आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल सप्तमी | गुरुवार

नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: धृति | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 23 अप्रैल 2026

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ओणम-दानशीलता का उत्सव

ओणम-दानशीलता का उत्सव

“ येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
   तेन त्वाम् अभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल:।।”

       संभवतः सभी ने इस मंत्र को एक से अधिक बार सुना होगा क्योंकि इस मंत्र का रक्षा सूत्र (विशेषकर मौली धागा) बांधते समय  उच्चारण किया जाता है । इस मंत्र में जिस राजा बलि की बात की जा रही है यह वही “राजा बलि” हैं जिनके पातळ लोक से भूलोक में पुनरागमन के उपलक्ष्य में ओणम का पर्व मनाया जाता है । वैसे तो देशभर में यह उत्सव मनाया जाता है परन्तु केरल राज्य में इसकी भव्यता और इसके प्रति जनमानस की ऊर्जा देखते ही बनती है । ओणम की कथा तो सबने सुनी होगी की किस तरह असुर राजा बलि से भगवान विष्णु ने तीन पग दान में मांगे । भगवान ने  वामन अवतार धारण किया और दो पग में ही समस्त संसार को नाप लिया और तब चूँकि राजा बलि को  दानशीलता का प्रतीक माना जाता था जिसका उन्हें  बहुत अहंकार था उन्होंने अपना सिर द्वार आये वामन को समर्पित कर दिया जिससे भगवान अति प्रसन्न हुए । तब वामन रुपी प्रभु नारायण ने राजा बलि से कहा यद्यपि मैंने पृथ्वी को अपने एक ही पग में माप लिया है अतः उसपर मेरा स्वामित्व है और इसलिए मैं तुम्हे पाताल में निवास करने का आदेश देता हूँ किन्तु प्रजा के प्रति तुम्हारे वात्सल्य और प्रेम को देखते हुए तुम्हे यह वर देता हूँ की तुम वर्ष में एक बार पृथ्वीलोक आकर अपनी प्रजा से मिल सकोगे और तब से यह उत्सव मनाया  जाता है । इस प्रसंग से यह शिक्षा मिलती है कि आप कितने ही गुणवान क्यूँ न हो अहंकार ऐसा दोष है जो आपके सभी गुणों पर भरी पड़ता है ।

इसी कथा में वर्णन है कि दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने यह जान लिया था कि यह स्वयं नारायण है इसलिए उन्होंने बलि को द्वार पर आये वामन को किसी भी प्रकार का वचन देने से रोका लेकिन जब राजा ने कहा की यदि स्वयं भगवान याचक बनकर मेरे द्वार पर आये हैं तो तब तो दान देना और भी श्रेयस्कर रहेगा और जब बलि ने संकल्प करने हेतु कमंडल उठाया तब शुक्राचार्य सूक्ष्म रूप लेकर जल प्रवाह बाधित करने के उद्देश्य से उसकी नली में जाकर बैठ गए तब वामन देव ने कमंडल के मुहाने पर एक छोटी लकड़ी दाल डी जिससे दैत्यगुरु की एक आँख फुट गई इस घटना के माध्यम से संभवत यह सन्देश देने का प्रयास किया जा रहा है कि यदि आप स्वयं कुछ अच्छा नहीं कर पा रहें है तो किसी अन्य द्वारा किये जा रहे सत्कार्य में बाधा भी मत डालिए साथ ही साथ यह सन्देश भी छुपा है की गुरु आज्ञा की अवज्ञा सैदव ही कष्टकारी होती है  ऐसा करने पर कठोर दुष्परिणाम भोगने पड़ सकते हैं ।    

