सीताराम की वचनबद्धता का मर्म जानना ही केवट होना है
April 22, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार
नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

सूर्य से निकली 9 रश्मियां चारों दिशाओं व 8 वसुओं से टकराने से उत्पन्न 108 ध्वनियों से संस्कृत के स्वर, व्यंजन व अयोगवाह बने।’स्वर स्वयं राजते’ अर्थात स्वर स्वयं चमकने वाले और व्यंजन शरीर रुपी दुनिया को सजाने वाले हैं।उनके सटीक उच्चारण से शरीर के ऊर्जा बिंदु सक्रिय होकर स्वास्थ्य प्रदान करते हैं।
तत्व मीमांसा के अनुसार आकाश से उत्पन्न शब्द वायु के स्पर्श से अर्थ और तेजस से रूप (आकार) धारण करते है।अणु और परमाणु के कंपन से ऊपजी अविनाशी ध्वनि अक्षर बन अंतरिक्ष में लीन हो जाती है। शब्दों का आधार ध्वनि है किन्तु उनके बारे में ज्ञान का अभाव था।ब्रह्मांड में सर्वत्र गति है। गति से ध्वनि, ध्वनि से शब्द और शब्दों से भाषा बनी।आरंभिक काल में जब भाषा का अस्तित्व न था।ऋषियों ने शब्दो के महत्व और उनकी अमरता को जानने के लिए एकाग्र होकर बार बार ध्वनियाँ उच्चारित कर ये जानने में प्रयासरत रहे कि मुख-विवर के किस सूक्ष्म अंग से ,कैसे और कहाँ से ध्वनि जन्म ले रही है।
निरंतर अथक प्रयासों से शुद्ध,स्पष्ट ध्वनियों के आधार पर परिष्कृत एवं सर्वमान्य बनी।भगवान शिव के डमरू से उत्पन्न 14 ध्वनियां पाणिनि के चातुर्दश महेश्वराणि सूत्र हैं। इनमें प्रथम चार सूत्रों में (‘अ इ उ ण्,ऋ ऌ क्,ए ओ ङ्,ऐ औ च्) स्वरों का परिचय एवं 5 वें तथा छठे सूत्र में अंतःस्थ ( ह य व र ट, लँ ण ) वर्ण हैं। 7वें सूत्र में अनुनासिक(ञ म ङ ण न म् )वर्ण हैं। 8 से 10 में सभी वर्गों के चौथे और तीसरे वर्ण (झ भ ञ्, घ ढ ध ष्, ज ब ग ड द श्) तथा 11वें और 12वें में सभी वर्गों के द्वितीय और प्रथम वर्ण (ख फ छ ठ थ च ट त व्, क प य्) आदि हैं। 13वें और 14वें सूत्र में उष्म वर्ण (श ष स र्, ह ल्) मौजूद हैं।आमतौर पर भाषाएँ अक्षरों को एक रैखिक क्रम में रखती हैं, लेकिन संस्कृत में व्याकरण और प्रत्याहार निर्माण को आसान बनाने के लिए ध्वनियों को उनके गुणों (नाद, घोष, अल्पप्राण, महाप्राण) के आधार पर हैं। अ व क वर्ग का उच्चारण कंठ,इ व च वर्ग तालु,ऋ व ट वर्ग ,र, ष मूर्धा,य वर्ग ,स तथा ल दांत,उ तथा प वर्ग होठ,ए कंठ व तालु,ओ कंठ तथा होंठ व हर वर्ग का पंचम वर्ण अनुनासिक है।

संस्कृत ध्वनि विज्ञान और महेश्वर सूत्र
कंपन से ऊपजी अविनाशी ध्वनि अक्षर बन अंतरिक्ष में लीन हो जाती है।इनकी ध्वनि-वैज्ञानिक संरचना अद्वितीय है, जो दुनिया की किसी अन्य भाषा में नहीं पाई जाती है। इसमें जैसा लिखा जाता है, बिल्कुल वैसा ही बोला जाता है। शब्दों के उच्चारण में कोई मूक वर्ण नहीं होने से संचार में त्रुटि की संभावना शून्य हो जाती है।ध्वनियों का वर्गीकरण उनके उच्चारण-स्थान और प्रयत्न के आधार पर व्यवस्थित और तर्कसंगत हैं। सुस्पष्ट, व्यवस्थित,त्रुटि रहित व परिमार्जित होने के कारण उसे वैज्ञानिक भाषा होने का गौरव प्राप्त है।शब्दों के अर्थ में दोहरापन से निजात पाने के लिए प्रत्यय व उपसर्गों का प्रयोग किया। सामासिक शब्दों को जोड़ने पर लगभग 769 करोड़ शब्दों का वृहत भंडार बन गया है। अन्य भाषाओं से अलग इसमें द्विवचन होता है।वाक्य के हर भाग में विभक्तियों का प्रयोग कर्ता,सर्वनाम, विशेषण रूप व्याकरणीय अर्थ प्रदान करते है।
शब्दों को प्रकृति और विज्ञान के नियमों के आधार पर गढ़ा गया है। यथा ब्रह्मांड में समाहित अ से ह याने ए टू जेड का ज्ञान होने का मिथ्या भाव ‘अहम्’है। रसायन विज्ञान में हाइड्रोजन का ऑक्सीजन के साथ दहन से जल बनता है। पंचमहाभूतों के अनुसार भी अग्नि से जल बनता है।हमारे मनीषियों ने ज्वलनात् जलं इति 'ज्वलनाज्जलमिति से 'जल' की निष्पत्ति मानी है।
