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अंग्रेजों के विरुद्ध परलकोट संग्राम: अमर सेनानी गेंद सिंह का बलिदान

अंग्रेजों के विरुद्ध परलकोट संग्राम: अमर सेनानी गेंद सिंह का बलिदान

यह लेख छत्तीसगढ़ के परलकोट संग्राम और अमर हुतात्मा गेंद सिंह के शौर्य की गाथा है। 1824 में उन्होंने समाज को एकजुट कर अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष किया। अपनी माटी की रक्षा हेतु उन्होंने फाँसी को गले लगाकर सर्वोच्च बलिदान दिया।

भारत को अंग्रेजों से मुक्ति सरलता से नहीं मिली। नगर, ग्राम और वन, सभी क्षेत्रों में क्रांति की ज्वाला धधक उठी थी। पूरा देश एकजुट होकर खड़ा हो गया था।

ऐसे ही एक महान क्रांतिकारी थे जनजातीय नायक गेंद सिंह। उन्होंने छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के परलकोट में सशस्त्र क्रांति का नेतृत्व किया था। इतिहास में यह घटना 'परलकोट विद्रोह' के नाम से दर्ज है। परलकोट मुख्य रूप से शत-प्रतिशत जनजातीय आबादी वाला क्षेत्र है, जिसे अबूझमाड़ भी कहा जाता है। यह असीम वन और खनिज संपदा से भरपूर इलाका है।

अबूझमाड़- प्राकृतिक सौंदर्य और खनिज संपदा से भरपूर
अबूझमाड़- प्राकृतिक सौंदर्य और खनिज संपदा से भरपूर

वर्ष 1757 के बाद अंग्रेजों ने अपना विस्तार शुरू किया। चर्च और सैन्य अधिकारियों के माध्यम से उन्होंने देश की वन्य संपदा पर अधिकार करना आरंभ कर दिया।इसके लिए अंग्रेजों ने दोहरी रणनीति अपनाई। उन्होंने सैन्य शक्ति से राजाओं-जमींदारों को अधीन किया और चर्च के माध्यम से जन सामान्य को प्रभावित करने का प्रयास किया।

छत्तीसगढ़ और बस्तर जैसे प्राकृतिक संपदा वाले क्षेत्र अंग्रेजों की प्राथमिकता थे। उन्होंने अपनी ताकत बढ़ाई और धीरे-धीरे इन वन क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया।

वहाँ के निवासियों पर अत्याचार बढ़ने लगे, जिसका प्रतिकार करने के लिए गेंद सिंह आगे आए। उनके जन्म की तिथि स्पष्ट नहीं है, लेकिन क्रांति के आरंभ का समय ऐतिहासिक रूप से ज्ञात है।

उन्होंने 1824 में पूरे अबूझमाड़ी समाज को एकजुट किया। सीमित संसाधनों के बावजूद, जनजातीय वीरों के पास तीर-कमान और साहस का अटूट बल था।

गेंद सिंह ने समूचे क्षेत्र के लोगों को अंग्रेजों से मुक्ति का आह्वान किया। प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वत्व की रक्षा के लिए प्राण देने का संकल्प ले चुका था।

इस क्रांति का केंद्र परलकोट जमींदारी थी, जिसके अंतर्गत 165 गांव आते थे। महाराष्ट्र के चंद्रपुर सीमा से लगे इस संगम क्षेत्र की प्राकृतिक बनावट ने संदेश भेजने में बड़ी सहायता की।

पर्वतों और घने जंगलों के कारण अंग्रेज अधिकारी एक वर्ष तक इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सके। जनजातीय वीरों ने अपने पारंपरिक हथियारों से आधुनिक बंदूकों का डटकर मुकाबला किया।

गेंद सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना का सामना करता हुआ जनजातीय समाज
गेंद सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना का सामना करता हुआ जनजातीय समाज

इस सशस्त्र संघर्ष में महिलाओं ने भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लोहा लिया। वे शत्रुओं पर तीरों की ऐसी वर्षा करतीं कि अंग्रेज सैनिक वहीं ढेर हो जाते।

घोटुल और अन्य उत्सवों का उपयोग संघर्ष की रणनीति बनाने के लिए किया जाने लगा। जनजातीय समूहों ने पांच-पांच सौ की टुकड़ियों में मोर्चाबंदी कर ली थी।

इन समूहों का नेतृत्व महिला और पुरुष दोनों कर रहे थे, जबकि गेंद सिंह सबका समन्वय संभाल रहे थे। यह संघर्ष इतना व्यापक हुआ कि अंग्रेजों को बड़ी सैन्य टुकड़ी भेजनी पड़ी। ब्रिटिश अधिकारी एग्न्यू के नेतृत्व में आधुनिक हथियारों और तोपखाने के साथ सेना परलकोट पहुंची। 10 जनवरी 1825 को पूरे क्षेत्र को घेर लिया गया।

भीषण तबाही से अपने लोगों को बचाने के लिए नायक गेंद सिंह ने स्वयं को समर्पित कर दिया। उनकी गिरफ्तारी के साथ ही यह बड़ा आंदोलन थम गया।

छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद - गेंद सिंह जी
छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद - गेंद सिंह जी

गिरफ्तारी के दस दिन बाद, 20 जनवरी 1825 को परलकोट महल के सामने उन्हें फांसी दे दी गई। गेंद सिंह का यह बलिदान छत्तीसगढ़ के इतिहास का पहला गौरवशाली बलिदान माना जाता है।

लेखक: रमेश शर्मा

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