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पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

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प्रजातंत्र की अवधारणा- भारत के इतिहास की नजर से

प्रजातंत्र की अवधारणा- भारत के इतिहास की नजर से

भारत अपना 76वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। गणतंत्र की एक और वर्षगांठ।  लोकतंत्र को आज हम जैसा देखते हैं, वो हमेशा से एक जैसा नहीं था, और समय के साथ इसके अर्थ में विस्तार हुआ हैं।

पश्चिम इतिहासकारों की दृष्टि में सबसे पहली लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुरूवात ऐथेंज़, ग्रीक में हुई democracy दो शब्दों से बना demos मतलब आम जन साधारण और kratos मतलब ताक़त। उस समय कार्यपालिका का चुनाव तो होता था लेकिन सभी वर्ग की भागीदारी नहीं थी। भूमिहीन, मज़दूर, ग़ुलाम, औरतें और कमज़ोर वर्ग चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा नहीं था, और ना ही नागरिक अधिकार जैसा कोई विचार था।

आगे के इतिहास में, ख़ासकर यूरोप में राजा एक शक्तिशाली व्यक्ति था और अपने अधिकार का ग़लत उपयोग करने के लियें स्वतन्त्र था वो एकाधिकार से युद्ध की घोषणा कर सकता था, मनमर्ज़ी का टैक्स व न्याय कर सकता था.. इसकी वजह से समाज के ताक़तवर वर्ग (सामन्त वर्ग) को समस्या होने लगी.. जैसे राजा के प्रति वफ़ादारी दिखाने के लिया अपने संसाधन युद्ध के लियें देना। जो एक अव्यवहारिक व्यवस्था थी।

इस सब के बाद राजा की शक्ति पर अंकुश रखने का विचार आया.. राजा युद्ध तो कर सकता हैं लेकिन सभी सामंतो की सहमति के बाद। अगर सामंतो में सहमति ना हो तो बड़े दल की बात मानी जाये। और राजा इस व्यवस्था को ना माने तो राजा को कोई सहयोग ना किया जाये। ये व्यवस्था ही आगे पार्लियामेंट कहलायी।

इस तरह न्याय, युद्ध और टैक्स का अधिकार राजा से निकल कर उच्च वर्ग (संसद) के पास आ गया जहाँ मजॉरिटी के हिसाब से काम होता था । ये इसलियें भी किया गया कि राजा अपने विरोधी सामंतो पर अतिरिक्त टैक्स ना लगा पाये।


आगे फ़्रान्स की क्रांति के आस पास संसद के ये अधिकार सिर्फ़ ऊँचे वर्ग तक ही सीमित ना रह जाये और आम जनता की भी हिस्सेदारी हो इस विचार से दो दल बने एक उच्च वर्ग का और एक आम जनता का.. ( बाद में ये वर्ग ही हाउस अव कॉमन भारत में लोकसभा बना)। सामान्य रूप से हम लोकतंत्र के इतिहास की यही जानकारी रखते हैं।

‘गण’ और ‘तंत्र’ के विषय में यह भी स्मरण करने का अवसर है कि सर्व प्रथम गणतंत्र का पाठ इसी धरा से पढ़ाया गया था। हजारों वर्ष पहले भी भारतवर्ष में अनेक गणराज्य थे, जहाँ शासन व्यवस्था अत्यंत सुदृढ़ थी और जनता सुखी थी।

गण शब्द का अर्थ संख्या या समूह से है। गणराज्य या गणतंत्र का शाब्दिक अर्थ संख्या अर्थात बहुसंख्यक का शासन है। इस शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में चालीस बार, अथर्ववेद में नौ बार और ब्राह्मण ग्रंथों में अनेक बार किया गया है। वहाँ यह प्रयोग जनतंत्र तथा गणराज्य के आधुनिक अर्थों में ही किया गया है।

