आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

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नाग पंचमी का वैश्विक एवं आध्यात्मिक दर्शन

नाग पंचमी का वैश्विक एवं आध्यात्मिक दर्शन


नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु।
ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः॥
अर्थात: जो सर्प पृथ्वी पर हैं, अंतरिक्ष में हैं या आकाश में हैं, उन सभी नागों को हमारा प्रणाम है।

हिंदू परंपरा में नाग पंचमी का त्योहार श्रद्धा, प्रकृति संरक्षण और आध्यात्मिक चेतना का एक अद्भुत संगम है। भारतीय संस्कृति की यह विशेषता रही है कि यहाँ जड़ और चेतन, दोनों में ईश्वर का वास देखा जाता है। वेदों का उद्घोष है-  “ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्” अर्थात इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी गतिशील या स्थिर है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। नाग पंचमी का पर्व इसी महान दर्शन का सजीव प्रतीक है।

सनातन धर्म में प्रकृति पूजा कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक उच्च वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण है। हमारे ऋषियों-मुनियों ने वृक्षों (पीपल, तुलसी), नदियों (गंगा, यमुना), पर्वतों (गोवर्धन, हिमालय) और पशु-पक्षियों (गाय, गरुड़, नाग) में दिव्य ऊर्जा का दर्शन किया। नाग पंचमी का पर्व इसी 'वसुधैव कुटुंबकम्' और 'सर्वभूतहिते रताः' (सभी जीवों के कल्याण) की भावना का विस्तार है। यह पर्व हमें सिखाता है कि मानव का अस्तित्व प्रकृति के बिना अधूरा है और नाग इस पारिस्थितिक तंत्र के अत्यंत महत्वपूर्ण रक्षक हैं।


नागपंचमी में नाग प्रतिमा की पूजा

भारत के अलग-अलग प्रांतों में नाग पंचमी को मनाने की अनूठी और समृद्ध परंपराएँ हैं:

  • उत्तर भारत: यहाँ लोग सुबह स्नान करके घरों के मुख्य द्वारों पर गोबर, गेरू या कोयले से नाग देवता की आकृति (नागपुत्तलिका) बनाते हैं। नागों को दूध, धान का लावा (खील), और दूब (दूर्वा) अर्पित की जाती है। इस दिन खेतों में हल चलाना या खुदाई करना वर्जित होता है।

  • छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ी संस्कृति में नाग पंचमी का विशेष महत्व है। यहाँ इस दिन पारंपरिक रूप से 'नागपंचमी मेला' (जैसे दलहा पहाड़ का मेला) आयोजित होता है। अखाड़ों में पहलवान अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। घरों में पारंपरिक व्यंजन जैसे 'चीला' और 'फरा' बनाए जाते हैं और नाग देवता को अर्पित किए जाते हैं।

  • महाराष्ट्र: यहाँ नाग पंचमी को बड़े उत्साह से मनाया जाता है। लोग मिट्टी के नाग की मूर्ति लाकर या सजीव नागों (कालसर्प) की पूजा करते हैं। इस दिन कड़ाही में कुछ भी तलना (तळणे) निषेध माना जाता है। बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करती हैं।

  • दक्षिण भारत: दक्षिण में (विशेषकर कर्नाटक और आंध्र प्रदेश) इसे 'नागुल चविथी' या 'नाग पंचमी' के रूप में मनाया जाता है। यहाँ मिट्टी के बांबी (पुट्टा) की पूजा की जाती है, जहाँ नागों का निवास होता है। लोग बांबी में दूध और अंडा अर्पित करते हैं। विवाहित महिलाएँ अपनी संतान और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए उपवास रखती हैं।

पौराणिक, ऐतिहासिक और ग्रंथीय संदर्भ

वेदों और उपनिषदों में नाग तत्व

  • यजुर्वेद: यजुर्वेद में नागों को नमस्कार करते हुए विशेष मंत्रों का उल्लेख है।

  • उपनिषद: उपनिषदों में सर्प को ब्रह्मांडीय ऊर्जा और प्राण शक्ति का प्रतीक माना गया है।