पर इस कथा के इतर देखें तो पता चलता है कि मलयाली कैलेन्डर के अनुसार कर्कीडकम के कठोर माह के बाद चिंगम माह (अगस्त-सितम्बर) आता है जो किसानों को समृद्धि की आशा प्रदान करता है और ओणम को फसल उत्सव बनता है । और यदि हम ध्यान दें तो पाते हैं की ओणम, पोंगल, लोहरी, बीहू हो या नुआखाई हो या फिर गुड़ीपड़वा सभी के केंद्र में नयी फसल की ख़ुशी का उत्सव मनाने का भाव ही निहित है। इसमें दीपावली की तरह दिए जलाने की भी परंपरा निभायी जाती है जिसके सम्बन्ध में स्कन्द पुराण के "वैष्णव खंड" में में वर्णन मिलता है कि भगवान विष्णु ने राजा बलि को पृथ्वी पर कार्तिक मास की चतुर्दशी से तीन दिन तक भ्रमण करने की अनुमति दी थी इसलिए राजा बलि दीपावली के एक दिन पहले, और उसके एक दिन बाद तक भूलोक में निवास करते हैं इसलिए दिए जलाकर उनका स्वागत किया जाता है ।

वहीं "भविष्यपुराण" के अनुसार राजा अपने सैन्य बल (दैत्यों) के साथ पृथ्वी पर आते हैं और चूँकि मूलतः असुर दुष्ट प्रकृति के होते हैं अतः अराजकता से बचने हेतु दीप प्रज्जवलित किये जाते हैं ताकि दीपक की सकारात्मक उर्जा और प्रकाश से अराजकता अथवा किसी अप्रिय घटना से बचा जा सके ।

इस उत्सव को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने पर ज्ञात होता है कि मानसून का आगमन सबसे पहले जून माह में केरल राज्य में हे होता है अतः चिंगम (अगस्त-सितम्बर ) माह तक फसल कटाई का समय आ चुका होता है और खुशहाली तथा समृद्धि भी जनसामान्य के जीवन में दस्तक देने लगती है अतः यही उत्सव मनाने हेतु अनुकूल समय प्रतीत होता है । और लोग राजा बलि के स्वगोत्सव में होने वाली तयारी हेतु सक्षम हो जाते हैं ।

       केरल में यह उत्सव हर धर्म और जाती के लोगों द्वारा मनाया जाता है । जिससे इसके फसलोत्सव होने का तथ्य पुष्ट होता है ।

अब हम इस उत्सव के प्रमुख आकर्षणों की चर्चा करते हैं जिनमें, नौका दौड़ (वल्लमकली), केले के पत्ते पर परोसे जाने वाले पारंपरिक भोजन (ओणम सद्या), फूलों की रंगोली (पुक्कलम), बाघ नृत्य (पुलिकली), पारंपरिक लोक नृत्य (कैकोट्टिक्कली या तिरुवथिराकाली) शामिल हैं।

वल्लमकल्ली- वल्लमकल्ली (नौका दौड़ ) ओणम के मुख्य आकर्षणों में से एक है । “नेहरु बोट रेस” इस दौरान होने वाली एक प्रसिद्ध प्रतियोगिता है जिसे देखने लाखों की संख्या में भीड़ इकठ्ठा होती है और जहाँ दर्शक दीर्घा में देश-विदेश के लोग सम्मिलित होते हैं। प्रतियोगी अपना भरपूर दम-ख़म दिखाने के लिए एक माह पूर्व से ही प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए अभ्यास प्रारंभ कर देते हैं। एक माह तक कम से कम छः घंटे प्रतिदिन अभ्यास किया जाता है जिससे प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन सुनिश्चित किया जा सके। इस दौरान ब्रम्हचर्य का भी पालन किया जाता है जिससे भारतीय ज्ञान परंपरा और जीवन दर्शन की जड़ें कितनी सुदृढ़ हैं इसका पता चलता है । इस प्रतियोगिता को लेकर लोगों में इतना उत्साह होता है, विशेषकर युवाओं में, कि वे अपने कार्यस्थल से एक से दो माह की छुट्टियाँ लेकर इस प्रतियोगिता में भाग लेने आते हैं यह केरल की सांस्कृतिक विरासत, आपसी सामंजस्य और सामूहिक बल की महत्ता को दर्शाने वाली  एक अद्भुत परंपरा है। इसके साथ ही जैसा कि हम इतिहास में पढ़ते है की दक्षिण भारतीय शासकों को नौसेना और नौपरिवहन का अच्छा ज्ञान था शताब्दियों से चली आ रही यह परंपरा कहीं न कहीं इस तथ्य को भी पुष्ट करती है ।
 


