राजिम की पंचकोसी यात्रा
March 12, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण शुक्ल चतुर्थी | रविवार
नक्षत्र: हस्त | योग: साध्य | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अगस्त 2026

जीवन के लिए गति आवश्यक है। गति से ऊर्जा मिलती है। केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु प्रकृति के लिए यह आवश्यक है। ग्रह-उपग्रह, नक्षत्र सब गतिमान हैं। इनकी यह गतिशीलता जीव-जन्तुओं व प्रकृति के अन्य उपादानों में ऊर्जा भरती है। समूची सृष्टि गति के आधीन है। गति भी कैसी? रैखिक नहीं, वृत्ताकार है। गति रुक जाये, तो प्रकृति रुक जाये। प्रकृति रुक जाये, तो जीवन रुक जाये। गति की यह वृत्ताकार स्थिति ही प्रदक्षिणा है।
भारतीय जीवन और सनातन संस्कृति में प्रदक्षिणा की परंपरा प्राचीनकाल से विद्यमान है। अध्यात्म, धर्म और दर्शन में जहाँ इसकी महत्ता सार्वकालिक है, वहीं हमारे लौकिक जीवन में भी प्रदक्षिणा की सार्वभौमिकता के दर्शन होते हैं। जीवन की सभी अवस्थाओं से जुड़ी हुई यह प्रदक्षिणा की परम्परा हमें बालपन में ही दिखाई पड़ती है। बच्चे जब विभिन्न तरह के खेल खेलते हैं, तो प्रदक्षिणा वहाँ उपस्थित रहती है। बच्चे जानते हैं कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। प्रकृति की गतिशीलता का यह सबसे पुष्ट प्रमाण है। विवाह संस्कार में भी अग्नि की प्रदक्षिणा लेकर ही सात फेरे पड़ते हैं। तीज-त्योहारों में तुलसी, आँवला, बरगद, पीपल आदि वृक्षों की प्रदक्षिणा की जाती है। आखा नवमी, वट सावित्री आदि त्योहार इसके प्रमाण हैं। देव स्थलों की प्रदक्षिणा तो मोक्ष का माध्यम है। केवल जीवन के रहते ही नहीं, अपितु मृत्यु संस्कार में भी प्रदक्षिणा की जाती है। मृतक के दाह-संस्कार के समय चिता की प्रदक्षिणा कर मुखाग्नि दी जाती है। यह तो सभी जानते हैं कि गणेश जी माता-पिता की प्रदक्षिणा कर देवताओं में प्रथम पूज्य बनकर गणपति या गणराज कहलाये। आज भी प्रदक्षिणा की यह सनातन परम्परा हमारे समाज व समुदायों में शाश्वत है।
वस्तुतः किसी देवता, देव स्थल (मंदिर), इष्टदेव या जो हमारे लिए पूज्य हैं, के चारों ओर इस तरह वृत्ताकार में घूमना कि देव या पूज्य स्थल अपने दक्षिण भाग में रहे, प्रदक्षिणा कहलाता है। यह करबद्ध नमस्कार की स्थिति में सम्पन्न होता है। इसे परिक्रमा भी कहा जाता है। इसीलिए मंदिरों में परिक्रमा पथ बना रहता है। छत्तीसगढ़ में परिक्रमा को 'परकम्मा' कहा जाता है। जैसे ज्यादा भ्रमणशील व्यक्ति के लिए कहा जाता है- 'आगेस परकम्मा करके।' प्रदक्षिणा के लिए केवल मंदिर या देव स्थल ही नहीं, अपितु वृक्षों, पर्वतों व नदियों की भी प्रदक्षिणा की जाती है। प्रदक्षिणा के पथ निश्चित होते हैं, जिन्हें परंपराओं के साथ पूरा किया जाता है। इसके पीछे मनौतियाँ और लोक मान्यताएँ प्रमुख होती हैं। पैदल प्रदक्षिणा के साथ-साथ शयन कर साष्टांग लेटकर भी प्रदक्षिणा की जाती है। चित्रकूट में कामदगिरि, बृज में चौरासी यात्रा, गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा, नर्मदा नदी की प्रदक्षिणा, छत्तीसगढ़ में राजिम की पंचकोसी यात्रा ये प्रमुख प्रदक्षिणा पथ हैं।
