फागुन मंडई- देवी के शक्तिपीठ स्थापना का देव दुर्लभ पर्व
March 10, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

छिंदक नागवंशी राजाओं के दसवीं ग्यारहवीं सदी से चौदहवीं सदी तक के शिलालेखों में चक्रकोट राज्य का उल्लेख मिलता है। जिसे आज बस्तर क्षेत्र कहा जाता है। चक्रकोट (बस्तर) में बैलाडीला की पहाड़ियों की तलहटी में दंतेवाड़ा नगर बसा हुआ है।

छिंदक नागवंशी शासक सोमेश्वर देव का अभिलेख
इस नगर में शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर, देवी दन्तेश्वरी माई जी का शक्तिपीठ देवालय है। इस मंदिर में 1224 ईस्वी का शिलालेख स्थापित है जिसमें जगदेक भूषण ( तृतीय) नरसिंह देव द्वारा देवी को भूमि अर्पित करने का उल्लेख है। भैरव मंदिर दंतेवाड़ा में 1061 ईस्वी का शिलालेख है जिसमें जगदेक भूषण (प्रथम) के सामंत चन्द्रादित्य ने भैरव देव को 1061 ईस्वी में बोरिग्राम अर्पित किया था। इस शिलालेख में इस नगर का नाम दत्तवाड़ा उल्लेखित है।

शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर दँतेश्वरी मंदिर
इन शिलालेखों से यह ज्ञात होता है कि ग्यारहवीं सदी में दत्तवाड़ा नगर में देवी और भैरव के इन मंदिरों के होने का प्रमाण प्राप्त होता है। दन्तेश्वरी मंदिर को जगदागुड़ी कहा जाता है इससे अनुमानित होता है कि छिंदक राजा जगदेकभूषण प्रथम ने यह मंदिर बनवाया था। मंदिर मुख्य दन्तेश्वरी मंदिर देवालय में देवी की प्रतिमा षष्ठ भुजा महिषमर्दिनी विग्रह स्थापित है जो अपने पुरातात्विक लक्षणों के अनुरूप आठवीं सदी से पूर्व की अनुमानित होती है। वर्तमान में देवी दन्तेश्वरी माई के नाम से विख्यात है।

दँतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा
किंतु यह आश्चर्य है कि देवी दन्तेश्वरी माई का पूर्व नाम माणिक्य देवी अथवा माणिकेश्वरी देवी प्राप्त होता है। चक्रकोट (बस्तर)में छिंदक राजा जगदेकभूषण (प्रथम)(1023 ईस्वी से 1063 ईस्वी) के भैरमगढ़ शिलालेख में माणिक्य देवी का उल्लेख मिलता है।

दंतेवाडा स्थित शिलालेख
बारसूर में सोमेश्वर देव द्वितीय के बत्तीसा मंदिर शिलालेख 1210 ईस्वी में पुनः माणिक्य देवी का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त कर्नाटक क्षेत्र में होयसल राजा विष्णुवर्धन 1116 ईस्वी एवं वीर बल्लाल तृतीय 1205 ईस्वी से संबंधित अभिलेखों में चक्रकोट की माणिक्य देवी का उल्लेख मिलता है।
चक्रकोट में छिंदक राजाओं के पतन के बाद 1324 ईस्वी के बाद काकतीय शासन स्थापित होता है। काकतीय राजा अन्नमराज देव 1324 ईस्वी के स्तुति श्लोक में माणिक्य देवी से खड्ग प्राप्त होने का उल्लेख मिलता है। इनके भाई वारंगल के काकतीय राजा प्रतापरुद्र को माणिक्य देवी का सेवक कहा गया है।
बस्तर में काकतीय वंश में महाराज्ञी मेघावती (1410 ईस्वी को )माणिक्य देवी की साधिका कहा गया है। बस्तर नरेश राजपाल देव 1709—1721 ईस्वी के ताम्रपत्र में देवी का नाम माणिकेश्वरी देवी का उल्लेख किया गया है।
इन अभिलेखीय साक्ष्यों से स्पष्ट है कि वर्तमान देवी दन्तेश्वरी माई जी को चक्रकोट के छिंदक राजाओं और काकतीय राजवंश ने माणिक्य देवी अथवा माणिकेश्वरी देवी के नाम से अपने अभिलेखों में संबोधित किया है।
देवी भगवती के शक्तिपीठों में अष्टादश शक्तिपीठ का उल्लेख अष्टादश शक्तिपीठ स्त्रोतम में मिलता है। अर्थात देश के अठारह प्रमुख शक्तिपीठों में चक्रकाेट की माणिक्य देवी शक्तिपीठ का उल्लेख बारहवें क्रम पर ज्ञात होता है।

