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पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

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सतपुड़ा की रानी - पचमढ़ी

सतपुड़ा की रानी - पचमढ़ी


यदि आप गर्म लू के थपेड़ों से परेशान होकर अपने शिथिल शरीर और मन को नई ऊर्जा देना चाहते है, नगरीय वातावरण और आपा-धापी से थके ऊबे नेत्रों व मन को ईश्वरीय छटा की दिव्य झलक दिखाना चाहते हैं साथ ही अपने दैनिक जीवन की आपाधापी से निकलकर तनाव मुक्त शांति से सपरिवार कुछ दिन प्राकृतिक पर्यटन मनाने के इच्छुक है तो आपकी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए मध्यप्रदेश स्थित सतपुड़ा पर्वतमाला की प्राकृतिक रानी ‘पचमढ़ी’ अपनी सुन्दर बांहे पसारे आपको आमंत्रण देती है।

भारत के सर्वश्रेष्ठ पर्वतीय आकर्षक स्थलों में से एक ‘पचमढ़ी’ अपनी प्राकृतिक सुरम्यता और रमणीक पर्यटन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। इसे देखते ही प्रतीत होता है मानों प्रकृति ने अपने हाथों से अपना समूचा सौन्दर्य पहाड़ पर यदि कहीं उड़ेला है तो वह केवल यही स्थल है। यही कारण है कि पचमढ़ी पर्यटकों के समक्ष अपना विस्तृत एवं मनोरम लैण्ड स्केप्स लिए हुए है। संध्या में पिघलते हुए सूर्य के पीले वर्ण से हल्की चमक लिये विशाल और हरे-भरे वृक्ष सतपुड़ा के गर्वोन्नत शिखर, प्राकृतिक प्रपात, गहरी विशाल खांईयां और गहन अन्धेरे की शीतलता, मन में अनुभव कराने वाली निस्तब्ध गुफाएं, यह सब एक ही बार एक ही जगह में पर्यटकों के हृदय में उतरकर उनके जीवन का एक हिस्सा बनकर रह जायगा तो वह एक मात्र स्थल है ‘पचमढ़ी’ जिसे देखते ही पर्यटक कह उठता है

‘‘पचमढ़ी औ पचमढ़ी।
तुम हो कितनी जादू भरी’’

देश के विभिन्न भागों से प्रकृति की इस पर्वतीय रानी तक पहुंचने वाले पर्यटक जैसे ही इसके क्षेत्र में प्रवेश करते है तब वे सहसा यहां के प्राकृतिक और मनोहारी दृश्यों के अद्भुत संसार में खोने लगते है। प्रदूषण से पूर्णतया मुक्त यह स्थल आज पर्यटकों की खास पसंदीदा जगह बन गया है। यहां के वन्य जीव, रोमांचक जंगल, जल प्रपात, गुफाएं तथा पहाड़ियों का अद्वितीय प्राकृतिक सौन्दर्य, पर्यटन की दृष्टि से हर किसी को सम्मोहित करता है। यहां यह जानना भी आवश्यक होगा कि आज के दौर में पूरे देश में पचमढ़ी एक मात्र ऐसा स्थल है जिसका पर्यावरण पूर्णतया प्रदूषण रहित है एवं आकाश एकदम स्वच्छ। इसलिए प्रसिद्ध वैज्ञानिक जयन्त नार्लीकर के प्रस्ताव पर टाटा इन्स्टीट्यूट ने यहां ‘गामा-रे-आब्जरवेट्री’ स्थापित की थी।

सतपुड़ा की सुरम्य पचमढ़ी घाटी
सतपुड़ा की सुरम्य पचमढ़ी घाटी

प्रचलित लोकोक्तिनुसार ‘पचमढ़ी’ का अर्थ है - पांचमढ़ी अर्थात् ‘पांच गुफाएं’। यहां की ये पांच गुफाएं उन पाण्डव भाईयों की कही जाती है जो अपने वनवास काल के दौरान छद्मवेश में लम्बे समय तक यहां रहे थे। समुद्रतल से 3555 फीट की ऊंचाई पर स्थित पचमढ़ी 60वर्गकिमी के वन क्षेत्र में फैली हुई है। ग्रीष्म ऋतु में पर्यटकों को यहां हल्के वस्त्र और सर्दी में ऊनी वस्त्र अवश्य लाना चाहिये। वर्षा ऋतु में इसका सौन्दर्य हसीन हो उठता है वहीं बादल, काटेज में पर्यटकों के पास श्वेत मेहमान बनकर बगैर बुलाये आते है तो मन रोमांचित हो उठता है। सर्द ऋतु में यहां छायी कोहरे की चादर देखना प्रकृति के अद्भुत नजारों में से एक है।

