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राजा चक्रधर सिंह पोर्ते: कला, संगीत और जनकल्याण के अप्रतिम नायक

राजा चक्रधर सिंह पोर्ते: कला, संगीत और जनकल्याण के अप्रतिम नायक

छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक गौरव, अद्भुत संगीत मनीषी और रायगढ़ रियासत के यशस्वी शासक महाराजा चक्रधर सिंह का जन्म गोंड राजवंश (गोंड जनजाति समुदाय) के पोर्ते गोत्र में 19 अगस्त 1905 को हुआ था। वे गोंड राजा भूपदेव सिंह पोर्ते के आत्मज थे। महाराजा चक्रधर सिंह पोर्ते मात्र एक राजा या शासक नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे युगद्रष्टा थे जिन्होंने कला, संस्कृति, दर्शन और राष्ट्रभक्ति को एक नया क्षितिज दिया। बचपन से ही उनमें असाधारण प्रतिभा के लक्षण दिखाई देने लगे थे। कला के प्रति अगाध प्रेम और प्रजा के प्रति निस्वार्थ समर्पण ने उन्हें इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया। उनकी पावन जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन करते हुए, हम उनके स्वर्णिम काल के बहुआयामी जीवन और अभूतपूर्व योगदान को याद करते हैं।

सांस्कृतिक और संगीतज्ञ के रूप में अद्वितीय योगदान:-महाराजा चक्रधर सिंह कथक नृत्य और शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में एक अमर हस्ताक्षर हैं। उन्होंने कथक नृत्य की एक नई और विशिष्ट शैली 'रायगढ़ घराना' की स्थापना की। उन्होंने संगीत, ताल और नृत्य पर 'नर्तन सर्वस्व', 'ताल तोयनिधि', 'मुरज परन पुष्कर' और 'रागरत्न मंजूषा' जैसे कालजयी महाग्रंथों की रचना की। उनके द्वारा लिखित 'ताल तोयनिधि' ग्रंथ को संगीत जगत में एक अनमोल धरोहर माना जाता है। महाराजा स्वयं एक बेहतरीन तबला और पखावज वादक थे।

उनके दरबार में देश-विदेश के दिग्गज कलाकारों, संगीतकारों और नर्तकों को न केवल आश्रय मिला, बल्कि उन्हें भरपूर सम्मान भी दिया गया। उनके इसी योगदान के कारण रायगढ़ को देश की 'सांस्कृतिक राजधानी' के रूप में पहचान मिली। उनके सम्मान में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला 'चक्रधर समारोह' आज भी उनकी जीवंत सांस्कृतिक विरासत का सबसे बड़ा प्रमाण है।


महाराजा चक्रधर सिंह

धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना:-महाराजा चक्रधर सिंह पोर्ते का जीवन गहरी धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना से ओतप्रोत था। वे भगवान गणेश के परम भक्त थे। उन्होंने रायगढ़ में भव्य गणेश उत्सव की ऐतिहासिक शुरुआत की, जिसने आगे चलकर एक विशाल जन-उत्सव का रूप ले लिया। उनकी आध्यात्मिकता संकीर्ण नहीं थी,उसमें सर्वधर्म समभाव और लोक-कल्याण की भावना समाहित थी। उनका मानना था कि संगीत और कला ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल और पवित्र माध्यम हैं। वे अपनी कला को ईश्वर की साधना मानते थे और इसी आध्यात्मिक दृष्टिकोण के कारण उनके स्वभाव में अद्भुत विनम्रता थी।

दार्शनिक और शास्त्र-शस्त्र के धनी:-वे एक उच्च कोटि के दार्शनिक विचारक थे, जो जीवन को केवल भोग नहीं बल्कि कर्म और साधना का मार्ग मानते थे। शास्त्रों के अगाध ज्ञान के साथ-साथ वे शस्त्र विद्या में भी अत्यंत निपुण थे। वे युद्ध कौशल, तीरंदाजी और घुड़सवारी में माहिर थे। एक शासक के रूप में उन्होंने अपनी प्रजा की रक्षा और न्याय व्यवस्था को हमेशा सर्वोपरि रखा। वे ज्ञान और पराक्रम के अद्भुत संगम थे। उनका मानना था कि एक शासक को शास्त्रों से वैचारिक समझ और शस्त्रों से सुरक्षा की शक्ति मिलनी चाहिए, तभी एक आदर्श राज्य की स्थापना हो सकती है

