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पुरुषोत्तम मास: भारतीय विज्ञान और अध्यात्म की समृद्ध परम्परा का संगम

पुरुषोत्तम मास: भारतीय विज्ञान और अध्यात्म की समृद्ध परम्परा का संगम

 


भारतीय संस्कृति में समय की गणना का आधार अत्यन्त वैज्ञानिक और तर्कसंगत रहा है। पञ्चाङ्ग निर्माण में जिस सूक्ष्मता का परिचय हमारे मनीषियों ने दिया है, वह आधुनिक विज्ञान को भी चकित करता है। 'पुरुषोत्तम मास' इसी वैज्ञानिक सन्तुलन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रायः लोग इसे केवल 'मलमास' मानकर शुभ कार्यों से दूर रहते हैं, किन्तु इसका वास्तविक महत्त्व आध्यात्मिक ऊर्जा के संचय और शारीरिक आरोग्य में निहित है। प्रस्तुत लेख में रमेश शर्मा जी ने पुरुषोत्तम मास के वैज्ञानिक आधार, इसके पौराणिक सन्दर्भों और जीवन के पाँच कोशों पर इसके प्रभाव का गहन विश्लेषण किया है। यह लेख हमें बताता है कि कैसे हमारी परम्पराएँ विज्ञान और अध्यात्म के अद्भुत समन्वय से निर्मित हुई हैं।


भारतीय कालगणना और पञ्चाङ्ग का विधान केवल ज्योतिषीय गणना भर नहीं है, अपितु यह खगोल विज्ञान, अध्यात्म और सामाजिक मनोविज्ञान के गहन निष्कर्षों पर आधारित एक सुव्यवस्थित तन्त्र है। इस वर्ष 17 मई से ज्येष्ठ शुक्लपक्ष एकम के साथ अधिकमास का आरम्भ हो चुका है, जो 15 जून की सोमवती अमावस्या तक प्रभावी रहेगा।

लोक जीवन में इसे 'पुरुषोत्तम मास' के नाम से जाना जाता है। यदि हम विज्ञान की दृष्टि से देखें तो इस मास का निर्धारण सूर्य और चन्द्रमा की गति के बीच समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया है। वहीं, अध्यात्म के धरातल पर यह कालखण्ड आत्मशक्ति को जाग्रत करने का एक विशेष अवसर प्रदान करता है। इसमें निहित व्रत, पूजा और उपासना के नियम समाज में सकारात्मक चिन्तन को प्रभावी बनाने के अद्भुत सूत्र सिद्ध होते हैं।

कालगणना से परे है भारतीय राष्ट्रीय पंचांग
कालगणना से परे है भारतीय राष्ट्रीय पंचांग 

वास्तव में जीवन की समृद्धि के लिये विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते हैं। इन दोनों के संयुक्त निष्कर्षों से ही मनुष्य का जीवन सकारात्मक और उन्नत बनता है। भारतीय परम्परा के विकास क्रम में धार्मिक उत्सवों का आयोजन हो अथवा तीज त्योहारों का निर्धारण, ये केवल उत्सव मनाने के प्रावधान नहीं हैं।

इनके मूल में विज्ञान के निष्कर्षों और अध्यात्म के बीच एक ऐसा समन्वय है, जिससे समाज जीवन प्रगतिशील बने और परस्पर व्यावहारिक तालमेल भी सशक्त हो। यही सिद्धान्त अधिकमास के निर्धारण में भी कार्य करता है। अधिकमास का आधार केवल धार्मिक आस्था नहीं है, बल्कि यह सूर्य और चन्द्रमा की गति में सन्तुलन बिठाने का एक खगोलीय उपाय है।

खगोलीय गणना के अनुसार चन्द्रमा की तुलना में सूर्य की गति तीव्र होती है। गति के इसी अन्तर के कारण वर्ष के अन्त में समय का एक बड़ा व्यवधान उत्पन्न हो जाता है। अधिकमास के माध्यम से इसी समयगत अन्तर को समायोजित किया जाता है।

अधिकमास (पुरुषोत्तम) का है विशेष महत्त्व
अधिकमास (पुरुषोत्तम) का है विशेष महत्त्व

यह तथ्य अत्यन्त विस्मयकारी है कि आज से हजारों वर्ष पहले भारतीय मनीषियों के पास इस सूक्ष्म अन्तर की सटीक जानकारी उपलब्ध थी। इसी ज्ञान के आधार पर भारतीय पञ्चाङ्ग का निर्माण हुआ। हमारे पञ्चाङ्ग में वर्ष की अवधि का निर्धारण सूर्य की गति से होता है, जबकि प्रतिदिन की तिथियों का निर्धारण चन्द्रमा की गति से किया जाता है।

यदि हम इन दोनों गतियों की सांख्यिकीय गणना करें, तो चन्द्रमा की गति के अनुसार एक वर्ष की अवधि 354 दिन 8 घण्टे और 34.28 सेकण्ड की होती है। इसके विपरीत, सूर्य की गति के अनुसार वर्ष की अवधि 365 दिन 6 घण्टे 9.54 सेकण्ड होती है।

इस प्रकार चन्द्रमा और सूर्य की गतियों में प्रतिवर्ष लगभग 10 दिन 21 घण्टे और 35.16 सेकण्ड का अन्तर आ जाता है। इस समयगत अन्तर को सन्तुलित करने के लिये यह निश्चित किया गया कि जब यह अन्तर बढ़ते हुए 29 दिन 12 घण्टे 44 मिनट और 2.865 सेकण्ड से अधिक हो जाए, तब एक 'अधिकमास' का प्रावधान किया जाए। सामान्यतः 19 वर्षों की अवधि में 7 अतिरिक्त मास जोडने की व्यवस्था की गई है।