पुलिकली नर्तक दल- पुलिकली का प्रदर्शन दस दिनों तक चलने वाले ओणम उत्सव के चौथे दिन किया जाता है। पुलिकली मलयाली भाषा का शब्द है जिसका हिंदी में अर्थ होता है :बाघ-खेल/ नृत्य”। इस परम्परा का आरम्भ लगभग 200 वर्ष पूर्व कोचीन के तत्कालीन महाराजा राम वर्मा सक्थन थंपुरन द्वारा किया गया था । इसे मुख्यतः पुरुषों द्वारा किया जाता है । यह बाघ की शिकार का कलात्मक प्रदर्शन है इसलिए इसके सभी कलाकार पुरे शरीर को रंगबिरंगी धारियों से रंगते है और शेर के मुख का चित्र बनवाते हैं । यह प्राचीन काल की जीवन शैली का प्रतीकात्मक स्वरुप है जब मानव जीवन के सञ्चालन हेतु कृषि और शिकार पर निर्भर था । इस नृत्य में भाग लेने वाले कलाकार आमतौर पर पेशे से बुचर, हमाल, और अन्य ऐसे ही वर्गों से सम्बंधित होते हैं जो समाज के पिछली श्रेणी में खड़े होते हों। इनकी इस परंपरा में भागीदारी भारतीय समाज में सभी वर्गों के प्रति निहित समरसता के भाव को प्रदर्शित करती है और यह बताती है कैसे तत्कालीन समाज के शासक  समाज के सभी वर्गों की यथोचित भूमिका सुनिश्चित करते थे।



 

पुक्कलम- जहाँ एक ओर पुलिकली साहस और उर्जा के प्रदर्शन से जुड़ा है वहीं पुक्कलम कोमल भावों को प्रदर्शित करने की रीति है ।  यह भारत में बहुप्रचलित रंगोली का ही एक स्वरुप है जिसे फूलों से बनाया जाता है। पहले दिन बहुत ही साधारण पुक्कलम बनाया जाता है जिसमें थुम्बा के फूलों का प्रयोग किया जाता है फिर सफ़ेद फूलों से यह रंगोली बनायी जाती है । जैसे-जैसे दिन बीतते जाते हैं वैसे-वैसे रंगोली का आकर बड़ा होता जाता है और इसकी सुन्दरता भी निखरती जाती है । जिसमें संभवतः यह जीवन दर्शन निहित है कि समय के साथ जीवन में भी अपनी समझ और विवेक का विकास करना करने पर जीवन और भी सुन्दर बनता जाता है। कुछ क्षेत्रों में पुक्कलम की प्रतोयोगिता भी आयोजित की जाती है ।
 



यदि हम इन सभी परम्परों में निहित दर्शन को देखें तो ओणम भी भारत के उत्सवों में निहित उस ध्येय का ही  प्रतिनिधित्व करता है जो लोगो में नव उर्जा का संचार, वैचारिक व नैतिक मूल्यों का उत्थान और मनोबल बढ़ाने का कार्य करते हैं। यह उत्सव हमें ब्रह्माण्ड की वृत्ताकार गति का भी स्मरण कराती है, यह समझाती है कि जीवनचक्र से जुडी सभी चीज़ों का दोहराव होता है  चाहे ऋतु चक्र हो या दिन-रात । निःसन्देह ओणम भारत की विविधतापूर्ण बहुरंगी संस्कृति का परिचायक होने के साथ-साथ स्वयं में भारत के जीवन दर्शन से अवगत कराने वाले सर्वश्रेष्ठ उत्सवों में से एक है ।
 

लेख-
सोनल बाजपेयी
 

 

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