आज का पंचांग

संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार

नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

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राजिम गौरव गाथा

राजिम गौरव गाथा

कमलक्षेत्र, देवपुर और पद्मावतीपुरी के नाम से प्रसिद्ध राजिम, महानदी त्रिवेणी संगम का वह तीर्थ है जहाँ वैष्णव, शैव और साक्त परंपराएँ एक साथ सांस लेती हैं। भक्तिन राजिम की तपस्या से राजिम लोचन की प्रतिष्ठा और नगर-नामकरण की कथा जानिए।

तत्क्षेत्रमलं दिव्यं कमलोपरि संस्थिम
चकस लाके जलधौ विष्णु मेरी बाम्बुजम
अकार्षी दिव्यं नगर राजीव बाख्य सदुललम ।।

वर्तमान राजिम जो प्राचीनकाल में कमलक्षेत्र, प‌द्मावतीपुरी, देवपुर नाम से अलग-अलग कालखंड में जाना जाता रहा । प्राचीन तीर्थ काव्य में राजिम का वर्णन उपरोक्त संस्कृत श्लोक के रूप में प्राप्त है। जिसका अर्थ कमल के ऊपर स्थापित वह कमल क्षेत्र है जो इस लोक में उस प्रकार शोभित हुआ, जैसे समुद्र में विष्णु का नाभि कमल। जो मनुष्यों को ऐसा दुर्लभ है। वह सुंदर राजिम नामक शहर रचा।

राजिम मंदिर, राजिम, छत्तीसगढ़
राजिम मंदिर, राजिम, छत्तीसगढ़

उक्त तथ्यों के अनुसार ब्रम्हाजी ने पाँच कोस (10 मील) लंबे सुगंधित कमल को आज्ञा दी- हे पुष्कर (कमल) तुम मृत्यु लोक में जाओ, जहाँ तुम गिरोगे वहाँ कमल क्षेत्र हो जाएगा। अतएव वह कमल पृथ्वी पर गिरा और पांच कोस (10 मील) पर्यन्त भू-मंडल को व्याप्त कर लिया।

ग्रंथकार ने यहाँ पर भक्तिभाव का पक्ष प्रस्तुत किया है। ब्रम्हा जी की आज्ञा से पुष्कर का निर्माण करना विश्वास की प्राचीन अभिव्यक्ति है। राजिम क्षेत्र की रचना महान ऋषि मुनियों ने ही की थी। वर्तमान राजिम क्षेत्र प्राचीन वैभव के अवशेषों की अजन्ता है। आज भी यहाँ अनेक स्थल हैं जो ग्रंथ में उ‌द्धृत तथ्यों की पुष्टि करते हैं।

उत्तरे कौशले देश,
वर्षे भारत संज्ञ के,
विध्य स्व दक्षिणी भाग,
आर्यावितो तम झिक्षिर्ता,
कमला कार ममले,
पंच क्रोश पुरं महत,
महानदी मया भटया,
समीपे तस्य शोभना ।

अर्थात् उत्तर कौशल देश में आर्यावित के सुंदर स्थान में विंध्य पर्वत के दक्षिण भाग पर कमल के समान पाँच कोस का नगर है। उस नगर के पास साफ जल से पूर्ण मनोहर महानदी है। इस तरह प्राचीन ग्रंथ में राजिम नगरी का यह स्पष्ट चित्र है। उक्त ग्रंथ में महानदी को साक्षात् गंगा संबोधित किया गया है।

सचमुच राजिम क्षेत्र के पाँच कोस के अंतर्गत पाँच प्रसिद्ध तीर्थस्थल नगर बसे हैं, क्रमशः पटेश्वर, चम्पेश्वर, ब्रम्हनेश्वर, फिंगेश्वर, कोपेश्वर महादेव के मध्य महानदी त्रिवेणी संगम स्थल पर स्थित कुलेश्वर महादेव का मंदिर, पाँचो नगरों का ध्रुव केन्द्र है। इन पाँचो देवालयों के मध्य सात से नौ मील तक समानांतर दूरी है।