वैदिक साहित्य में, विभिन्न स्थानों पर किए गए उल्लेखों से यह जानकारी मिलती है कि उस काल में अधिकांश स्थानों पर हमारे यहाँ गणतंत्रीय व्यवस्था ही थी। कालांतर में, उनमें कुछ दोष उत्पन्न हुए और राजनीतिक व्यवस्था का झुकाव राजतंत्र की तरफ होने लगा।

ऋग्वेद के एक सूक्त में प्रार्थना की गई है कि समिति की मंत्रणा एकमुख हो, सदस्यों के मत परंपरानुकूल हों और निर्णय भी सर्वसम्मत हों। कुछ स्थानों पर मूलतः राजतंत्र था, जो बाद में गणतंत्र में परिवर्तित हुआ।

महाभारत के सभा पर्व में अर्जुन द्वारा अनेक गणराज्यों को जीतकर उन्हें कर देने वाले राज्य बनाने की बात आई है। महाभारत में गणराज्यों की व्यवस्था की भी विशद विवेचना है।

जहां गणतंत्रात्मक शासन प्रणाली मौजूद थी, जहाँ शक्ति किसी राजा के बजाय निर्वाचित सभाओं या परिषदों (जैसे सभा, समिति, गण) में निहित होती थी, जो निर्णय लेती थीं; इसमें वज्जि संघ और लिच्छवि जैसे गणराज्य थे, जहाँ  शाक्य, कोलिय जैसे जनपदों में लोग मिलकर शासन करते थे, जिसमें अध्यक्ष (राजा) और अन्य पदाधिकारी चुने जाते थे, और यह राजशाही से अलग, जनता के कल्याण व न्याय पर केंद्रित थी।


गणतंत्र की विशेषताएँ:
सत्ता का विकेंद्रीकरण: शक्ति किसी एक व्यक्ति में न होकर एक परिषद या सभा में होती थी, जो आधुनिक लोकतंत्र का एक प्रारंभिक रूप थी।
निर्वाचित पदाधिकारी: गणराज्य का प्रमुख (नायक या राजा) और अन्य अधिकारी, जैसे सेनापति और कोषाध्यक्ष, निर्वाचित होते थे।
सभा और समिति: सभा (बुजुर्गों का समूह) और समिति (आम लोगों का समूह) जैसी संस्थाएँ महत्वपूर्ण निर्णय लेती थीं, जिनमें महिलाएँ और पुरुष दोनों भाग लेते थे (विदत्त में)।
संस्थागार: सभा या परिषद की बैठकें एक विशेष भवन 'संस्थागार' में होती थी, जहाँ प्रशासन और न्याय का कार्य होता था।
समानता और न्याय: यह प्रणाली समानता, न्याय और प्रजा के कल्याण के सिद्धांतों पर आधारित थी, जहाँ राजा-प्रजा संबंध पिता-पुत्र जैसा माना जाता था।
संघीय स्वरूप: कई गणराज्य आपस में मिलकर 'संघ गणराज्य' बनाते थे (जैसे वज्जि संघ), जो सुरक्षा और व्यवस्था के लिए होता था।

प्रमुख गणराज्य:
वज्जि संघ: सबसे शक्तिशाली, जिसमें लिच्छवि, वैदेह, नय और मल्ल शामिल थे, राजधानी वैशाली थी।
शाक्य: गौतम बुद्ध का राज्य, जिसकी परिषद (संथागर) में 500 सदस्य थे और नेता को 'राजा' कहा जाता था।
लिच्छवि: सबसे प्रभावशाली, जिनकी अपनी सभा (7,707 सदस्य) थी और वे अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सेनापति आदि चुनते थे।