छत्तीसगढ़ की धरती खनिज संपदाओं और वन संपदाओं से जितनी परिपूर्ण है, उतनी ही यह कला साहित्य, संस्कृति, इतिहास, पुरातत्व व धर्म की दृष्टि से आज भी समुन्नत है। प्राचीनकाल में इसे दक्षिण कौशल कहा जाता था। दण्डकारण्य भी इसी का प्राचीन नाम है। ऐसी मान्यता है कि भगवान राम ने वनवास के समय लगभग दस बारह वर्ष दण्डकारण्य में बिताये। छत्तीसगढ़ को राम का ननिहाल माना जाता है। लवकुश का जन्म छत्तीसगढ़ के ही तुरतुरिया में हुआ ऐसा माना जाता है। तुरतुरिया में ही वाल्मीकि का आश्रम था। पूरा छत्तीसगढ़ वर्तमान में भी राममय है। यहाँ के लोगों के आचार-विचार, रहन-सहन, खान-पान, तीज-त्योहार सभी राममय है। राम की माता कौशल्या दक्षिण कोशल के राजा भानुमंत की बेटी थी, इसलिए राम छत्तीसगढ़ के भांजा हुए। आज भी छत्तीसगढ़ का लोक मानस अपने भांजा को राम का रूप मानकर उसका चरण स्पर्श करता है। राजिम का राजीव लोचन मंदिर, शिवरीनारायण का शबरी मंदिर, सिरपुर का लक्ष्मणेश्वर व रामचंद्र मंदिर आज भी इसकी प्राचीनता को प्रतिपादित करते हैं। राजिम की पंचकोसी यात्रा तो सर्वविदित है।
राजिम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से दक्षिण दिशा में लगभग 45 किमी. दूर स्थित है। यह छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा महानदी के किनारे पर स्थित है। राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है, क्योंकि यहाँ महानदी, पैरी और सोंदूर तीन नदियों का पवित्र संगम है। इसलिए इसे 'त्रिवेणी संगम' भी कहा जाता है। यहाँ पर पिण्डदान और अस्थि विसर्जन किये जाते हैं। यहाँ के मंदिरों में राजीव लोचन मंदिर और कुलेश्वर महादेव का मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। कुलेश्वर मंदिर त्रिवेणी संगम पर ही नदी के भीतर ऊँचे अधिष्ठान पर स्थित है। यहाँ के सभी मंदिरों का धार्मिक महत्ता के साथ-साथ ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व भी है। यहाँ जो पंचकोसी यात्रा संपन्न होती है, उनमें अधिकांश शिवधाम हैं और राजिम से लगभग पाँच-पाँच कोस की दूरी पर चारों दिशाओं में स्थित हैं। इसलिए इन्हें पंचकोसी कहा जाता है। कोश अर्थात खजाना के अर्थ में ये सभी देवस्थल हमारे सनातन धर्म व संस्कृति के कोश हैं। जहाँ पर हर साल हजारों श्रद्धालु अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए पैदल यात्रा कर जीवन धन्य करते हैं।

महानदी सिहावा पर्वत से निकलकर छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की धरती को सींचती हुई, यहाँ के जन जीवन को समृद्धि और खुशियाँ बाँटती हुई उड़ीसा में समुद्र में जाकर मिलती है। महानदी को चित्रोत्पला गंगा जी भी कहा जाता है। राजीव लोचन का मंदिर महानदी के दायें तट पर स्थित है। यहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक 15 दिनों का विशाल मेला भरता है। इस मेले में छत्तीसगढ़ के अलावा देश के अन्य प्रदेशों से भी साधु संत और श्रद्धालुजन राजीव लोचन व कुलेश्वर महादेव के दर्शन के लिए आते हैं। महानदी के पवित्र जल में स्नानकर पुण्य के भागी बनते हैं। चूँकि राजिम शैव और वैष्णव का संगम स्थल है, इसलिए इसे हरिहर क्षेत्र कहा जाता है। इसे कमल क्षेत्र या पद्मक्षेत्र भी कहा जाता है। राजिम पंचकोसी यात्रा के संदर्भ में एक किंवदन्ती प्रचलित है, जो जनमानस में व्याप्त है।

कहा जाता है कि एक समय भगवान विष्णु ने बैकुंठ लोक से धरती पर निवास करने के उद्देश्य से विश्वकर्माजी को धरती पर एक मंदिर निर्माण करने के लिए कहा। पर शर्त रखी कि जगह ऐसी हो जहाँ पर कोई शव न जला हो। विश्वकर्मा जी धरती पर आये, चारों ओर ऐसी जगह की तलाश की, जहाँ शव न जला हो, पर उन्हें ऐसा कोई स्थान नहीं मिला। वे विष्णु जी के पास गये और बोले कि प्रभु धरती पर तो ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ शव न जला हो। तब विष्णु जी ने एक कमल का फूल अपने हाथ से नीचे छोड़ा और कहा कि जहाँ यह कमल गिरेगा, वहीं पर हमारे लिए मंदिर का निर्माण करना। विश्वकर्माजी ने ऐसा ही किया। अतः कमलफूल के केन्द्र अर्थात पराग वाले स्थान पर राजीव लोचन जी का मंदिर राजिम में है और पंखुड़ियों पर कुलेश्वर महादेव (त्रिवेणी संगम), चम्पेश्वर महादेव (चम्पारण्य), पटेश्वरनाथ महादेव (पटेवा), ब्रह्मकेश्वर महादेव (बह्मणी), फणिकेश्वर महादेव (फिंगेश्वर) व कोपेश्वरनाथ महादेव (कोपरा) है।
