मानव इतिहास को सहेजती गोत्र प्रणाली
July 07, 2025
संवत् 2082 विक्रमी | चैत्र कृष्ण अष्टमी | बुधवार
नक्षत्र: ज्येष्ठा | योग: वज्र | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 11 मार्च 2026

श्री कृष्ण जनमाष्टमी विशेष आलेख
पर्यावरण संरक्षण की चेतना वैदिक काल से ही प्रचलित है। प्रकृति और मनुष्य सदैव से ही एक दूसरे के पूरक रहे हैं। एक के बिना दूसरे की कल्पना करना बेमानी है। वैदिक काल के ध्येय वाक्य "सर्वे भवन्तु सुखिनः" की अभिधारणा लिए प्रकृति और मनुष्य एक दूसरे की सहायता करते थे। संहारक की स्थिति के बावजूद प्रकृति सदैव मनुष्य को अपने अनुपम उपहारों से सँवारती रही है। ऐसा नहीं है कि प्रकृति पर अतिक्रमण आधुनिक काल में ही प्रारम्भ हुआ, भगवान श्रीकृष्ण के समय में भी यह सब व्याप्त था। उस समय भी प्रकृति के संरक्षण एवं संवर्धन करने के सार्थक प्रयास हमारे भगवान श्री कृष्ण द्वारा किये गए जिसके लिए पूरी मानव सभ्यता उनकी ऋणी रहेगी।
सर्वप्रथम हम उनके द्वारा धारण की जाने वाली वेषभूषा को ही देख ले उनसे ही उनके प्रकृति प्रेम को साक्षात समझा देखा जा सकता है। कृष्ण प्रकृति के कितने बड़े सचेतक और प्रकृति प्रेमी थे, इसका पता उनके द्वारा उपयोग की जाने वाली प्रिय वस्तुओं के अवलोकन से चलता है। उनकी प्रिय कालिन्दी, गले में वैजयंती फूलों की माला, सिर पर मयूर पिच्छ, अधरों पर बांस की बांसुरी, कदम्ब की छाँव और उनकी प्रिय धेनु यह सब इस बात की ओर इंगित करते है कि श्रीकृष्ण पर्यावरण के सच्चे हितैषी और संरक्षक थे।
गीता में प्रकृति के साथ अपने अभेद को व्यक्त करते हुए वह कहते है- "अश्वथ सर्ववृक्षाणां" अर्थात वृक्षों में वह अपने को पीपल बतलाते है। इतना ही नहीं वह ऋतुओं में स्वयं को बसन्त, नदियों में स्वयं को गंगा की उद्घोषित करते हैं। इसका तात्पर्य ही यह है कि सृष्टिं के कण कण में उनका वास है अतः हमें सबका संवर्धन पोषण व सुरक्षा करनी चाहिए। हरे-भरे वृक्षों से आच्छादित वृन्दावन की प्राकृतिक सुषमा से वह काफी प्रभावित नजर आते हैं। "वन में देहरूपकम" कह कर वह वृन्दावन को अपनी देह के समान बतलाया हैं। तुलसी से भरे वृन्दावन की शोभा के गुणगान के पीछे भी तुलसी की महत्ता व औषधीय प्रयोग की जीवन मे महत्ता समझाना ही परिलक्षित होता है।
श्री कृष्ण की बाल्यकाल से ले कर जीवनपर्यंत तक की अंनत लीलाओ में भी पर्यावरण संरक्षण की अनन्य प्रेरणाएँ छुपी पड़ी है। उस युग मे भी श्रीकृष्ण के जीवन चरित्र में उनके प्रकृति एवं पर्यावरण प्रेम की जो खुशबू हम पाते हैं वैसी अन्यत्र कहीं नहीं मिलती। वे सचमुच प्रकृति प्रेम और पर्यावरण क्रांति के प्रेरक युग पुरूष थे। साढ़े सात वर्ष की उम्र में उन्होंने प्रकृति के प्रति अद्भुत प्रेम और महत्त्व दर्शाते हुए उन्होंने जो गोवर्धन लीला की, उसके पीछे भी पर्यावरण संरक्षण का ही अनन्य सन्देश छिपा है।
वर्षा के लिए इन्द्रदेव की पूजा को अनावश्यक करार देते हुए गोवर्धन नामक दिव्य पर्वत की पूजा करने के लिए बृजवासियों को प्रेरित किया। गोवर्धन पर्वत की संरचना ही कुछ ऐसी रही है कि उसके करीब 22 वर्ग किलोमीटर के आकार में अधिक ऊंचाई न होकर समतल फैलाव अनेक स्थानों पर है जिससे उस पर गायों के लिए खूब घास, औषधिक वनस्पति एवं अनेक पेड़ पौधे उगे हुए हैं। कृष्ण ने कहा कि हमारे समस्त गोधन जो उस समय सम्पत्ति का सूचक था,को यह चारा उपलब्ध कराता था। इसी से वर्षा का जल बहकर यमुना में जाता है। श्री कृष्ण ने उसके भौगोलिक व पर्यावरणीय महत्व को समझा और बृजवासियों को भी समझाया अत: इंद्र की पूजा के बजाय गोवर्धन पूजा का विधान आरम्भ किया। उसके बाद इन्द्रकोप का सामना कर इन्द्र का मान मर्दन जिस प्रकार से उन्होंने गोवर्धन धारण कर किया वह जग विदित ही है।
