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नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

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रामकथा से जीवन प्रबंधन के सूत्र

रामकथा से जीवन प्रबंधन के सूत्र


रामचन्द्र जी का चरित्र केवल एक ऐतिहासिक आख्यान नहीं है, प्रत्युत यह मानव जीवन के कुशल प्रबन्धन और आत्मिक जागरण का एक श्रेष्ठ ग्रन्थ है। अचल कुमार वैष्णव जी द्वारा रचित यह ज्ञानवर्धक आलेख श्रीरामचरितमानस के सन्दर्भ में 'देखना' या 'देखा' शब्द की अत्यन्त सूक्ष्म, और मनोवैज्ञानिक मीमांसा के माध्यम से यह दर्शाता है कि किस प्रकार हमारी दृष्टि, और सजगता हमारे कर्मों की दिशा और फल का निर्धारण करती है। रावण का अभिमान, मारीच की विवशता, हनुमान जी की निष्काम भक्ति, और भरत जी की सजगता के उदाहरणों से लेखक ने अपनी बातों को समझाने का प्रयत्न किया है।


देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि। 
बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि।।

हमारे व्यावहारिक जीवन में 'देखिए' या 'देखो' शब्द का प्रयोग बहुत होता है। उदाहरण के लिए, “देखो! तुम जो कर रहे हो, वह सही नहीं है।” तो यहाँ ‘देखो’ शब्द के उपयोग का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या सम्मुख खड़ा व्यक्ति अन्धा है? ऐसा नहीं है। वास्तव में होता यह है कि कभी-कभी अत्यन्त समझदार, और ज्ञानी व्यक्ति से भी कोई न कोई बड़ी चूक हो ही जाती है और उस चूक में हमारी दृष्टि से किसी सूक्ष्म तत्त्व की उपेक्षा होना ही एक बड़ा कारण होता है।

इसलिए ही ‘देखो’, ‘देखना’ आदि का ऐसी परिस्थितियों में लाक्षणिक उपयोग होता है। आशय यह है कि हम जो भी कार्य करें, उसे भलीभान्ति देख-सुनकर, अर्थात् पूर्णतः जांच परख कर ही करें। श्रीरामचरितमानस के कुछ प्रेरणादायक प्रसंगों पर विचार करें, जहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस 'देखा' शब्द का अत्यन्त सुन्दर और दार्शनिक प्रयोग किया है। एक बार लंकापति रावण अपनी सभा में आसीन है, और अपने विशाल परिवार को देखकर यह अभिमान करता है कि मेरा इतना बड़ा परिवार है, मेरा कौन क्या बिगाड़ लेगा।

दसमुख बैठ सभां इक बारा।
देखि अमित आपन परिवारा।।

सुत समूह जन परिजन नाती।
गनै को पार निसाचर जाती।।
अहंकार- रावण के सर्वनाश का कारण

अहंकार- रावण के सर्वनाश का कारण

विचारणीय यह है कि रावण ने अपनी दृष्टि से क्या देखा। उसने केवल अपने उस नश्वर परिवार, और सगे सम्बन्धियों को देखा जिनसे नाता जीवन पर्यन्त ही रहता है। परिवार वाले हमारा साथ केवल श्मशान तक ही निभाते हैं, परन्तु मृत्यु के उपरान्त जो हमारा साथ निभाता है, वह केवल परब्रह्म परमेश्वर ही है। पारिवारिक उत्तरदायित्वों को अपना पुनीत कर्म समझकर अवश्य निभाना चाहिए, परन्तु उनसे किसी प्रतिफल की आशा किए बिना।

रावण का इतना विशाल परिवार था, जिसके विषय में यह कहा जाता है कि उसके 1 लाख पुत्र, और सवा लाख नाती थे, फिर भी उसके भवन में एक दीप जलाने वाला तक नहीं बचा। उसके परिवार में कोई विलाप करने वाला भी नहीं रहा। इसलिए कहा गया है कि पूर्ण सजगता से 'देखिए'। आज मनुष्य संसार की समस्त वस्तुओं को देखना चाहता है, बस एक ही वस्तु को नहीं देखता।

