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स्वतंत्रता संग्राम के अमर बलिदानी राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह

स्वतंत्रता संग्राम के अमर बलिदानी राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह

 


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में 1857 का वर्ष एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संग्राम की शुरुआत तो 17 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हो चुकी थी, लेकिन 1857 के संग्राम में रियासतों के राजा, जमींदार और सामान्य लोग इस संग्राम में बड़ी संख्या में शामिल हुए। मध्य भारत के महाकौशल क्षेत्र में गढ़ा मंडला के राजा शंकर शाह और उनके पुत्र कुंवर रघुनाथ शाह ने अपने राज्य के आम लोगों और अपने सैनिकों को संगठित करके अंग्रेजी शासन का पुरजोर विरोध किया। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार किया और 18 सितम्बर 1857 को जबलपुर में तोप के मुख से बाँधकर मृत्युदण्ड दिया। उनका बलिदान आज भी महाकौशल क्षेत्र के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना के रूप में स्मरण किया जाता है।

महाकौशल का गढ़ा कटंगा क्षेत्र लम्बे समय तक गोंड शासकों का प्रमुख केन्द्र रहा। इसी राजपरिवार से राजा शंकर शाह सम्बन्धित थे। उनके पिता राजा सुमेर शाह थे। उपलब्ध विवरणों के अनुसार शंकर शाह का जन्म 1789 में हुआ था।


 राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह की जन्म स्थली: मंडला

उस समय इस क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही थीं और मराठाओं का प्रभाव बढ़ चुका था। शंकर शाह ने कम आयु से ही युद्धकला और धनुर्विद्या में रुचि ली। उनके आसपास स्थानीय युवाओं का एक समूह भी तैयार हुआ। आगे चलकर वे अंग्रेजी शासन और उसकी नीतियों के विरोध में सक्रिय हुए। उनका विवाह फूलकुंवरि से हुआ। उनके पुत्र रघुनाथ शाह ने भी पिता के साथ राजनीतिक और सैनिक गतिविधियों में भाग लिया।

शंकर शाह के पास उस समय अपने पूर्वजों जैसा विस्तृत राज्य और सैन्य शक्ति नहीं थी, फिर भी स्थानीय समाज में उनका प्रभाव बना हुआ था।। 1857 से पहले ही उत्तर और मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह फैल चुका था। जबलपुर में अंग्रेजों की 52वीं रेजीमेंट तैनात थी। स्थानीय स्तर पर अंग्रेजी प्रशासन, कर व्यवस्था और उसके हस्तक्षेप को लेकर असन्तोष था।

राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह ने इसी समय अंग्रेजों के विरोध में लोगों को संगठित करना शुरू किया। वे आसपास के प्रभावशाली लोगों, सैनिकों और स्थानीय समाज को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास कर रहे थे। दोनों पिता पुत्र कविता भी लिखते थे। उनकी रचनाओं में अंग्रेजी शासन के विरोध और स्वतंत्रता की भावना दिखाई देती थी। वे कविता और गीतों के माध्यम से लोगों में चेतना जगाने का प्रयास करते थे। अंग्रेज अधिकारियों की दृष्टि में ऐसी गतिविधियां उनके खिलाफ विरोध को बढ़ावा देने वाली थीं।

शंकर शाह और रघुनाथ शाह के पास अंग्रेजों का सीधे सामना करने के लिए बड़ी सेना नहीं थी। इसलिए उन्होंने स्थानीय लोगों को संगठित करने पर जोर दिया। 1857 के संग्राम के समय अंग्रेज अधिकारियों को आशंका थी कि यदि मंडला क्षेत्र के शासक परिवार, जमींदार, मालगुजार और सैनिक एक साथ खड़े हुए तो महाकौशल में उनका विरोध व्यापक रूप ले सकता है। अंग्रेजी प्रशासन को उनकी गतिविधियों की जानकारी मिलने लगी। उन पर यह आरोप भी लगाया गया कि वे जबलपुर में तैनात सैनिकों को विरोध के लिए प्रेरित कर रहे थे और अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध कार्रवाई की तैयारी कर रहे थे।