प्रत्येक देवालयों के नाम पर पाँच नगर बसे हैं और मध्य कुलेश्वर महादेव के समीप ही राजिम स्थित है। अतएव राजिम क्षेत्र का आकार भी कमल के समान है। यही भौगोलिक जानकारी हमारे प्राचीन ग्रंथो की थाती है। 

इस प्राचीन ग्रंथ के अनुसार राजिम का नाम देवपुर था, तीर्थग्रंथ में महानदी को श्रृंगी ऋषि द्वारा मृत्यु लोक में लाया गया। ग्रंथ अनुसार महानदी का उद्‌गम स्थान कंक पर्वत बताया गया है। इस तरह तय होता है, कि वर्तमान सिहावा पर्वत ही तब कंक पर्वत के नाम से संबोधित किया जाता था।

सिहावा तथा राजिम के मध्य क्षेत्र में सागर नामक राजा द्वारा लगातार एक सौ यज्ञ संपन्न कराया गया, इन्हीं यज्ञों में अश्वमेध यज्ञ भी शामिल था। अश्वमेध यज्ञ के संदर्भ में महानदी का इस तरह वर्णन होता है।

ऋषिणा ऋगिणानिता
दिव्य देवतर गिणि
महानदी सम ख्याना,
कंक भूध नंदिनीं
तत्रांक भिष्यत्य चिरं तदा
चि त्रो त्यला ख्य लाका |

कलयुग में श्रृंगी ऋषि द्वारा लायी गई कंक पर्वत से उत्पन्न श्री गंगा जी (वर्तमान महानदी) होगी, जिनको महानदी और चित्रोत्पला भी कहेंगे। इन्हीं गंगा जी के कारण कमल क्षेत्र तीर्थराज होगा। तीर्थराज में महानदी को स्पष्ट रूप से कंक नंदनी कहा गया है । 

इसी तरह बस्तर से संबंधित एक संस्कृत ग्रंथ में भी महानदी को कंकनी संबोधित किया गया है। महानदी कंक पर्वत और कंक नंदिनी से संबंधित एक और संदर्भ - 

पुरा केकय देशः श्रीमान धमर्विदा वर
लोमपादो दशहथों राजासीत सुमहारथः
नगरै कैक नारव्ये वै सर्वशोभासमक्वते ।।

अर्थात् पहले केकय देश के राजा धर्म वेत्ताओं में श्रेष्ठ महारथ श्री लोमपाद हुए, ये राजा सब शोभाओं से युक्त कंकन नामक नगर में रहते थे। राजीव महात्म्य तथा अन्य कतिपय तीर्थ ग्रंथो में कंक नगर तथा कंक आश्रम आदि का उल्लेख आया है।

वर्तमान छत्तीसगढ़ का प्राचीन ग्रंथो तथा ऐतिहासिक घटनाओं से सन्निकट का संबंध है। सिहावा तथा महानदी इस महाक्षेत्र की मुख्य भुमिकाएँ हैं। छत्तीसगढ़ गोंड राजाओं के वंशावली संस्कृत काव्य ग्रन्थ के अनुसार श्री लोमपाद का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वर्तमान सिहावा क्षेत्र प्राचीन वैभव के भू-गर्भ अवशेष संपदा के विपुल भंडार से लबालब है।

इस क्षेत्र से निकली वर्तमान महानदी आगे चलकर त्रिवेणी संगम तथा चित्रोत्पला के नाम से प्रसिध्द होती है। पैरी और सोंदुर सहायक नदियों के संगम स्थल पर ही कुलेश्वर महादेव जी का प्राचीन मंदिर है। महानदी के एकदम कगार पर ही वर्तमान राजिम स्थित है । 

इस तरह से राजिम प्राचीनकाल से ही अपने धार्मिक आध्यात्मिक गौरवशाली परम्पराओं को आत्मसात किये आज पर्यंत ऐतिहासिक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विख्यात है। जिस राजिम को साक्षात भगवान विष्णु का कमल क्षेत्र माना जाता है, जिसे पुराणों में तीर्थग्रंथो में देवपुर, पद्मावतीपुरी के नाम पर जाना जाता रहा।