पचमढ़ी की अधिकांश आबादी यहां छावनी में वास करती है। पर्यटन का साधन खुली जीप है जिसमें बैठकर प्रकृति के दृश्यों के दर्शन करने का आनन्द ही कुछ ओर है। सतपुड़ा पर्वतमाला के मनोरम कटोरेनुमा पठार पर स्थित पचमढ़ी दरअसल मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में है। पचमढ़ी पहुंचने के लिये निकटतम हवाई अड्डा राजधानी भोपाल और महाराष्ट्र का नागपुर है। यहां से निजी टेक्सी, बस द्वारा आसानी से पचमढ़ी पहुंचा जा सकता है। यहां का निकटतम रेल्वे स्टेशन ‘पिपरिया’ है। यह स्थान इटारसी-जबलपुर (म.प्र.) रेल्वे लाईन के मध्य स्थित है। यहां से (पिपारिया से) पचमढ़ी के लिये टेक्सियां, बस सवेरे 5 बजे से रात्रि 9 बजे तक उपलब्ध रहती है। पीपरिया से यह स्थल 52 किमी दूर है। बस से सड़क मार्ग यह स्थल सीधे भोपाल (195किमी), इन्दौर (364किमी), नागपुर (258किमी), जबलपुर (244किमी), दिल्ली (913किमी) बस मार्ग द्वारा भी जुड़ा हुआ है। पचमढ़ी में ठहरने के 4 दर्जन सुविधा युक्त होटल भी है, जहां ठहरने व भोजन की उत्तम सुविधाएं सुलभ है।

इस प्रकार स्वास्थ्यप्रद जलवायु, मनोहारी वादियों, जलप्रपात, उंतुग शिखर, उद्यान तथा पुष्पों के प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण पचमढ़ी को सतपुड़ा पर्वतमाला की रानी और ‘मध्यप्रदेश का कश्मीर’ कहा जाता है। सन् 1862ई. में कैप्टिन फारसीथ इस स्थल पर आये और यहां के बड़े महादेव पहाड़ पर पहुंचे तो वे सूर्य की किरणों से जन्में विभिन्न रंगों से रंगी घाटियां, पहाड़ एवं वृक्षों के सौन्दर्य से आल्हादित हो गए थे। केप्टिन चूंकि इग्लैण्ड के थे। इंग्लैण्ड में सूरज की धूप के लिए व्याकुल उनके मन को चटकदार धूप तो मिली ही पर इस चटक में भारत के अन्य स्थलों पर बरसती अग्नि जैसेी गरमी नहीं थी वरन् शीतल हवा उस धूप को सुखद बना रही थी। इस अहसास पर मुग्ध हो उन्होंने यहां की स्वास्थ्यवर्धक हवा को ध्यान में रखकर यहां एक ‘सैनिटोरियम’ की स्थापना का निर्णय लिया और सर्वप्रथम यहां ‘बासन लाॅज’ नामक इमारत का निर्माण कराया।

पचमढ़ी का ऐतिहासिक बाइसन लॉज
पचमढ़ी का ऐतिहासिक बाइसन लॉज

धीरे-धीरे यहां अंग्रेज अधिकारियों, कर्मचारियों की नियुक्त्यिां हुई और आवासीय निर्माण होते गये। कैप्टन तो यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य से इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्हंे ‘‘द हाईलैण्ड आॅफ सेन्ट्रल इण्डिया’’ जैसी प्रसिद्ध पुस्तक लिखने की प्रेरणा यहीं से मिली, जिसमें उन्होंने लिखा कि- ‘‘मैने भारत के अनेक प्रान्त देखे लेकिन गहरे हरे लाल रंग का हरा जामुन, आम और गूलर के बेशुमार दरख्तों की कतारों और विभिन्न जड़ी बूटियों से भरा ऐसा पर्वतीय स्थल कहीं नहीं देखा।’’ उन्होनें आगे लिखा कि- ‘‘नैसर्गिक सौन्दर्य से ओतप्रोत इस स्थल को देखना अपने आप में अनूठा अनुभव है। यहां ऐसा लगता है जैसे मैं अपने देश के ही किसी खुबसूरत पार्क में आ गया हूं।’’

