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कठपुतलियों की ऐतिहासिकता

कठपुतलियों की ऐतिहासिकता

शाब्दिक तौर पर कठपुतली का तात्पर्य काठ (लकड़ियों) से बनी पुतलियों से ही है। परंतु भारत के ही विभिन्न प्रदेशों एवं विश्व के अलग-अलग देशों में अलग-अलग नामों से जानी जाती है। पर यह बात सच है कि सभी स्थानों में पुतलियों का प्रचलन दिखाई पड़ता है।


भारत में प्रचलित कठपुलियों के विभिन्न प्रारूप

भारत में पुतली के जन्म के संबंध में अनेक मत है। महाभारत, रामायण, पंचतंत्र कथा सरित्सागर आदि ग्रंथों में किसी न किसी रूप में इनका उल्लेख मिलता है। कथानुसार पार्वती जी के कहने पर शिवजी ने चलती-फिरती पुतली उन्हें दी, ताकि वे निर्बाध रूप से साधना में लीन हो सकें। ऐसे समय में पार्वती जी उसी पुतली के साथ मनोरंजन किया करती थी। इसी तरह से 'वीरकरीला' नामक भारतीय ग्रंथ में एक विशेष पुतली का उल्लेख है जो केवल पार्वती जी के पास ही थी।

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महादेव और माँ पार्वती

यह इतनी सुंदर व आकर्षक थी कि पार्वती को सदैव इस बात की चिंता बनी रहती थी कि कहीं शिवाजी इस पुतली में प्राण ही न फूंक दें और इसी से विवाह न रचा लें? 'कथा सरित्सागर' में एक ऐसे दस्तकार का उल्लेख है जो अपनी लाड़ली बिटिया का जी बहलाता था। 'पंचतंत्र' में उन पुतलियों का उल्लेख है जो लकड़ी की खूटियों के सहारे नाना प्रकार के करतब दिखाती थीं। राजा विक्रमादित्य के सिंहासन में स्थित बत्तीस पुतलियाँ रात्रि में निकलकर राजा का मनोरंजन करती थी और राजा को निरंतर न्याय का पथ दिखलाती थी।

दिन में राजा इसी सिहासन पर बैठकर निर्णय सुनाया करते थे। इसीलिए 'सिंहासन बत्तीसी' का संदर्भ राजा विक्रमादित्य के साथ जुड़ गया। साथ ही यह पुतलियाँ राजा के कहने पर सभी दिशाओं में घूम-फिरकर सच्ची घटना की सही खबर भी लाती थी। इसी आधार पर राजा न्याय करते थे। इन पुतलियों की सहायता से ही राजा की लोकप्रियता एवं न्यायप्रियता दोनों ही बढ़ी।


सिंहासन बत्तीसी और कठपुतलियां 

जब राजा भोज इसी सिहासन पर बैठना चाहते थे। तब क्रमशः बत्तीस पुतलियों ने राजा भोज को एक-एक कर न्यायिक कहानियाँ सुनाई और अंत में सिहासन को स्वर्ग की ओर ले गयीं। इस प्रकार विक्रमादित्य का यह खेल पुतलियों के प्रचार-प्रसार का एक माध्यम बना। एक अन्य कथानुसार सेवकराम नामक बढ़ई सुंदर एवं आकर्षक खिलौने बनाता था। इन खिलौनों को देखकर बच्चे प्रायः इनसे बतियाते रहते थे।

जब सेवकराम इस तरह बच्चों को खिलौनों के साथ देखते, तब उन्हें यह बात खल जाती थी कि काश! ये खिलौने भी बोल पाते। एक दिन शिव-पार्वती भ्रमण करते उधर पहुँचे, खिलौने को देखते ही पार्वती जी ने शिवजी से इनमें प्राण फूंकने का अनुरोध किया, पार्वती की जिद के कारण शिवजी ने अपनी दिव्य शक्ति से उनमें प्राण फेंक दिये। फिर सभी खिलौने चहचहाने लगे। इसी तरह से बोलती पुतलियों की कल्पना कर कठपुतलियों का खेल आरंभ हो गया। इसी कारण से आज भी कठपुतली खेल शुरू करने के पूर्व शिव-स्तुति की जाती है-

बैल चढें शिव जी मिले, पूरण हो सब काम।
खेल कठपुतली का करां, लैके हरि का नाम ॥

इस प्रकार पुतली उद्भव संबंधी कथन की पुष्टि होती है। साथ ही मोहन जोदड़ो एवं हड़प्पा की खुदाई से प्राप्त खिलौनों का यदि सूक्ष्म अध्ययन किया जाये, तो यह बात सिद्ध हो जाती है कि उस समय की सभ्यता व संस्कृति में भी पुतलियों का प्रचलन रहा होगा? क्योंकि खुदाई से प्राप्त खिलौनों के विभिन्न अंगों में छिद्र पाये गये हैं। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इन छिद्रों में डोरे या धागा डालकर संचालित किया जाता रहा होगा।


