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लोक-अनुभव का भंडार: हमारी वाचिक परंपरा

लोक-अनुभव का भंडार: हमारी वाचिक परंपरा


आदि काल से लेकर आधुनिक सभ्यता के अब तक के मानव के निरंतर विकास की यात्रा हमें बताती है कि किसी न किसी व्यक्ति अथवा जन समुदाय ने अपने सुदीर्घ आनुभाविक ज्ञान, बोध, कौशल, सूचनात्मक जानकारी का आदान-प्रदान किसी व्यक्ति अथवा किसी माध्यम से किया है। एक ओर जहां मनुष्य को बोली और भाषा का वरदान ईश्वर प्रदत्त है। वहीं मनुष्य अपने सृजन और बौद्धिक क्षमता का निरंतर प्रयोग करते हुए संकेत, ध्वनि, चित्र, इशारे, आपसी और‌ सार्वजनिक संवाद द्वारा अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाने का निरंतर विकासात्मक प्रयास किया है।

मानव की इस यात्रा का ही सुपरिणाम है कि आज भी वाचिक संवाद की परंपरा में किसी भी क्षेत्र की सांस्कृतिक, साहित्यिक, भौतिक, वानस्पतिक, आर्थिक, सांस्कारिक, धार्मिक और सार्वजनिक शिक्षा, जिसे लोक शिक्षा कहने में कोई भी अतिशयोक्ति नहीं है, इसका विशाल भंडार है। इसमें समय-समय पर एक दूसरे से संवाद करते हुए अनंत बीजों का संग्रह इस वाचिक परंपरा के भंडार गृह में सुरक्षित रखा गया है, जो समय-समय पर लोक सम्मत ज्ञान और परख रखने वालों द्वारा सार्वजनिक भी होता रहता है।

पीढ़ियों से प्रवाहित वाचिक परंपरा
पीढ़ियों से प्रवाहित वाचिक परंपरा

पौराणिक काल में जहाँ 'रामायण' महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखा गया, वह भी कालान्तर में वाचिक परंपरा का ही एक लिखित हिस्सा है। पूर्व में यह श्रोताओं के समक्ष मौखिक पद्य पंक्तियों व आख्यानों के रूप में संचारित किया जाता था; पर महर्षि वाल्मीकि ने इसे लिखित स्वरूप प्रदान किया। इसके अनुरूप आज भी विश्व भर के विभिन्न समुदायों के पारंपरिक ज्ञान, कौशल, कला शिल्प, इतिहास, संस्कृति, जीवन जीने की शैली, कृषि, आखेट, आपसी संवाद, लोक नाट्य, त्यौहार व पर्वों पर गाए जाने वाले गीत और मंत्रोच्चार द्वारा किए जाने वाले उपचार की पद्धतियों में भी वाचिक परंपरा समाहित होती है।

भारत के सभी समुदायों का संपूर्ण वैशिष्ट्य उनकी वाचिक परंपरा में झलकता है। चाहे वह संस्कार गीत हों, लोक कथाएँ व गाथाएँ हों, समय-समय पर बुजुर्गों द्वारा लोगों को सचेत व चेतनाशील बनाने के लिए बोली जाने वाली लोकोक्तियाँ अर्थात् हाना हों, बौद्धिक ज्ञान को परखने की दृष्टि से पूछी और बूझी जाने वाली पहेलियाँ हों, लोक नाट्य के रसीले व चुटीले संवाद हों, यहाँ तक कि स्वयं समुदायों की उत्पत्ति कथाएँ हों; इन सब में लोक साहित्य और सांस्कृतिक तत्वों का स्पष्ट समावेश होता है। इनके जीवंत रहने में वाचिक परंपराओं की महत्वपूर्ण भूमिका है।

वर्तमान में बढ़ते सूचना व संचार के माध्यमों के बावजूद भी वाचिक परंपरा का महत्व आज भी बरकरार है। विशेष रूप से वनांचली समुदायों की वाचिक परंपराओं में उनकी संपूर्ण जीवन शैलियों, लोक दर्शन, लोक साहित्य, लोक कर्म, वानस्पतिक और औषधीय ज्ञान, तारे, नक्षत्र, ग्रह, पिंडों सहित जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कार गीतों, गाथाओं, वीर व साहसिक नायकों के उल्लेखनीय कार्यों और जनकल्याण के लिए समर्पित उच्च विचारधारा वाली बहादुर नारियों की गाथाएँ सहस्रधारा की तरह कल-कल, छल-छल की सुमधुर ध्वनि करती आज भी प्रवाहमान हैं।