वादन करते महाराजा चक्रधर सिंह
वादन करते महाराजा चक्रधर सिंह

सामाजिक और आर्थिक सुधार एक संवेदनशील और दूरदर्शी राजा के रूप में महाराजा चक्रधर सिंह ने समाज के वंचित, पिछड़े और शोषित वर्गों के उत्थान के लिए अनेक क्रांतिकारी कार्य किए। उन्होंने जातिगत भेदभाव को मिटाकर समाज में समरसता स्थापित करने का सफल प्रयास किया। शिक्षा के प्रसार के लिए उन्होंने कई विद्यालयों की स्थापना की, जहाँ गरीब बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था थी। आर्थिक मोर्चे पर उन्होंने कृषि को बढ़ावा देने के लिए सिंचाई की आधुनिक सुविधाओं का विस्तार किया और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित किया। उनकी आर्थिक नीतियों का मुख्य उद्देश्य रियासत को आत्मनिर्भर बनाना और प्रजा के जीवन स्तर को ऊपर उठाना था।

राजनीतिक दूरदर्शिता और मातृभूमि के प्रति समर्पण:-महाराजा चक्रधर सिंह ने देश के स्वतंत्रता आंदोलन और आजादी के बाद रियासतों के विलीनीकरण के अत्यंत संवेदनशील दौर में अपनी विलक्षण राजनीतिक दूरदर्शिता का परिचय दिया। वे अपनी मातृभूमि से अगाध प्रेम करते थे। जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब उन्होंने किसी भी संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठकर देश की अखंडता और एकता को सर्वोपरि माना। उन्होंने भारतीय संघ में अपनी रायगढ़ रियासत के सहज और शांतिपूर्ण संविलियन का मार्ग प्रशस्त किया। उनका यह कदम उनकी गहरी राष्ट्रभक्ति और मातृभूमि के प्रति उनके निस्वार्थ समर्पण को दर्शाता है।


रियासतकालीन रायगढ़ का मोती महल

प्रेरणादायी कार्य और जीवंत विरासत:-उनका सबसे बड़ा प्रेरणादायी कार्य कला और कलाकारों को समाज में सर्वोच्च स्थान दिलाना था। उन्होंने कला को महलों के बंद कमरों से निकालकर जन-जन तक पहुँचाया और उसे आम जनता से जोड़ा। उन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी देश की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने और उन्हें समृद्ध करने का जो भगीरथ प्रयास किया, वह आज की युवा पीढ़ी के लिए एक महान सीख है। उन्होंने दुनिया को सिखाया कि सत्ता और संपत्ति का सही उपयोग कला, ज्ञान और जनसेवा के लिए होना चाहिए।
"कला ही जीवन की सर्वोच्च साधना है, और प्रजा की सेवा ही एक राजा का परम धर्म है।"
"संगीत और संस्कृति आत्मा की वह वैश्विक भाषा है जो संपूर्ण मानवता को एक सूत्र में बांधती है।"
"शस्त्र से राज्य की रक्षा होती है और शास्त्र से संस्कृति की, एक कुशल राष्ट्र के लिए दोनों अनिवार्य हैं।"

महाराजा चक्रधर सिंह की जयंती के पावन अवसर पर हमारा यह संदेश होना चाहिए कि हम अपनी गौरवशाली जड़ों, अपनी समृद्ध संस्कृति और अपनी पारंपरिक कलाओं का सम्मान करें। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपनी वास्तविक पहचान को न भूलें। हमें अपनी कला और ज्ञान का उपयोग समाज को जोड़ने, सामाजिक कुरीतियों को मिटाने और देश के सर्वांगीण कल्याण के लिए करना चाहिए।

महाराजा चक्रधर सिंह भारतीय इतिहास के उन विरले और गिने-चुने शासकों में से हैं, जिन्हें उनकी किसी सैन्य विजय या राजनीतिक शक्ति के लिए नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक चेतना, कलात्मक दूरदर्शिता और लोक-कल्याणकारी कार्यों के लिए युगों-युगों तक याद किया जाता है। वे एक सच्चे राष्ट्रभक्त, महान संगीत सम्राट, अद्वितीय दार्शनिक और अनुपम युगपुरुष थे। उनकी जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन करते हुए हम उनके दिखाए मार्ग, उनके आदर्शों और उनकी महान सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखने का दृढ़ संकल्प लेते हैं।

 -विकेश कुमार हिचामी
 छत्तीसगढ़

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