वारुणी पर्व : प्राणदायी “जल” के सम्मान का उत्सव
March 17, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार
नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026


नई फसल से सम्बंधित उत्सव- पोंगल
‘पोंगल’ शब्द तमिल भाषा के ‘पोंगु’ से निकला है, जिसका अर्थ है उबाल आना या छलक पड़ना। नई फसल के चावल, दूध और गुड़ से बनी पारंपरिक पोंगल खीर जब मिट्टी के पात्र में उबलकर बाहर आती है, तो वातावरण “पोंगालो पोंगल” के उल्लासपूर्ण उद्घोष से गूंज उठता है। यह क्षण समृद्धि, शुभारंभ और सामूहिक आनंद का प्रतीक माना जाता है।
पोंगल का समय सूर्य के उत्तरायण गमन से भी जुड़ा है। हिंदू पंचांग के अनुसार मकर संक्रांति के साथ सूर्य उत्तर गोलार्ध की ओर बढ़ता है। इसके पूर्व पूस माह में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने के कारण ठंड अधिक होती है, जबकि उत्तरायण का आरंभ प्रकाश, ताप और नई ऊर्जा का संकेत देता है। पोंगल चार दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें प्रत्येक दिन का अपना सांस्कृतिक तथा भावनात्मक महत्व है।
भोगी पोंगल पहले दिन मनाया जाता है। यह आत्मशुद्धि और नवीनीकरण का प्रतीक है। घरों की सफाई की जाती है ठीक वैसे ही जैसे कुछ क्षेत्रों में कार्तिक मास में आने वाले दीपावली त्यौहार के पहले किया जाता है, पुराने और अनुपयोगी सामान का त्याग किया जाता है ताकि नकारात्मक ऊर्जा से निकलकर नवऊर्जा का संचार हो और नए वस्त्र धारण कर जीवन में नए आरंभ का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए पितृपूजन किया जाता है उन्हें नए वस्त्र अर्पित कर तैयार किये गए व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। पितृपूजन भारत की मूल संस्कृति में निहित एक ऐसी परंपरा है जो जो हमारे पूर्वजों के प्रति हमारी आस्था और आदर को व्यक्त करता है । इसके बाद ही पोंगल का उत्सव आरम्भ होता है ।

भोगी पोंगल
दूसरा दिन सूर्या पोंगल या थाई पोंगल के नाम से मनाया जाता है जो कि मुख्य पर्व होता है। यह दिन सूर्यदेव को समर्पित है। प्रातः शुभ मुहूर्त में खुले आंगन में पोंगल पकाई जाती है इसके लिए पूर्व दिशा की ओर मुख करके के यह रस्म निभायी जाती है, इसके लिए गन्ने से नियत स्थान को अलंकृत किया जाता है ठीक वैसे ही जैसे हम तुलसी पूजा या छठ पर्व के अवसर पर करते हैं पोंगल बनाने के लिए मिट्टी की नयी हांडी लायी जाती है और उसपर हल्दी की गाँठ बंदी जाती है क्योंकि भारतीय संस्कृति में हल्दी का विशेष महत्व है औए इसे पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।

उत्तरायण होते सूर्यदेव के अभिवादन का उत्सव- पोंगल
इस दिन नए चावल को मीठा और नमकीन दोनों प्रकार से तैयार किया जाता है मीठा चावल पकाने के लिए गुड़ का प्रयोग किया जाता है । इस दिन पोंगल सांभर भी बनाया जाता है जिसकी विशेष बात यह है की इसमें किसी भी प्रकार की दाल का उपयोग नहीं होता, जैसे सामान्य तौर पर किया जाता है, केवल 21 प्रकार शाक उपयोग में लायी जाती है। संभवतः ऐसा आहार विज्ञान के नियमों के अंतर्गत किया जाता होगा। रंग-बिरंगे कोलम से घर सजाए जाते हैं और तमिल कैलेंडर के शुभ ‘थाई’ माह का स्वागत किया जाता है।
माटु/ मट्टू पोंगल तीसरे दिन मनाया जाता है, जो पशुधन को समर्पित है। गाय और बैल, जो कृषि जीवन की रीढ़ हैं, इस दिन सम्मानित किए जाते हैं। उन्हें स्नान कराया जाता है, सींग सजाए जाते हैं और विशेष आहार दिया जाता है। यह परंपरा श्रम और प्रकृति के सहजीवन को रेखांकित करती है।इसे देखते ही छत्तीसगढ़ समेत कई क्षेत्रों में प्रचलित गोवर्धन पूजा (पशुधन को खिचड़ी खिलाने की परंपरा) और सावन अमावस्या को मनाये जाने वाले हरेली तिहार की याद आ जाती है जब पशुधन की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है ।

