बृहदीश्वर मन्दिर: चोलकालीन शिक्षा और ज्ञान का केन्द्र
August 08, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार
नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

ओणम का सम्बन्ध अच्छी उपज, पारिवारिक मिलन, लोक कलाओं और राजाबलि से संबंधित है। तमिल और मलयालम साहित्य इसके पुराने उल्लेख सहेजे हुए हैं। संगमकालीन तमिल काव्य मदुरैक्कांचि मदुरै के ओणम उत्सव का वर्णन करता है। बाद की वैष्णव पंथ की रचनाएँ और केरल के मन्दिर अभिलेख भी ओणम से जुड़ी पूजा, दान तथा सामुदायिक भोज के संकेत देते हैं। इससे पता चलता है कि दक्षिणापथ में लोग बहुत पहले से यह पर्व मनाते थे।
लोकमान्यता के अनुसार महाबलि असुर कुल के राजा और विष्णुभक्त प्रह्लाद के पौत्र थे। लोग उन्हें दानी और प्रजापालक शासक के रूप में स्मरण करते हैं। उनकी प्रजा सुखी और सम्पन्न थी। महाबलि ने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर अधिकार स्थापित किया। इससे देवता चिन्तित हुए और भगवान विष्णु के पास पहुँचे।
केरल का लोकपर्व ओणम
उस समय राजा बलि एक यज्ञ कर रहे थे। उन्होंने यज्ञ में आने वाले याचकों को उनकी इच्छा के अनुसार दान देने का संकल्प लिया था। भगवान विष्णु ने वामन का रूप धारण किया और एक ब्राह्मण बालक के रूप में यज्ञस्थल पहुँचे। महाबलि ने उनका स्वागत किया और उनसे इच्छित दान माँगने को कहा। वामन ने अपने पैरों से नापी हुई 3 पग भूमि माँगी। बलि ने उन्हें अधिक भूमि देने का प्रस्ताव रखा। वामन अपनी माँग पर स्थिर रहे। महाबलि ने 3 पग भूमि देने का वचन दे दिया।
वचन मिलते ही वामन ने विराट त्रिविक्रम रूप धारण किया। उन्होंने पहले पग में पृथ्वी और दूसरे पग में आकाश को नाप लिया। इसके बाद उन्होंने महाबलि से तीसरे पग के लिए स्थान पूछा। महाबलि ने अपना सिर झुका दिया और वामन से तीसरा पग उस पर रखने का निवेदन किया। विष्णु ने महाबलि की दानशीलता और वचन पालन से प्रसन्न होकर उन्हें प्रति वर्ष अपनी प्रजा से मिलने का वरदान दिया।
वामन और महाबलि
केरल की लोकमान्यता में महाबलि हर वर्ष ओणम के अवसर पर अपनी प्रजा का हाल जानने आते हैं। लोग घर सजाकर, पुष्प रंगोली बनाकर और सामूहिक भोज तैयार करके उनका स्वागत करते हैं। यह कथा ओणम को वामन और महाबलि दोनों से जोड़ती है। केरल के एर्णाकुलम जिले में स्थित तृक्काकरा वामनमूर्ति मन्दिर इस परम्परा का प्रमुख केन्द्र है। मन्दिर समिति अत्थम से तिरुवोणम तक 10 दिनों का उत्सव आयोजित करती है।
तृक्काकरा वामनमूर्ति मन्दिर
ओणम का नाम तिरुवोणम नक्षत्र से जुड़ा है। संस्कृत में इसे श्रवण नक्षत्र कहते हैं। उत्सव के 10 दिनों के मलयालम नाम नक्षत्रों पर आधारित हैं। अलग क्षेत्रों और परिवारों के लोग दिनवार रीति को अपने ढंग से निभाते हैं। अत्थम से तिरुवोणम तक पुष्प सज्जा, पूजा, वस्त्र, भोजन और सांस्कृतिक आयोजन पर्व की सामान्य पहचान बने हुए हैं।
दिन 1: अत्थम, हस्त नक्षत्र
अत्थम से ओणम उत्सव आरम्भ होता है। परिवार घर और आँगन की सफाई करते हैं। वे घर के सामने फूलों की छोटी सज्जा बनाते हैं। मलयालम में इसे पुक्कलम कहते हैं। पहले दिन लोग इसकी रचना सरल रखते हैं। कोच्चि के निकट तृप्पूणितुरा के स्थानीय लोग अत्थचमयम आयोजित करते हैं। तृक्काकरा वामनमूर्ति मन्दिर का प्रशासन भी इसी दिन उत्सव का ध्वज फहराता है।