बृहदारण्यकोपनिषद 5.3.1 के अनुसार हृदय शब्द में हृ-हरणे शिराओं से अशुद्ध रक्त हरणे), द-ददाति (फेफड़ों को शुद्ध रक्त देने ) और य -याति (शरीर के सारे अंगों में रक्त को गति देना) है।1992में जिस सिद्धांत की खोज हार्वे ने की थी, वही उपनिषद में लाखों वर्ष पूर्व उजागर हो रही है।
बृहदारण्यकोपनिषद
एक बार जगदीशचंद्र बसु से पूछा गया कि आपको वनस्पतियों में प्राण होने का शोध करने की प्रेरणा कहां से मिली?"बसु ने कहा “आप संस्कृत का ऐसा शब्द बताएं जिसमें बहुत से वृक्ष-पौधों का बोध हो।”उत्तर मिला 'शस्यश्यामलां मातरम्।' तब उन्होंने कहाः “शस्य शस् धातु से बना है, इसका अर्थ है हत्या करना” हत्या उसी की की जा सकती है जिसमें जीव हो याने शस्य की हत्या करना संभव है।” "यदि वनस्पतियों में प्राण न होते तो उन्हें मरने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। यदि संस्कृत का ज्ञान नं होता तो शायद मैं यह नहीं कर पाता।
षट्शतानि दिवा रात्रौ सहस्राण्येकविंशतिः। एतत्संख्यात्मकं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा।
योगचूडामण्युपनिषद् के 32 वें श्लोक के अनुसार सामान्य अवस्था में एक मनुष्य दिन - रात में 21,600 सांस लेता है। मेडिकल साइंस के अनुसार 4 सैकंड का एक श्वास होने से 1 दिन में 15*60*24=21600 श्वास लेने की पुष्टि होती है। 'हंस' (सोऽहम्) के अनायास जप में ही से बाहर व स से पुनः स्थापित होता रहता है।
श्वास से प्राण ऊर्जा बढ़ाकर मन को शांत करना ही प्राणायाम है।क के बाद गहराई व तीव्रता से ख बोलने से स्वत: प्राणायाम होता है।अ उ और म से बना ॐ का उच्चारण मन को एकाग्र कर दिव्यता प्रदान करता है। वैदिक ध्वनि का तीव्रता, जोश और दृढ़ता से किया उच्चारण की गूंज ही मंत्र साधना का मूल सिद्धांत है।आधुनिक भौतिकी (ध्वनि विज्ञान) के अनुसार ॐ का उच्चारण ब्रह्मांड की कंपन आवृत्तियों से मेल खाते हैं, जो मानसिक शांति और शारीरिक उपचार में सहायक है। हृदय से निकला ह् व्यंजन ण,न,म, य,र, ल,व आदि उरस्य ध्वनियों के साथ मिलकर बनी ह्ण, ह्न, ह्म, ह्य, ह्र, ह्ल ,ह्व ध्वनियां और भी अधिक गहराइयां को बढ़ा देती है।विसर्ग व अनुस्वारों का शारीरिक स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण योगदान है।

प्राणायाम
राम: बालक: हरि: भानु: आदि विसर्ग युक्त पुल्लिंग शब्दों के उच्चारण से अनायास ही कपालभाति और प्राणायाम से होने वाले लाभ प्राप्त हो जाते हैं। ऐसे उच्चारण तनाव-निवारक आह से वाह बन जाते है। जलं, वनं,फलं तथा पुष्पं आदि अनुनासिक नपुंसक लिंग शब्दो के उच्चारण से भ्रामरी हो जाता है। जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा,उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जायेगा। ‘राम: फलं खादति’ बोलने से कपालभाति व भ्रामरी एक साथ हो जाते हैं। इस प्रकार संस्कृत संभाषण चलते फिरते योग साधना है।
सांख्य दर्शन के अनुसार किसी धातु के पच्चीस शब्द रूप आत्मा, 4अंत:करण,5 ज्ञानेन्द्रियाँ,5, कर्मेन्द्रियाँ ,पंचतन्मात्रायें, पंच महाभूतों का ज्ञान करवाते हैं।पुल्लिंग राम शब्द के विभिन्न विभक्तियों के द्विवचन रामौ ; रामाभ्यां ; रामयो; का उच्चारण योग में प्रयुक्त क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं।शरीर में दो ऊर्जा धाराओं के मिलन बिंदु संधि कहलाती हैं।हमारे शरीर में 72000 नाडियो में प्राण ऊर्जा प्रवाहित होती है।इति अहम् को संधि युक्त इत्यहंम् उच्चारण करने पर वाक् इन्द्रिय के विशेष प्रयत्न से एक्यूप्रेशर चिकित्सा से मन नीरोग रहता है।