माटु पोंगल
कन्नुम पोंगल चौथा और अंतिम दिन होता है । यह पारिवारिक मिलन, सामाजिक सौहार्द और आनंद का दिन है जब लोग अपने बड़ो का घर आशीर्वाद लेने के लिए एकदूसरे के घर जाते है और घरों की सजावट और सृजनात्मक क्षमता की सराहना करते हैं । यदि हम ध्यान से देखने का प्रयास करे तो समझ आता है कि भारत के सभी तीज-त्योहारों में परम्पराएँ हमेशा से क्षमता विकास के अनूठे और सरल माध्यम रहे हैं । परंपरागत नृत्य “कुम्मी” जो गरबा के ही समान किया जाता है जिसमे केवल महिलाएं भाग लेती है और किसी भी प्रकार का वाद्ययंत्र उपयोग में नहीं लाया जाता, सामूहिक भोज और भाई-बहन के रिश्तों की मंगल कामनाएं इस दिन की विशेषता हैं इसलिए इस दिन को कन्नी(कन्या) पोंगल भी कहा जाता है । इस दिन जगह-जगह पर मटकीफोड़ का भी आयोजन किया जाता है ।

लोकनृत्य- कुम्मी
ऐसे नवविवाहित जोड़े जब पहली बार साथ में पोंगल मन रहें हों उनके लिए यह उत्सव "थलाई पोंगल" कहलाता है। इस दिन नवविवाहिता को उसके मायके पक्ष की ओर से विशेष स्नेह और सम्मान के साथ आमंत्रित किया जाता है। लड़की के परिवारजन और रिश्तेदार उसके घर आते हैं, साथ में रेशमी साड़ी या धोती, गन्ना, हल्दी का पौधा, काँसे या पीतल का पोंगल पात्र, नए चावल, गुड़, फल और सब्ज़ियाँ लेकर आते हैं।
इन उपहारों को "पोंगल सीर" कहा जाता है, जिनका गहरा सांस्कृतिक महत्व है। कई परिवारों में यह परंपरा केवल विवाह के पहले वर्ष तक सीमित नहीं रहती बल्कि हर वर्ष निभाई जाती है। यदि माता-पिता अब जीवित न भी हों, तब भी यह धर्म और स्नेह का दायित्व भाई निभाता है कि वह अपनी बहन को ‘पोंगल सीर’ अर्पित करे और इस पारिवारिक रीति को आगे बढ़ाए।
पोंगल के दौरान गांवों और शहरों में मेले लगते हैं। पारंपरिक साड़ियां, हस्तशिल्प, मिट्टी के बर्तन और स्थानीय आभूषण लोकसंस्कृति की झलक प्रस्तुत करते हैं। जल्लीकट्टू (सांडों का खेल), कबड्डी, उरी आदिथल (आंखों पर पट्टी बांधकर मटका फोड़ना) जन्माष्टमी के समरूप, वलुक्कु मरम (मलखंभ), मल्लर कंबम (योग और व्यायाम का मिश्रण) और अन्य ग्रामीण खेल उत्सव में ऊर्जा और रोमांच भर देते हैं। हर क्षेत्रीय उत्सव में मेलों की बहुत खास भूमिका होती है लगता है मानो आज पर्यंत हमारे परंपरागत क्रय-विक्रय के माध्यम का प्रतिनिधित्व करते हों।

जल्लीकट्टू
यह पर्व केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पुडुचेरी में इसे संक्रांति या पेद्दा पंडुगा के रूप में मनाया जाता है। तमिल प्रवासी समुदायों के बीच श्रीलंका, मलेशिया और सिंगापुर में भी पोंगल समान उत्साह से मनाया जाता है।
पोंगल और संक्रांति केवल फसल उत्सव नहीं हैं, बल्कि वे उस जीवन-दर्शन को अभिव्यक्त करते हैं जिसमें प्रकृति, श्रम और समाज एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं। यह पर्व नई आशा, सामूहिकता और संतुलन का संदेश देता है। दक्षिण भारत की सांस्कृतिक आत्मा को समझने के लिए पोंगल एक प्रवेशद्वार तो है ही लेकिन इस त्यौहार में निर्वहन की जाने वाली परम्पराएँ अपने आप में यह समझने के लिए पर्याप्त हैं कि उत्तर हो या दक्षिण भूगोल से इतर देखें तो संपूर्ण भारत में सनातन की मूलधारा एक ही है जहां उत्सव के माध्यम से कृतज्ञता को जीवन का आधार माना जाता है।
लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा
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