शंकराचार्यविरचितं अष्टादश पाठ
लङ्कायां शाङ्करी देवी कामाक्षी काञ्चिकापुरे ।
प्रद्युम्ने शृङ्खलादेवी चामुण्डी क्रौञ्चपट्टणे ॥ 1 ॥
अलम्पुरे जोगुलाम्बा श्रीशैले भ्रमराम्बिका ।
कोल्हापुरे महालक्ष्मी माहूर्ये एकवीरिका ॥ 2 ॥
उज्जयिन्यां महाकाली पीठिक्यां पुरुहूतिका ।
ओढ्यायां गिरिजादेवी माणिक्या चक्रकोटिली ॥ 3 ॥
हरिक्षेत्रे कामरूपा प्रयागे माधवेश्वरी ।
ज्वालायां वैष्णवी देवी गया माङ्गल्यगौरिका ॥ 4 ॥
वारणस्यां विशालाक्षी काश्मीरेषु सरस्वती ।
अष्टादश सुपीठानि योगिनामपि दुर्लभम् ॥ 5 ॥
अत: स्पष्ट होता है कि वर्तमान दन्तेश्वरी देवी चक्रकोट राज्य की माणिक्य देवी है। इस देवी के इस शक्तिपीठ का उल्लेख देश के अठारह प्रमुख शक्तिपीठों में ज्ञात होता है।
दंतेवाड़ा में देवी सती के दान्त गिरने की मान्यता प्रचलित है। यह मान्यता आधुनिक न होकर पुरातन मान्यता है। बस्तर में काकतीय राजा अन्नमराज देव 1324 ईस्वी ने देवी को माणिक्यदेवी शुभदन्तिकेश्वरी संबोधित किया है जिसका अर्थ है माणिक्य देवी जो शुभ (देवी सती के) दान्त गिरने के स्थल पर स्थापित देवी है।
1703 ईस्वी में दिगपाल देव के दंतेवाड़ा मंदिर शिलालेखों में देवी को दन्तावला और दन्तावली देवी कहा है। इसके बाद भी 1709 ईस्वी में एवं 1853 ईस्वी की बस्तर राज वंशावली में देवी का नाम माणिक्य देवी ही प्राप्त होता है।
देवी सती के दान्त गिरने की मान्यता से माणिक्य देवी लोक में दंतेसरी और दन्तेश्वरी देवी के रूप में विख्यात हुई। विगत सौ डेढ़ सौ साल से यह नाम स्थापित हो चुका है। 1061 ईस्वी में इस नगर को दत्तवाड़ा कहा है जिसे अब दंतेवाड़ा कहा जाता है। वर्तमान में देवी को दंतेसरी और दन्तेश्वरी देवी कहा जाता है।

