आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल तृतीया | सोमवार

नक्षत्र: रोहिणी | योग: सौभाग्य | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 20 अप्रैल 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल तृतीया | सोमवार

नक्षत्र: रोहिणी | योग: सौभाग्य | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 20 अप्रैल 2026

भोजपुरी लोकगीत-शैली : पवाँरा

भोजपुरी लोकगीत-शैली : पवाँरा

गांव से खबर आई कि छोटे भाई के नवजात शिशु का बधावा गाने घर पर पर्वरिया आने वाले हैं। उस अवसर पर मैं उपस्थित हुआ और पाँरा सुनने का आनंद उठाया। 'पाँरा' एक लोकगीत शैली है जो कथा और नाटक के साथ मिश्रित संगीत के रूप में प्रस्तुत की जाती है। भारत में ऋतु के पर्व-त्योहार और जीवन के अनेक अवसरों पर आधारित असंख्य लोकगीत हैं जो आज भी ग्रामीण श्रोताओं-दर्शकों का मनोरंजन करते हैं।

ये लोकगीत हमारी संस्कृति की धरोहर हैं। इनमें अनाम गीतकारों द्वारा ऋऋतु पर्व और विभिन्न संस्कारों पर रचित गीत लयबद्ध रूपों में प्रस्तुत किए गये हैं। ऐसे गीत हमारी चेतना में रचे-बसे संस्कारों को प्रेरित करते रहते हैं। ये हमारी लोक संस्कृति के संवाहक हैं। संस्कृति मानवीय मूल्यों और संस्कारों की एक लम्बी परम्परा का नाम है जिसमें जीवन की ऊर्जा हमारी भावना और कर्म को प्रेरित करती रहती है।

सुंदर जीवन के मूल्य सत्य, प्रेम, निष्ठा, नैतिकता, धर्म, और त्याग जैसे तत्व संस्कृत्ति के अवयव होते हैं। जिस राष्ट्र की संस्कृति का क्षय होने लगता है उसके नागरिक सर्वप्रथम इन गुणों से वंचित होने लगते हैं और अनास्था, अविश्वास अथवा शंकाओं के बीच राष्ट्रीय जीवन की शांति और विकास अवरुद्ध हो जाते हैं। इसलिए अतीत की सांस्कृतिक विरासत के अच्छे मूल्य मनुष्य के सुंदर भविष्य का निर्माण करते हैं।

आज को भूमंडलीय परिस्थिति के विकट क्षणों में जो अनुकरण की हवा में भी अपनी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा में सचेष्ट रहता है, वास्तव में, वही राष्ट्र और जाति का रक्षक है। संस्कृति एक दिन की उपलब्धि नहीं होती, उसे बनने और बदलने में युग लग जाते हैं। पीढ़ियाँ बदल जाती है। युगों से हमारे समाज में संस्कार गीतों को परम्परा है। ये गीत जीवन के लिए संजीवनी बूटी का काम करते हैं। आधुनिक जीवन शैली के तनावों में हमारा सहजता से जीवनयापन कठिन होता जा रहा है।

ऐसी विकट स्थिति में ये लोक गीत हमें सहज जीवन की प्रेरणा देते हैं। अपने गाँव पहुंचकर जब पवाँरा सुना तो मन को बड़ा संतोष मिला। पहले भी मैंने पवाँरे सुन रखे हैं। पवाँरा एक लोकगीत है जिसमें लोक कथा, नाट्य और संगीत का मिश्रण है। भारत जैसे विशाल देश के विविध भागों में इससे मिलती जुलती लोकगीत शैली की प्रथा है। प्रस्तुति और भाषा भिन्न भले हो किन्तु संदेश में समानता होती है।

बिहार प्रदेश के भोजपुरी अंचल में पवाँरा गानेवालों को पारिया कहते है। ये भाट-चारण की कोटि के हैं। ये अपने यजमान की प्रतिष्ठा, धन-संतान आदि की वृद्धि के प्रति अपनी शुभकामना व्यक्त करते हैं। विशेषकर परिवार में शिशु के जन्म पर बधाई देने के लिए ये लोग गीत-नृत्य प्रस्तुत करते हैं। इसे ही बधावा नाचना कहते हैं। पवाँरा के जिस रूप और महत्व पर प्रकाश डाला जा रहा है उसका क्षेत्र बिहार के छपरा-सीवान और गोपालगंज का परिमंडल है। इस क्षेत्र की मुख्य भाषा भोजपुरी है।

पवाँरा में संगीत और प्रहसन का आनन्द आता है। पर्वरिया लोग इस क्षेत्र में मुस्लिम जाति की श्रेणी में आते हैं। जीविकोपार्जन के लिए जो भूमिका ये अदा करते हैं वह हिजड़ों के समकक्ष मानी जा सकती है। शहरों और कस्बों में शादी विवाह अथवा पुत्र जन्म पर हिजड़े वधाई के गीत गाते हैं। आजकल ये किन्नर कहलाते हैं।

