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निषादराज जयंती विशेष: लोक चित्रांकन परंपरा में रामसखा निषादराज गुहा

निषादराज जयंती विशेष: लोक चित्रांकन परंपरा में रामसखा निषादराज गुहा

निषादराज गुहा भारतीय परंपरा में अटूट भक्ति, सच्ची मित्रता और सेवा भाव के प्रतीक माने जाते हैं। छत्तीसगढ़ की राव-भाट परंपरा में भित्ति चित्रों के माध्यम से श्रीराम और निषादराज के संबंधों को जीवंत रखा गया है। निषादराज जयंती के अवसर पर उनके जन्म, पौराणिक कथाओं और सामाजिक योगदान को समझना हमें भक्ति, समानता और श्रम के सम्मान का संदेश देता है।

भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना में 'निषादराज गुहा' का व्यक्तित्व अटूट भक्ति और निस्वार्थ मैत्री का सर्वोच्च शिखर है। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में 'राव-भाट' परंपरा के माध्यम से निषादराज और प्रभु श्रीराम के संबंधों को भित्ति चित्रों में सहेजने की परंपरा सदियों पुरानी है। निषादराज जयंती के पावन अवसर पर उनके जन्म, स्वरूप और सामाजिक योगदान को समझना प्रासंगिक है।

पौराणिक मान्यताओं और पंचांग गणना के अनुसार, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को 'निषादराज जयंती' के रूप में मनाया जाता है। यह तिथि राम नवमी से ठीक चार दिन पूर्व आती है, जो आध्यात्मिक रूप से प्रभु श्रीराम के आगमन की पूर्व-सूचना और स्वागत की तैयारी का प्रतीक है। त्रेतायुग में जन्में निषादराज गुहा, श्रृंगवेरपुर के अधिपति थे और उन्होंने अपने पूरे जीवन को 'राम-काज' के लिए समर्पित कर दिया।

निषादराज के सम्मान में निर्मित पार्क- श्रृंगवेरपुर
निषादराज के सम्मान में निर्मित पार्क- श्रृंगवेरपुर

शास्त्रों और किंवदंतियों में जन्म का रहस्य
विभिन्न रामायणों, पुराणों और लोक साहित्यों में निषादराज की उत्पत्ति और उनके पूर्व जन्मों को लेकर अत्यंत रोचक और ज्ञानवर्धक सन्दर्भ मिलते हैं:
महाराज वेन के शरीर से उत्पत्ति (विष्णु व भागवत पुराण): पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब ऋषियों ने अधर्मी राजा वेन के पार्थिव शरीर की जंघाओं का मंथन किया, तब उससे एक श्याम वर्ण पुरुष प्रकट हुआ। ऋषियों ने उसे 'निषेध' (बैठ जाओ) कहा, जिससे 'निषाद' शब्द की व्युत्पत्ति हुई। माना जाता है कि उन्होंने राजा वेन के संचित पापों को सोख लिया, जिससे उनका वंश परम पावन और सेवाभावी हुआ।

पूर्व जन्म का 'कछुआ' (लोक मान्यता): एक प्रसिद्ध किंवदंती के अनुसार, निषादराज पूर्व जन्म में क्षीरसागर के एक कछुए थे। उनकी इच्छा भगवान विष्णु के चरण स्पर्श की थी, जो त्रेतायुग में श्रीराम के पद-प्रक्षालन के रूप में पूर्ण हुई।
सत्यनारायण कथा का 'लकड़हारा' (स्कंद पुराण): स्कंद पुराण के रेवाखंड में उल्लेख है कि जिस निर्धन लकड़हारे ने काशी में सत्यनारायण का व्रत किया था, वही अगले जन्म में श्रृंगवेरपुर के राजा 'गुह' हुए।