कैप्टन ने जब इस स्थल के बारे में अपने अंग्रेज अफसरो को बताया तब उन्होंने भी यहां आकर इसे विकसित करने की पहल शुरू की। उन्होंने यहां खूबसूरत योजनाओं को शानदार अंजाम देना शुरू किया। अंग्रेज शासन काल में निर्मित ये इमारते आज भी अपने स्वर्णिम अतीत की कहानी कहती है। कैप्टन फारसोथ के नाम पर यहां के एक स्थल का नाम भी रखा गया-  ‘‘फारसोथ प्वाइंट’’ बाद में श्रीमती इंदिरा गांधी के यहां आगमन के कारण इस स्थल को ‘‘प्रियदर्शिनी प्वाइंट’’ नाम दिया गया। यहां 60 वर्षो से शिक्षा अर्जन के ऐसे केन्द्र भी संचलित है जहां चीनी, भूटानी, तिब्बती आदि भाषाओं का ज्ञान दिया जाता है। यहां का गोल्फ मैदान देश के प्रसिद्ध खेल मैदानों में शुमार है।

इसी के साथ पचमढ़ी ने अपने अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य व स्थलों की खूबसूरत वादियों से फिल्मी निर्माताओं को इतना अधिक लुभाया कि उन्होंने यहां ‘किस्मत’, ‘मैस्सी साहब’, ‘पल दो पल का साथ’, ‘तरकीब’, ‘द इलैक्ट्रिक मून’, ‘थोड़ा सा रूमानी हो जाय’ तथा ‘अशोका द ग्रेट’ जैसी प्रसिद्ध फिल्मों की शूटिंग की। यह स्थल पर्वतारोहियों के लिये तो रोमांच और साहस का स्थल है साथ में यह अकूत वन सम्पदा और दुर्लभ जड़ी बूटियों से भी समृद्ध है।

पचमढ़ी के दर्शनीय पर्यटन स्थलों का परिचय इस प्रकार है -
जटाशंकर:- पचमढ़ी बस स्टेण्ड से अल्प दूरी पर स्थित इस सुरम्य स्थल से यहां प्रकृति की महान कृतियों को आप उत्कृष्ट रूप में देख सकते है। ऊंचे-नीचे दो पाषाणी पर्वत शिखरों को आपस में टकराने से रोकता आसमान का टुकड़ा और उसके तल में अन्धेरी गुफा की बारहमासी ठंडक में समाधिस्थ है योगीराज शिव। रूक-रूक कर टपकती बूंदे उन्हं अखण्ड स्नान कराती है। चट्टानों के मध्य स्थित कुण्ड के ऊपर अटकी-लटकी हुई है विशाल पाषाणी चट्टानंे, जो पर्यटकों को भय मिश्रित आश्चर्य में डाल देती है। यहां शीतल वातावरण शारीरिक और मानसिक संताप हर लेता है। कुण्ड को घेरने वाली चट्टानो पर जमी ‘काई’ विशेष प्रकार की है जो दूर से देखने पर स्वर्ण रंग की लेकिन निकट में देखने पर हरे रंग की दिखायी देती है। जनाश्रुति है कि महादेव शिव ने यहां अपनी जटाओं का त्याग किया था। ऊंची पहाड़ियों से आवृत तथा हरियाली से आच्छादित यह स्थल पर्यटकों को आनन्दित कर देता है।