कदम्ब और करील के वृक्षो को जिस तरह उन्होंने संवर्धन एवं गरिमा प्रदान की उसका वर्णन श्रीमद्भागवत एवं गर्ग संहिता में मिलता है।कृष्ण ने गीता में स्वयं अपना परिचय देते हुए यह स्पष्ट कहा कि वह देवो में इन्द्र, मुनियों में कपिल तथा पेड़ों में साक्षात पीपल है। यह वनस्पति विज्ञान का प्रामाणिक तथ्य है कि पेड़ों में सर्वाधिक प्राणवायु अर्थात ऑक्सीजन देने वाला पेड़ पीपल ही है,अतः उसे गरिमा प्रदान की गई।
श्री कृष्ण की बाल्य लीलाओ में दूसरी प्रमुख लीला है कालिया नाग के मान मर्दन की लीला। कालिया नाग की लीला की पृष्ठ भूमि में निहित दर्शन और पर्यावरण तत्व को समझने की जरूरत है। कृष्ण के लिए यह उनकी सहन शक्ति के बाहर था कि यमुना जैसी पवित्र नदी का जल प्रदूषित हो जाए और ऐसा विषैला जल पीकर बृजवासी और उनका पशुधन मौत के मुंह में चला जाए। इसीलिए उन्होंने कालिया नाग को यमुना नदी छोड़ कर चले जाने को विवश किया और यमुना का जल उसके जहर से प्रदूषण मुक्त किया। उन्होंने कालिया नाग को भी मारा नही केवल अन्यत्र जाने को विवश किया ताकि यमुना प्रदूषण मुक्त हो और सृष्टि में नागों का अस्तित्व भी बना रहे।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश मे गाय और गो वंश की महत्ता से कृष्ण भलीभांति परिचित थे अतः उन्होंने बाल्यकाल से ही गोवंश को बचाने को प्राथमिकता दी। प्रारम्भ से गोपालन और गायें चराने के कारण उनका नाम गोपाल पड़ा। गाय के दूध, दही, मक्खन, घी से तन मन को बलिष्ठ बनाना, उसके गोबर से ईधन, आंगन एवं कुटि लेपन तथ गोमूत्र से नाना प्रकार के उपचार से लोगों को लाभान्वित होने के लिए उन्होंने प्रेरित किया।
आज वैज्ञानिक मानते हैं कि गोबर से लेपित आंगन एवं दीवारों वाले मकान पर अणु परमाणु विकिरण का प्रभाव नहीं पड़ता। पूतना के वध के बाद गोपियां श्रीकृष्ण के अंगों पर गोमूत्र, गोरज व गोमय लगा कर शुद्धि करती हैं क्योंकि उन्होंने पूतना के मृत शरीर को छुआ था और गाय की पूंछ को श्रीकृष्ण के चारों ओर घुमाकर उनकी नजर उतारती हैं। तीनों लोकों के कष्ट हरने वाले श्रीकृष्ण के अनिष्ट हरण का काम गाय करती है।
जब-जब श्रीकृष्ण पर कोई संकट आया नंदबाबा और यशोदा माता ब्राह्मणों को स्वर्ण, वस्त्र तथा पुष्पमाला से सजी गायों का दान करते थे। यह है गौमाता की महिमा और श्रीकृष्ण के जीवन में उनका महत्व। नंद बाबा के घर सैंकड़ों ग्वालबाल सेवक थे पर श्रीकृष्ण गायों को दुहने का काम भी स्वयं करना चाहते थे।
कन्हैया ने आज माता से गाय चराने के लिए जाने की जिद की और कहने लगे कि भूख लगने पर वे वन में तरह-तरह के फलों के वृक्षों से फल तोड़कर खा लेंगे। पर मां का हृदय इतने छोटे और सुकुमार बालक के सुबह से शाम तक वन में रहने की बात से डर गया और वह कन्हैया को कहने लगीं कि तुम इतने छोटे-छोटे पैरों से सुबह से शाम तक वन में कैसे चलोगे, लौटते समय तुम्हें रात हो जाएगी। तुम्हारा कमल के समान सुकुमार शरीर कड़ी धूप में कुम्हला जाएगा परन्तु कन्हैया के पास तो मां के हर सवाल का जवाब है। वह मां की सौगंध