उससे बदलकर राजिम हो जाना अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटना है। उसके पीछे की कहानी' (लोक किवंदती) और उपलब्ध साक्ष्य का अवलोकन आवश्यक हो जाता है। आज भी राजिमलोचन मंदिर के सम्मुख जिस भक्तिन राजिम सती की समाधि विद्यमान है, भला इतिहास उसे विस्मृत कैसे कर सकता है?

आइये जानते हैं प‌द्मावतीपुरी से राजिम नामकरण की यात्रा जिस भक्त के त्याग, तप-तपस्या से संभव हो पाया उसके पीछे का इतिहास क्या है ?

'राजिम वर्तमान छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले का एक प्रसिध्द स्थल है। जिसका अपना प्राचीन वैभवशाली इतिहास रहा है हमारे प्राचीन ग्रंथ पुराण व तीर्थ ग्रंथों में उसकी व्यापक धार्मिक व सांस्कृतिक वर्णन है। अलग-अलग समय में कभी देवपुर, प‌द्मावतीपुरी तो कभी कमलक्षेत्र के नाम से यह प्रसिद्ध रहा ।

राजिम नगरी नदीश्रेष्ठा महानदी के श्री संगम (त्रिवेणी संगम) अर्थात उत्पलेश्वर (महानदी), पित्रोध्दारिणी (पैरी) और सुंदराभूति (सोंदुर) के संगम पर बसा, साक्षात् परम पिता परमेश्वर विष्णु जी की नगरी है। इसी कारण प्राचीन ग्रंथ में उसे कमल क्षेत्र के नाम में भी जाना जाता है। चित्रोत्पला (महानदी) में ही देवाधिदेव महादेव कुलेश्वर साक्षात् स्वयंभु रूप में विराजित है।

राजिम वैष्णव, शैव और शाक्त तीनों धार्मिक मान्यताओं की संगमस्थली भी है। अलग-अलग पूजन परंपरा, मान्यताओं के बाद भी यहाँ के लोग पुरातन काल से ही सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से समरस जीवन जीते रहे हैं।आज तक के इतिहास में कभी भी धार्मिक संघर्ष, जातीय संघर्ष या विद्वेश का कोई एक भी उदाहरण नहीं रहा।सभी जाति वर्ग और पंथ के लोग आपसी सौहार्दता, समरसता का पालन करते सुख शांति से रहते आये।

महानदी का कछार बहुत ही उर्वरा भूमि रही, उस क्षेत्र में अधिकतर तैलिक परिवार तिलहन उत्पादन करते। उसे घानी में पेरकर तेल का व्यापार कर सुखी सम्पन्न जीवन व्यतीत करते थे। स्वभाव से सीधे सरल या यूं कहें साधुता उनके रंग-रग में थी।

इसी पद्मावतीपुरी में प्रसिद्ध तैलकार गृहस्थ संत धर्मदास जी और उनकी धर्मपरायण पत्नी शांति देवी निवास करते थे ।धर्मदास जी धनाड्य होने के साथ धार्मिक प्रवृत्ति, सरल, सहज, साधु सदृश जीवन जीने वालेउदार व्यक्ति थे।

उनके निवास में सदैव साधु, संत, दीन, दुखीयों का आना-जाना लगा रहता था। वे सामर्थ्य अनुसार सबकी सेवा सुश्रुवा करते । कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटता। उस धार्मिक कार्य में उनकी पत्नी शांतिदेवी बढ़-चढ़कर उनका साथ देती।

इस तरह उनका जीवन धर्म-कर्म करते सुखमय व्यतीत हो रहा था। सब कुछ होते हुए भी निःसंतान होने के कारण एक वेदना उनके हृदय में बनी रहती थी। वे संतान की चाह में निरंतर सकर्म की ओर अग्रसर हो ईश्वरीय सत्ता से प्रार्थना करते, मन कर्म पवित्र हो, तो भगवान भी भक्त के आधीन होते हैं।