जीते जी उसे देखना असम्भव सा है, परन्तु वही एकमात्र शाश्वत सत्य है। यदि हम केवल उसी का ध्यान रखें, तो जीवन में कभी कोई पाप या अपराध नहीं होगा। वह वस्तु मृत्यु है, जो एक अटल सत्य है। जिसने जीते जी अपनी मृत्यु का ध्यान रखा है, उसी ने इस जीवन को भरपूर आनन्द और सार्थकता के साथ जिया है। हम सभी भलीभान्ति जानते हैं कि एक दिन देह त्यागना निश्चित है, तो फिर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मत्सर का अहंकार क्यों करना। जब मृत्यु सुनिश्चित है, तो क्यों न भगवान की परम शरण का आश्रय लिया जाए।

मारीच ने अपनी मृत्यु को भलीभान्ति देखा और परमसत्य को पहचान लिया।
उभय भान्ति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना।।

इसलिए हमें सदैव यही कहना पड़ता है कि सजग होकर देखिए। संसार में छली और कपटी लोगों की कोई कमी नहीं है। भारतीय संस्कृति में आश्रम का नाम लेते ही एक पावन, और पुनीत स्थल मन में आता है, जिसका अनुचित लाभ भी अनेक लोगों ने खूब उठाया है। जन सामान्य ही नहीं, अपितु अत्यन्त बुद्धिमान लोगों को भी तथाकथित आश्रमों ने ठगा है। अनैतिक रूप से छले जाने की सूचनाएं निरन्तर मिलती रहती हैं। इसलिए देखिए, जब भी कोई आश्रम दिखे, तो अत्यन्त सोच समझकर ही वहां का आश्रय लें। अन्यथा आप भी राजा प्रतापभानु की भान्ति छले जाएंगे।

फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहं बस नृपति कपट मुनिबेषा।।
सदा हनुमान जी की भान्ति दूरदृष्टि से देखो।
चढि गिरि सिखर चहुं दिसि देखा। भूमि बिबर एक कौतुक पेखा।।
सदैव सजग रहने का सन्देश देता मारीच प्रसंग

सदैव सजग रहने का सन्देश देता मारीच प्रसंग

यदि आप अपने साधारण स्तर से ऊंचा उठेंगे, तो आपको कुछ श्रेष्ठ करने की राह अवश्य मिलेगी। कुछ ऊपर उठकर विचार करें, आपको जीवन में सफलता अवश्य मिलेगी। हनुमान जी को उस ऊंचाई से क्या दिखाई दिया, यह मानस की पक्तियों में वर्णित है।

दीख जाइ उपबन बर सर बिगसत बहु कंज। 
मन्दिर एक रुचिर तहं बैठि नारि तप पुंज।।

सज्जनों, मानस का यह सूत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। आज इतनी कथाएं हो रही हैं, और अनेक धार्मिक आयोजन भी हो रहे हैं, फिर भी समाज में अपेक्षित परिणाम दृष्टिगत नहीं होता। इसका मूल कारण क्या है। इसका कारण यह है कि बस आयोजन हो रहे हैं, हम उन पर कोई चिन्तन या मनन बिल्कुल नहीं करते। एक व्यक्ति रामकथावाचक बन गया, तो दूसरे भी देखा देखी मानस मर्मज्ञ, और कथावाचक बन गए।

थोड़ा रुकिए, समझिए, और तब अनुकरण कीजिए। बन्धु, अनुकरण के लिए भी विवेक और बुद्धि की आवश्यकता होती है। जिनकी कथा हम कहते हैं, और सुनते हैं, क्या कभी उनसे मिलने या उन्हें देखने की आपकी अभिलाषा नहीं होती। मन में यह उत्कट इच्छा तो उत्पन्न करें कि मुझे भी साक्षात् प्रभु के दर्शन हो जाएं।

हृदय बिचारत जात हर केहि बिधि दरसन होय।।
महादेव हमें यह पावन सूत्र दे रहे हैं।
संभु समय तेहि रामहि देखा।
उपजा हियं अति हरषु बिसेषा।।


आत्म दृष्टि पर निर्भर है जीवन का आनंद 

यह प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि आप अपनी दृष्टि से देखना क्या चाहते हैं। परशुराम के समक्ष साक्षात् अखंड श्रीराम खड़े हैं, परन्तु वे केवल खंडित शिव धनुष को ही देख रहे हैं।