सितम्बर 1857 में अंग्रेज अधिकारियों ने राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद उनके विरुद्ध अंग्रेजी शासन के खिलाफ षड्यंत्र और विद्रोह को बढ़ावा देने के आरोप लगाए गए। उनके निवास और उनसे सम्बन्धित स्थानों की तलाशी के दौरान ऐसी कविताएं और सामग्री मिलने का उल्लेख मिलता है, जिन्हें अंग्रेज अधिकारियों ने विरुद्ध से जोड़ा। इसके बाद दोनों के विरुद्ध मुकदमे की कार्रवाई की गई।

अंग्रेजी प्रशासन ने शंकर शाह और रघुनाथ शाह को मृत्युदण्ड देने का निर्णय लिया। साधारण फांसी के स्थान पर उन्हें तोप के मुख से बाँधकर मृत्युदण्ड दिया गया। उस समय इस प्रकार का दण्ड विद्रोहियों और स्थानीय जनता में भय पैदा करने के लिए भी प्रयोग किया जाता था। 18 सितम्बर 1857 को जबलपुर में राजा शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह को तोप के मुख से बाँधा गया और तोप चलाकर दोनों को मृत्युदण्ड दिया गया।

इस घटना ने स्थानीय समाज पर गहरा प्रभाव डाला। अंग्रेजों का उद्देश्य उनके प्रभाव को समाप्त करना और सम्भावित संग्राम को रोकना था, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद महाकौशल क्षेत्र में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध असन्तोष और बढ़ा। शंकर शाह और रघुनाथ शाह के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनकी कविताएं भी थीं। उस समय लिखित और मौखिक रचनाएं लोगों तक विचार पहुंचाने का प्रभावी माध्यम थीं। दोनों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से अंग्रेजी शासन के विरुद्ध असन्तोष व्यक्त किया।

अंग्रेज अधिकारियों ने इन कविताओं को सामान्य साहित्य के रूप में नहीं देखा। उन्हें आशंका थी कि ऐसी रचनाएं सैनिकों और जनता को विद्रोह के लिए प्रेरित कर सकती हैं। यही कारण था कि उनकी साहित्यिक गतिविधियां भी उनके विरुद्ध लगाए गए आरोपों का हिस्सा बनीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि 1857 का संघर्ष केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं था। गीत, कविता, जनसम्पर्क और स्थानीय संगठन भी विरोध के महत्वपूर्ण माध्यम बने।

राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह की मृत्यु ने महाकौशल क्षेत्र में अंग्रेजी शासन के विरोध को और तीव्र किया। स्थानीय जनस्मृति में दोनों का नाम अंग्रेजी शासन के विरुद्ध खड़े होने वाले शासकों के रूप में बना रहा। उनकी स्मृति में हर वर्ष 18 सितम्बर को बलिदान दिवस मनाया जाता है। जबलपुर और महाकौशल क्षेत्र में इस दिन दोनों के योगदान को याद किया जाता है। उनकी कहानी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में मध्य भारत की भूमिका को समझने में महत्वपूर्ण है। इससे पता चलता है कि अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष कुछ बड़े राजनीतिक केन्द्रों तक सीमित नहीं था। अलग अलग क्षेत्रों के स्थानीय शासक, सैनिक और समाज भी अपनी परिस्थितियों के अनुसार इस संघर्ष में शामिल हुए थे। राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह ने अंग्रेजी सत्ता के दबाव के सामने अपने विरोध से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। 18 सितम्बर 1857 का उनका बलिदान आज भी भारतीय स्वाभिमान और स्वतंत्रता की स्मृति से जुड़ा हुई है।

लेख-
उर्वशी जैस्वाल
रायपुर

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