प‌द्मावतीपुरी (राजिम) में काशी के धर्मात्मा नरेश सोमदत्त प्रतिवर्ष माघपूर्णिमा के अवसर पर विशाल शिव महायज्ञ का आयोजन करते जो अनवरत महाशिवरात्रि तक चलता। हजारो की संख्या में देश भर से ऋषि, मुनी, ज्ञानी, ध्यानी संत समाज प‌द्मावतीपुरी आते। पद्मावतीपुरी शिवमय हो जाता, चारो ओर शंख, घंटी की स्वर लहरी गुंजायमान हो स्वर्ग की भांति ऊर्जा से पूरित हो जाता।

ईश्वरीय कृपा से शांतिदेवी एवं संत धर्मदास के घर माघ पूर्णिमा के दिन ही प्रभु भक्त सुलक्षणी कन्या का जन्म हुआ। कन्या की ज्योति एवं सुगंधि हवा में सभी दिशाओं में फैल गई, जिससे साधु संतो, महात्माओं को इस शक्ति के अवतार का ज्ञान हो गया।

वे सभी संत धर्मदास जी के घर पहुंचने लगे। संत धर्मदास जी ने सभी आगंतुकों का यथायोग्य सत्कार किया । उसी समय सभी संत महात्माओं द्वारा विचार कर कन्या का नाम 'राजिम' रखा गया।

rajim mata

संत धर्मदास और शांतिदेवी भगवान विष्णु के परम भक्त थे। घर में सदैव साधु-संतो का आदर सत्कार करते, दीन दुखियों की सेवा उनके जीवन का अंग था, जिसे बचपन ही राजिम देखते आई।

फलस्वरूप उसमें भी बचपन से ही धार्मिक अध्यात्मिक गुण के साथ करुणा संस्कारजनित मिला ।अब राजिम छः वर्ष की हुई, इसलिए उसकी शिक्षा-दीक्षा लोमश ऋषि आश्रम में संचालित गुरुकुल में होने लगी।

एक समय कुलेश्वर महादेव पर साधु संतो का सत्संग मेला लगा था, राजिम वहाँ जाती और ध्यान लगाकर प्रभु के चरित्र को सुनकर जल्दी घर लौट आती। परंतु एक दिन कथा प्रसंग सुनते रात्रि हो गई, राजिम को घर जानें कोई नहीं मिला।

तब वह भयवश महादेव मंदिर से कुछ दूरी पर आँखे मूंदे प्रभू का ध्यान लगाने बैठ गई, यह वही जगह थी, जहाँ पर विष्णु भगवान चतुर्भुजी रूप में मूर्ति के आकार में रेत के अंदर विराजमान थे। राजिम ने आवाज सुनी - पुत्री राजिम तू चिंता न कर, मैं तुझे घर तक पहुँचा दूंगा।

भगवान विष्णु ने चतुर्भुज मनमोहक रूप धारण कर दर्शन दिए, राजिम का यह प्रथम विष्णु दर्शन था । वह कब घर पहुँच गई उसे याद न रहा? उस दिन से राजिम उस स्थान पर घंटो ध्यान स्मरण करने बैठी रहती । उसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य एवं ईश्वरीय शक्ति का निवास हो चुका था।

राजिम घर में भी प्रभू ध्यान में खोए रहती, माता-पिता से उसकी मनोदशा छिपी नही थी।पद्मावतीपुरी के ही एक तैलिक परिवार रतनदास व उसकी स्त्री पारो का धर्मदास जी के परिवार के साथ मित्रवत व्यवहार था।

एक बार रतनदास जी द्वारा घर के मांगलिक कार्य में धर्मदास जी को परिवार सहित आने का आमंत्रण मिला। पूरा परिवार उस मांगलिक कार्य में शामिल हुआ । रतनदास व पारो ने धर्मदास और शांति देवी का आदर सत्कार किया।

