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जनयोद्धा टंट्या भील : भारत के अमर क्रांतिकारी

जनयोद्धा टंट्या भील : भारत के अमर क्रांतिकारी

टंट्या भील एक ऐसा व्यक्तित्व था जिसने वन में जन्म लेकर, अभाव और अशिक्षा से जूझते हुए अपनी इच्छा शक्ति और संकल्प से एक ऐसा असाधारण आंदोलन छेड़ा जो शोषण और अन्याय के प्रतिकार का प्रतीक बनकर संपूर्ण समाज में छा गया। अपने समाज के प्रति टंट्या का जुड़ाव इतना गहरा था कि आज भी इस इलाके का हर बच्चा बलिदानी टंट्या को 'मामा' के संबोधन से पुकारता है।

स्व के लिए सर्वस्व अर्पित : अलौकिक महारथी टंट्या मामा" - The Narrative World

मध्य प्रदेश के खंडवा जिले की पंधाना तहसील के बड़दा गांव में सन् १८४२ में भाऊ सिंह के यहां एक बालक ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया टंट्या। टंट्या की मां टंट्या के बचपन में ही स्वर्ग सिधार गयी थीं। भाऊसिंह ने बच्चे के लालन पालन के लिये दूसरी शादी भी नहीं की। पिता ने टंट्या को लाठी-गोपन व तीर-कमान चलाने का प्रशिक्षण दिया। टंट्या ने धनुर्विद्या में भी दक्षता हासिल कर ली थी। वह गांव में सबका दुलारा था। उसकी व्यवहार कुशलता और विनम्रता ने उसे लोकप्रिय बना दिया।

आज भी जनजाति घरों में टंट्या भील को देवता की तरह माना जाता है। जनजाति जन कहते हैं कि टंट्या को अलौकिक शक्ति प्राप्त थी, इन्हीं शक्तियों के सहारे टंट्या भील एक ही समय सत्रह सौ ग्रामों में ग्राम सभा किया करते थे, इन्हीं शक्तियों के कारण अंग्रेजों के दो हजार सैनिक टंट्या भील को पकड़ नहीं पाते थे। टंट्या भील देखते ही देखते अंग्रेजों के आंखों के सामने से ओझल हो जाते थे। कहा जाता है कि टंट्या भील सैकड़ों जनजाति झगड़ों को ग्राम सभा में ही हल कर देते थे।

टंट्या के जीवन में विद्रोह अपने और समाज के शोषण को देखकर हुआ। टंट्या ने सबसे पहले अपने ही गांव में शिवा पटेल के विरुद्ध मात्र चौदह वर्ष की आयु में आवाज उठायी जिसके प्रतिकार स्वरूप शिवा पटेल ने उसके पिता की हत्या कर दी। बस यहीं से टंट्या का विद्रोह शुरू हुआ। टंट्या का संघर्ष सामंतों और साहूकारों के विरुद्ध जनक्रांति थी जो आगे चलकर अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता का संग्राम बना ।

टंट्या ने गांव वालों को एकत्रित करके उन्हें खेती करने के लिये प्रेरित किया। टंट्या की प्रेरणा से लोगों ने अपनी खेती करना शुरू किया। यह बात पटेल साहूकारों को असहनीय थी, उन्होंने टंट्या पर चोरी का आरोप लगाकार जेल भिजवा दिया।

एक वर्ष पश्चात् जेल से छूटकर टंट्या अपने गांव बडदा न पहुंचकर लोगों को जगाने लगे। अपनी सुरक्षा के पक्ष को ध्यान में रखकर अब टंट्या ने निमाड़ छोड़ होल्कर और निमाड़ की सीमा सीहोरा में अपना डेरा जमाया। १८५७ की लड़ाई को सुदूर वन प्रांतों और उसके समीप बसे गांवों तक ले जाने का श्रेय टंट्या भील को ही जाता है। उस काल में १८५७ की क्रांति के महानायक तात्या टोपे की टंट्या भील से कई मुलाकातें हुई। जब टंट्या के स्वाधीनता अभियान की भनक अंग्रेजों और साहूकारों को लगी, तब अंग्रेजों ने पोखर गांव के सरदार पटेल के साथ साजिश रचकर टंट्या को खंडवा जेल में बंद कर दिया।

साथ ही उसके साथी बिजन्या और दोल्या को भी पकड़ लिया। लेकिन योद्धाओं को भला कौन रोक सकता है? तीनों वीर सेनानी जेल की छत से भाग निकलते हैं। १८८६ तक टंटया ने निमाड़ और मालवा की होल्कर रियासत के सीमावर्ती खरगौन, मंडलेश्वर और महेश्वर क्षेत्र में अंग्रेजी सरकार को चैन की सांस नहीं लेने दी। टंट्या को आमने-सामने न पकड़ पाने की स्थिति में अंग्रेज पुलिस टंट्या की मुंहबोली बहन के पति गद्दार गणपत के साथ साजिश रचती है। राखी के दिन धोखे से टंट्या को गणपत के यहां पकड़ लिया जाता है। २६ सितंबर १८८९ को जिला अधिकारी की अदालत में मुकदमा चलाया गया। ४ दिसंबर १८८९ को वीर नायक टंट्या भील को फांसी दे दी गयी। निमाड़ के जनमानस की आस्था और विश्वास का प्रतीक लोकनायक टंट्या तो अपने जीवनकाल में ही निमाड़ के अंचलों में अमरत्व पा चुके थे, जिसे कोई फांसी कैसे समाप्त कर सकती है। आज भी उनकी वीरता की गाथा सुनाई जाती है
 

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