वर्तमान बस्तर, प्राचीन चक्रकोट राज्य
अब पूर्णतः स्पष्ट है कि “चक्रकोट में देवी सती के दान्त गिरने के स्थल पर स्थापित माणिक्य देवी, जिसकी प्रतिमा आठवीं सदी से पूर्व नल राजवंश के शासकों द्वारा निर्मित है। जिसका उल्लेख ग्यारहवीं सदी से छिंदक राजाओं से लेकर उन्नीसवीं सदी तक काकतीय राजाओं के अभिलेखों और स्तुति और अष्टादश शक्तिपीठ में माणिक्य देवी प्राप्त होता है, वह माणिक्य देवी अब दन्तेश्वरी देवी के नाम से पूजित है।
देवी सती के दान्त गिरने की मान्यता पुरातन है इसलिए चौदहवीं सदी में माणिक्य देवी को देवी सती के शुभ दान्त गिरने के स्थल पर स्थापित देवी कहा गया है। इसी मान्यता से देवी सती के दान्त गिरने का यह स्थान 1061 ईस्वी में दत्तवाड़ा और अब दंतेवाड़ा है। माणिक्य देवी अब सिर्फ दन्तेश्वरी देवी के नाम से विख्यात है। चक्रकोट की माणिक्य देवी का शक्तिपीठ वर्तमान दन्तेश्वरी मंदिर, देश के अष्टादश शक्तिपीठ में एक प्रमुख शक्तिपीठ है। ”
भारत के सबसे प्राचीन अठारह महाशक्तिपीठ में एक यह महाशक्तिपीठ, ग्यारहवीं सदी के बाद से नरबलि, आत्मबलिदान, शव साधना जैसे तांत्रिक कर्मकांड का केंद्र बन गया था। धीरे धीरे यह महाशक्तिपीठ सिर्फ तांत्रिकों का केंद्र बन गया था, इसलिए इस शक्तिपीठ से जन सामान्य दूर होता गया।

बस्तर की आस्था का केंद्र आराध्य देवी माई दँतेश्वरी
फाल्गुन शुक्ल षष्ठी तिथि को देवी के छत्र दंतेवाड़ा में ही देव पड़ाव स्थल पर स्थापित किया जाता है। फागुन मंडई की समस्त रस्मों के निर्वहन तक देवी का छत्र यहीं स्थापित रहता है। समस्त रस्मों का निर्वहन देव पड़ाव और फिर दन्तेश्वरी मंदिर के समक्ष पुनः निर्वहन किया जाता है। फागुन मंडई देवी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा पर्व है।

फागुन मंडई
इससे ज्ञात होता है कि माणिक्य देवी का शक्तिपीठ ग्यारहवीं सदी के पूर्व देव पड़ाव स्थल पर स्थापित था जहां देवी की वर्तमान प्रतिमा आठवीं सदी पूर्व से ही स्थापित थी। देव पड़ाव का शक्तिपीठ देवालय और देवी की प्रतिमा पांचवी छठवीं सदी में नल राजवंश के शासकों द्वारा निर्मित है। ग्यारहवीं सदी में वर्तमान दन्तेश्वरी मंदिर में छिंदक राजा जगदेकभूषण प्रथम ने देवी की प्रतिमा पुनः प्रतिष्ठापित की है।
पंद्रहवीं सदी में बस्तर के काकतीय राजा पुरुषोत्तम देव ने देवी की रथयात्रा पर्व प्रारंभ कराया जिसे आज बस्तर दशहरा कहा जाता है। बस्तर राजा रुद्रप्रताप देव के काल में 1906 ईस्वी में मंदिर पर काष्ठ निर्मित भवन निर्मित कराया जिसे संपूर्ण मंदिर इस काष्ठ निर्मित भवन का अंग बन गया है।

महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी
महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी ने इन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया था जिसका शिलालेख मंदिर में लगा हुआ है। मंदिर के मुख्य पुजारी और मठ पति जिया परिवार विगत पचास पीढ़ियों से देवी के चरणों में कार्यरत हैं जिनकी वृहद वंशावली प्राप्त होती है।
संदर्भ: बस्तर साम्राज्ञी मां दन्तेश्वरी पुस्तक तृतीय संस्करण।

लेख:
श्री ओम प्रकाश सोनी
असिस्टेंट प्रोफेसर, इतिहास विभाग,
शासकीय शहीद बापुराव स्नातकोत्तर महाविद्यालय
सुकमा, बस्तर संभाग, छत्तीसगढ़.
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