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जगतजननी की पावन प्राकट्य स्थली पुरैना: श्रद्धा और भक्ति का वैभव

जगतजननी की पावन प्राकट्य स्थली पुरैना: श्रद्धा और भक्ति का वैभव


भारतीय वाङ्गमय में रामायण मात्र एक महाकाव्य नहीं, अपितु लोक-आस्था और सांस्कृतिक चेतना का आधार स्तम्भ है। इस महागाथा की केन्द्र बिन्दु जगतजननी माता सीता हैं, जिनका प्राकट्य और जीवन आदर्शों की पराकाष्ठा है। बिहार के सीतामढ़ी जिले में स्थित पुरैना वह पावन स्थल है, जो सदियों से श्रद्धालुओं के लिए अटूट आस्था का केन्द्र बना हुआ है। प्रस्तुत लेख में लेखक ने पौराणिक साक्ष्यों, विशेषकर विष्णु पुराण और वाल्मीकि रामायण के आलोक में सीताजी की जन्मस्थली पुरैना की महिमा का विस्तार से वर्णन किया है। यह लेख हमें मिथिला की उस प्राचीन समृद्ध परम्परा से जोड़ता है, जहाँ भक्ति और ज्ञान का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। पुरैना और जनकपुर के ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व को रेखांकित करता यह आलेख पाठकों को रामायण काल की स्मृतियों में ले जाने का एक विनम्र प्रयास है।


मिथिला की पावन धरा का कण कण श्रीराम की सीता की स्मृतियों से रचा बसा है। बिहार का पुपुड़ी सीतामढ़ी क्षेत्र वह पवित्र भूमि है, जहाँ माता जानकी का प्राकट्य हुआ था। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो प्राचीन काल में जनकपुर, जिसे पुपुड़ी भी पुकारा जाता था, अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए विख्यात था।

इस क्षेत्र की महिमा का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ प्राचीन समय में 72 तड़ाग अर्थात तालाब और 52 कुटियां विद्यमान थीं। इन कुटियों में निरन्तर साधु सन्तों का निवास रहता था और समीप ही भव्य देव मन्दिरों की श्रृंखला बनी हुई थी।

आज भी इस पावन क्षेत्र के मुख्य मन्दिरों में श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की मनमोहक मूर्तियां स्थापित हैं। जनकपुर के समीप ही दक्षिण पूर्व दिशा में एक सरोवर के तट पर महर्षि विश्वामित्र का प्राचीन मन्दिर स्थित है। यहाँ से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर धनुषा बस्ती है, जहाँ एक सरोवर के पास विशाल पत्थर का धनुष आज भी दर्शनीय है।

इस स्थान पर पहुँचकर श्रद्धालु तुलसी के राम, उनकी अर्धांगिनी सीता और विदेह वंश के प्रतापी राजा सीरध्वज की नगरी जनकपुर को देखकर श्रद्धा से नतमस्तक हो जाते हैं। प्रशासनिक दृष्टि से यह स्थान मुजफ्फरपुर जिले के अन्तर्गत आता है। रक्सौल दरभंगा रेलवे लाइन पर स्थित सीतामढ़ी रेलवे स्टेशन से मुख्य मन्दिर की दूरी मात्र 2 किलोमीटर है।

सीतामढ़ी से लगभग 1.5 किलोमीटर पश्चिम दिशा में पुरैना स्थित है, जिसे पुनउड़ा बस्ती भी कहा जाता है। यहाँ एक पक्का सरोवर है, जिसके विषय में जनश्रुति है कि इसी स्थल पर अयोनिजा सीताजी का प्राकट्य हुआ था। पौराणिक साक्ष्यों की ओर दृष्टि डालें तो विष्णुपुराण के चौथे अंश के पाँचवें अध्याय में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जनकपुर के राजा हृस्वरोमा के दो पुत्र थे, जिनका नाम सीरध्वज और कुशध्वज था।

इनमें से सीरध्वज मिथिला के राजा बने। एक समय की बात है, जब वे पुत्र की कामना से सोने के हल से यज्ञभूमि की जुताई कर रहे थे। उसी समय हल के अग्रभाग से दिव्य कन्या सीता प्रकट हुई थीं। जगतजननी जानकी की जन्मभूमि होने के कारण इस स्थान का महत्त्व अतुलनीय है। पुरैना के इसी माहात्म्य को रेखांकित करते हुए रामचरितमानस में वन्दना की गई है :

सीताराम गुणग्राम पुण्यारण्य विहारिणी।
 बंदौ विशुद्ध विज्ञानौ कवीश्वर कपीश्वरौ॥

मिथिला और पुरैना का परस्पर सम्बन्ध अत्यन्त गहरा और अटूट रहा है। पुरैना जहाँ सीताजी की जन्मभूमि है, वहीं मिथिला अर्थात जनकपुर उनका निवास स्थल रहा है। मिथिला ही जनकपुर का प्राचीन नाम है, जिसे विभिन्न कालों में तीरमुक्ति, विदेह और विदेहनगर जैसे नामों से भी सम्बोधित किया गया।

