली कोरवा जाति में भाई-बहन के सम्बन्धों के साथ-साथ, कृषक अपने खेतों में जाकर पूर्ण श्रद्धा के साथ तेंदू की लकड़ी, शतावर और भेलवां के पत्तों की पूजा करते हैं और उन्हें रक्षासूत्र बाँधते हैं। तत्पश्चात, इसे खेतों में 'राखी खूँटा' के रूप में रोपित किया जाता है। कोरवा समुदाय का विश्वास है कि यह अभिमंत्रित खूँटा फसलों को प्राकृतिक प्रकोपों, कीटों और व्याधियों से बचाकर सुरक्षित रखेगा। यह मनुष्य द्वारा अन्नदायिनी प्रकृति की सुरक्षा की मंगलमयी कामना का अद्भुत उदाहरण है।

जशपुर के कोतबा अंचल में गो-पूजन और रक्षा-संकल्प:  जशपुर के कोतबा क्षेत्र में समाज में रक्षाबन्धन के दिन पशुधन के प्रति अपनी अनन्य कृतज्ञता ज्ञापित करता है। यहाँ की बहनें अपने भाइयों को सूत्र बाँधने से पूर्व अपने गोवंश (गायों और बैलों) का तिलक-अर्चन कर उन्हें राखी बाँधती हैं। गोवंश को परिवार के भरण-पोषण और कृषि-जीवन का मूल आधार मानकर, उनकी रक्षा और आरोग्यता की कामना करना इस पर्व का प्राथमिक कर्त्तव्य माना गया है।

मध्य प्रदेश का सैलाना अंचल और चराचर पूजा: मध्य प्रदेश के सैलाना क्षेत्र में रक्षाबन्धन की परम्परा और भी विस्मयकारी है, जहाँ यह उत्सव श्रावण अमावस्या से आरम्भ होकर कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी तक (लगभग साढ़े तीन महीने) चलता है। श्रावण पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल भाई को राखी बाँधने के उपरांत, सांध्यकाल में पूरे परिवार के लोग गृह के मुख्य द्वारों, शय्या (खाट), हल, पालतू पशुओं और समस्त कृषि उपकरणों को रक्षासूत्र बाँधते हैं। यह इस सत्य का जीवंत प्रमाण है कि मानव अपनी सुख-सुविधा और जीवन-यापन के सभी सहचरों की सुरक्षा और दीर्घायु की कामना करता है।

ओडिशा की 'गाम्हा पूर्णिमा': ओडिशा में इस पावन तिथि को 'गाम्हा पूर्णिमा' के रूप में मनाया जाता है, जो कृषि-देवता भगवान बलभद्र के जन्मोत्सव की भी तिथि है। इस दिन ओडिया कृषक अपने बैलों को अलंकृत कर उन्हें रक्षासूत्र बाँधते हैं, जो कृषि प्रधान संस्कृति में पशुधन के प्रति कृतज्ञता और उनकी रक्षा की मंगल-कामना का अनुपम प्रतीक है।

इन जीवंत लोक-परम्पराओं के अतिरिक्त, समाज के अन्य अंगों में भी यह समष्टिगत स्वरूप स्पष्ट झलकता है कि जब ब्राह्मण अपने यजमान या राजा को रक्षासूत्र बाँधता है, जब माताएँ शिशु के कण्ठ में सुरक्षा के लिए 'रखड़ी' पहनाती हैं, और जब देवालयों में श्रद्धालु पुजारियों से अपने हाथ में रक्षासूत्र बँधवाते हैं, तब हर स्थान पर भाव यही रहता है कि उस पवित्र धागे के माध्यम से पर्यावरण, राज्य, समाज और समस्त प्रियजनों की रक्षा की कामना हम करें।

4. आज भाई-बहनों का ही पर्व क्यों माना जाने लगा? 
यदि आज के परिदृश्य में यह धारणा सामान्य रूप से प्रचलित हो गई है कि रक्षाबन्धन केवल बहन द्वारा भाई को राखी बाँधने का पर्व है, तो इसका विकास हमारी परम्पराओं के ऐतिहासिक अनुकूलन और संक्रमण काल में हुआ है। मध्यकाल में जब भारत विदेशी आक्रमणों, सीमाओं के अतिक्रमण और सामाजिक असुरक्षा के भीषण दौर से गुजर रहा था, तब अपनी अस्मिता, मान-मर्यादा और परिवार की रक्षा के लिए महिलाओं ने समाज के सामर्थ्यवान पुरुषों को रक्षासूत्र बाँधकर उन्हें 'धरम भाई ' बनाने की एक अत्यंत व्यावहारिक और पवित्र पद्धति का विकास किया। ऐसा इसलिए क्योंकि रक्षासूत्र बांधने पर जब व्यक्ति भेंट स्वरूप कुछ दे, तो उससे अपने परिवार की सुरक्षा का वर मांग ले, जैसी युक्ति देवी लक्ष्मी ने लगाई थी। तो आशय यह है कि राखी बाँधकर रक्षा का वचन मांगना एख युक्ति थी, जो आक्रमणकारियों से अपने परिवारों के बचाव के लिए महिलाओं ने विकसित की।

इतिहास में रानी कर्णावती द्वारा हुमायूँ को राखी भेजने का प्रसंग इसी युक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिसके माध्यम से उन्होंने चित्तौड़ की सुरक्षा सुनिश्चित करने का संकल्प माँगा था। विषम और संकटकालीन परिस्थितियों में मर्यादाओं की रक्षा का वचन पाने के लिए महिलाओं द्वारा वीरों को भाई बनाने की इस युक्ति ने तत्कालीन समाज को एक सूत्र में पिरोने का महान कार्य किया। इसी ऐतिहासिक आवश्यकता के कारण कालान्तर में इस उत्सव में बहन द्वारा भाई को राखी बाँधने की परम्परा को अत्यधिक सामाजिक विस्तार और प्रमुखता प्राप्त हुई। किन्तु इस ऐतिहासिक अनुकूलन को ही पर्व का एकमात्र आदि-रूप मान लेना हमारी प्राचीन और विशाल लोक-संस्कृति के प्रति अज्ञानता ही होगी। हमारे ग्रामीण और जनजातीय अंचलों में आज भी इस पर्व का अपने मौलिक, समष्टिगत और सार्वभौमिक रूप अपने पूर्ण वैभव के साथ जीवित है।

२१वीं सदी के इस वैज्ञानिक और वैचारिक युग में हमें अपनी लोक-परम्पराओं के इस विस्तीर्ण और उदात्त दर्शन को पुनः प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है। रक्षाबन्धन केवल किसी एक सम्बन्ध की परिधि में सिमटा हुआ पर्व नहीं है, बल्कि यह समष्टिगत चेतना, प्रकृति और मनुष्य के अटूट सह-अस्तित्व तथा चराचर जगत के प्रति असीम आत्मीयता का महोत्सव है। एक बहन जब अपने भाई को रक्षासूत्र बाँधती है, तो वह किसी याचना भाव से नहीं, अपितु एक 'शक्ति' के रूप में उसके मस्तक पर तिलक लगाकर उसकी यश और विजय का मार्ग प्रशस्त करती है। यह नारी के आत्मबल के माहात्म्य को रेखांकित करने वाला पर्व है। तो आइए, इस रक्षाबन्धन पर हम इसे संकुचित अर्थों के बन्धनों से मुक्त कर, इसके उस सार्वभौमिक लोक-स्वरूप को पहचानें जहाँ बंधने वाला हर धागा संपूर्ण सृष्टि के कल्याण, सुरक्षा और परस्पर विश्वास का अमर संवाहक है।

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