जटाशंकर
जटाशंकर

पाण्डव गुफाएं:- इन पांच मढ़ियों के कारण ही यह स्थल पचमढ़ी कहलाया। पाण्डव भाईयों ने अपने अज्ञातवास का समय यहीं बिताया था। ऐसी भी जनाश्रुति है कि अर्जुन ने यहीं वृहन्नला के वेष में ‘नागपतिकन्या’ को संगीत की शिक्षा दी थी। पुरातत्त्वविद् इसका निर्माण 6ठी-7वीं सदी मानते है। यहां काली अन्धेरी गुफा को भीम गुफा और सबसे अधिक सुन्दर गुफा को द्रोपदी कुटीर कहा जाता है। यहां अर्जुन,नकुल, युधिष्ठिर तथा सहदेव की गुफाएं भी बनी हुई है। इन गुफाओं से पचमढ़ी का सुन्दर और विहंगम दृश्य मनोहारी दिखायी देता है। गुफाओं के समक्ष ही रंग-बिरंगे पुष्पों से सुसज्जित पाण्डव उद्यान भी है।

हांडी खो:- उक्त गुफाओं से थोड़ा आगे ‘हांडी खो’ एक ऐसी गहरी घाटी है जो ‘वी’ शेप में हरेभरे वृक्षों से भरपूर होकर पर्यटकों को आकर्षित करती है। यह लगभग 300फीट तक गहरी है जिसके तल तक  पत्थर फैकनें का पर्यटक असफल प्रयास भी करते है। इस स्थल का नाम यहां तैनात रहे अंगे्रज अफसर ‘हांडी’ के नाम पर है।

प्रियदर्शिनी प्वाइंट:- यह स्थल पूर्व में कैप्टन फारसोथ के नाम पर था जिन्होंने यही आकर इस पचमढ़ी को खोजा और शहर बसाने की शुरूआत की थी। 1964ई. में इन्दिरा गांधी यहां आयी तब इस स्थल का नाम उनके बचपन के नाम पर ‘प्रियदर्शिनी प्वाइंट’ रखा गया। यह एक खूबसूरत प्राकृतिक पर्यटक स्थल है जहां से प्राकृतिक सुषमा का आनन्द लिया जा सकता है।

बड़े एवं गुप्त महादेव:- यह एक प्रचुर हरीतिमा वाला प्राकृतिक स्थल है। यहां लगभग 60फीट लम्बी गुफा में प्रवेश किया जाता है जो पर्यटकों के लिए एक रोमांच की जगह है। 60फीट के बाद यहां बड़े महादेव की लिंग मूर्ति दर्शनीय है। इस स्थल के चारों ओर दूर-दूर तक बिखरी प्राकृतिक छटा तथा इस गुफा के अद्भुत सौन्दर्य को निहारना पर्यटन यात्रा का अविस्मरणीय क्षण है जो भुलाये नही भूलता। गुफा के अन्दर पहाड़ से झरती पानी की बून्दे पर्यटक के मन और  शरीर को शीतल कर देती है। गुफा के मध्य शीतल जल का कुण्ड और झरना दर्शनीय है। पर्यटक इसमें स्नान करते है। यहां प्रतिवर्ष शिवरात्रि को विशाल मेला भी भरता है। 1857ई. में स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारी तात्या टोपे ने इसी क्षेत्र में सेना का पुनः एकत्रीकरण किया था।

बड़े एवं गुप्त महादेव
बड़े एवं गुप्त महादेव

उक्त स्थल के आगे ही गुप्त महादेव की प्राकृतिक गुफा है। लगभग 40फीट लम्बी-सकरी इस प्राकृतिक गुफा में शिव की लिंगमूर्ति दर्शनीय है। गुफा के अन्दर एक बार में 8 व्यक्ति ही साहस के साथ जा सकते है। प्राकृतिक रम्यता और धर्म का यह स्थल भारतीय संस्कृति का बेजोड़ उदाहरण है। संकरी गुफा में स्थित होने के कारण ही इसे गुप्त महादेव का स्थल कहा जाता है।

बी-फाल:- कल-कल बहते झरने का अनुपम प्राकृतिक सौन्दर्य भला किसे नहीं भाता? बी-फाल पचमढ़ी के प्रमुख जलप्रपातों में से एक है। पचमढ़ी आने वाला शायद ही कोई ऐसा पर्यटक होगा जो बी-फाल जाये और नहाने का आनन्द न ले पाये। यह झरना 150फीट की ऊंचाई से गिरता है। इसकी चंचल सी धारा ऊंचाई से गिरने पर कितनी विशाल और सुन्दर हो उठती है यह आनन्द तो यहीं आकर लिया जा सकता है। यहां सपरिवार पूरा दिन आसानी से गुजारा जा सकता है।