मेरे राजिम पहुँचने पर सभी मित्र श्री तुकाराम कंसारी, संतोष सोनकर, राजेन्द्र सिंह ठाकुर और जितेन्द्र कुमार राजीवलोचन मंदिर में मिले। हम सब ने मिलकर भगवान राजीव लोचन के दर्शन किए। सावन का महीना और रविवार का दिन होने के कारण मंदिर में बहुत भीड़ थी। राजेन्द्र मनु जी राजीवलोचन मंदिर के पुजारी, मंदिर के सदस्य और अन्न भंडार के कोठारी हैं। इसलिए मंदिर दर्शन में कोई असुविधा नहीं हुई। उन्होंने मंदिर के संबंध में अनेक महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ यहाँ के पुरातत्व, इतिहास, कला, संस्कृति और पंचकोसी यात्रा के संबंध में दी।
राजीवलोचन भगवान के दर्शन पश्चात परिसर में स्थित राज राजेश्वर महादेव, दान दानेश्वर महादेव, राजिम तेलीन माता मंदिर, जगन्नाथ मंदिर के साथ ही महानदी किनारे स्थित भूतेश्वर महादेव व पंचेश्वर महादेव के दर्शन कर मन को बड़ी शांति मिली। राजिम की पंचकोसी यात्रा को प्रारंभ करने के पूर्व श्रद्धालु यात्री उपरोक्त मंदिरों में पूजन अर्चन व दर्शन कर पुण्य के भागी बनते हैं। श्री राजेन्द्र मनु जी राजीव लोचन मंदिर के पुजारी और कर्ता-धर्ता हैं। उन्होंने बताया कि राजिम की प्रसिद्धि प्राचीन काल से रही है। धर्म, संस्कृति, पुरातत्व और कला की दृष्टि से यह छत्तीसगढ़ ही नहीं, अपितु पूरे देश में प्रसिद्ध है। महानदी की पावन धाराएँ तरंगित होकर इसकी महिमा का बखान करती हैं। राजीव लोचन मंदिर चतुष्कोणीय आकार में निर्मित है। उत्तर और दक्षिण दोनों ओर मंदिर का प्रवेश द्वार है। राजीवलोचन अर्थात् जिनके नेत्र कमल के समान हो, ऐसे भगवान विष्णु की सुंदर काले प्रस्तर से निर्मित चतुर्भुजी प्रतिमा यहाँ विराजित है, जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं। यह मंदिर पूर्वाभिमुखी है। महामंडप में करबद्ध गरुड़ जी की मूर्ति हैं। गर्भ गृह का प्रवेश द्वार विशेष अलंकृत है, जिसमें सर्पाकार मानवी आकृक्तियों का अकंन है। महामंडप में बारह प्रस्तर स्तंभ जिनमें गंगा, यमुना तथा विष्णु के दशावतारों से जुड़ी वामनावतार, वराहावतार, नरसिंह अवतार आदि की भव्य व विशाल मूर्तियाँ हैं। एक ओर प्राचीन शिला लेख का हिन्दी अनुवाद है, जिसे बाद में लगाया गया है। इसी मंदिर परिसर में अनेक शिवालय हैं। भगवान विष्णु और शिव दोनों ही यहाँ विराजित हैं, और प्राचीन काल से पूजित हैं। इसलिए इसे हरि हर क्षेत्र कहा जाता है।

भगवान राजीवलोचन की यह मूर्ति अपने आप में अद्भुत है, जिसमें गजराज को सूंड में कमल नाल पकड़े हुए दिखाया गया है। गज और ग्राह की लड़ाई में भगवान विष्णु ने अपने चक्र सुदर्शन से ग्राह को मारकर गज की रक्षा की थी। इस मंदिर का निर्माण काल आठवीं शताब्दी बताया गया है। इस अभिलेख के आधार पर इस मंदिर का निर्माण नलवंशी राजा विलासतुंग द्वारा कराने का वर्णन मिलता है। मंदिर परिसर में राज राजेश्वर महादेव व दान दानेश्वर महादेव के रूप में पश्चिमाभिमुखी दो शिव मंदिर हैं। इनके भी प्रवेश द्वार राजीवलोचन मंदिर की तरह अलंकृत हैं। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। बाहर मंदिर के निर्माणकर्ता राजा जगतपाल की आसनस्थ मूर्ति है। इन्हीं मंदिरों से लगा हुआ राजिम तेलीन माता का मंदिर है। कहा जाता है कि इसी भक्त माता राजिम के नाम पर इस स्थान का नामकरण हुआ। इस संबंध में यह किंवदंती प्रचलित है कि यहाँ एक तेली परिवार रहता था। यह परिवार तिल अन्न से अपने घानी द्वारा तेल निकालता और आसपास के गाँवों में बेचता। इस तरह अपने परिवार का भरण पोषण करता। उसका एक बेटा था, जिसकी शादी हुई तो बहू के आने पर बहू भी तेल बेचने का कार्य करती। बहू एक दिन जब तेल बेचने जा रही थी तो रास्ते में पड़े पत्थर से टकरा कर गिर गई, जिससे सारा तेल उस पत्थर पर ही फैल गया। वह रोने लगी। सोचा कि यदि सास-ससुर जानेंगें तो नाराज होंगे। घर जाकर वह अपने सास-ससुर और पति से क्या कहेगी? वह सुबक सुबक कर रोने लगी। इसी समय एक चमत्कार हुआ। रोना छोड़कर तेल के बर्तन को देखती है, तो बर्तन तेल से भरा हुआ है। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। वह तेल बेचने चली गई। इस घटना के पश्चात् बहू जब भी उस रास्ते से तेल बेचने जाती, सबसे पहले वह उसी पत्थर को अपना तेल चढ़ाती। इससे उसके घर में सुख समृद्धि की वर्षा होने लगी। धन-धान्य से वे परिपूर्ण हो गए। एक दिन बहू ने उक्त घटना अपने सास-ससुर और पति से कही। उन्होंने उक्त पत्थर को देखना चाहा। फिर जब जाकर देखा और उसे पल्टाया तो वह चतुर्भुजी विष्णु की भव्य प्रतिमा थी, जिसे वे घर लाकर उसकी पूजा करने लगे। कुछ समय बाद दुर्ग के राजा जगत पाल ने उस मूर्ति को सविनय तेली परिवार से माँगकर मंदिर में स्थापित किया। कहते हैं कि उसी दिन से इस स्थान और मंदिर का नाम राजिम पड़ा।
सुबह जब सात बजे मैं घर से निकला था तो तेज बारिश हो रही थी। बस से यात्रा कर रायपुर होते हुए राजिम पहुँचा, तब तक वर्षा जारी थी। रास्ते में हरे-भरे खेत, छोटे-छोटे लहराते धान के पौधे मन को आनंदित कर रहे थे। तेज बारिश के कारण नदी नालों में बाढ़ की स्थिति थी।
राजिम पहुँकर बरसात में कुछ बचते, कुछ भींगते पटेवा पटेश्वर नाथ धाम पहुँचे। बड़ा मनोरम दृश्य। एक विशाल सरोबर के किनारे पटेश्वर नाथ शिवधाम स्थित है। सरोवर लगभग 18 एकड़ में फैला हुआ है। मंदिर का पट बंद था। कुछ बच्चे बारिश का मजा ले रहे थे। हमने ताले की चाबी के बारे में पूछा तो एक बच्चा पास ही पुजारी के पास से चाबी लाकर पट खोल दिया। पटेश्वरधाम पंचकोसी यात्रा का प्रथम पड़ाव है। पंचकोसी यात्रा कार्तिक माह से प्रारंभ होकर महाशिवरात्रि तक चलते रहती है। यात्री अपनी सुविधानुसार बाजे-गाजे के साथ पैदल निकालते हैं। पंचकोसी यात्रा का प्रारंभ कुलेश्वर महादेव से होकर कुलेश्वर महादेव में ही समापन होता है। ग्राम पटेवा राजिम से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर बसा है। पटेवा का प्राचीन नाम पट्टनापुरी था। पटेवा में विराजित महादेव 'सद्योजात' शिवलिंग है, जिनके ऊपर ताँबे का नाग फन फैलाए हुए है। इस मंदिर में विष्णु व लक्ष्मी जी की संगमरमर की भी मूर्तियाँ हैं, जो अर्वाचीन है। लेकिन पटेश्वर महादेव का शिवलिंग अत्यंत प्राचीन है, जिनकी अर्धांगिनी अन्नपूर्णा है। इस प्रकार यह मंदिर अन्नकोश का प्रतीक है। यह भी अल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है। अन्न को अन्नपूर्णा कहा जाता है, जो कि पार्वती का ही एक रूप है। पंचकोसी यात्रा में आने वाले यात्री अपने साथ दाल चावल, सब्जी, लकड़ी व बर्तन लेकर चलते हैं। अपनी-अपनी टोली के अनुसार भोजन बनाते हैं। तालाब में स्नान कर पंचकोसी धाम पटेश्वरनाथ के दर्शन व पूजन पश्चात् चम्पेश्वर महादेव के दर्शन के लिए चम्पारण की ओर प्रस्थान करते हैं। बीच में पड़ने वाले गाँवों के लोग पंचकोसी यात्रियों का स्वागत करते हैं। उनके लिए जल आदि की व्यवस्था कर स्वयं पुण्य के भागी बनते हैं। सावन होने के कारण शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ अधिक थी।