हड़प्पा की खुदाई से प्राप्त खिलौने 

लोकजीवन से जुड़ी कठपुतली कला का जन्मकाल और स्थान के विषय में मतैक्य नहीं है। अनादिकाल से ही पुतलियों या गुड़ियों द्वारा मानव की भूमिका निभाई जा रही है। साथ ही रोचक एवं बाल सुलभ इस विद्या से सभी वर्गों का मनोरंजन होता है। आज भी देश के विभिन्न ग्रामीण अंचलों में पृथक-पृथक नामों से पुतलियों का प्रचलन दिखाई पड़ता है। कुछ क्षेत्रों में केवल एक डंडे या बाँस के सिरे पर मात्र एक हंडिया लटका कर ही किसी का प्रतीक मान लिया जाता था और उसी के अनुरूप उस चरित्र की गाथा सुनायी जाती थी।

धीरे-धीरे इसी प्रकार की परम्पराओं से नाटकीय तत्वों का प्रकटीकरण कठपुतलियों द्वारा होने लगा। आदिकाल से ही विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं एवं जादू-टोनों से बचने के लिए किसी न किसी प्रकार से सांस्कृतिक प्रतीकों का प्रयोग होता रहा है। कुछ पुतलियों एवं प्रतीकों को पारिवारिक एवं सामाजिक देवी-देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया जा चुका है।

भारतीय कठपुतलियों की जन्म स्थली राजस्थान को ही माना जाता है। वहाँ के पारम्परिक पुतलीकारों ने अपनी चंचल अँगुलियों के चमत्कारिक संचालन से जहाँ जन-जन का मन बहलाया, बच्चों से तालियाँ बजवाई व बूढ़ों की आँखों में आँसू तक भर दिये, वहीं जीवनदर्शन भी दिया। समाज को विभिन्न प्रकार से शिक्षित किया। इन पुतलियों द्वारा राजस्थान के साथ ही साथ विभिन्न प्रदेशों के लोक संगीत, नृत्य, वेशभूषा का भी प्रतिनिधित्व होता रहा है।


राजस्थान की पारंपरिक कठपुतलियां 

इनके द्वारा भारतीय नाट्य कला, धार्मिक, सामाजिक एवं ऐतिहासिक गाथाओं को गाँव-गाँव तक ले जाने का प्रयास संभव हो पाया है। इस प्रकार से पुतली कला से संबंधित कलाकारों ने लोक शैली एवं कलाओं का सशक्त माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर न केवल भारत में वरन् संपूर्ण विश्व में कठपुतली को विशिष्ट स्थान दिलवाया है। अतः पुतलियों ने न सिर्फ समाज का मनोरंजन किया है अपितु इनके द्वारा शिक्षण एवं मानसिक रोगोपचार भी संभव हो पाया है।

पारंपरिक तौर पर राजस्थान के पुतलीकार नट, भाव, राव, भोजो, भाभी, बलाई और खोरी जाति के होते हैं। इसी तरह अन्य प्रदेशों में पंजाब, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात में नट जाति के लोगों को विभिन्न नामों से जाना जाता है। यह नामकरण पुतलियों की बनावट, उनकी वेशभूषा एवं पुतली शब्द के लिए प्रयोग किये जाने वाले स्थानीय बोली व भाषा के आधार पर किया गया है। वर्तमान में प्रचलित भारतीय पुतलियों का वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है।

दास्ताना पुतली -
यह पुतली हाथ में दस्ताने के रूप में धारण की जाती है। इसे तीन अँगुलियों से संचालित किया जाता है। इसे उड़ीसा में साखी कुंदई, केरल में पापाकुत्तु, पश्चिम बंगाल में बेनी पुतुल व उत्तरप्रदेश में गुलाबों-सिताबों के नाम से जाना जाता है।


दास्ताना पुतली 

छड़ पुतली -

इस प्रकार की पुत्तलियों को विभिन्न हिस्सों से काटकर डंडियों या छड़ों में बाँध ली जाती है तथा नाटकीय ढंग से वाचिक संचालन किया जाता है। इसे पश्चिम बंगाल में पुतुल नाच, उड़ीसा में काठी कुंदई व विहार में यमपुरी के नाम से जाना जाता है।


पुतुल नाच- बंगाल, यमपुरी- बिहार 

 

धागा (सूत्र) पुतली -
इस तरह की पुतलियों को धागे व डोरे की सहायता से उनके विभिन्न अंगों को संचालित किया जाता है। इसका ज्यादातर प्रचलन राजस्थान में है। साथ ही महाराष्ट्र में कला सूत्र बाहुल्य, कर्नाटक में गोम्बयाटा, तमिलनाडु में बोम्बलाटा, आंध्रप्रदेश में बोम्बलाटा, उड़ीसा में गोपाल्म कुंदई नाच, आसाम में पुतुल नाच, पश्चिम बंगल में तेरेर पुतुल नाच, त्रिपुरा में पुतुल नाच व मणिपुर में लैथीवी जोगिया के नाम से जानी जाती है।