धूपगढ़:- यह पचमढ़ी का अत्यन्त मनोहारी दर्शनीय स्थल है यह समुद्रतल से 4429फीट की ऊंचाई पर स्थित सतपुड़ा पर्वतमाला की सर्वोच्च चोटी है। यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त का अद्भुत और मनोरम दृश्य दिखायी देता है जिसे देखने के लिए रोजाना पर्यटकों की भीड़ उमड़ पड़ती है। अधिक ऊंचाई पर होने से इस स्थल से सम्पूर्ण पचमढ़ी का मनोहारी दृश्य देख पर्यटक बाग-बाग हो उठते है। घुमावदार सड़क, गहरी घाटियां और शीतल बयार का रोमांच यहां पर पर्यटकों को होता है। यहां से शाम को थका मांदा सूर्य जब धीरे-धीरे अपने अस्तांचल की ओर सरकता हुआ व क्षितिज पर अपनी स्वर्णिम कूची से अनेक प्रकार के गाढ़े और हल्के रंगों से बादलों को चित्रमय करता है तो पर्यटकों की सांसे इस दृश्य को देखने के लिए थम सी जाती है।

धूपगढ़ का मनोहारी सूर्यास्त
धूपगढ़ का मनोहारी सूर्यास्त

अन्त्तः सम्पूर्ण वन प्रान्तर, पक्षियों समेत अपने जीवनदाता को नमन करते हुए विदा देता है और संध्या सकुचाती सी धरा के आवृत करने दबें पांव, जब प्रवेशकरने लगती है तब पर्यटक मुग्धावस्था से निकलकर पुनः अपने जगत में प्रवेश करते है। यहां ऐसे ही क्षण प्रकृति की विशालता से साक्षात्कार कर पर्यटक उसके अंग बनकर स्वानूभूति कर पाते है। यहां मौन होकर सूर्यास्त का अनुभव पर्यटकों के जीवन का अविस्मरणीय क्षण बन जाता है।

चैरागढ़:- पचमढ़ी के सबसे श्रमसाध्य स्थलों में है, चैरागढ़। ऊंची पहाड़ी पर 1300 सीढ़ियां उत्साह बनाकर चढ़ना एक अद्भुत रोमांच है। इस चढ़ाई मंे आस-पास का सौन्दर्य देखते हुए पर्यटकों को थकान का एहसास नहीं होता। अन्त में चतुर्भुजाकार चोटी पर जैसे ही पर्यटक पहुंचते है वहां का अद्भुत प्राकृतिक दृश्य और गरमी में भी ठण्डी हवा के झोके उन्हें मदमस्त कर देते है। यह प्राकृतिक स्थल तब हर पर्यटक का संताप हर लेता है।

यहां लगभग 240मीटर लम्बी व इतनी ही चैड़ी चैकोर चोटी पर भगवान शिव की विशाल और अति भव्य मूर्ति तपस्या रूप में स्थापित है। इसके आसपास 2किलो से लेकर 200किलो वजन तक के सैकड़ो त्रिशूल जो भक्तों द्वारा कन्धों पर यहां लाकर चढ़ाये जाते है देखने योग्य है। ये सैकड़ो त्रिशूल शिवभक्तों की श्रद्धा, भक्ति के प्रमाण है। शिवरात्रि मेले के दौरान त्रिशूल कंधे पर रखे, रास्ते में न बैठने, पूरा रास्ता पैदल चलने की मान्यता पूरी करते हुए अनेक भक्तों के दल यहां देखे जा सकते है।

अप्सरा विहार:- यह पचमढ़ी का ऐसा प्राकृतिक और मनोहारी सरोवर है जिसके लिये यह कहा जाता है कि यहां स्नान करने के लिए परियां भी लालायित रहती है। यहां छोटे-छोटे कई जल कुण्ड है। इन कुण्डों में झरने से गिरता जल अति सुन्दर दृश्य उत्पन्न करता है। पर्यटक यहां स्नान करने और तैरने का खूब आनन्द लेते है।