खाकर कहते हैं कि न तो मुझे धूप लगती है और न ही भूख और वह मां का कहना न मानकर गोचारण की अपनी हठ पर अड़े रहे और गौचारण इतने प्यार से करते रहे कि प्यारे कन्हैया की छवि गौ के बिना अधूरी ही लगती है। बेकार समझा जाने वाले बांस को बेसुरा कहा जाता था किंतु कन्हैया ने उसमें अनन्य सुर भरकर उसे बांसुरी बना दिया और यह संदेश दिया कि प्रकृति की दी कोई भी वस्तु व्यर्थ नही है, बस उसे उपयोग करना आना चाहिए। उसी बांसुरी से कृष्ण जब मधुर मुरली की तान छेड़ते थे तब गोपियों के अलावा तोतें, मोर, हिरण एवं अन्य पशु पक्षी तक उनके पास आ बैठते थे।
जहां तक मोरपंख की बात है, कहते हैं कि त्रैतायुग में सीता वियोग में वन विचरण करते राम लक्ष्मण को एक मोर ने आगे -आगे चल कर किष्किन्धा पर्वत का रास्ता दिखाया था। उसी का आभार मानकर कृष्ण ने द्वापरयुग में अपने मुकुट में मोरपंख को धारण किया। कृष्ण को 'वासुदेव' भी कहते हैं। 'वासुदेव' का अर्थ वह देव जिसका 'कण-कण में वास हो'। जब कृष्ण का कण-कण में वास है तो प्रकृति का वह कौन सा जर्रा हो सकता है जिसमें वे न हों और उस जर्रे तक के संरक्षण से उन्हें प्रेम न हो।
जब एक बार ब्रह्मा जी को महामाया के प्रभाव से यह भ्रम हो गया कि कृष्ण जो एक साधारण ग्वाल बाल के रूप में गायें चराते हैं, वह सर्वज्ञ ब्रह्म कैसे हो सकते हैं? इसकी परीक्षा के लिए जब उन्होंने एक बार कृष्ण के ग्वाल सखाओं और गाय बछड़ों का अपहरण कर एक गुफा में छुपा लिया तब कृष्ण ने ऐसी लीला रची कि ब्रह्माजी को सभी गाय बछड़ों तथा यहाँ तक कि हर पेड़ पौधे में कृष्ण की छवि नजर आने लगी। इस पर उन्होंने अपने इस कृत्य के लिए लज्जित होते हुए क्षमा याचना की।
मिट्टी पृथ्वी के पर्यावरण का प्रमुख अंग है। इसी के कारण खेती बाड़ी और पेड़ पौधों का अस्तित्व सम्भव है। इसीलिए उन्होंने 'ब्रज की रज' का महत्त्व इतना अधिक बतलाया कि स्वयं मुक्ति का भी महत्त्व उसके आगे फीका पड़ गया। उन्होंने गीता (3/13) में यज्ञ की अपनी निराली परिभाषा देते हुए ‘‘यज्ञ शिष्टा शिन: सन्तोमुच्यन्ते सर्व किल्विषै भुज्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्म् कारणात’’ की जो बात कही है उसमें प्रकृति के समस्त जीवों के संरक्षण एवं उनके पर्यावरण प्रेम की खुशबू आती हैं। उन्होंने यही कहा कि जो व्यक्ति अपनी आय के पाँच हिस्से कर केवल पांचवा हिस्सा स्वयं के पोषण पर तथा शेष चार भाग पृथ्वी के अन्य जीवों एवं पेड़ पौधों संरक्षण पर खर्च करता है वह पुण्यवान जीवन जीता है अन्यथा जो केवल अपने सुख और पेट को भरने पर ध्यान देता है वह साक्षात पाप को खाता है।
आज पूरा विश्व पर्यावरण संक्षरण के लिए काम कर रहा है. पर्यावरण और पशुधन हमेशा से भारत के आर्थिक चिंतन का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है और हमारी प्रेरणा के लिए श्री कृष्ण से बढ़ कर कोई और आदर्श और ब्रज भूमि से बेहतर कोई स्थान नहीं हो सकता है। भगवान श्री कृष्ण प्रकृति और पर्यावरण के परम उपासक है। उन्होंने इन्द्र पूजा का विरोध कर ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का संदेश देकर पूरे मानव समाज को प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण की दिशा में क्रांति का उद्घोष किया।