ऐतिहासिक प्रमाण:
बौद्ध और पाली साहित्य (जातक कथाएँ) इन गणराज्यों की कार्यप्रणाली और संविधान की जानकारी देते हैं।
पाणिनि ने उत्तर-पश्चिमी गणराज्यों को 'आयुधजीवी संघ' कहा है, जो उनकी सैन्य प्रकृति को दर्शाता है।
प्राचीन भारत में लगभग 600 ईसा पूर्व से 400 ईस्वी तक इन गणराज्यों का अस्तित्व लोकतंत्र और गणतांत्रिक परंपराओं की गहराई को दर्शाता है, जो बाद में गुप्त साम्राज्य के विस्तार के साथ समाप्त हो गए।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी लिच्छवी, बृजक, मल्लक, मदक और कम्बोज आदि जैसे गणराज्यों का उल्लेख मिलता है। उनसे भी पहले पाणिनी ने कुछ गणराज्यों का वर्णन अपने व्याकरण में किया है। आगे चलकर यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने भी क्षुदक, मालव और शिवि आदि गणराज्यों का वर्णन किया है।

गांव का स्वराज : शुक्र-नीति-सार
पंडित जवाहर लाल नेहरू अपनी किताब हिंदुस्तान की कहानी में भारत मे जन भागीदारी की व्यवस्था का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि "दसवीं सदी" की एक पुरानी किताब है, जिससे तुर्की और अफगान हमलों से पहले की हिंदुस्तान की राजनैतिक व्यवस्था का कुछ चित्र मिलता है।

यह है शुक्राचार्य का 'नीति सार'। इसमें केंद्रीय शासन के और शहर और गांव की जिंदगी के संगठन का बयान मिलता है; साथ ही राज-सभा और बहुत-से सरकारी महकमों के भी बयान हैं। गांव की पंचायत, या चुनी हुई प्रतिनिधि सभा के न्याय और व्यवस्था दोनों ही के संबंध में बड़े अधिकार थे और इसके सदस्यों को राजा के अधिकारी बहुत ही आदर की नजर से देखते थे।

यही पंचायत जमीन की बांट करती थी और पैदावार का एक अंश कर के रूप में उगाहती थी और गांव की तरफ से सरकार का हिस्सा अदा किया करती थी। कई गांव-पंचायतों के ऊपर एक बड़ी पंचायत हुआ करती थी, जो उनकी निगरानी करती और जरूरत पड़ने पर उनके कामों में दखल भी दे सकती थी।"

"कुछ पुराने शिलालेख हमें यह भी बताते हैं कि गांव पंचायतों के सदस्य किस तरह चुने जाते थे और उनमें क्या बातें गुण और दोष की समझी जाती थीं। अलग-अलग समितियां बनाई जाती थीं, जिनके लिए सालाना चुनाव होते थे और जिनमें औरतें हिस्सा ले सकती थीं।

अच्छा आचरण न करने पर कोई भी सदस्य अपने पद से हटाया जा सकता था। सार्वजनिक रुपये-पैसे का ठीक-ठीक हिसाब न दे सकने पर कोई भी सदस्य अयोग्य ठहराया जा सकता था और अलग किया जा सकता था।

रियायत रोकने के लिए बनाये गए एक दिलचस्प नियम का बयान मिलता है- सार्वजनिक पदों पर इन सदस्यों के निकट संबंधियों की नियुक्ति नहीं हो सकती थी।

इन गांव-पंचायतों को अपनी आज़ादी का बड़ा खयाल रहता था और यह नियम बना हुआ था कि जबतक राजाज्ञा न मिली हो, कोई भी सिपाही गांव में दाखिल नहीं हो सकता था।

"अगर किसी पदाधिकारी की शिकायत लोग करें, तो 'नीति-सार' का कहना है कि राजा को "अपने हुक्कामों की तरफदारी न करके अपनी रियाया की तरफदारी करनी चाहिए।"

अगर बहुत लोग शिकायत करें, तो पदाधिकारी को बर्खास्त कर देना चाहिए, "क्योंकि पद के मद से कौन उन्मत्त नहीं हो जाता?" राजा का जनता के बहुमत के बमूजिब काम करने का कर्तव्य बताया गया था।