पटेश्वर धाम से घनघोर बारिश शुरू हो गयी। ऐसी बारिश जिसे छत्तीसगढ़ी में 'ठढ़दिया' पानी कहते हैं। भींगते-भागते हम चम्पारण पहुँच ही गये। चम्पेश्वर महादेव की डेहरी पर पहुँचकर हृदय को बड़ी शांति मिली। यहाँ भी श्रद्धालुओं की भीड़ थी। पंचकोसी यात्रा का दूसरा पड़ाव है चम्पारण। पहले इसका नाम चम्पाझर था। स्थानीय लोग बताते हैं कि यहाँ पहले चम्पा चम्पेश्वर महादेव को 'तत्पुरूष' महादेव कहा जाता है। यहाँ इनकी अर्धांगिनी कालिका है, जो पार्वती का ही एक रूप है। चम्पेश्वर महादेव का जो शिवलिंग है, उसमें पार्वती व गणेश जी के रूप के भी दर्शन होते हैं। यह शिवलिंग स्वयंभू है। इस संबंध में बड़ी रोचक कथा प्रचलित है- कहा जाता है कि लगभग आठ सौ साल पहले यहाँ घनघोर जंगल था। गाँव का ग्वाला गायों को लेकर रोज चराने के लिए जंगल जाता। मनमोहक बंशी बजाता। गायों को चराता, नदी में पानी पिलाता। फिर शाम को गायों को लेकर वापस गाँव आता। उन्हीं गायों में एक बँझली (बाँझ) गाय थी। वह गाय रोज शाम को घर आने के बजाय वापस जंगल की ओर लौट जाती। एक दिन ग्वाला उसके पीछे-पीछे गया। देखा तो आश्चर्य का ठिकाना न रहा। शमी के पेड़ के नीचे गाय खड़ी है। उसके थन से दूध की धार एक पत्थर पर गिर रही है। ग्वाले ने आकर गाँव वालों को बताया, पर किसी को भी उसकी बातों पर भरोसा न हुआ। ग्वालें ने उन्हें सच दिखाना चाहा।

दूसरे दिन फिर शाम को बँझली गाय जंगल की ओर लौटने लगी, तब ग्वाले के साथ गाँव वाले भी उसके पीछे पीछे वहाँ पहुँचें। गाँव वालों ने देखा तो सब की आँखें खुली की खुली रह गयी। ग्वाले ने जो कहा था, वह सच निकला। गाँव वालों ने उस जगह की साफ-सफाई की देखा तो वहाँ शिवलिंग है, जिसमें शिवजी के संग पार्वती व गणेश जी की छबि है। सबने मिल-जुल कर वहाँ मंदिर बनवाया। यही चम्पेश्वर महादेव हैं। यहाँ शिवरात्रि के समय विशाल मेला भरता है।
चम्पारण चम्पेश्वर महादेव के लिए तो प्राचीनकाल से प्रसिद्ध है। यह महाप्रभु वल्लभाचार्य का जन्म स्थान भी है। उनका उसे पल्टाया तो वह चतुर्भुजी विष्णु की भव्य प्रतिमा थी, जिसे वे घर लाकर उसकी पूजा करने लगे। कुछ समय बाद दुर्ग के राजा जगत पाल ने उस मूर्ति को सविनय तेली परिवार से माँगकर मंदिर में स्थापित किया। कहते हैं कि उसी दिन से इस स्थान और मंदिर का नाम राजिम पड़ा।
सुबह जब सात बजे मैं घर से निकला था तो तेज बारिश हो रही थी। बस से यात्रा कर रायपुर होते हुए राजिम पहुँचा, तब तक वर्षा जारी थी। रास्ते में हरे-भरे खेत, छोटे-छोटे लहराते धान के पौधे मन को आनंदित कर रहे थे। तेज बारिश के कारण नदी नालों में बाढ़ की स्थिति थी।
काशी में कुछ अशांति थी। इस कारण वे गाँव की ओर लौट पड़े। रास्ते में राजिम के पास चम्पाझर पड़ता है। वे यहाँ चम्पेश्वर महादेव के दर्शन के लिए पहुँचे। यहीं उनकी पत्नी वल्लमागारू ने रात में एक बालक को जन्म दिया। यह घटना संवत पन्द्रह सौ पैंतीस बैसाख कृष्ण पक्ष एकादशी (ई.स. 1479) की है। बालक बड़ा कमजोर था। उसके जीने की आशा कम थी, इसलिए उन्होंने बालक को शमी पेड़ के कोटर में छोड़ दिया और दुःखी मन से आगे निकल गये। चलते-चलते रास्ते में देववाणी हुई कि बालक जीवित है। वे तुरन्त लौटे। देखा तो सचमुच बालक धरती की गोद में मचल रहा है। बालक के चारों ओर आग का गोल घेरा है।
