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पंडवानी: महाभारत आख्यान का लोक स्वरूप

पंडवानी: महाभारत आख्यान का लोक स्वरूप

भारतीय संस्कृति में लोक और शास्त्र का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यहाँ लोक का अर्थ उस निरन्तर बहने वाली सांस्कृतिक धारा से है, जो परिष्कृत होकर शास्त्र का रूप ले लेती है। इसके बाद यही धारा अपने विविध रूपों में प्रकट होकर समाज को सिंचित करती है।
भारत में लोक से शास्त्र का बनना और शास्त्र से पुनः लोक में एक नई विधा के साथ लौटने यह चक्र निरन्तर चलता आ रहा है। यह आज भी गाँव की गलियों- चौपालों, खेतों-खलिहानों से सुनाई दे रहे लोक गीतों में प्रत्यक्ष रूप में अनुभव किया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर मन्दिरों, व्यासपीठों, यज्ञ वेदियों में यही धारा श्लोकों और मन्त्रों के रूप में सुनाई देती है।



महाभारत आख्यान का लोक स्वरूप

यह समन्वय हमें पूरे भारत के साथ साथ छत्तीसगढ़ प्रदेश में भी दिखाई देती है। छत्तीसगढ़ के लोकगीतों में भरथरी, सुआ, करमा, ददरिया, पंडवानी जैसे लोकगीत आज भी भारतीय संस्कृति को समृद्ध कर रहे  हैं। इसी कड़ी में लोकगाथा पंडवानी का विशेष महत्व है। पंडवानी छत्तीसगढ़ में विकसित हुई एक पारंपरिक लोकगाथा है। यह एक अत्यंत लोकप्रिय एकल लोक गायन और नाट्य शैली है। इसमें संगीत के माध्यम से द्वापर युग के महाकाव्य महाभारत के पांडवों की कथा को पंडवानी गायक प्रस्तुत करते हैं। पंडवानी में मुख्य रूप से पांच पांडवों, माता कुंती, द्रौपदी और भगवान श्रीकृष्ण के चरित्र का वर्णन रहता है। इसमें भीम के पराक्रम और उनके गदायुद्ध को विशेष कर दिखाया जाता है।

पंडवानी का मंचन करती तीजन बाई
पंडवानी का मंचन करती तीजन बाई

पंडवानी छत्तीसगढ़ के समुदायों की मौखिक परंपरा से जुड़ी सांस्कृतिक विरासत है। परंपरा के रूप में यह कला गांव के चौपाल और आंगन से शुरू हुई है। इसमें महाभारत के वीर योद्धा भीम को मुख्य नायक मानकर वीरता की गाथा गाई जाती है। लोक कलाओं को प्रस्तुत करने का सबका अपना अलग ढंग और शैली होती है।उसी प्रकार पंडवानी की भी दो मुख्य शैलियां हैं:

वेदमती शैली

इस शैली में कलाकार भूमि या मंच पर वीरासन में बैठकर शांत और गंभीर ढंग से महाभारत की कथा को हाथ में तंबूरा लेकर गाता है। वेदमती शैली का आधार शास्त्र और लिखित ग्रंथ हैं। सबल सिंह चौहान द्वारा रचित महाभारत की लोकगाथा को इसमें गाया जाता है। झाडूराम देवांगन इसके सर्वश्रेष्ठ कलाकार हैं। उनका जन्म छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के बासीन गांव में हुआ था। पंडवानी की वेदमती शैली में झाडूराम देवांगन एक ऐसा नाम हैं जिन्होंने महाभारत की कथा को लोक जीवन से जोड़कर पंडवानी को गांव की चौपाल से राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया।


