मानवता के पुजारी छत्तीसगढ़ के संत गहिरा गुरु
August 02, 2025
संवत् 2082 विक्रमी | चैत्र कृष्ण अष्टमी | बुधवार
नक्षत्र: ज्येष्ठा | योग: वज्र | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 11 मार्च 2026

भगवान श्री राम के जीवन का लंबा समय वनवास में व्यतीत हुआ था, अतः वनों से भारतीय संस्कृति का सम्बंध उनके काल से ही घर-घर में पहुँच चुका था जब वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना कर दी थी। लेकिन आजकल वाल्मीकि जी द्वारा सँस्कृत में रचित पूर्ण रामायण कम ही लोगों ने पढ़ी है, इसलिये हम उसमें वर्णित वनों से लगभग अपरिचित हैं।
वाल्मीकि जी द्वारा रामायण की रचना में भारतीय वनों का जो विवरण प्राप्त होता है वैसा किसी अन्य ग्रँथ में प्राप्त नहीं होता। वर्तमान के वानिकी वैज्ञानिक भी रामायण में वनों के उल्लेख को पढ़कर हतप्रभ रहते हैं और कितने ही शोधकर्ताओं ने वाल्मीकि जी द्वारा रामायण में उल्लेखित भारतीय वनों व वनस्पतियों पर ही शोध पत्र लिख डाले।
एक शोध के अनुसार वाल्मीकि रामायण में 182 किस्म के पेड़-पौधों का वर्णन है, जो विश्व के किसी भी अन्य काव्य ग्रन्थों में नहीं प्राप्त होता! वाल्मीकि जी को भारत के विभिन्न क्षेत्रों के वनों का इतना गूढ़ ज्ञान था की उनके बताये विवरण आज भी सटीक बैठते हैं।
भारतीय प्रायद्वीप के वनों को वर्तमान वैज्ञानिक हिमालय से श्रीलंका तक विभिन्न श्रेणियों में बाँटते हैं जैसे शीतोष्ण वन, सूखे पर्णपाती वन, नम पर्णपाती वन, मिश्रित पर्णपाती वन और उष्ण कटिबंधीय वर्षा वन। लगभग यही वैज्ञानिक वर्णन श्री राम के अयोध्या से लेकर श्री लँका तक की वनवास यात्रा में और वनवास के अतिरिक्त भी उनकी लीला से जुड़ी अन्य कथाओं में प्राप्त होता है। कुछ उदाहरण -
हमारे काव्यग्रन्थ व प्राचीन ग्रन्थ केवल धार्मिक विषयों को ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत के प्राचीन भूगोल व परिस्थितिकी तंत्र के विषय को भी समझाते हैं।
आलेख
डॉ अलका यतींद्र यादव बिलासपुर छत्तीसगढ़
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