यह चमत्कार देख माता-पिता का मन आनंद से भर गया। यही बालक आगे चलकर महाप्रभु वल्लभाचार्य हुए। वल्लभ बचपन से होशियार थे। उन्हें बाल सरस्वती कहा गया। गुरुओं से वेदों की शिक्षा पायी। वे कृष्ण के परम भक्त थे। चम्पारण में कृष्ण भगवान के बाल रूप की पूजा की जाती है। बारहों महीने वल्लभ सम्प्रदाय पुष्टि मार्ग के अनुयायी देश-विदेश से यहाँ दर्शन के लिए आते हैं। उनका जन्म दिवस हर साल बैसाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को धूमधाम से मनाया जाता है। तब भी यहाँ बड़ा मेला भरता है। चम्पारण की दूरी राजिम से लगभग 15 किमी. है। चम्पेश्वर महादेव के दर्शन के पश्चात् श्रद्धालुओं की पंचकोसी यात्रा की टोलियाँ बहानी गाँव के लिए प्रस्थान करती है।
बहानी गाँव में ब्रहाकेश्वर महादेव का मंदिर है। चम्पारण से इसकी दूरी उत्तर पूर्व की और लगभग 10 किमी. है। बह्मनी नदी के किनारे स्थित है। बहाकेश्वर महादेव में भगवान शिव की 'अघोर' वाली मूर्ति है। यहाँ उमा इनकी शक्ति है। यहाँ महादेव आनंदमय स्वरूप में पूजे जाते हैं। जो लोग इस आनंदमय स्वरूप का एक बार दर्शन कर लेते हैं, उनका जीवन धन्य और आनंदमय हो जाता है। उन्हें न किसी का भय होता है और न किसी का त्रास। बहानी नदी के किनारे एक जलकुंड है, जिसके उत्तरी छोर पर ब्रह्मकेश्वर महादेव का मंदिर है। इस कुंड में जल का स्रोत अनवरत रूप से प्रवाहित होते रहता है, जिसे स्थानीय लोग 'सेत गंगा' कहकर पूजते हैं। यहाँ का जल पवित्र माना जाता है। ब्रह्मकेश्वर महादेव का मंदिर महासमुंद जिले में स्थित है। बह्मनी का ब्रह्मकेश्वर महादेव पंचकोसी यात्रा का तीसरा पड़ाव है। भक्तगण रात्रि में यहाँ विश्राम कर फिंगेश्वर के लिए प्रस्थान करते हैं, जहाँ पर फणिकेश्वर महादेव विराजमान हैं।
अब बारिश थम सी गयी थी। अतः फिंगेश्वर जाने के बजाय नवापारा से लोमश ऋषि आश्रम होते हुए कुलेश्वर महादेव जाना उचित प्रतीत हुआ। इसी कुलेश्वर महादेव से पंचकोसी यात्रा का प्रारंभ और समापन होता है। नवापारा से होते हुए हम महानदी का पुल पार करते हुए बेलाही गाँव पहुँचे। इसी बेलाही गाँव में लोमश ऋषि का आश्रम है, जहाँ पर हर समय श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। कुलेश्वर महादेव महानदी के तट पर स्थित है। जहाँ पर पैरी, सोंढुर और महानदी का त्रिवेणी संगम है। बताते हैं कि पहले इस स्थान पर बेल के पेड़ अधिक थे। इसलिए इस स्थान का नाम 'बेलाही' पड़ा। बेल के पेड़ आज भी दिखाई पड़ते हैं। बेल पत्र भगवान भोलेनाथ अर्थात कुलेश्वर महादेव को चढ़ाया जाता है। चूँकि राजेन्द्र मनु जी स्वयं पुजारी हैं, मंदिर समिति के सदस्य हैं। इसलिए कुलेश्वर महादेव के पुजारियों व साधु-संतों से इनका आत्मीय लगाव है। इसका लाभ हमें इस यात्रा में बराबर मिलता रहा। राजिम और नयापारा बस्ती के बीचों बीच महानदी प्रवाहित होती है। इस समय महानदी में बाढ़ की स्थिति थी। कुलेश्वर महादेव में आने-जाने के लिए अब लक्ष्मण झूला बन गया है, जो बहुत ही आकर्षक है। जब लक्षमण झूला नहीं था, तब कुलेश्वर महादेव तक पहुँचने के लिए नवापारा बेलाही मार्ग ही उपयुक्त था। राजिम से कुलेश्वर महादेव तक जाने के लिए महानदी को पार करना पड़ता था, जो बारिश के दिनों में संभव ही नहीं था। महानदी में पानी कम होने पर ही रेत व पानी में चलकर यहाँ आना पड़ता था। लक्षमण झूला बनने से अब दोनों ओर से आना - जाना हर मौसम में सुगम हो गया है। यह तो सर्वविदित है कि कुलेश्वर महादेव का मंदिर त्रिवेणी संगम में स्थित है। यह मंदिर नदी के बीच ऊँचे अधिष्ठान पर निर्मित है, जो भीषण बाढ़ की स्थिति में भी वर्षों से सुरक्षित है। कुलेश्वर महादेव के सम्बंध में यह लोक मान्यता है कि जब भगवान श्री राम सीता और लक्ष्मण वनवास के समय दण्डकारण्य