उसी समय राजिम रतनदास जी के घर रखी घानी के पास निर्बल थके-हारे बीमार बैल को देख रही थी, मन करुणा से भर गया, वह द्रवित हो बैल के माथे को सहलाने लगी, यह क्या बैल जो कई दिनों से दाना-पानी छोड़ चुका था, वह उठ खड़ा हुआ, भला चंगा हो गया। यह सब होनी कैसे घटी सब अचंभित थे, यह दैवीय चमत्कार से कम नहीं था।

इस घटना के बाद राजिम के दैवीय शक्ति की चर्चा पूरे नगर में फैल गयी। फिर क्या था दुखियाजन, रोगग्रस्त लोग धर्मदास जी के घर बड़ी संख्या में आते, राजिम ध्यानस्थ होकर प्रभु का नाम लेकर उन पर हाथ फेरती।

त्रिलोकीनाथ से उनके उत्तम स्वास्थ्य व अन्य परेशानियों को दूर करने की कामना करती और लोग स्वस्थ संतुष्ट होकर घर जाते। धीरे-धीरे राजिम की ख्याति पद्मावतीपुरी के चारों दिशाओं में फैलने लगी। बड़ी संख्या में दूर दराज के पीड़ित लोग आने लगे। इस तरह राजिम श्रद्धा से भक्तिन राजिम कहलाने लगी ।

राजिम नर सेवा ही नारायण सेवा के भाव से ईश्वरीय आराधना में लीन रहने लगी। समय के साथ जब राजिम विवाह योग्य हो गई, तब माता-पिता उनके हाथ पीले करने चिंतित होने लगे। वे ईश्वर से प्रार्थना करते कि जैसे भी राजिम को सुयोग्य वर मिल जाए ।

प‌द्मावती पुरी के तैलिकवंशी रतनदास और पारो के एक संतान अमरदास थे, जिसे धर्मदास व शांति ने देख लिया था। बचपन से ही अमरदास को लोग दास जी कहा करते थे, क्योंकि अमरदास भी नित्यप्रति साधु संतो की सेवा में लगे रहते।

रतनदास जी से राजिम और अमरदास के विवाह का प्रस्ताव धर्मदास जी रखते हैं, जिसे रतनदास जी सहर्ष स्वीकृति देते हैं। शुभ मुहुर्त में अमरदास संग राजिम का विवाह वैदिक रीति से संपन्न होता है।

माता-पिता का घर छोड़कर राजिम अपने ससुराल आ गई। रतनदास व पारो राजिम को बेटी की तरह स्नेह करते, वे भी राजिम के आने से अपार हर्षित थे, अपने को धन्य समझते थे। ससुराल आते ही राजिम घरेलु कार्यों को निपुणता से करने लगी।

घर के साथ-साथ तेल व्यवसाय के सभी कार्यों, लेन-देन को भी बखूबी निभाने लगी। पूरा परिवार सास-ससुर पति को भी ईश्वर भजन-पूजन में लगा चुकी थी, पूरा परिवार धर्मप्राण था। फिर भी पारिवारिक जीवन, संत सेवा आदि के कारण प्रभू की सेवा और पूजा-पाठ के लिए कम समय मिल पाता था।

एक रात्रि को विष्णु भगवान चतुर्भुज रूप धारण कर स्वप्न में राजिम को दर्शन देकर कहा- हे पुत्री राजिम, तेरी पूजा और आराधना न पाकर मैं तप रहा हूँ। हे पुत्री तुम तो जगत के कार्यों में व्यस्त हो गई हो परंतु मुझे तुम्हारी मदद की आवश्यकता है। तुम ही तो मुझे उजागर करोगी, तुम्हारे सिवाय किसी ने मेरा  दर्शन नहीं किया है।

तुम ही मेरे लोचन स्वरूप को जगत के सामने लाओगी और लोगों के कल्याण का कारण बनोगी, मेरी यह इच्छा पूर्ण करो, तुम अपने घर के घानी का शुध्द तेल लाकर मेरे तप्त बदन पर लेपन कर शीतलता प्रदान करो । मैं कह चुका हूँ, मैं तप रहा हूँ, मुझे शांति प्रदान करो ।