समय के साथ इसका नाम अपभ्रंश होकर तिरहुत हो गया। श्रीमद्भागवत में पिंगला नामक वैश्या ने इस भूमि की महिमा का वर्णन करते हुए इसके आध्यात्मिक प्रभाव को स्वीकार किया है। शास्त्रों के अनुसार यहाँ के निवासी भगवती जानकी के पुण्य प्रताप के कारण ब्रह्मज्ञानी हो गए हैं। सम्पूर्ण क्षेत्र में सीता संस्कृति की व्यापकता का अनुभव होता है।

माता सीता की उत्पत्ति के विषय में विभिन्न पौराणिक ग्रन्थों में विस्तृत कथाएं प्राप्त होती हैं। यद्यपि विवरणों में भिन्नता हो सकती है, परन्तु इस तथ्य पर सभी पौराणिक मत एकमत हैं कि राजा जनक, जो विष्णु पुराण के अनुसार विदेह वंश के 15वें राजा सीरध्वज थे, उनकी ध्वजा में हल का चिन्ह अंकित था।

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के उत्तरकाण्ड के 17वें सर्ग में सीताजी की उत्पत्ति की एक विशेष कथा का वर्णन है। कथा के अनुसार लंकापति रावण ने एक बार हिमालय के वनों में बृहस्पति के पुत्र कुशध्वज की पुत्री वेदवती को तपस्यारत देखा। रावण काम के वश में होकर विमान से उतरा और उसने तपस्विनी वेदवती के केश स्पर्श किए।

इस अपमान से क्रोधित होकर वेदवती ने अपने केश त्याग दिए और रावण को श्राप देते हुए अग्नि में प्रवेश कर गईं। उन्होंने संकल्प लिया कि वे रावण के वध के लिए पुनः जन्म लेंगी। वही वेदवती कालान्तर में जनकराज के घर में अयोनिजा सीता के रूप में अवतरित हुईं।

एक अन्य पौराणिक सन्दर्भ के अनुसार श्रीराम के जन्म से पूर्व राजा जनक और रावण के मध्य भगवान शिव के सान्निध्य में शास्त्रार्थ हुआ था, जिसमें रावण पराजित हुआ। अपनी पराजय का प्रतिशोध लेने के लिए रावण ने ऋषि मुनियों पर अत्याचार आरम्भ कर दिए।

उसने ऋषियों के रक्त से एक घड़ा भरवाया और उसे जनकपुर के खेतों में दबवा दिया। रावण के इस कुकृत्य के कारण जनकपुर में भीषण अकाल पड़ गया और वर्षा पूरी तरह से थम गई। अकाल का यह दौर लगभग 12 वर्षों तक चला, जिससे जनता भूख और प्यास से त्राहि त्राहि करने लगी।

तब ऋषि मुनियों ने राजा जनक को सुझाव दिया कि यदि राजा स्वयं खेतों में हल चलाएंगे, तो वर्षा अवश्य होगी। जनता के संकट निवारण हेतु राजा जनक ने स्वर्ण का हल तैयार करवाया। राजा जनक और उनकी पटरानी सुनयना ने विधि विधान से हल चलाना प्रारम्भ किया।

हल चलाते हुए जब वे पुरैना में बेरिया महादेव के समीप पहुँचे, तब हल का फाल उस कलश से टकराया जिसे रावण ने गड़वाया था। उस कलश से देवी सीता अपने सिंहासन पर आरूढ़ होकर अपनी 8 सखियों के साथ प्रकट हुईं। राजा जनक के विनम्र आग्रह पर भगवती सीता ने एक नन्हीं और तेजमयी बालिका का रूप धारण कर लिया।

राजा जनक ने उस दिव्य बालिका को रानी सुनयना की गोद में सौंप दिया और वे उन्हें लेकर अपनी नगरी लौट आए। जैसे ही इस नन्हीं बालिका ने नगर में प्रवेश किया, प्रजा के कष्टों का अन्त हो गया और घनघोर वर्षा आरम्भ हो गई। हल की नोंक अर्थात सीता से उत्पन्न होने के कारण उनका नाम सीता रखा गया और जनक की पुत्री होने के कारण वे जानकी कहलाईं।

आज भी सीतामढ़ी में जानकी जी का एक प्राचीन मन्दिर विद्यमान है, जिसमें माता सीता की प्रस्तर प्रतिमा स्थापित है। प्रतिवर्ष चैत्र मास की रामनवमी के अवसर पर यहाँ एक विशाल मेले का आयोजन होता है, जो उत्तर बिहार के धार्मिक वैभव का परिचायक है।

सीतामढ़ी के समीप पुरैना में लाल रंग का एक अत्यन्त सुन्दर मन्दिर है, जो प्राकृतिक सौन्दर्य से आच्छादित है। लोक मान्यताओं के अनुसार इसी पावन भूमि पर श्रीराम ने अहिल्या का उद्धार किया था। महाभारत काल में भी इस पुण्य भूमि का विशेष वर्णन मिलता है।

यद्यपि समय के चक्र के साथ जनकपुर का वह प्राचीन वैभव कहीं विस्मृत सा हो गया है, किन्तु आज भी वहाँ के जीर्ण शीर्ण मन्दिर और पुरावशेष मिथिला के उस गौरवशाली इतिहास को स्वयं में समेटे हुए हैं। पुरैना की यह पावन माटी आज भी भक्तों को उस युग का स्मरण कराती है जब साक्षात् शक्ति ने लोक कल्याण हेतु इस धरा पर अवतार लिया था।

-रविन्द्र गिन्नोरे

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