संस्कृत भाषा के शब्दों का उच्चारण हमारे विशिष्ट ऊर्जा चक्रों को सक्रिय कर उसके चेतना स्तर को बढा देते हैं। ध्वनि का उपयोग कर आंखों या कानों को छूना, अनुष्ठानों में अंग स्पर्श का विधान ऊर्जा चक्र को जाग्रत करने से हैं। अ’ एवं क वर्ग का उच्चारण से मूलाधार चक्र संतुलित होता है, जिससे मलाशय और गर्भाशय के विकार दूर होते हैं।इ’ व च वर्ग का उच्चारण स्वाधिष्ठान चक्र को सक्रिय कर जल तत्व को नियंत्रित करता है।प्रजनन अंगों तथा हार्मोनल संतुलन में कामगार साबित होता है। कृष्ण’ तथा ‘ऋ’ एवं ट वर्ग का उच्चारण मणिपुर (नाभि चक्र )को सक्रिय करता है।चयापचय का संतुलन व पाचन क्रिया में सुधार होता है। राम तथा लृ’, त वर्ग का उच्चारण अनाहत चक्र को सक्रिय कर ऊर्जीकृत करता है। यह रक्त संचार को सुधारने, तनाव व डिप्रेशन को कम करने और फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ाने में सहायक है।सोह्म’ का उच्चारण ‘अनाहत’ एवं ‘मणिपूरक’ दोनों चक्रों को सक्रिय करता है।
तनाव से मुक्त सुखी जीवन
‘उ’ तथा प वर्ग का उच्चारण विशुद्धि चक्र सक्रिय होता है जिससे थायराइड की समस्याएं, गले के रोग और हकलाहट दूर होती है।ईषत् स्पृष्ट वर्ग का उच्चारण आज्ञा चक्र को ऊर्जा कृत कर सक्रियता प्रदान करता है।इससे मानसिक एकाग्रता बढ़ती है, अनिद्रा,माइग्रेन व सिरदर्द में तुरंत राहत मिलती है।आध्यात्मिक चेतना केंद्र सहस्रार चक्र परम चेतना का द्वार माना जाता है। हल्के दबाव से सहस्रार चक्र सक्रिय होता है, जिससे पूरे तंत्रिका तंत्र को शांति मिलती है।शब्द शक्ति का प्रभाव स्वयं पर एवं दूसरे पर पड़ता है। इसीलिए कहा गया है कि व्यक्ति को शुद्ध उच्चारण के साथ-साथ बहुत सोच-समझ कर बोलना चाहिए।संस्कृत के विभक्ति युक्त शब्दों के अर्थ ग्रहण में भ्रम पैदा नहीं होने से भाषाई विकृति नहीं होती।संक्षिप्तता इतनी कि एक-दो व्यंजनों से श्लोक पूर्ण हो जाता है।शब्द में वर्ण की स्थिति बदलने पर भी ध्वनि में परिवर्तन नहीं होने से कंप्यूटर को ध्वन्यात्मक निर्देश दिए जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। डिजिटल कंप्यूटर बाइनरी कोड को पहचान कर कमांड समझ पाता है। संस्कृत के स्वर व व्यंजन लघु (0) और गुरु (1) की तरह संयोजनों का क्रम उत्पन्न करते हैं।
संस्कृत में अहम् संस्कृतम् पठामि,पठामि अहं संस्कृतम्, पठामि संस्कृतम् अहं संस्कृतम् अहं पठामि, संस्कृतम् पठामि अहं,अहं पठामि संस्कृतम् आदि वाक्यों में अर्थ भेद नहीं होता। नासा के वैज्ञानिक द्वारा अंतरिक्ष यात्रियों को अलग-अलग भाषाओं में भेजे संदेशों में शब्दों के स्थान बदल जाने से अर्थ ही बदल जाने की समस्या से निजात पाने का मात्र संस्कृत ही विकल्प है।कम्प्यूटर भाषा की तरह सन्दर्भ रहित है।कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा फॉर्टन, बैकस-नार-प्रारूप पाणिनि संस्कृत व्याकरण नियमों के समरूप हैं।इसके वाक्यों में शब्दों की स्थितिगत स्वतंत्रता, भाषा की समुचित कोडिंग,अक्षर स्मृति में कम स्पेस घेरने,एकमेव अर्थ व्यक्त करने वाले वाक्य कम्प्यूटर भाषा के लिए उपयुक्त हैं।ताम्र पत्रों पर लिखी 60000 पांडुलिपियों पर नासा की रिसर्च जारी है। संस्कृत भाषा आधारित छठा व सातवीं जेनरेशन सुपर कम्प्यूटर्स 2034 तक बनकर तैयार हो जाएंगे। भविष्य में भाषा-क्रांति के माध्यम से आने वाला समय संस्कृत का होगा।
- रामनिवास शर्मा
पूर्व उपनिदेशक शिक्षा
लक्ष्मणगढ़
संस्कृत ध्वनियों का उच्चारण एक सहज योग
August 29, 2026