धागा (सूत्र) पुतली

 

छाया पुतली-
इस प्रकार की पुतलियों को पहले आकृति व पात्रानुसार विभिन्न अंगों को काटकर पुनः संचालन के योग्य बना ली जाती है तथा इन हिस्सों को पतली सिकों या छड़ों के द्वारा रात में दीपक या बल्बों के प्रकाश और दिन में सूर्य के प्रकाश द्वारा परदे पर छाया दिखाकर प्रदर्शित की जाती है। इसे महाराष्ट्र में चामढाचा बाहुल्य, कर्नाटक में टोगलू गोम्बमाटा, केरल में थोल पखा कुत्तु, तमिलनाडु में थोलू बोम्बलाटा, आंध्रप्रदेश में थालू बोम्बलाटा व उड़ीसा में रावणछाया के नाम से जानी जाती है।


 

 

छड़ व धागा (मिली-जुली) पुतली -
इन पुतलियों में छड़ व धागे का आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जाता है। इस तरह इसे छड़ व धागे (मिली-जुली) से संचालित पुतली कही जाती है। इसे बिहार में चादर दरबार व पश्चिम बंगाल में भी चादर दरबार के नाम से ही जानी जाती है।

मोजे पुतली -
इन पुतलियों का प्रयोग वर्तमान में जिन पुतलीकारों द्वारा किया जा रहा है। इसे पुराने या नये मोजे या कपड़ों में रूई भरकर पुतलियाँ बना ली जाती है तथा विषयानुसार पात्रों का चयन कर दर्शकों के लिए प्रस्तुत की जाती है। इसे कमर तक ही दिखाने का प्रयास किया जाता है। यह पुतली बनाने में आसान व संचालन में सरल है तथा इसका प्रभाव भी काफी मनोरंजक होता है इसका प्रयोग ज्यादातर शहरी क्षेत्रों में ही हो रहा है।

भारतीय पुतलियों के साथ ही ऐतिहासिक दृष्टि से विश्व की पुतलियों की चर्चा की जानी आवश्यक है। समकालीन इतिहास में भारत की तरह विश्व के अनेक देशों में अलग-अलग नामों, प्रकारों, आकृतियाँ एवं वेशभूषा वाली पुतलियों की जानकारी मिलती है। मिस्र, तुर्की, हैं। अरब तथा ईरान जैसे मुस्लिम देशों में पारम्परिक पुतलियों का चलन है। जो कि भारतीय पद्धति को ही प्रतिपादित करती है।

यहाँ रमजान के दिनों में पुतली द्वारा मनोरंजन किया जाता है। तुर्की में करखेज, जापान में डकुंबों, इंडोनेशिया में यांगगोलोक जैसी विश्व प्रसिद्ध पुतलियाँ हैं। भारतीय पुतलियों को विभिन्न प्रदेशों के ग्रामीण अंचलों में प्रतीक के तौर पर पूजा भी की जाती है। इनका सृजन विशेष पर्वों पर किया जाता है। रात-रात भर जागरण कर इनको बनाया, सजाया व विवाह सम्पन्न किया जाता है और अंत में इन्हें विधिपूर्वक उत्सव संपन्न होने के पश्चात् तालाब या नजदीक की नदी में विसर्जित कर दिया जाता है।
 


डकुंबों-जापान

छत्तीसगढ़ में गौरा-गौरी तथा गणगौर इसी तरह की पुतलियाँ है। सूक्ष्म अध्ययन किया जाये, तो भारतीय पुतलियों के साथ ही साथ कठपुतलियों का एक विस्तृत इतिहास है। यह समाज को निरंतर शिक्षित, जागृत एवं स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करती रही हैं। प्राचीनकाल की तरह आज भी इस लोककला की महत्ता व जन संचार के रूप में इसकी उपयोगिता से इंकार नहीं किया जा सकता है। हालाँकि वर्तमान में प्रचार-प्रसार के आधुनिकतम साधन उपलब्ध है।

 

इन सबके मुकाबले पुतलियाँ आज भी लोक संचार एवं लोक शिक्षण का सशक्त एवं प्रभावी माध्यम है। इनके द्वारा लोगों के मन-मस्तिष्क को जागृत एवं शिक्षित किया जा सकता है। यूँ तो कठपुतलियों के सैकड़ों दल हैं जो कि व्यवसायिक है। किन्तु मध्यप्रदेश में शौकिया तौर पर प्रदेश व्यापी संगठन "यूनिवर्सल पपेट थियेटर" का गठन किया गया है। इतना बड़ा अव्यवसायी कठपुतली दल शायद भारत वर्ष में कहीं नहीं हैं। इसमें भिलाई, गुना, बिलासपुर, टीकमगढ़ आदि इकईयाँ तो वर्ष भर कुछ न कुछ कार्यक्रम एवं प्रशिक्षण करते रहते हैं।

लेख-
विभाष उपाध्याय
चौमासा अंक-56

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