आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी | बुद्धवार

नक्षत्र: मघा | योग: शुभ | करण: तैतिल

पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी | बुद्धवार

नक्षत्र: मघा | योग: शुभ | करण: तैतिल

पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

पोरा तिहार: बैलों के प्रति कृतज्ञता और अन्न के गर्भ-पूजन का पर्व

पोरा तिहार: बैलों के प्रति कृतज्ञता और अन्न के गर्भ-पूजन का पर्व


देश के विभिन्न क्षेत्रों में पोरा का पर्व पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। कृषि प्रधान क्षेत्रों में यह किसानों के लिए महत्वपूर्ण पर्व है। भारत के महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और कुछ अन्य प्रदेशों में भी भाद्रपद अमावस्या को पोला मनाया जाता है। इसमें कृषि कार्य में सहयोगी बैलों को सजाकर उनका पूजन किया जाता है और उनके सहयोग के लिए आभार प्रकट किया जाता है। साथ ही, पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं।

छत्तीसगढ़ में प्रचलित पोरा त्योहार में नंदी स्वरूप बैल की मिट्टी की मूर्ति तथा चुकिया-पोरा और जांता (चक्की) की पूजा की जाती है। इसमें स्थानीय पकवान चीला, गुलगुला, ठेठरी और खुरमी का भोग लगाया जाता है। विशेष रूप से इस दिन गुड़ का मीठा चीला (गुरहा चीला) चढ़ाया जाता है।

पोरा पोला बैल की छोटी मूर्ति
बैल की छोटी मूर्ति

पूजन के पश्चात इन बैलों को छोटे-छोटे बच्चे रस्सी बांधकर घुमाते रहते हैं और खेलते हैं। चुकिया-पोरा लड़कियों का खिलौना होता है, जबकि नंदिया-बइला (नंदी बैल) से लड़के खेलते हैं। इस दिन नंदिया-बइला को गांव की गलियों में घुमाते बच्चों का उत्साह देखते ही बनता है। मिट्टी के छोटे-छोटे बर्तनों से खेलती नन्ही बच्चियां खेल-खेल में ही रसोई कार्य की बारीकियों से अवगत होने लगती हैं। पोरा के बर्तन रिक्त नहीं रखे जाते। उनमें अन्न से बने पकवान रखे जाते हैं, ताकि घर में कभी भी अन्न की कमी न रहे।

पोरा त्योहार के बाद छत्तीसगढ़ की बेटियों-बहनों का सबसे बड़ा त्योहार 'तीजा' आता है। तीजा पर्व मायके में रहकर मनाया जाता है। अतः पोरा के बाद ग्रामीण जन अपनी बेटियों और बहनों को उनके ससुराल से लिवाकर लाते हैं। वे जब तीजा लाने के लिए अपनी बेटियों-बहनों के घर जाते हैं, तो खाली हाथ नहीं जाते। अनिवार्यतः पारंपरिक पकवान ठेठरी-खुरमी लेकर जाते हैं।

अन्न से बने पकवान
अन्न से बने पकवान

कुछ गांवों में पोरा के अवसर पर खेल प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाता है। पोरा का पर्व सिर्फ बैलों के सम्मान का पर्व नहीं है, अपितु यह धान की फसल के गर्भधारण संस्कार का भी पर्व होता है। भाद्रपद अमावस्या की रात्रि में गांव के बुजुर्ग और बइगा गांव के शीतला मंदिर (माता देवालय) में जाकर गांव की सुख-समृद्धि और अच्छी फसल की कामना के साथ ग्राम्य देवी-देवताओं की विधि-विधान से पूजा करते हैं। सुबह होने पर कृषि संबंधी और निर्माण संबंधी कार्य पूर्णतः बंद रहते हैं। यहाँ तक कि कुएं से पानी आदि भरना भी निषिद्ध रहता है।

इस विधान को 'गरभचरु' के नाम से जाना जाता है। पूजन के पश्चात गांव के किसी किसान के खेत से गभोट (धान के पौधे में बीज बनने/दूध बनने की अवस्था) वाले पौधे को लाकर गांव के प्रत्येक घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर बइगा द्वारा लगाया जाता है। ग्रामीण, बइगा को इसके लिए अन्नदान और द्रव्यदान देकर विदा करते हैं। पोरा पर्व के उपरांत ही घास (कांदी) का गट्ठर बांधकर लाया जा सकता है, उससे पूर्व नहीं लाया जाता।

भाद्रपद (भादो) मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को 'कुशोत्पाटिनी अमावस्या' भी कहा जाता है। 'कुशोत्पाटिनी' का अर्थ है— "कुश नामक पवित्र घास को जड़ से उखाड़ने वाली।" शास्त्रों के अनुसार, इसी एक विशेष दिन वर्ष भर के धार्मिक कार्यों (पूजा, श्राद्ध, तर्पण, यज्ञ आदि) में उपयोग के लिए पवित्र कुश को मंत्रोच्चार के साथ जड़ सहित उखाड़कर संचित (इकट्ठा) किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन उखाड़ा गया कुश पूरे वर्ष तक पवित्र और उपयोग के योग्य रहता है। यही रीति हमें ग्राम्य जगत में नजर आती है, जिसमें सूक्ष्म वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विचारधारा समाहित होती है।

बैल की पूजा
बैल की पूजा

इस दिन नंदी स्वरूप बैल की पूजा की जाती है। बैल को हिंदू धर्म में धर्म का स्वरूप माना गया है। बैल को ही भगवान शिव ने अपना वाहन बनाया है। शैलचित्रों से लेकर विभिन्न सभ्यताओं के पुरातात्विक अभिलेखों में बैलों का चित्रण मिलता है, जो मानव जाति के उत्थान में बैलों के योगदान को दर्शाता है।वृषभ राशि का प्रतीक भी बैल है। शिव मंदिर की कल्पना नंदी के बिना नहीं की जा सकती, इसलिए बैल पूजित होते हैं।


शैलचित्र में बैल का अंकन

छत्तीसगढ़ के गांवों में गोल्लर (सांड) छोड़ने की परंपरा रही है। जिस बैल को गोल्लर छोड़ दिया जाता है, वह कृषि कार्यों से मुक्त होकर स्वच्छंद विचरण करता रहता है। संभवतः इसलिए स्वच्छंद विचरण करने वाले लोगों के लिए छत्तीसगढ़ी में "गोल्लर ढिलाय हे" उक्ति का प्रयोग किया जाता है। लोक जीवन में प्रचलित बहुत-से रीति-रिवाजों का समय के साथ ह्रास हो रहा है। इनके संवर्धन के लिए नई पीढ़ी को आगे आना चाहिए और अपनी अनमोल सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का प्रयास करना चाहिए।

लेख -रीझे यादव
गरियाबंद (छत्तीसगढ़)

Follow us on social media and share!