शहरों में ढोलक लिए, साड़ी पहने और यदाकदा अश्लील मुद्राएं दिखाते और ताली बजाते ये लोग गीत गाते हैं और परिवार के लोगों से भरपूर नेग-रुपए पैसे लेकर हटते हैं। देने में जो कोताही करता है उसको भरी सभा में लज्जित करने से ये बाज नहीं आते। हिजड़ों में पुरुष स्त्री दोनों होते हैं किन्तु पोरिया दल में मैंने केवल पुरुषों को ही देखा है। किन्नरों की अपेक्षा पवाँरिया लोगों के भी क्षेत्र बंटे होते हैं। एक दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश करने पर उनमें संघर्ष भी होता है।

पुत्र जन्म की सूचना पाकर कुछ अंतराल पर पवाँरिया  दल सर्वप्रथम अपने यजमान के द्वार आकर अपने ढोलक का पूजन करवाता है। कोई महिला सिंदूर तेल से उस ढोलक को टीकती है और 'सीधा' रूप में चावल-दाल सब्जी आदि के साथ कुछ द्रव्य देकर पर्वरिया को प्रसन्न किया जाता है। तदुपरान्त समय निर्धारित कर वे पांच-सात की संख्या में अपने साज-बाज के साथ आते हैं। यजमान के घर पर उनका नृत्य और गायन कई घंटे तक चलता है। इसका ग्रामीण दर्शक पूरा आनन्द उठाते हैं। गाँव का यजमान यदि किसी कारण शहर चला जाए तो पुत्र जनमोत्सव का बधावा गाने पवाँरिया  लोग शहर भी जा पहुंचते हैं।

'पवाँरा ' एक प्रकार की व्यास शैली में गीत प्रस्तुत है। इनमें पूरे विस्तार से गीत के साथ कथा चलती है। इन गीतों में सोहर, ठुमरी, पूर्वी, दादरा, खेलावना, झूमर आदि भी गाए जाते हैं। वाद्य-उपकरण के नाम पर इनके पास एक या दो ढोलक, झाल और कुकुही होती है। 'कुकुही' छोटी सारंगी समान वाद्य है जिससे बड़ी मीठी तान निकलती है। मुख्य गायक अपने हाथ में कुकुही थामे बजाते हुए गीत सुनाता और पगताल से नृत्य दिखाता है। इसे 'पावटी' काटना भी कहते हैं। वह बीच-बीच में धमकर कथा को विस्तार से समझाता है फिर गीत की कड़ों को आगे बढ़ाता है। दूसरे सदस्य समवेत स्वर में उसके गीत को आगे बढ़ाते हैं।

उस रात अपने गांव पचरुखी में घर के सामने जब मैं पवाँरा  सुन रहा था तब देखा कि इस लोक संगीत का आनन्द उठाने सौ डेढ़ सौ ग्रामीण स्त्री-पुरूष आ जुटे हैं। एक महिला ने मुख्य गायक से प्रस्ताव रखा कि आज जरा भांजा मामा का गीत सुनाओ। भोजपुरी पारे में भगिना-मामा की लोककथा बड़ी रोचक और उपदेशपूर्ण हैं। वाद्यमंत्रों का कोई बड़ा तामझाम नहीं, अपनी मधुर लयधुन में कुकुही कुंकुआ रही थी और डोलक-मजीरे वाले संगति के लिए सजे थे। उनका सामूहिक स्वर गूंज उठता था। कथा-वर्णन में कोई साथी मुख्य गायक से छोटा सा प्रश्न कर बैठता था। उत्तर देते हुए नाच-गान पुनः चलने लगता था।

मामा-भांजा के उस लोकगीत में सात मामाओं द्वारा अपने एकमात्र भांजे की सम्पत्ति हड़पने के लक्ष्य से उसकी हत्या के षड्यंत्र की कथा चल रही थी। भांजा अपने मामा और मानियों के कपटपूर्ण व्यवहार को समझ नहीं पाता और उनके प्रीतिभोज के आमंत्रण को स्वीकार कर लेता है। स्वादिष्ट भोजन की थाल में जहर मिला दिया जाता है। और भांजे को वह जहर वाली थाल परोसी जाती है।

इसी बीच सबसे छोटी मामी को अपने अबोध भांजे पर दया आ जाती है। वह सोचती है कि भूसम्पति के लिए एक निर्दोष व्यक्ति का प्राण हरण होने जा रहा है। षड्यंत्र को वह पचा नहीं पाती और भांजे को संकेत से बता देती है कि जहर वाली थाल मत खाना। अपनी थाल किसी मामा की थाल से बदल लेना। भांजा सावधान हो जाता है और षडयंत्र का भंडाफोड़ हो जाता है। अंत में भांजा अपनी छोटी मामी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उन षडयंत्रकारी मामा और मामियों की भर्त्सना करता है।