लोक में जीवित रामकथा परंपरा
लोक में जीवित रामकथा परंपरा

सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने वाचिक परंपरा के महत्व को प्रतिपादित करते हुए कहा है कि- "अगर पुरातत्व विभाग के लोग मुझे क्षमा करें, तो मैं यह कहना चाहूँगा कि प्राचीन लोकगीतों का महत्व किसी मोहनजोदड़ो, हड़प्पा से कम नहीं है।" इस कथन से स्पष्ट होता है कि वाचिक परंपरा में लोक जीवन का दर्शन, लोक धर्म और लोक भाव आदि समाहित होता है। यही कारण है कि लिखित साहित्य की परंपरा के विकास से शताब्दियों पूर्व ही वाचिक परंपरा का प्रचलन मानव मस्तिष्क में रहना अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। साथ ही, लोक द्वारा अपनी आने वाली पीढ़ियों को निरंतर ज्ञान हस्तांतरित करने की वाचिक परंपरा की विविध और‌ लोकप्रिय शैलियाँ लोगों को जीवन जीने की कला निरंतर सिखाती रही हैं।

भारतीय ज्ञान परंपरा में लिखित साहित्य से पूर्व ही मौखिक एवं वाचिक परंपराओं का विशेष स्थान रहा है। यहाँ श्रुति परंपरा से आने वाली पीढ़ियों में ज्ञान बोध का हस्तांतरण करने की विशिष्ट व व्यवस्थित परंपरा रही है। इसी कड़ी में वनांचलों में रहने वाले लोगों की वाचिकता की विशेषता को समय-समय पर रेखांकित किया गया है। वे आज भी अपनी मौखिक परंपराओं के माध्यम से अपने ज्ञान बोध का हस्तांतरण अपनी भावी पीढ़ी में करते हैं। प्राकृतिक वातावरण में रहते हुए प्राकृतिक ज्ञान, बीजारोपण से लेकर फसल चक्र की विविधताओं, आहारजन्य विशेषताओं, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी, औषधीय पौधों की पहचान, वनों में रहने वाले पशु-पक्षियों की जीवन शैलियों और छोटे-छोटे कीट पतंगों की जीवन शैलियों के आनुभविक ज्ञान को अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंपने का सबसे बढ़िया माध्यम वाचिक परंपरा ही रही है।

अपने लोक अनुष्ठानों, लोक पर्वों और जन्म, विवाह तथा अंत में मृतक-कर्म (अंत्येष्टि) जैसे संस्कारों के दौरान बड़े-बुजुर्गों के सानिध्य एवं उनकी उपस्थिति में युवा व बच्चे तथा आने वाली पीढ़ियाँ लगातार वाचन और संवाद से ज्ञान बोध प्राप्त करते रहते हैं। यही कारण है कि उन्हें अलग से कोई बात सीखनी नहीं पड़ती। इस तरह वाचिकता का अपना विशिष्ट स्थान है। इससे न सिर्फ किसी भी जाति-समुदाय के वरिष्ठ जनों और कला कौशलों में पारंगत लोगों का ज्ञान परंपरा से हस्तांतरित होता है, बल्कि इसके लिए अलग से कोई श्रम-साधना भी नहीं करनी पड़ती। इसीलिए वाचिक परंपरा को हर काल में महत्व दिया गया है।


(अंत्येष्टि) संस्कारों से पीढ़ियों तक ज्ञान परंपरा

वाचिक परंपरा एक तरह से पुस्तकों से बाहर की दुनिया मानी जाती है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. राजेंद्र रंजन ने भी इस बात को स्वीकार करते हुए कहा है कि- "वाचिक परंपरा साहित्यिक ज्ञान से बाहर के ज्ञान का अध्ययन करना है। यह लोक का अनुभव होता है। इसलिए इसे लोक साहित्य भी कहा जाता है। यह किसी एक व्यक्ति द्वारा लिखित साहित्य से अधिक महत्व का होता है, क्योंकि यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोक अनुभव से प्राप्त किया जाता है, जो आने वाली पीढ़ियों को यथावत सौंप दिया जाता है।"

लेख:
श्री राम कुमार वर्मा
भिलाई छत्तीसगढ़

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