दिन 2: चितिरा, चित्रा नक्षत्र
परिवार घर की शेष सफाई और सजावट पूरी करते हैं। वे पुक्कलम में फूलों की एक और परत जोड़ते हैं। परम्परागत रूप से लोग आसपास उपलब्ध फूलों का उपयोग करते थे। आज लोग बाजार से लाए गए फूल भी सजावट में रखते हैं।
दिन 3: चोदि, स्वाति नक्षत्र
इस दिन लोग पुक्कलम का आकार बढ़ाते हैं और उसमें नए रंग जोड़ते हैं। परिवार ओणम के लिए वस्त्र और घरेलू सामग्री खरीदना आरम्भ करते हैं। मलयालम में लोग पर्व पर पहने जाने वाले नए वस्त्रों को ओणक्कोडि कहते हैं।
दिन 4: विशाकम, विशाखा नक्षत्र
परिवार ओणसद्या की योजना बनाते हैं। वे आवश्यक अनाज, मसाले, नारियल और सब्जियाँ जुटाते हैं। स्थानीय व्यापारी भी पर्व की सामग्री अधिक मात्रा में बेचते हैं। विद्यालय और संस्थाएँ पुक्कलम प्रतियोगिताएँ आरम्भ करते हैं।
दिन 5: अनिझम, अनुराधा नक्षत्र
लोग अनिझम को नौका दौड़ की परम्परा से जोड़ते हैं। कई स्थानों पर नाविक वल्लमकली की तैयारी और अभ्यास करते हैं। स्थानीय समितियाँ ओणम काल में अलग तिथियों पर केरल की प्रसिद्ध नौका दौड़ें आयोजित करती हैं। वे स्थानीय परम्परा और पंचांग के अनुसार तिथि तय करती हैं।
ओणम की वल्लमकली परम्परा
दिन 6: तृक्केट्टा, ज्येष्ठा नक्षत्र
लोग मन्दिर जाते हैं और पुक्कलम में नए फूल जोड़ते हैं। परिवारों में मेल मिलाप भी बढ़ता है। लोग सम्बन्धियों से मिलते हैं और पर्व की तैयारियों में एक दूसरे की सहायता करते हैं। कई स्थानों पर विद्यालय और सांस्कृतिक संस्थाएँ नृत्य, संगीत तथा खेलों का आयोजन करती हैं।
दिन 7: मूलम, मूल नक्षत्र
मन्दिर समितियाँ और स्थानीय समूह विशेष पूजा तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम आरम्भ करते हैं। कुछ समूह सामूहिक ओणसद्या भी आयोजित करते हैं। लोक नृत्य, गीत और पारम्परिक खेल उत्सव का वातावरण बनाते हैं। स्थानीय परम्परा इन आयोजनों का रूप तय करती है।
दिन 8: पूराडम, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र
लोग मिट्टी से छोटी आकृतियाँ बनाकर पुक्कलम के बीच रखते हैं। वे इन्हें ओणत्तप्पन या तृक्काकरा अप्पन कहते हैं। अलग परम्पराएँ इन आकृतियों को वामन, महाबलि अथवा उनसे जुड़े देव स्वरूपों का प्रतीक मानती हैं। परिवार इनके सामने दीप जलाते हैं और नैवेद्य अर्पित करते हैं।
दिन 9: उत्राडम, उत्तराषाढ़ा नक्षत्र
उत्राडम को प्रथम ओणम भी कहते हैं। लोकमान्यता के अनुसार परिवार इस दिन महाबलि के आगमन की तैयारी पूरी करते हैं। वे अन्तिम खरीदारी करते हैं और भोजन तैयार करते हैं। लोग ताजी उपज, फल और अन्य सामग्री घर लाते हैं। परिवार अपने अतिथियों के स्वागत की व्यवस्था करता है।
दिन 10: तिरुवोणम, श्रवण नक्षत्र
तिरुवोणम पर्व का मुख्य दिन है। लोग प्रातः स्नान करके नए वस्त्र पहनते हैं और पूजा करते हैं। परिवार घर के सामने बड़ा पुक्कलम बनाते हैं और साथ बैठकर ओणसद्या ग्रहण करते हैं। लोग सम्बन्धियों और पड़ोसियों से मिलते हैं तथा एक दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं। मन्दिर समितियाँ और स्थानीय संस्थाएँ नृत्य, संगीत, खेल तथा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करती हैं।
पुक्कलम परंपरा