मैं आज भी नदी के उसी स्थान पर रेत ने ढंका हुआ हूँ, जहाँ मैने पहली बार तुम्हें दर्शन दिया था। यहाँ से निकालकर मेरे विग्रह को मंदिर में स्थापित करो, ताकि मेरे भक्तो का उद्धार हो सके, मुझे अब और तपने न दो, मेरे शरीर के ताप को शांति प्रदान करो।

राजिम स्वप्न के इस बात को घर में सभी लोगों को बताकर पुरे परिवार सहित घड़े में शुध्द तिल तेल लेकर उसी स्थान पर गई और विधिवत नियम-धियम से पूजा कर तेल श्री विग्रह में लेपन की, ईश्वरीय आदेश अनुसार राजिम चतुर्भुज भगवान को अपने घर लायीं, उसे अपने घानी कक्ष में विराजित कर नित्य प्रति पूजन-अर्चन आरंभ की। भगवान के विराजते ही राजिम के यहाँ श्री लक्ष्मी जी का निवास हो गया।

उनका व्यापार दिन-प्रतिदिन और बढ़ने लगा, घानी सदैव तेल से लबालब रहता। कितनों बेचने के बाद भी तेल ज्यों का त्यों भरा रहता। देखते ही देखते अन्न- धन का भंडार भर गया। पूर्व की भाँति राजिम दीन दुखियों और जरूरतमंदो को दान देती, साधु-संतो की सेवा करती, साथ ही चतुर्भुज भगवान को लेप लगाए तेल से अस्वस्थ लोगों के शरीर में मलकर उन्हें स्वस्थ करती।

ईश्वरीय कृपा में राजिम की ख्याति चहुँ ओर फैलने लगी । राजिम ने  घर में रखे चतुर्भुज भगवान, जिसे वह बड़े प्रेम से लोचन कहती, के लिए एक भव्य मंदिर का निर्माण प्रारंभ कर दिया। मंदिर निर्माण पश्चात् माघ पूर्णिमा के शुभ अवसर पर प्राण प्रतिष्ठा सुनिश्चित किया गया। इस अवसर पर भारत के कोने-कोने से साधु संत-महात्मा इसके साक्षी बननें पधारे।

पूरी पद्मावतीपुरी दुल्हन की तरह सजने लगी। लोग स्वतः अपने घरों को तोरण पताके, फूल माला और दीप ज्योति से सजाने लग गए। घर आँगन को चौंक पुरकर उत्साह मंगल से झूम गए ।

पूरा जन सैलाब प्राण प्रतिष्ठा के लिए उमड़ पड़ा साधु संतों द्वारा पूरे वैदिक विधि-विधान से चतुर्भुज भगवान विष्णु के श्री विग्रह को राजिम और अमर दास के हाथों तेल का लेपन किया गया, उन्हें शंख, चक्र, गदा, पद्म, सिर पर मोती जड़ित मुकुट, कानों में कुंडल, गले में कौस्तुभ मणी, वक्षस्थल पर भृगुलता के चिन्ह, हाथों में कंगन, कमर में कमरबंध, बाहुओं में भुजबंद एवं पीताम्बर की काछनी, चमकता-दमकता सलोना रूप मन को आल्हादित कर रहा था।

राजिम प्रभु के इस स्वरूप को देखकर सुध बुध खो बैठी और ध्यान मग्न होकर प्रभु की वंदना करने लगी। मन ही मन कहने लगी हे प्रभु लोचन आपके दिव्य दरबार में जो कोई आए, उसकी इच्छा पूरी हो, उसे मोक्ष की प्राप्ति हो । कमल क्षेत्र के श्री संगम पर स्नान दान करने व अस्थि विसर्जन करने पर उन्हें माँ चित्रोत्पला गंगा मैया की तरह उद्धार करे।