वेदमती शैली में पंडवानी का मंचन करते हुए झाडूराम देवांगन

झाडूराम देवांगन ने पंडवानी को केवल गाया नहीं बल्कि उसे अपने स्वर, अभिनय और हाव-भाव में जिया है। उनके स्वर में मिट्टी की महक, लोक जीवन की वेदना और भारतीय परंपरा की गूंज समाहित थी। इसी कारण झाडूराम देवांगन को पंडवानी का पितामह कहा जाता है। उन्होंने सबल सिंह चौहान कृत महाभारत को आधार बनाकर शास्त्र सम्मत कथा को लोक धुन में पिरोकर ग्रामीण जनता के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने पंडवानी लोक कला को नई प्रतिष्ठा दिलाई तथा देश और विदेश में ख्याति अर्जित की। उनकी इस शैली को उनके शिष्यों पुनाराम निषाद, पंचूराम और रेवाराम जैसे कलाकारों ने आगे बढ़ाया है।

कापालिक शैली

यह शैली अत्यंत जीवंत, नाटकीय और ऊर्जावान होती है। इसमें मुख्य कलाकार खड़े होकर हाथ में तंबूरा लेकर मंच पर घूमते हुए और नाचते-गाते हुए पूरे प्रसंग का अभिनय करता है। तंबूरा कभी भीम की गदा, कभी अर्जुन का धनुष तो कभी गांधारी की आंखों की पट्टी बन जाता है। यह पूरी तरह मौखिक परंपरा पर आधारित होती है।

कापालिक शैली में पंडवानी का मंचन करते हुए तीजन बाई
कापालिक शैली में पंडवानी का मंचन करते हुए तीजन बाई

पंडवानी की कापालिक शैली को नई पहचान देने वाली कलाकार तीजन बाई हैं। उनका जन्म छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में हुआ था। वे छत्तीसगढ़ की पहली ऐसी महिला हैं जिन्होंने कापालिक शैली में पंडवानी गाकर देश और विदेश में पहचान दिलाई। उन्होंने अपनी ओजस्वी शैली में खड़े होकर प्रदर्शन करने की परंपरा की शुरुआत की। तीजन बाई अपने गायन के साथ तानपुरा घुमाते हुए महाभारत के अनेक पात्रों को मंच पर जीवंत कर देती थी। एक महिला के रूप में उन्होंने अपनी धाक जमाई और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संस्कृति का परचम लहराया। इसके परिणामस्वरूप भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण से सम्मानित किया। 05 जुलाई 2026 को तीजन बाई 70 वर्ष की आयु में परलोक सिधार गई। पंडवानी की इस शैली को आगे बढ़ाने में ऋतु वर्मा, शांतिबाई चेलक, उषा बाई बारले, तरुणा साहू और लक्ष्मी साहू जैसी कलाकार पंडवानी की लोकगाथा को जन-जन तक पहुंचा रही हैं।

पंडवानी में रागी का महत्व

पंडवानी में रागी का बहुत बड़ा महत्व है। संगत के कलाकार पीछे अर्धचन्द्राकार घेरे में बैठते हैं। उन्हीं में एक रागी होता है जो हुंकार भरता है। वह मुख्य कलाकार के रोचक प्रश्नों के उत्तर देकर कथा को आगे बढ़ाने में सहायता करता है। जब कलाकार प्रसंग को आगे बढ़ाता है तो रागी 'हां भाई, हां बहन' कहकर कथा को रोचक बनाता है। सहयोगी कलाकार तबला, ढोलक और मंजीरा बजाकर पूरे माहौल को संगीतमय बना देते हैं। गायक और रागी के बीच की जुगलबंदी देखने योग्य होती है।

पंडवानी में रागी की महत्वपूर्ण भूमिका
पंडवानी में रागी की महत्वपूर्ण भूमिका

पंडवानी में वेशभूषा का महत्व

किसी भी लोक कला, लोकगाथा और लोकनृत्य में वेशभूषा का अलग महत्व रहता है। जैसे लोकनाट्य नाचा में परी और जोकर की पोशाक की अलग पहचान होती है, वैसे ही पंडवानी में भी पहनावे का बहुत महत्व है। पुरुष कलाकार पारंपरिक धोती और कुर्ता पहनते हैं तथा कंधे पर गमछा रखते हैं। महिला कलाकार लाल, हरे या पीले रंग की सूती साड़ी पहनती हैं।