पुक्कलम ओणम की प्रमुख पहचान है। परिवार अत्थम से इसकी रचना आरम्भ करते हैं और प्रत्येक दिन इसका आकार बढ़ाते हैं। पहले लोग अपने आसपास मिलने वाले मौसमी फूलों से ही इसे बनाते थे। फूलों की गोलाकार सज्जा घर की स्वच्छता, अच्छी उपज और अतिथि के स्वागत से जुड़ी है।
लोकमान्यता में यह राजा महाबलि के स्वागत का भी प्रतीक है। कुछ क्षेत्रों में परिवार पुक्कलम के बीच ओणत्तप्पन की आकृति रखते हैं। तिरुवोणम के बाद अलग स्थानों पर लोग अलग रीति से इसकी विदाई करते हैं। कहीं लोग आकृति हटा देते हैं और कहीं उसका विसर्जन करते हैं। वे इसे महाबलि की वार्षिक यात्रा पूरी होने का संकेत मानते हैं।

पुक्कलम की पुष्प परंपरा
ओणसद्या परंपरा
ओणसद्या शुद्ध शाकाहारी सामूहिक भोजन है। लोग इसे केले के पत्ते पर परोसते हैं। इसमें चावल, परिप्पु, साम्भर, अवियल, थोरन, ओलन, कूटुकरी, पचड़ी, खिचड़ी, अचार, पापड़ और पायसम जैसे व्यंजन शामिल हो सकते हैं। व्यंजनों की संख्या और प्रकार परिवार, क्षेत्र तथा उपलब्ध सामग्री के अनुसार बदलते हैं।
इसलिए लोग किसी एक निश्चित संख्या को पूरे केरल का नियम नहीं मानते। लोग सद्या में भोजन एक निश्चित क्रम से परोसते हैं। परिवार के सदस्य और अतिथि साथ बैठकर भोजन करते हैं। यह परम्परा परिवार, पड़ोस और समुदाय के बीच सहयोग को बढ़ाती है। कई मन्दिर, सामाजिक संस्थाएँ और स्थानीय समूह भी सामूहिक सद्या आयोजित करते हैं।
पारंपरिक ओणसद्या
वल्लमकली ओणम काल की प्रसिद्ध परम्परा है। लम्बी नौकाओं पर बैठे नाविक एक साथ चप्पू चलाते हैं और वंचिप्पाट्टु गाते हैं। अलप्पुझा और पम्पा नदी के आसपास होने वाली नौका दौड़ें विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। सभी दौड़ें एक ही दिन नहीं होतीं। स्थानीय आयोजक पंचांग और परम्परा के अनुसार उनकी तिथि तय करते हैं।
महिलाएँ दीप के चारों ओर वृत्त बनाकर कैकोट्टिकली अथवा तिरुवातिराकली प्रस्तुत करती हैं। कलाकार ओणम के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कथकली, कुम्माट्टिकली और अन्य लोक नृत्य भी प्रस्तुत करते हैं। त्रिशूर की पुलिकली में कलाकार बाघ का रूप धारण करके नृत्य करते हैं। स्थानीय लोग ओणम उत्सव के दिनों में इसका आयोजन करते हैं। बच्चे और युवा ओणम के खेलों में भाग लेते हैं। कई स्थानों पर स्थानीय समूह रस्साकशी, गेंद के खेल, धनुर्विद्या के पारम्परिक रूप और शारीरिक कौशल से जुड़ी प्रतियोगिताएँ आयोजित करते हैं। मन्दिरों तथा गाँवों में वाद्य दल घरों और सार्वजनिक स्थलों पर प्रस्तुति देते हैं। केरल का प्रत्येक क्षेत्र इन लोक रूपों में अपनी विशेषताएँ जोड़ता है।
ओणम की कैकोट्टिकली
ओणम की परम्परा में पौराणिक कथा, कृषि जीवन, परिवार और लोक कला एक साथ दिखाई देते हैं। राजा महाबलि की स्मृति प्रजा के सुख और शासक के दायित्व की धारणा से जुड़ी है। वामन की कथा वचन पालन, दान और विनम्रता का महत्त्व बताती है। पुक्कलम, ओणसद्या और लोक कलाएँ सामूहिक भागीदारी को प्रकट करती हैं। यह पर्व अच्छी उपज के लिए प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी देता है। अलग मतों और समुदायों की भागीदारी ने इसे केरल की साझा सांस्कृतिक पहचान का पर्व बनाया है। ओणम की रीति हर क्षेत्र में एक जैसी नहीं है। यही विविधता इसकी लोक परम्परा को जीवित रखती है।
लेखिका: श्रीजा वेंकटेश
ओणम पर्व की मान्यता और परम्पराएँ
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