रामायण और महाभारत में संदर्भ

  • रामायण: लक्ष्मण जी को स्वयं शेषनाग का अवतार माना गया है। उन्होंने त्रेतायुग में भगवान श्रीराम की सेवा के लिए अवतार लिया। मेघनाद के 'नागपाश' से जब श्रीराम और लक्ष्मण मूर्छित हुए, तब गरुड़ देव ने आकर उन्हें मुक्त किया था, जो नागों की अगाध शक्ति को दर्शाता है।

  • महाभारत: महाभारत की कथा तो नागों से गहराई से जुड़ी है। अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हुई थी। इसके प्रतिशोध में उनके पुत्र जनमेजय ने 'सर्प मेध यज्ञ' (सर्पसत्र) किया था। आस्तिक मुनि के हस्तक्षेप पर नाग पंचमी के दिन ही इस यज्ञ को रोका गया था और सर्प जाति की रक्षा हुई थी। तभी से नाग पंचमी मनाने की परंपरा और सुदृढ़ हुई।


महाभारत परम्परा में जनमेजय के सर्पसत्र को आस्तिक मुनि द्वारा रोके जाने का प्रसंग

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण का उद्घोष:

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥

भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं - मैं शस्त्रों में वज्र हूँ, गौओं में कामधेनु हूँ, संतानोत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ और सर्पों में राजा वासुकि हूँ।

जब कुरुक्षेत्र की भूमि पर योगेश्वर श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं, तो वे नागराज वासुकि को स्वयं का ही स्वरूप बताते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक सिद्ध करता है कि नाग वंश कोई साधारण जीव नहीं, बल्कि साक्षात् नारायण की चेतना का प्रतीक है। नागपंचमी का यह पावन दिन हमें याद दिलाता है कि सृष्टि के कण-कण में, और सर्प जैसी संहारक शक्ति में भी, उसी परमेश्वर का वास है।

धार्मिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व

धार्मिक दृष्टिकोण: हिंदू त्रिमूर्ति में नागों का स्थान सर्वोच्च है। भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर शयन करते हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि समय और काल (शेष) के ऊपर ही संपूर्ण सृष्टि टिकी है। वहीं, देवाधिदेव महादेव शिव जी अपने गले में वासुकि नाग को धारण करते हैं। यह दर्शाता है कि विषैले और भयानक जीवों को भी यदि शरण मिले, तो वे आभूषण बन जाते हैं।


देवाधिदेव महादेव शिव जी

आध्यात्मिक और यौगिक दर्शन (कुण्डलिनी शक्ति):

अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।
शङ्खपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा॥

भावार्थ: अनन्त, वासुकि, शेष, पद्मनाभ, कम्बल, शंखपाल, धृतराष्ट्र, तक्षक और कालिया—इन नौ नाग देवताओं का स्मरण कल्याणकारी है।

भारतीय दर्शन और तंत्र शास्त्र में 'नाग' केवल एक रेंगने वाला जीव नहीं, बल्कि चेतना की उस अनंत ऊर्जा का प्रतीक है जिसे हम 'कुंडलिनी शक्ति' कहते हैं। मूलाधार चक्र में सुप्त पड़ी यह नागिन रूपी शक्ति जब जाग्रत होती है, तो मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है। नागपंचमी का उत्सव बाह्य जगत में नागों की पूजा के साथ-साथ, हमारे भीतर छिपी इसी असीम दार्शनिक और आध्यात्मिक ऊर्जा को जगाने का पर्व है।