पंडवानी गायक ऋतु वर्मा 
पंडवानी गायक ऋतु वर्मा 

वे पारंपरिक आभूषणों में गले में सुता, पुतरी, हाथ में ऐंठी, बांह में पहुंची, कमर में करधन, कान में खिनवा, चोटी में गजरा और माथे पर टिकली लगाती हैं। पैरों में पैरी पहनी जाती है। महिला कलाकारों की वेशभूषा और शृंगार पूरी तरह पारंपरिक लोक शैली के अनुरूप होता है। पहनावे का सबसे बड़ा हिस्सा गायक या गायिका के हाथ में पकड़ा हुआ तंबूरा होता है जिसे मोतियों और घुंघरुओं से सजाया जाता है। यह वेशभूषा स्थानीय प्रचलन का परिचय देती है और इसके माध्यम से दर्शक अपनी लोक संस्कृति से जुड़ते हैं।

पंडवानी से मिलती प्रेरणा

पंडवानी लोगों को सत्य, न्याय और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। इसमें पांडवों, विशेषकर भीम या अर्जुन के संघर्ष और विजय के माध्यम से अच्छाई की जीत को दिखाया जाता है। यह मनुष्य को कर्म प्रधान होने, अपने कर्तव्य का पालन करने और अहंकार से दूर रहने का संदेश देती है। तंबूरा और मंजीरा की धुन के साथ जब कलाकार कथा गाता है तो श्रोता मन्त्रमुग्ध हो जाते हैं।

गाँव में पंडवानी का दृश्य
गाँव में पंडवानी का दृश्य

मनोविज्ञान दृष्टिकोण से देखें तो पंडवानी स्मरण शक्ति और मौखिक संवाद परंपरा के आधार पर घंटों तक महाभारत का सजीव वर्णन करने की क्षमता को दर्शाती है। भावनात्मक रूप से कथा के समय कलाकार स्वयं को पूरी तरह द्रौपदी, भीम और अर्जुन जैसे पात्रों के रूप में ढाल लेता है। यह जुड़ाव कलाकार और दर्शक दोनों के दबे हुए भावों और तनाव को बाहर निकालकर मानसिक शांति देता है।

पंडवानी में गायन, अभिनय और शारीरिक मुद्राओं का सुंदर समन्वय होता है। मुख्य कलाकार द्वारा अलग-अलग पात्रों को अलग-अलग आवाज और शारीरिक चाल-ढाल के जरिए जीवंत करना शरीर और विचारों के तालमेल का वैज्ञानिक स्वरूप है। पंडवानी केवल मनोरंजन का साधन नहीं है बल्कि यह समाज को सीख देने का बड़ा माध्यम है। इसमें वीर रस के साथ करुण, हास्य और शृंगार रस का सुंदर मेल देखने को मिलता है। छत्तीसगढ़ी भाषा की मिठास और शब्द सामर्थ्य पंडवानी के माध्यम से उभरकर सामने आता है।

प्रसिद्ध पंडवानी गायक चेतन देवांगन
प्रसिद्ध पंडवानी गायक चेतन देवांगन

इस प्रकार पंडवानी छत्तीसगढ़ की वह लोकगाथा है जिसे झाड़ूराम देवांगन और तीजन बाई ने अपनी शैलियों में गाकर देश और विदेश में पहचान दिलाई। पंडवानी संगीत, अभिनय और गायन का सुंदर मेल है। यह महाभारत के आदि पर्व, सभा पर्व, वन पर्व, विराट पर्व और अश्वमेध पर्व की कथाओं पर आधारित होती है। पराक्रम से जुड़े ये प्रसंग समाज को सत्य के संघर्ष के साथ धर्म की जीत और असत्य की हार की सीख देते हैं। आज जब आधुनिकता की दौड़ में लोग अपने संस्कारों को भुला रहे हैं, तब पंडवानी हमारी भारतीय संस्कृति को जीवित रखे हुए है।


लेख:
डॉ. पद्म साहू, खैरागढ़, छत्तीसगढ़
(
लेखिका शिक्षाविद् साहित्यकार हैं, जो हिंदी एवं छत्तीसगढ़ी में अपनी छंदबद्ध रचनाओं के लिए जानी जाती है।)

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