कृष्ण माखन चोरी कर गोपियों को दर्शन देते थे, गोपियां अष्ट पहर श्रीकृष्ण का चिंतन करती थीं। प्रेमभाव के इस दृश्य में संतों ने लिखा है कि "ताही अहीर की छोहरियां छछिया भर छाछ पर नाच नचावे", भगवान श्री कृष्ण का यह नृत्य नयनाभिराम होता था। आचार्य ने कहा भगवान कृष्ण द्वारा वन में जाकर गाय चराना, जात पात का भेद मिटाकर ग्वालों के साथ बैठकर कलेवा करना, ब्रह्मा जी का मोह दूर करना। इंद्र का अहंकार मिटाना, उसके कोप से ग्वालों को बचाना। यह लीलाएं हम सभी के लिए संदेश देती हैं।
उन्होंने कहा कि भगवान ने गोवर्धन पर्वत पूजन कर, पहाड़ों, वृक्षों की रक्षा का संदेश दिया। वृक्ष द्वारा हमें प्राणवायु, समिधा, फल-फूल मिलता हैं। इस तरह भगवान श्रीकृष्ण ने लीलाओं जे माध्यम से पर्यावरण की रक्षा करना बताया है। वर्तमान में मनुष्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति लापरवाह हो रहा है, कुछ संगठनों द्वारा जरूर प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन सभी को अपनी भूमिका का निर्वहन करना होगा।
आज समूचा विश्व पर्यावरण की विकृति से जूझ रहा है।' ओजोन परत ' के क्षीण होने से पृथ्वी पर सूर्य का ताप बढ़ने लगा है। ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से विश्व आज त्रस्त नजर आता है। कहीं सुनामी आ रही है, तो कहीं भूकम्प आ रहा है। यह सब पर्यावरण में आये असंतुलन के कारण ही है। प्रकृति के इस असंतुलन का जिम्मेदार मानव ही है। अपने जीवन को आरामदायक बनाने के लिए उसने प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन कर उसे हानि पहुंचाने का प्रयास किया है। आज स्थिति इतनी भयावह हो गयी है कि पर्यावरण संरक्षण एक वैश्विक मुद्दा बन गया है। ऐसे में हम अपने लोकनायक श्री कृष्ण को प्रेरणास्त्रोत बना कर उनके आदर्शों पर चल कर पर्यावरण की रक्षा कर सकते है और पृथिवी को संकटो से बचा सकते है।
आलेख
डॉ नीता चौबीसा,
लेखिका, इतिहासकार एवं भारतविद, बाँसवाड़ा,राजस्थान
मानव इतिहास को सहेजती गोत्र प्रणाली
July 07, 2025
नील की गोदी में सोये मिश्र का भारत से प्राचीन सम्बन्ध
July 05, 2025
वैनायकी की व्याख्या: पौराणिक ग्रंथों में देवी की विविध छवियाँ
April 30, 2025
पितृ-पक्ष श्राद्ध का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक रहस्य
October 04, 2023
गांधी को समझने के लिए गांधी दर्शन को समझना नितांत आवश्यक
October 02, 2023
गणेश चतुर्थी को चंद्र दर्शन निषेध क्यों?
September 19, 2023
जिजीविषा और तप के बीज : हरितालिका तीज
September 17, 2023
शिव का अघोरी रूप एवं महिमा
August 28, 2023
नील की गोदी में सोये मिश्र का भारत से प्राचीन सम्बन्ध
August 25, 2023
गंगा अवतरण : आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक रहस्य
August 11, 2023
सब धरती कागद करूँ , लेखनी सब बनराय : गुरु पूर्णिमा विशेष
July 03, 2023
नवसस्येष्टि यज्ञ :पौराणिक ऐतिहासिक संदर्भ
March 07, 2023
सनातन विश्व में पर्यावरण क्रांति के अग्रदूत : श्री कृष्ण
August 19, 2022
प्रथम नहर और बीज विज्ञानी: भगवान हलधर
August 17, 2022
वासंती माटी पर खिले भारत की स्वाधीनता के पुष्प
August 15, 2022
विराट भारत का महा संकल्प दिवस : श्रावणी पर्व
August 11, 2022
मानव इतिहास को सहेजती गोत्र प्रणाली
July 13, 2022
भारत के इतिहास से छेड़छाड़ : सत्य शोधन की आवश्यकता
July 06, 2022
मध्ययुगीन भारतीय भक्ति परम्परा की सिरमौर मीरा बाई
October 31, 2020
हमारी ज्ञान परम्परा का महत्त्वपूर्ण घटक हैं जनऊला!