सूर्य प्रत्येक राशि पर लगभग एक माह तक विराजमान रहते हैं और सूर्य के राशि परिवर्तन की तिथि से ही अधिकमास का आरम्भ सुनिश्चित होता है। इस वर्ष 15 मई को सूर्य ने मेष राशि से वृष राशि में प्रवेश किया, किन्तु अमावस्या 16 मई शनिवार को होने के कारण ज्येष्ठ शुक्लपक्ष एकम 17 मई से अधिकमास का प्रारम्भ हुआ।

अधिकमास के 'पुरुषोत्तम मास' बनने की कथा भी अत्यन्त रोचक और मनोवैज्ञानिक है। जब प्राचीन काल में पृथ्वी के मौसम परिवर्तन का अध्ययन करते समय सूर्य और चन्द्रमा की गति का अन्तर स्पष्ट हुआ, तब समय के सामञ्जस्य के लिये इस अतिरिक्त मास का निर्धारण हुआ।

चूँकि राशियाँ केवल 12 होती हैं और सूर्य की यात्रा इन्हीं राशियों के अनुसार चलती है, इस अतिरिक्त मास के लिये कोई विशिष्ट राशि उपलब्ध नहीं थी। इस कारण इसे 'मलमास' कहा जाने लगा और समाज में यह धारणा बन गई कि यह अवधि अशुभ है।

अति प्राचीन है भारतीय खालोगीय गणना
अति प्राचीन है भारतीय खालोगीय गणना 

श्रीमद्भागवत के अनुसार, अपनी उपेक्षा से दुखी होकर यह मास भगवान विष्णु के पास पहुँचा। तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम देकर 'पुरुषोत्तम मास' के रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने उद्घोष किया कि इस मास में किये गये सभी आध्यात्मिक कार्यों और साधनाओं का फल अन्य मासों की तुलना में अधिक प्राप्त होगा। श्रीमद्भगवद्गीता में भी पुरुषोत्तम मास का उल्लेख प्राप्त होता है।

इसके स्वामी साक्षात् श्रीमन्नारायण माने गये हैं, इसलिये इस माह में किये जाने वाले पूजन और भजन से नारायण की प्रसन्नता प्राप्त होती है। यदि हम इसे मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें, तो सकारात्मक कार्यों में संलग्न रहने से मन की अशान्ति दूर होती है और शुभ संकल्पों की गति तीव्र होती है, जिससे परिणाम भी मंगलकारी होते हैं।

आरोग्य और आध्यात्मिक जागरण की दृष्टि से भी इस मास का विशेष महत्त्व है। व्यक्ति के अस्तित्व के पाँच प्रमुख आयाम होते हैं, जिन्हें पञ्चकोश कहा जाता है। इनमें प्रथम 'अन्नमय कोश' अर्थात शरीर है, द्वितीय 'प्राणमय कोश' अर्थात हमारी प्राण शक्ति है, तृतीय 'मनोमय कोश' अर्थात मन है, चतुर्थ 'ज्ञानमय कोश' अर्थात बुद्धि है और पञ्चम 'आत्ममय कोश' अर्थात हमारी आत्मा है।

पंचकोशीय शरीर में ऊर्जा संतुलन का मास
पंचकोशीय शरीर में ऊर्जा संतुलन का मास

हमारे पूर्ण आरोग्य के लिये इन पाँचों कोशों में ऊर्जा का उचित सन्तुलन होना अनिवार्य है। यदि किसी एक कोश में ऊर्जा की अधिकता या कमी होती है, तो यह रोगों का कारण बनता है। पुरुषोत्तम मास की पूजन विधि और आहार का निर्धारण इन्हीं पाँचों आयामों में ऊर्जा का सन्तुलन स्थापित करने के लिये किया गया है।

आहार विज्ञान की दृष्टि से इस मास में कुछ विशेष वस्तुओं के सेवन का विधान है। पुरुषोत्तम मास में गेहूँ, चावल, सफेद धान, मूंग, जौ, तिल, मटर, बथुआ, ककड़ी, केला, घी, कटहल, आम, पीपल, जीरा, सोंठ, इमली, सुपारी, आँवला और सेंधा नमक जैसे सात्विक पदार्थों का सेवन करने का परामर्श दिया गया है। साथ ही, पूरे माह में एक समय भोजन करने का नियम बताया गया है।

इसके विपरीत शहद, चौलाई, उड़द की दाल, राई, प्याज, लहसुन, गोभी, गाजर, मूली और तिल के तेल का सेवन वर्जित माना गया है। भोजन के इस निषेध और विधान को अध्यात्म से जोड़ने के पीछे का उद्देश्य मनुष्य में सकारात्मक भाव उत्पन्न करना है। एक आदर्श नागरिक और स्वस्थ समाज के निर्माण के लिये सकारात्मक चिन्तन ही आधारशिला होती है।

इस प्रकार, अधिकमास का निर्धारण भारतीय मनीषा द्वारा दी गई एक अनुपम त्रिवेणी है। इसमें जहाँ एक ओर खगोल विज्ञान का सूक्ष्म अन्वेषण और अनुसन्धान है, वहीं दूसरी ओर आरोग्य और आध्यात्मिक जागरण का मार्ग भी प्रशस्त है।

साथ ही, सामूहिक अनुष्ठानों के माध्यम से यह सामाजिक सहभागिता और परिवार में समन्वय बनाने का भी एक सशक्त माध्यम है। यह मास हमें अपनी जड़ों से जुड़ने और जीवन को अनुशासित एवं सन्तुलित बनाने का सन्देश देता है।

---रमेश शर्मा

 

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