"लोकमत राजा के मुक़ाबले में ज्यादा मजबूत होता है; जिस तरह कि बहुत से तारों की बटी हुई रस्सी शेर को भी खींच लाती है।" पदाधिकारियों की नियुक्ति करते वक्त चरित्र और योग्यता का ध्यान रखना चाहिए-जात या घराने का नहीं और "न वर्ण से और न पुरखों द्वारा ब्राह्मणत्व का भाव उत्पन्न किया जा सकता है।"

आगे पंडित नेहरू यूरोपियन और भारतीय राजतंत्र के अंतर को और स्पष्ट करते है-

"-----हिंदुस्तान में कोई धर्मतंत्री राजतंत्र नहीं था। हिंदुस्तान की राज पद्धति के अनुसार माना हुआ अधिकार था। दो हज़ार साल पहले चीनी फ़िलसूफ़ मेंसियस ने जो कहा था, अगर राजा अन्यायी या अत्याचारी हो, तो उसके खिलाफ विद्रोह करने का अधिकार वह हिंदुस्तान पर भी लागू होता है।

 "जब शासक अपनी प्रजा को घास और कूड़े की तरह समझे, तब प्रजा को उसे लुटेरे और दुश्मन की तरह समझना चाहिए।" यहां राजकीय अधिकारों की सारी कल्पना यूरोप की सामंती कल्पना से जुदा थी, जिसमें राजा को अपने राज्य के सब लोगों और वस्तुओं पर अधिकार हासिल था।

यह अधिकार वहां राजा अपने सामंतों (लार्डों और वैरनों) को दे देता था और ये लोग राज-निष्ठा की प्रतिज्ञा करते थे। इस तरह अधिकार की एक सीढ़ी तैयार हो जाती थी। ज़मीन और उससे संबंध रखनेवाले लोग सामंती लार्ड की, और उसके ज़रिये राजा की, प्रजा हो जाते थे।"

प्रसिद्ध गांधीवादी लेखक धर्मपाल इस बात और स्पष्ट करते हैं "भारतवर्ष में यद्यपि राजशाही शासन पद्धति रही और यह पद्धति पूरी दुनिया में थी। परंतु भारत की शासन पद्धति राजशाही होते हुए भी किस प्रकार अन्य राष्ट्रों से अलग थी और जनमानस का उसके ऊपर कैसा नियंत्रण था और उस नियंत्रण को( जो जनता की ताकत थी ) किस प्रकार अंग्रेजों ने समाप्त किया इसका वर्णन कथित रूप से विद्वान माने जाने वाले ब्रिटिश अधिकारी जेम्स मिल ने 1832 में ब्रिटिश संसद में अंग्रेजो की जीत के रूप में प्रस्तुत किया।

वह ब्रिटिश संसद को बताते है कि सन अट्ठारह सौ के आसपास भारत में कार्यरत अंग्रेज राजनीतिज्ञों के द्वारा किस प्रकार भारत के राजाओं का नियमन और नियंत्रण किया और 1748 के बाद अपनी सुरक्षा के लिए उन्होंने अंग्रेजों के साथ किस प्रकार संधि की और समझौते किए।

इसके कई प्रमाण जेम्स मिल ने ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत किए। उन्होंने यह भी कहा की भारत के राजाओं को अपनी प्रजा से भय मिश्रित सम्मान प्राप्त होता था, पर जब प्रजा उन से असंतुष्ट हो जाती थी तब उन्हें पदच्युत करके अन्य किसी को सिंहासन पर बिठा देती थी।

परंतु जैसे ही अंग्रेजों का शासन स्थापित हुआ , राजा अंग्रेजों के अधीन हो गए प्रजा के पास अंग्रेजों का विरोध करने का कोई सटीक उपाय नहीं था। अतः यह परंपरा (जनता के द्वारा असंतुष्ट होने पर राजा को बदल देने की ) समाप्त हो गई।"