अप्सरा विहार

रजत प्रपात:- यह अप्सरा विहार के निकट एक ऐसा सुन्दर स्थल है जहां 350फीट की ऊंचाई से झरना गिरता है। यहां पतली सी गिरती जलधारा रजत के समान दिखायी देती है। प्रपात की उछलती बूंदे धूप में चांदी सी प्रतीत होती है। वर्षा ऋतु में इस प्रपात का दृश्य पर्यटकों को मंत्र मुग्ध कर देता है।

पचमढ़ी झील:- यह झील पर्यटकों के नौका विहार के लिये सर्वोत्तम है। यहां शाम के समय नौका विहार का आनन्द अत्यन्त मनोहारी लगता है। झील के आस-पास सुन्दर सघन हरे-भरे वृक्षों की शोभा मनोहारी दिखायी देती है।

शासकीय अलंकृत उद्यान:- शाम के समय सपरिवार आनन्द से बिताने के लिये सबसे सुन्दर यहां का स्थान शासकीय अलंकृत उद्यान है। हरे भरे पेड़-पौधे और हरी दूब से लबरेज इस उद्यान में बैठकर शीतल बयार का आनन्द मन में असीम शांति प्रदान करता है। उद्यान का यह सारा प्राकृतिक सौन्दर्य मन में उत्साह, उमंग के भावों का प्राण संचार करता है। समीप ही बालोद्यान में बच्चों के मनोरंजन के लिए ‘किलकारी’ रेलगाड़ी की सुन्दर व्यवस्था है। इस गाड़ी में बैठकर बच्चे किलकारी करते घूमते और उल्लासित होते है। इसी के निकट मृगनयनी उद्यान में बारहसिंगा, हिरण, खरगोश, नीलगाय का खुला विचरण पर्यटकों को रोमांचित करता हुआ उन्हंे वन्य जीवों की दुनियां में ले जाता है।

वानिकी संग्रहालय:- यदि पर्यटक वन्य जीवों और वन सम्पदाओं के बारे में जानने की जिज्ञासा रखते है तो इसके लिये सबसे उत्तम स्थान पचमढ़ी का वानिकी संग्रहालय, इसे कैप्टन फारसोथ ने ‘बाइसन लाज’ नाम से निर्मित करवाया था। 1862ई. में निर्मित बाइसन लाज के प्रवेश द्वार पर लगाये बाइसन का सिर आज भी यहां सुरक्षित रखा है। विभिन्न प्रदर्शन तथा संदेश, वनों और वन्य प्राणियों से सम्बन्धित जानकारी के साथ-साथ उनके समूचे पर्यावरण के संरक्षण के प्रति रूचि जाग्रत करने की दृष्टि से भी यह संग्रहालय पर्यटकों के लिए महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक है।

सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान:- यह बड़ा प्रसिद्ध और दर्शनीय उद्यान है। 524वर्ग किमी क्षेत्र में फैले हुए इस राष्ट्रीय उद्यान के प्रमुख प्रवेश द्वार को ‘पनार पानी’ कहा जाता है। इस विशाल उद्यान का उद्घाटन प्रसिद्ध पक्षीविद् डाॅ0 सालिम अली ने 19अक्टूबर 1981ई. को किया था। यहां बाघ, तेन्दुआ, गौर, चीतल, सांभर, जंगली भैंसा, बारहसिंगा, रीछ, नीलगाय, हिरण, जंगली सुअर और अन्य जानवरों को विचरण करते देखा जा सकता है। इस विशाल उद्यान में विख्यात सागवान एवं बांसवन, सदाबहार साल के वन, प्राकृतिक आम्रकुंज, गहरी घाटियां, ऊंचे पर्वत, सुन्दर जलप्रपात तथा जलाशय इस उद्यान को अतिरिक्त प्राकृतिक सौन्दर्य एवं विविधता प्रदान करते है, जिनके मोहपाश में टहलते पर्यटक दुनिया की सारी बातें भूल कर प्राकृतिक संसार में खो जाते है। देश में ऐसा संदेश देने वाला वनोद्यान कहीं नहीं है।