नागबंधन और तांत्रिक महत्व: भारतीय मूर्तिकला और तंत्र शास्त्र में 'नागबंधन' की कला अत्यंत प्रसिद्ध है। यह दो या दो से अधिक नागों के अंतर्ग्रथन (गुंथे होने) की आकृति होती है। दार्शनिक रूप से यह जीव और शिव के मिलन, प्रकृति और पुरुष के जुड़ाव, तथा समय के चक्रव्यूह को दर्शाती है। प्राचीन मंदिरों के गर्भगृह और द्वारों पर नागबंधन की आकृतियाँ नकारात्मक ऊर्जा को रोकने के लिए बनाई जाती थीं।


नागबंधन की आकृतियाँ

सामाजिक और सांस्कृतिक प्रासंगिकता

गाँव और घर की जीवंत परंपराएँ ग्रामीण भारत में नाग पंचमी केवल एक पूजा नहीं, बल्कि एक सामाजिक उत्सव है। श्रावण मास की रिमझिम फुहारों के बीच, खेतों में हरियाली छा जाती है। इस समय सांप अपने बिलों से बाहर आते हैं।

  • कृषक मित्र के रूप में: गाँवों में किसान नागों को 'क्षेत्रपाल' (खेतों का रक्षक) मानते हैं। नाग खेतों में फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले चूहों और कीटों का शिकार करते हैं। इसलिए, नाग पंचमी पर किसान नागों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

  • भय से श्रद्धा की ओर: यह पर्व हमें सिखाता है कि जिससे भय हो, उसे नष्ट करने के बजाय उसके अस्तित्व को स्वीकार करें और उसे सम्मान दें।

साधु-संतों, ऋषियों के उपदेश और हमारा दायित्व

संतों की वाणी: महापुरुषों और ऋषियों ने हमेशा संदेश दिया कि अहिंसा ही परम धर्म है। संत ज्ञानेश्वर, स्वामी विवेकानंद और आधुनिक युग के पर्यावरणविदों ने भी यह स्पष्ट किया है कि सृष्टि के हर जीव में एक ही चेतना धड़कती है। यदि हम किसी एक जीव की प्रजाति को नष्ट करते हैं, तो हम स्वयं के विनाश का मार्ग प्रशस्त करते हैं।


प्रकृति और उसकी प्रत्येक जीव प्रजाति का संरक्षण

पर्यावरण संरक्षण और हमारा आधुनिक दायित्व: आज अंधाधुंध शहरीकरण, वनों की कटाई और रासायनिक खेती के कारण नागों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। कई लोग डर के कारण या अंधविश्वास में आकर इन बेजुबान जीवों को मार देते हैं। नाग पंचमी के इस पावन अवसर पर हमारा सबसे बड़ा संकल्प होना चाहिए:

  • अंधविश्वास से मुक्ति: सपेरों द्वारा पकड़े गए सांपों को जबरन दूध पिलाने से उनके फेफड़ों में संक्रमण हो जाता है और वे मर जाते हैं। हमें सपेरों से सांपों को मुक्त कराकर उन्हें वन विभाग या सर्प मित्रों को सौंपना चाहिए।

  • पारिस्थितिक संतुलन: नागों का संरक्षण करना हमारी जैव विविधता के लिए अनिवार्य है।

  • जीव दया: ऋषियों के उपदेशों को जीवन में उतारते हुए, हमें उनके प्रति हिंसक होने के बजाय उनके अस्तित्व का सम्मान करना चाहिए।

नाग पंचमी का त्योहार अतीत की कड़ियों को आधुनिक विज्ञान से जोड़ने वाला एक सेतु है। यह हमें याद दिलाता है कि मानव इस धरती का स्वामी नहीं, बल्कि इसका एक हिस्सा मात्र है। जब हम नाग देवता के सामने शीश झुकाते हैं, तो हम वास्तव में पूरी प्रकृति की संप्रभुता के सामने नतमस्तक होते हैं।

शुभम भवतु। नाग देवता आप सभी के जीवन की रक्षा और उन्नति करें।

लेख:
श्री विकेश कुमार हिचामी,
छत्तीसगढ़

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