श्री धर्मपाल अपनी किताब में लिखते है "हमें जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंग  (1783) के, एलेग्जेंडर क(1799)के , और रामनाथम पुरम कि परिशिष्ट में दिए गए विवरण के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था उस काल में कैसी थी इसका कुछ विवरण मिलता है ।

"इसमें कोई शक नहीं कि आज तक की शासन् व्यवस्था में जन भागीदारी से बनी अर्थव्यवस्था सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। कोरोमंडल कि तटीय प्रदेशों में उसके अवशेष दिखाई देते थे।

जन शासन कि विशेषता देखी जा सकती है। सरकार को देने कि लिए राजस्व जमीन की पैदावार का एक निश्चित हिस्सा होता था ।वह अनाज के रूप में दिया  जाता था। प्रत्येक गांव की स्वयं ही एक पूर्ण जाति /व्यवस्था होती थी। ग्राम राज्य के संरक्षण में होते हुए भी गाँव का शासन अपनी व्यवस्था के अनुसार चलता था।"

"गांव में लेखा रखने वाला कनक पिल्ले ,अनाज तोलने वाला लोहार, आदि अधिकार प्राप्त समाज था। अधिक बड़े गांव में वैद्य ज्योतिषी भी होते थे । इन सब लोगों को गांव की पैदावार से अपना हिस्सा प्राप्त होता था ।

घर और बगीचे की  जमीन छोड़कर किसी की भी अपनी स्वामित्व जमीन नहीं होती थी । गांव कि भूमि सामूहिक सवामित्व की होती थी । वह एक साथ जोती जाती थी और पैदावार उचित अनुपात में सबको बांट दी जाती थी।

एक इनाम कि राशि भी थी, दूसरा श्रोत्रीसम की भी राशि होती थी, मंदिर ,ब्राह्मण, चर्च , इन सबको अनाज का एक भाग प्राप्त  होता था । तालाब , पानी के प्रवाह की भी देख रेख इसी राशि से होती थी।

उत्तम खाद के लिए भेड़ बकरियों का पालन किया जाता था ,उसकी  लिद पर गांव का अधिकार होता था। इसके अलावा रक्षा व्यवस्था के लिए एक रक्षा अधिकारी होता था, जिसकि जिम्मेदारी गांव कि सुरक्षा की  होती थी।" ( यह वर्णन 17वी सदी के अंत का है कि भारत के गावों में कैसी सहकारी पद्धति लागू थी)

आदर्श राज्य का वर्णन मंत्र पुष्पांजलि के तीसरे श्लोक में किया गया है।

"ॐ स्वस्ति, साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं
वैराज्यं पारमेष्ट्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं ।
समन्तपर्यायीस्यात् सार्वभौमः सार्वायुषः आन्तादापरार्धात् ।
पृथीव्यै समुद्रपर्यंताया एकरा‌ळ इति ॥"

हिन्दी भावार्थ: "हमारी इच्छा है कि हमारा राज्य सभी के कल्याण की प्राप्ति करे। हमारा राज्य सम्पूर्णतया उपभोग्य वस्तुओं से परिपूर्ण हो। यहां लोककल्याण की प्रबल प्रभुता हो।

हमारा राज्य आसक्ति और लोभ से रहित हो। हमारी श्रेष्ठ अधिसत्ता उस परमश्रेष्ठ महाराज्य पर हो। हमारा राज्य सीमाओं तक सुरक्षित रहे, जहां समुद्र तक फैली हुई पृथ्वी पर हमारा दीर्घायु एकत्र राज्य हो। हमारा राज्य सृष्टि के समाप्ति तक सुरक्षित रहे।"


इस श्लोक जो कुछ भी कहा गया है वह वह एक जनता के प्रति जिम्मेदार राज्य और प्रभुसत्तात्मक शक्ति शाली राज्य की कल्पना है। जो हमारी संवैधानिक अवधारणाओं से पूरी  तरह मेल रखते है।

 

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