March 11, 2026
पौराणिक कथा - चार प्रश्न
March 10, 2026
फागुन मंडई- देवी के शक्तिपीठ स्थापना का देव दुर्लभ पर्व
March 10, 2026
बुन्देली चित्रकला
March 09, 2026
भारतीय नारी का आदर्श
March 08, 2026
धूलपंचमी को मेला के अवसर पर पीथमपुर के कालेश्वरनाथ
March 08, 2026
केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि इतिहास का जीवन्त अभिलेख है बहुरुपियों की लुप्त होती कलाएँ!
March 07, 2026
सबहिं धरे सजि निज-निज द्वारे: भारत में द्वार-सज्जा के विविध रूप
March 06, 2026
बस्तर का सामाजिक ताना बाना, साझी विरासत, संस्कृति और देव परंपरा के मूल भाव में समरसता
March 05, 2026
सुप्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी, चिन्तक व विचारक : पृथ्वीसिंह आजाद (आज पुण्यतिथि)
March 05, 2026
ब्रज के देवालयों में होली उत्सव
March 03, 2026
जनजातीय समुदायों में होली का पर्व
March 03, 2026
होली की आभा है- पलाश
March 02, 2026
होली- लोकजीवन का बहुरंगी त्यौहार
March 01, 2026
खेले मसान में होरी दिगम्बर....
February 28, 2026
फाग का लोकरंग
February 27, 2026
दक्षिण कोसल की वैज्ञानिक प्रेरणा और रसतत्त्व के महान् ऋषि - आचार्य नागार्जुन
February 27, 2026
चेतना के व्यक्त प्रतीकः मन्दिर
February 26, 2026
पुस्तक समीक्षा : सावरकरकृत ‘भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ’
February 25, 2026
रैबारी के रीति रिवाज एवं परम्पराएँ
February 23, 2026
हमारी ज्ञान परम्परा का महत्त्वपूर्ण घटक हैं जनऊला!
March 11, 2026
पौराणिक कथा - चार प्रश्न
March 10, 2026
फागुन मंडई- देवी के शक्तिपीठ स्थापना का देव दुर्लभ पर्व
March 10, 2026
बुन्देली चित्रकला
March 09, 2026
भारतीय नारी का आदर्श
March 08, 2026
धूलपंचमी को मेला के अवसर पर पीथमपुर के कालेश्वरनाथ
March 08, 2026
केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि इतिहास का जीवन्त अभिलेख है बहुरुपियों की लुप्त होती कलाएँ!
March 07, 2026
सबहिं धरे सजि निज-निज द्वारे: भारत में द्वार-सज्जा के विविध रूप
March 06, 2026
बस्तर का सामाजिक ताना बाना, साझी विरासत, संस्कृति और देव परंपरा के मूल भाव में समरसता
March 05, 2026
सुप्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी, चिन्तक व विचारक : पृथ्वीसिंह आजाद (आज पुण्यतिथि)
March 05, 2026
ब्रज के देवालयों में होली उत्सव
March 03, 2026
जनजातीय समुदायों में होली का पर्व
March 03, 2026
होली की आभा है- पलाश
March 02, 2026
होली- लोकजीवन का बहुरंगी त्यौहार
March 01, 2026
खेले मसान में होरी दिगम्बर....
February 28, 2026
फाग का लोकरंग
February 27, 2026
दक्षिण कोसल की वैज्ञानिक प्रेरणा और रसतत्त्व के महान् ऋषि - आचार्य नागार्जुन
February 27, 2026
चेतना के व्यक्त प्रतीकः मन्दिर
February 26, 2026
पुस्तक समीक्षा : सावरकरकृत ‘भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ’
February 25, 2026
रैबारी के रीति रिवाज एवं परम्पराएँ
February 23, 2026
This is the commets tab content.
This is the Tags tab content.
Note * Your email address will not be published. Required fields are marked
प्राचीन गुरुकुल पद्धति और शिक्षा के सरोकार
August 01, 2025