कथा-संगीत डेढ़ घंटे तक चला। उसमें करुणा, ओज, घृणा, रहस्य और व्यंग्य विनोद के भाव थे। उस संगीत भरी कथा को दर्शकों ने खूब मनोयोग से सुना और प्रसन्न हुए।

उस गीत की कुछ पंक्तियां है:-

मान जा ए भगिना तू बतिया हमार, मामी बनवले बड़ी जयनार,

थरिया पवित्र कर आज तू हमार।

ऐ भांजे हमारी बात मानो, तुम्हारी मामी ने स्वादिष्ट भोजन तैयार किया है। उसे ग्रहण कर तुम हमारी थाल को पवित्र करो।

गायक कुकडी बजाता हुआ नाचता था और बीच बीच में पावटी काटता था। ओजपूर्ण प्रसंग आने पर उसकी आवाज गगन तक गूंज उठती थी। कभी-कभी वह दो चार कदम कूद भी पड़ता था। ढोलक की धड़ाक-तड़ाक थाप पर आधी रात में ऊंघते श्रोताओं की नींद टूट जाती थी। हास्य-विनोद की लहर भी हिलोरे लेने लगती थी।

बचपन में एक पवारे में मैंने सुना था-"रानी चल भइली, दरभंगा के राज।

खिड़की के राहे रानी डोलिया फनवली, चल भइली, दरभंगा के राज।

लोग जाने रानी रूसल जास, लोग जाने रानी नैहर जास।

चल भइली दरभंगा के राज।

उस गीत में दरभंगा की किसी रानी की प्रेम-कथा का प्रसंग था।

'पवाँरा' के गीतों में मनोरंजन के साथ लोकधर्म, संस्कृति के गुण प्रेम, त्याग, न्याय, स्नेह, सदाचरण आदि के भी तत्व मौजूद होते हैं।

'पवाँरा' में शिशु जन्म पर सोहर भी गाया जाता है। इसमें अकसर माँ कौशल्या और दशरथ का नाम आता है। राम जन्म की बधाई गाई जाती है। क्योंकि भारतीय संस्कृति में प्रत्येक नवजात पुत्र आदर्श राम का ही प्रतीक होता है।

'पवाँरे' में कई गीत ननदी भौजाई से भी संबंधित है। प्रसव पीड़ा में भाभी अपनी ननद से कहती है-

धीरे-धीरे उठेला दरदिया ये ननदिया मौरी रे, ननद-भौजाई में जवाब सवाल चलता है-'केनिये से आवेला हर चुरिहरवा, ननदिया मोरी रे। केनिये से अइले रंगरेज, ननदिया मोरी रे।' जबाब-पुरुब से आवेला हर चुरिहरवा, भौजाई भोरी रे पछिम से अइले रंगरेज भौजाई मोरी रे।

'पवाँरे' में ऐसे और भी अनेक कथा-प्रसंग हैं जो गीत प्रहसन में प्रस्तुत किए जाते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विकसित युग में भी ये लोकगीत अपनी रोचकता और नाटकीयता के कारण ग्रामीणों में स्वागत पाते है।

इसमें संदेह नहीं कि हमारा भारतीय समाज आज तेजी से बदल रहा है। रुचियों में भारी परिवर्तन लक्षित है। देहात तक पहुंचा दूरदर्शन ग्रामीणों की वह भूख मिटाने में लगा है जो आज से दस-बीस साल पहले सांस्कृतिक कार्यक्रमों से मिटा करती थी। 'पवाँरा', कठपुतली का नाच, आल्हागान, चैता-गान अथवा अन्य लोकगीत लोगों का खूब मनोरंजन करते थे। उनमें जीवन मूल्यों के जीवन्त उदाहरण होते थे। किन्तु आज की भौतिकवादी दौड़ में उस आकर्षण में कमी आई है।

इस दृष्टि से 'पवांरा' का प्रचलन भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। 'पंवारा' गाने वाले अब थोड़े दान-दहेज से संतुष्ट नहीं होते। वे यजमान से जमीन, जेवर और कीमती सामान मांगते हैं। इनमें बहुत से अब शहरों में नौकरी करने लगे हैं। ऐसी दशा में 'पाँरा' एक दिन अगली पीढ़ी के लिए इतिहास की कोई कथा बने, इस पर आश्चर्य नहीं।

डॉ. रमाशंकर श्रीवास्तव
भोजपुरी लोकगीत-शैली : पवाँरा
"संस्कृति: अंक -02"

Follow us on social media and share!