आये थे, तब माता सीता ने अपने हाथों से रेत का शिवलिंग निर्माण कर अपने कुल की रक्षा के लिए महादेव की पूजा की थी। तब से ये यहीं विराजित हैं और इसीलिए इन्हें कुलेश्वर महादेव के नाम से पूजा जाता है। इन्हें उत्पलेश्वर महादेव भी कहा जाता है। शिवलिंग के स्वरूप में आज भी रेत नजर आती हैं। मंदिर के पृष्ठ भाग में विशाल पीपल का वृक्ष है। नदी तल से अधिष्ठान की ऊँचाई लगभग बीस-पच्चीस फीट होगी। कुलेश्वर महादेव में अनेक पुरातात्विक महत्त्व की प्राचीन मूर्तियाँ हैं। मंदिर में एक प्राचीन शिलालेख भी संरक्षित है। निर्माण की दृष्टि से अष्टकोणीय यह मंदिर जल धाराओं के बीच निर्मित है जो बड़ा अद्वितीय और सुदृढ़ स्थिति में है। लक्ष्मण झूला से आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ कुलेश्वर महादेव के प्रति उनकी आस्था और भक्ति को प्रकट करती है।
पंचकोसी यात्रा के मुख्य कर्ताधर्ता और लोमश ऋषि आश्रम निवासी पंडित सिद्धेश्वरानंद जी ने बताया कि राजिम का मंदिर आठवीं शताब्दी का है और भगवान रामजी वनागमन के समय यहाँ आए थे। तब से इसकी प्रसिद्धि है। ऐसा कहा जाता है कि लोमश ऋषि नित्य पंचकोसी यात्रा करते थे। उन्हीं के द्वारा संचालित इस परंपरा को हम लोग बनाए हुए हैं। आज भी इस कलयुग में लोग हजारों की संख्या में पद यात्रा करते हैं। यात्रा में लोग अपनी टोली के लिए खुद भोजन बनाते हैं। एक समय भोजन करते हैं। एक साथ पड़ाव करते हैं। नहाने के लिए तेल-साबुन आदि का उपयोग नहीं करते। सबकी कोई मनोकामना होती है। वे मनोकामना की पूर्ति के लिए एक नारियल लेकर यात्रा पर निकल पड़ते हैं। इससे हमारी धार्मिक आस्था बलवती होती है। हमारे सनातन धर्म का प्रचार होता है। पहले यात्रा का निश्चित समय नहीं होता था। बाद में इसे व्यस्थित किया गया। बाहर जनवरी से यह यात्रा प्रारंभहोती है, जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल होते हैं। लोमश ऋषि आश्रम से प्रारंभ कर अठारह जनवरी को यहीं समापन होता है। इस पंचकोसी यात्रा की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि यात्रा में बोल बम या हर-हर महादेव के जय घोष के स्थान पर राम नाम का संकीर्तन किया जाता है। चूँकि छत्तीसगढ़ राम मय है, इसलिए इस यात्रा की यही परंपरा है। महिला पुरुष, आबाल वृद्ध सभी अपनी शक्ति अनुसार पूर्ण भक्ति से इस यात्रा में शामिल होते हैं। पंडित जी ने और भी अनेक जानकारियाँ दी। मैंने मामा-भाँचा की किंवदंती की जानकारी चाही। चूँकि मैंने अपने दादी से सुना था कि जब महानदी में बाढ़ आती है। जब कुलेश्वर मंदिर जल प्रवाह में डूबने लगता है, तब वहाँ से आवाज आती है कि-'ममा में बूड़त हव मोला बचा।' तब राजिम तट के मंदिर पंचेश्वर महादेव से आवाज आती है कि 'तै नई बूड़स भाँचा, चिंता झन कर, मैं हैव ना।' कहा जाता है कि इसके बाद बाढ़ का पानी उतरने लगता है। इस पर पंडित जी ने कहा कि हो सकता है, कि कभी ऐसा सच सामने आया हो और किंवदंती प्रचलित हो गई हो। रात्रि भोजन के पश्चात राजेन्द्र मनु जी ने एक और जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भगवान राजीवलोचन का प्रतिदिन श्रृंगार तीन रूपों में होता है। प्रातःकाल बाल रूप, दोपहर युवा रूप में और संध्या वृद्ध रूप में। इसके अतिरिक्त पर्व व उत्सव के अनुसार जैसे दीपावली, होली, बसंत पंचमी, रक्षाबंधन, दशहरा, जेठवनी एकादशी, चैत्र व कुँवार नवरात्रि, माघ पूर्णिमा, अक्षय तृतीया व सावन महीना में पर्व अनुरूप विशेष श्रृंगार किया जाता है। ये श्रृंगार बड़े ही दर्शनीय होते हैं।