उस समय से माघ पूर्णिमा के दिन यज्ञ हवन-पूजन, भजन प्रतिवर्ष लोचन मंदिर और कुलेश्वर महादेव में अनवरत होने लगा, धीरे-धीरे इस पर्व ने अब वृहद मेला का रूप धारण कर लिया है। लोग कहाँ जाबो बड़ दूर हे गंगा कहकर श्री संगम पर अस्थि विसर्जन करने लगे।

साल दर साल माघ पूर्णिमा का यह पर्व धार्मिक मेला लोगों के आस्था का केंद्र बन गया। राजिम और अमरदास का परिवार आने वाले सभी साधु-संत महात्माओं के साथ सभी श्रद्धालुओं के लिए रहने ठहरने और भोजन का प्रबंध करता।अब तो जैसे पद्मावतीपुरी राजिम के नाम से प्रसिद्ध होने लगा।

जनमानस में स्वर बुलंद होने लगा, वे सामुहिक रूप से भगवान लोचन को राजिम लोचन भगवान कहने लगे। उनका मानना था माता राजिम की भक्ति के कारण ही उन्हें प्रभू का दर्शन लाभ मिला है।

इसलिए प्रभू लोचन को राजिम लोचन भगवान कहकर संबोधित करेंगे, उनकी बातों से साधु संत भी सहमत हुए। सभी ने एक स्वर से सहमत होते हुए राजिम लोचन भगवान का जयकारा लगाने लगे।

पुरा पद्मावतीपुरी उस जयकारे से गुंज उठा तब से पद्मावतीपुरी नगर का नाम भक्त माता राजिम के नाम से पड़ा। और चतुर्भुज भगवान को भक्तगण राजिम लोचन भगवान कहकर पुकारने लगे।

परंतु भक्त माता राजिम को यह स्वीकार नहीं था, उन्होने लोगों को समझाया कि यह उचित नहीं भगवान के आगे मेरा नाम आए यह सर्वथा अनुचित है, मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकती। मैं केवल भक्त हूँ, मैं भी उन्हीं की बनायी रचना हूँ, मुझसे यह पाप नहीं होगा।

प्रभू लोचन राजिम को पुनः प्रेरणा दी, समझाया हे पुत्री यह सब मेरी इच्छा अनुकुल है दिग-दिगंतर तक लोग तुम्हारी भक्ति की शक्ति को चिरस्थायी बनाए रखें, इस हेतु मैंने ही जनमानस को प्रेरित कर यह सब करवाया। तुम विचलित न हो, विरोध न करो, मुझे इसी से शांति मिलेगी।

तुम केवल मेरी आराधना करो, तुम्हारी भक्ति से ही मेरी शक्ति बढ़ेगी, मैं सदैव इस स्थान में रहकर लोगों का कल्याण करूंगा । भगवान लोचन के प्रेरणा पाकर राजिम संतुष्ट हुई, और हरि इच्छा को स्वीकार कर पुनः अपने कर्म में लीन हुई। 

समय और काल (मृत्यु) ईश्वर के बनाए निर्धारित नियमों का पालन करते हैं। राजिम के परिवार में माता-पिता, सास-ससुर इसी चक्र में स्वर्गवासी हो गये । स्वतः राजिम भी दीन दुखियों की, साधु संतो की सेवा करते, शारीरिक शिथिलता का अनुभव करने लगी समय के साथ-साथ राजिम अब आमजनों की माता बन गई थी। साधु संतो की दृष्टि में वह भक्तिन बन गई । उनकी भक्ति की शक्ति देश भर में चर्चा का विषय बन गई थी।

उस समय के युग में शक्ति संपन्न राजा और सामंत को एक आम महिला का इस तरह प्रसिद्ध हो जाना, पद्मावतीपुरी को राजिम नगर कहा जाना उनके हृदय में सांप लोटने जैसा था। राजिम माता के इस प्रसिद्धि से चीढ़ कर वहाँ के सामंत राजभय व बल प्रयोग करने लगे। षड्यंत्र से माता राजिम की छवि धुमिल करने मनगढ़ंत कहानियाँ गढ़ी गई, उन पर प्रलोभन का आरोप लगाया गया।