भारत में 'लोक चित्रांकन' केवल कला नहीं, बल्कि इतिहास और लोक-स्मृति के संरक्षण का माध्यम है। छत्तीसगढ़ के केंवट और निषाद समाज में 'राव-भाट' परंपरा इसका अनुपम उदाहरण है। जहाँ एक ओर उड़ीसा के पट-चित्र और राजस्थान की 'पड़' गायन शैली प्रसिद्ध है, वहीं छत्तीसगढ़ के नदी तटों पर बसी निषाद संस्कृति में भित्ति चित्रों के माध्यम से त्रेतायुगीन संबंधों को आज भी जीवित रखा गया है।

भित्ति चित्रों में संरक्षित त्रेतायुग (निषाद संस्कृति)
भित्ति चित्रों में संरक्षित त्रेतायुग (निषाद संस्कृति)

भाट कला: शैली और प्रतीक
निषाद समाज के राव-भाट जब अपने यजमानों के घर पहुँचते हैं, तो वे केवल वंशावली ही नहीं बांचते, बल्कि उनके घर की दीवारों को एक 'पवित्र कैनवास' में बदल देते हैं। इन चित्रों की अपनी एक विशिष्ट पहचान है: पारंपरिक रूप से ये चित्र गेरू, पिसे हुए चावल (अहिपन) और वनस्पति रंगों से बनाए जाते थे। वर्तमान में चटक लाल, पीले और हरे रंगों का प्रयोग इन्हें और अधिक आकर्षक बनाता है। चित्रों का मुख्य केंद्र 'निषादराज गुहा' होते हैं। विशेष रूप से उस दृश्य का अंकन अनिवार्य है जहाँ निषादराज, प्रभु श्रीराम के चरण पखार रहे हैं।
प्रवेश द्वार पर बने ये चित्र इस बात का प्रतीक होते हैं कि यह घर 'रामसखा' के वंशजों का है। यह कला साक्ष्य देती है कि कैसे एक समाज अपनी जातीय पहचान को सीधे रामायण के प्रसंगों से जोड़ता है।

निषादराज: भक्ति और मर्यादा का संगम
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में निषादराज के प्रेम को अद्भुत विस्तार दिया है। भाटों के चित्रों में भी उसी भाव की प्रधानता होती है।
"मांगी नाव न केंवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥" इस चौपाई का जीवंत रूप इन लोक चित्रों में दिखता है। केंवट का यह तर्क कि "प्रभु के चरणों की धूल से पत्थर की अहिल्या स्त्री बन गई, तो कहीं मेरी काठ की नाव भी नारी न बन जाए," लोक मानस में गहराई से बैठा है। भाटों द्वारा उकेरे गए चित्रों में राम, सीता और लक्ष्मण की सौम्यता के साथ-साथ निषादराज की अनन्य भक्ति और संकोच का सुंदर मिश्रण होता है।

निषादराज और श्रीराम की भेंट केवल एक राजा और भक्त की भेंट नहीं थी, बल्कि दो सहपाठियों और मित्रों का मिलन था। महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में साथ शिक्षा ग्रहण करने से लेकर, वनवास के समय श्रृंगवेरपुर में आतिथ्य स्वीकार करने तक, राम ने सदैव निषादराज को उचित सम्मान दिया।

अश्वमेध यज्ञ में श्रीराम द्वारा आमंत्रित निषादराज
अश्वमेध यज्ञ में श्रीराम द्वारा आमंत्रित निषादराज

जब रावण वध के पश्चात राम अयोध्या लौटे, तब भी उन्होंने अपने मित्र निषादराज को नहीं भुलाया। अश्वमेध यज्ञ में उन्हें विशेष निमंत्रण देना इस बात का प्रमाण है कि प्रभु राम के दरबार में श्रम और सेवा का मूल्य किसी भी उच्च पद से बड़ा था। भाटों के चित्रों के माध्यम से यही संदेश पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँच रहा है कि "दूसरों के श्रम का सम्मान ही सच्ची ईश्वर पूजा है।"

लेख-
श्री राम कुमार वर्मा
भिलाई-3, जिला- दुर्ग 

 

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