सुनत बचन फिरि अनत निहारे।
देखे चापखंड महि डारे।।

अनेक लोगों को भविष्यवाणी करने की बहुत चाह होती है। वे प्रायः यह कहते हुए मिल जाएंगे कि वे सब कुछ पहले से ही देख लेते हैं। महानुभाव, यदि ऐसा कुछ सम्भव होता, तो मनुष्य सबसे पहले अपनी ही मृत्यु को देखता। एक भविष्यवेत्ता कालनेमि इसी प्रकार की घोषणा कर देता है, जबकि साक्षात् काल उसके सम्मुख खड़ा है।

होत महा रन रावन रामहिं।
जितिहहिं राम न संसय या महिं।।

इहां भएं मैं देखउं भाई।
ग्यानदृष्टि बल मोहि अधिकाई।।

अतएव देखो, अपने उत्तरदायित्व, और कर्तव्य के प्रति पूर्ण रूप से सत्यनिष्ठ रहें। निष्काम भाव से अपने समस्त कर्म करते रहें, क्योंकि यह सम्पूर्ण सम्पत्ति केवल श्रीराम की ही है। जाग्रत रहें, और सजग रहें। ईश्वर ने आपको मानव बनाया है, अतः दानव या पशु न बनें, क्योंकि अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन केवल मानव ही कर सकता है। भरत जी अयोध्या की सुरक्षा के प्रति अपने उत्तरदायित्वों के लिए कितने जाग्रत हैं, यह उनके चरित्र से स्पष्ट झलकता है - देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।

उनके मन में यह शंका उत्पन्न होती है कि कोई निशाचर है। उनकी सजगता देखिए। अभी यह पूर्णतः ज्ञात नहीं है कि यह वास्तव में निशाचर है या कोई और। इसलिए केवल अनुमान करके उन्होंने बिना फलक वाले बाण को कान तक तानकर छोड़ दिया -

बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि।। 

माता पार्वती, माता सीता, भरत जी, और त्रिजटा जो भी स्वप्न देखते हैं, वे अक्षरशः सत्य सिद्ध होते हैं। परन्तु हम सभी विचार करें कि हम लोग जाग्रत अवस्था में भी वास्तव में क्या देख रहे हैं।

तो रामकथा के इन अमूल्य जीवन सूत्रों से हम यह समझ पाते हैं कि हमारे जीवन का कुशल प्रबन्धन हमारी 'दृष्टि की समग्रता' पर ही निर्भर करता है। रावण, कालनेमि जैसे पात्रों की दृष्टि केवल नश्वर भौतिकता, खंडित आकारों, और क्षुद्र स्वार्थों तक ही सीमित रही, जिसके कारण वे साक्षात् परमसत्य को देखने में पूर्णतः असफल रहे।

इसके विपरीत, श्री हनुमान जी की दूरदृष्टि, और भरत जी की सजग दृष्टि यह प्रमाणित करती है कि जब मनुष्य अपनी दृष्टि को अहंकार, और मोह के आवरण से मुक्त कर समग्रता की ओर ले जाता है, तभी उसे जीवन का वास्तविक लक्ष्य प्राप्त होता है। ‘देखने’ की यह जाग्रत, और समग्र दृष्टि हमें यह सिखाती है कि हम नश्वर शरीर, और सांसारिक माया के स्थान पर अपने शाश्वत कर्तव्यों, और मृत्यु जैसे अटल सत्य को पहचानें।


जीवन में आवश्यक है ऊँचाई से सत्य की परख 

जब हमारे भीतर इस समग्र दृष्टि का पूर्ण जागरण होगा, तभी हम सच्चे अर्थों में भगवान श्रीराम के जीवन दर्शन को आत्मसात कर सकेंगे, और मानव होने के अपने सर्वोच्च उत्तरदायित्व को सिद्ध कर सकेंगे।

-अचल कुमार वैष्णव
(लेखक प्रतिष्ठित रामकथा एवं भागवत कथा वाचक हैं, जो अपनी ओजस्वी वाणी से सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों का निरंतर प्रसार करते हैं।)

 

 

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