इस कार्य हेतु एक अलग मंदिर निर्माण कर प्रतिमा को स्थानांतरित करने की कुचेष्टा की गई यहाँ तक भगवान के पैरों में जंजीर बांध देते, जिसका चिन्ह आज भी देखा जा सकता है, पर भगवान राजिम के बनाए मंदिर में पुनः आ जाते ।

जब हर तरह से सामंतो की हार होने लगी तब थक हारकर मनगढ़त चित्र फलक मंदिरों की दीवारों पर लगाने लगे। उसी तरह श्लोक लिखकर भित्तियों में भी जोड़ा गया। लोगों को कई तरह से दिग्भ्रमित करने का प्रयास किया गया। तब के इतिहासकारों, प्रशस्ति लेखकों को भी अपने पक्ष में लिखनें कहा गया।

उक्त सत्य पक्ष को आदरणीय लेखक पुरषोत्तम अनासक्त जी ने लिखा है- इतिहास के पृष्ठ राजा महाराजाओं के पक्षधर रहे हैं। कहना होगा, मंदिर स्वयं राजिम ने बनाया था। आज भी कई इतिहासकार इसे सही मानते हैं।

राजिम माता के नाम पर नगर और राजिमलोचन नाम दोनो लोकमत को सही प्रमाणित करने में सत्य सहायक है। सोचने वाली बात है, भगवान श्री विष्णु राजिम की भक्ति से प्रसन्न हों, उन्हें दर्शन देते हैं, वे स्वयं धन धान्य से परिपूर्ण रही, जीवन भर दीन दुखियों, साधु संतो की सेवा की, पर राजिम के प्रसिद्धि से चिढ़े लोग यह तर्क देते हैं, कि सामंत जगतपाल को विष्णु मंदिर बनाने का स्वप्न आया।

जबकि यह हास्यास्पद मनगढंत कहानी है। माता राजिम स्वयं संपन्न थी, उन्हें मंदिर निर्माण कराने के लिए जन सहयोग ही काफी था। इससे स्पष्ट है, कि तात्कालीन सामंतवादी सोच यह बर्दाश्त नहीं कर सका और मनगढंत कहानी गढ़कर माता राजिम के छवि को धुमिल करने की कोशिश की गई।

जीवन के अंतिम समय में माता के हृदय को धक्का लगा, इसी बीच बसंत पंचमी के दिन अमर दास जी भी सतलोकी हो गये। वहाँ के सामंत द्वारा किये गए षड्यंत्र से माता राजिम पहले से दुखी थीं, अमरदास जी के जाने के पश्चात माता राजिम भी उन्हीं की चिता में स्वयं की इच्छा से सती हो गई।

आज भी उनकी समाधि स्थल पर (सती मंदिर) उत्कीर्ण शीलालेख में घानी, ऊपरी भाग पर खुली हथेली (उँगलियाँ), सूर्य चंद्र एवं पूर्ण कुंभ की आकृति अंकित है, जो उनके जीवन के गौरवशाली इतिहास के साक्षी है।

धन्य है वह माटी जहाँ भगवान को भक्ति के बल पर वश में करने वाली ऐसी महान भक्तिन का जन्म हुआ । जो सदैव आमजन के हृदय में निवास करती है, आस्था का केन्द्र है जिनके तप त्याग और तपस्या के चलते पदमावतीपुरी राजिमधाम बना ऐसे अधिष्ठात्री देवी को सादर नमन।

!! राजिम लोचन भगवान की जय !!

आलेख संकलन धनराज साहू, खोपली (बागबाहरा)
मो.नं. 9977949272
आलेख सामग्री साभार :महानदी घाटी की सभ्यता - लेखक कृष्णारंजन जी
मैं राजिम लोचन तप रहा हूं - लेखक मेहत्तर राम साहू खोपली (बागबाहरा)

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