राजेन्द्र गिरी:- सतपुड़ा पर्वत की इस चोटी का नाम पूर्व में ‘पेनोरमा गिरी’ था। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद जब पचमढ़ी आये तब उनके सम्मान में इस प्राकृतिक स्थल का नाम ‘राजेन्द्र गिरी’ रखा गया। उनके द्वारा यहां रौंपा गया पौधा वृक्ष के रूप में आज भी मौजूद है। यह एक खूबसूरत हराभरा और प्राकृतिक बयार वाला पर्यटन उद्यान है। यहां से पचमढ़ी की ऊंची-ऊंची पहाड़ियां स्पष्ट रूप से दिखायी देती है।

राजेन्द्र गिरी
राजेन्द्र गिरी

चर्च:- पचमढ़ी में जब पहली बार अंग्रेज आये तब उन्होंने अपने आवासों के साथ-साथ अपने ईसाई धर्म के चर्च भी आराधना के लिये बनवाये थे जो आज भी संचालित है तथा पर्यटकों को देखने के लिये भी सुलभ है। इसमें प्रवेशार्थ चर्च संचालक से सम्पर्क करना होता है। यहां रोमन कैथेलिक और प्रोटेस्टंेट मत के चर्च दर्शनीय है जिनमें सुन्दर आराधना स्थल तथा दीवारों पर ईसा मसीह व उनके जीवन चित्र जड़े हुए है।

अन्य पर्यटन स्थल:- पचमढ़ी पर्यटकों को लिए प्राकृतिक स्वर्ग है। यहां अनेक जलप्रपात, कुण्ड, स्थल है जो सभी को खूब आकर्षित करते है। यहां माडादेव राॅक पेन्टिंग ऐसा स्थल है जहां प्राचीनकालीन आदिमानव के बनाये सफेद और लाल रंग के शैलचित्र है। ये चित्र अधिकतर पाषाणी दीवारों पर है जो यौद्धाओं के है और हजारों सालों बाद आज भी सुरक्षित है। यहां रीछगढ़ नामक एक प्राकृतिक स्थल है जो चारो और पहाड़ी से घिरा है। इसमें तीन प्रवेशद्वार होने से यह स्थल गढ़ के समान प्रतीत होता है। पचमढ़ी में रम्य कुण्ड, डचेसफाल, पांचाली कुण्ड, सुन्दर कुण्ड, जलावतरण ऐसे सुन्दर जलप्रपात वाले स्थल है जहां मानव मन को अथाह शांति मिलती है। यह स्नान, आनन्द विहार करने के वे बेमिसाल स्थल है जहां पर्यटक  सीधे-सीधे केवल प्रकृति से स्वयं सम्बन्ध जोड़ता है। इन स्थलों के चप्पे-चप्पे पर वृक्षों, मनोहारी कंुजो और दुर्लभ वनस्पतियों के भण्डार है। ये सभी स्थल पचमढ़ी की पर्यटन यात्रा में सहजता से देखने में आते है।

पचमढ़ी में विभिन्न जातियों के मेले और उत्सव जनजीवन की विविधता और सांस्कृतिक जीवन्त्ता के प्रतीक है। इनके माध्यम में जन सामान्य अपनी कला, संस्कृति एवं परम्पराओं से परिचित होते है। शिव रात्रि, नागपंचमी तथा पचमढ़ी उत्सव पचमढ़ी को विशिष्ट पहचान देते है। पचमढ़ी एक नैसर्गिक पर्यटन स्थल है। पर्यटक किसी भी मौसम में कितने ही दिन क्यों न रहे। इस सौन्दर्यमयी स्थली में उसका मन प्यासा ही रहेगा। अपने विविध प्राकृतिक रूपों को उद्घाटित करते हुए यह सतपुड़ा की रानी आपको सौन्दर्यपाश में आबद्ध कर लेगी और आप अपने घर लौटेगंे तो स्वतः ही यही गुनगुना उठेगें -

‘‘पचमढ़ी औ पचमढ़ी।
तुम हो कितनी जादू भरी’’

लेख-
ललित शर्मा
झालावाड़(राज.)

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