अगली सुबह राजिम से फिंगेश्वर को दूरी सत्रह किलोमीटर है। आधा-पौन घण्टे में मैं फिंगेश्वर पहुँच गया। सावन का प्रथम सोमवार होने के कारण श्रद्धालुओं की भीड़ थी। मंदिर समिति की ओर से प्रसादी वितरण की व्यवस्था चल रही थी।
फिंगेश्वर पुरानी जमींदारी रही है। यहाँ का फणिकेश्वर मंदिर दसर्वी शताब्दी का है। पुरातत्व व शिल्प की दृष्टि से मंदिर सुदृढ़ और सुंदर है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण फणिनागवंशी राजाओं द्वारा किया गया है, इसलिए इसे फणिकेश्वर महादेव कहते हैं। गर्भगृह में शिवलिंग विराजमान है। फणिकेश्वर महादेव में शंकर की 'ईशान' नाम वाली मूर्ति है। इनकी अर्धांगिनी अंबिका है। फिंगेश्वर पंचकोसी यात्रा का चौथा पड़ाव है। यहाँ गणेश जी व चामुण्डा की मूर्तियाँ हैं। मंदिर कलश विहीन है। कलश मंदिर के भीतर ही रखा हुआ है। मंदिर की बाह्य दीवारों में रामकथा व कृष्ण कथा से संबंधित अनेकों आकर्षक व सुंदर मूर्तियाँ हैं। दशावतारों से जुड़ी मनोहारी मूर्तियों के साथ अनेक मिथुन मूर्तियाँ हैं। इसी प्रांगण में पंचदेव मंदिर है, जो बहुत ही सुंदर है। इसे यहाँ के जमीदारों ने बनवाया है। पंचदेव मंदिर के सामने एक प्राचीन बावड़ी है।
राजिम पंचकोसी यात्रा का पाँचवाँ पड़ाव ग्राम कोपरा के कोपेश्वर महादेव हैं, जिन्हें कर्पूरेश्वर महादेव भी कहा जाता है। बड़ा मनभावन दृश्य। तालाबों के बीच मंदिर दूर से दिखाई दे रहा था। महिलाएँ और नन्हीं बेटियाँ हाथों में जल और पूजा की थाली लिये मंदिर की ओर जा रही थीं। कोपरा पंचकोसी यात्रा का पाँचवाँ और अंतिम पड़ाव है। तीन तालाब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। पास ही श्मशान घाट है। पीपल के वृक्ष पर मृतक कर्म के लिए काली इंडियाँ लटक रही हैं। मुझे लगा कि भगवान शिव का यह सही स्थान है, जो अपने भूत-पिशाचों के साथ यहाँ निवास करते हैं। एक तालाब के गहरे पानी में निर्मित यह शिव मंदिर दूर से तालाब के जल में झिलमिला कर मनोरम दृश्य उत्पन्न करता है। पूछने पर पता चला कि यह 'दलदली' तालाब है, जिसे 'शंख सरोवर' भी कहा जाता है। श्रद्धालुओं की भीड़ में महिलाओं की संख्या अधिक थी। मैंने मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश किया, तो शिवलिंग को देखकर आँखें चमत्कृत हो गयीं, क्योंकि अब तक मैंने पंचकोसी यात्रा के जितने भी मंदिरों में शिवलिंग की दर्शन किये उनका रंग काला या कत्थई था, किन्तु इस मंदिर में विराजित शिवलिंग का रंग संगमरमर की तरह धवल, किन्तु विशेष आभा लिये हुए कर्पूर की तरह चमकदार और उज्जवल है। तब मुझे स्मरण हो आया कि शायद इसी कारण इसे कर्पूरेश्वर महादेव कहा जाता है। पुजारी ने जानकारी दी कि कर्पूरेश्वर महादेव में 'वामदेव' नाम की मूर्ति है, इनकी अर्धांगिनी भवानी है। ये आनंदमय कोश के प्रतीक हैं। ये अपने सभी भक्तों को आनंदित करते हैं। कोपरा गरियाबंद जिले का सबसे बड़ा और उन्नत गाँव है। सामाजिक सहभागिता और धार्मिक कार्यों के लिए दूर-दूर तक इसकी प्रसिद्धि है। कर्पूरेश्वर महादेव की कृपा यहाँ सदैव सब पर बरसती रहती है। कोपरा से पैदल चलकर पंचकोसी यात्री पुनः राजिम पहुँचते हैं। तब कुलेश्वर महादेव में ही यात्रा का समापन विधि-विधान से होता है।
हमारी सनातनी परम्पराएँ केवल हमें ज्ञान ही नहीं देतीं, बल्कि हमारे मनप्राण को ऊर्जा से भर देती हैं। कला, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, पुरातत्व आदि से परिचित कराकर जीवन को गौरव से संपृक्त करती हैं। राजिम की इस पंचकोसी यात्रा के पड़ावों के दर्शन कर मैंने भी यह सत्य अनुभूत किया।
छत्तीसगढ़ का पारम्परिक लोकनाट्य: रहस
July 22, 2026