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पर्व विशेष : | तदनुसार 17 जुलाई 2026

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प्रकृति की गोद में छिपा स्वास्थ्य का खजाना

प्रकृति की गोद में छिपा स्वास्थ्य का खजाना

जब कोई रोग होता है, तो पता चलता है कि वह या तो मानसिक अस्वास्थ्य की वजह से होता है या हमारे मन पर उसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसी कारण आधुनिक समाज में मनोचिकित्सकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। पर जो लोग प्रकृति माँ की गोद में रहते हैं, उन्हें मनोविकार कैसे घेर सकता है! फिर भी, हर मानव को कभी न कभी रोग का सामना करना पड़ता है।


डमरू दादा- दायें से प्रथम, बस्तरक्षेत्र में जड़ीबूटी से लोगों का इलाज करते हैं

आज की व्यस्त दिनचर्या और जीवनशैली के कारण हम दादी-नानी के नुस्खे भूल गए हैं, लेकिन जनजातीय समाज प्रकृति पर निर्भर रहता है। वे न केवल जड़ी-बूटियों के ज्ञाता हैं, बल्कि वनस्पतियों के औषधीय गुणों से परिचित हैं। वन उनके मित्र हैं और जीवनयापन में सहयोगी। मानव इतिहास में सामाजिक बदलाव होते रहे, पर यह समाज अपने पारंपरिक ज्ञान को सहेज कर प्रकृति के साथ एकात्म भाव से जीवन जी रहा है।

जनजातीय औषधीय ज्ञान और पद्धतियाँ-
हमारी इस यात्रा की शुरुआत करते हैं जनजातीय समाज के रोग की निदान की पद्धति से। इनके पास ऐसा अद्भुत ज्ञान है कि वे नब्ज देखकर रोग का कारण और स्वरूप पहचान लेते हैं। कुछ स्थानों पर नाम, जन्मस्थान व समय जानकर ही वे स्वास्थ्य कुंडली बनाकर रोग का निदान करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे लोग ज्योतिष या टैरोकार्ड से अपनी जानकारी लेते हैं। इस समानता से यह कहना बिलकुल भी गलत नहीं कि लगता है कि यह जनजातीय समाज हमारा मूल समाज है और हमारी बहुत सी परम्पराओं और रीतिरिवाज का मूल यही से आया है।जब ये लोग वन में औषधीय वनस्पतियों की खोज में जाते हैं, तो शुद्धता और पवित्रता का ध्यान रखते हैं। बिना स्नान वन प्रदेशों में नहीं जाते, पूजा-अर्चना करके वनदेवी से क्षमा मांगते हैं। यह भारतीय समाज की संवेदनशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण है।


आपके आस-पास हे है आपके रोगों का उपचार

मुख्य औषधीय वनस्पतियों के उदाहरण हैं- सूजा: सिरदर्द में जड़ से ताबीज़ बनाते हैं, कोइलिखामार: आधे सिरदर्द के लिए उपयोगी होता है और गम्बो-लिम्बो वृक्ष (Simarouba) पशुओं की कीट समस्या के लिए। यानि के स्वयं से लेकर अपने मवेशियों तक के इलाज के सम्बन्ध में यह समाज पर्याप्त जानकारी रखता है ।

इनके पास फूलों के पोषण और औषधीय गुण की जानकारी भी पर्याप्त होती है । जनजातीय समाज विटामिन सी, ई, फिनोल, प्रोटीन, फ्लेवोनोइड, फाइबर व आवश्यक खनिज अपने आसपास के फूलों से लेता है। उदाहरण के लिए, ओडिशा क्षेत्र में जंगली लाल इंडिगो के फूल दाल के साथ पकाए जाते हैं, इसका उपयोग ग्रामीण महिलाएं अपने दैनिक भोजन पकाने में इसलिए करती हैं क्योंकि ये फूल बहुत  पौष्टिक गुणों से युक्ता होते हैं। कुछ समुदाय भुने हुए चावल के आटे व गुड़ से पौष्टिक नाश्ता भी तैयार करते हैं। कोरापुट के वैज्ञानिक डॉ. कार्तिक लेंका के अनुसार, ये जंगली फूल एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं, जो कैंसर और हृदय रोग से बचाते हैं। जनजातीय समाज लगभग 122 प्रजातियों के जंगली फूलों का उपयोग अपने दैनिक जीवन में करता है। जैसे कचना का उपयोग ऑस्टियोपोरोसिस (जिसमें हड्डियाँ कमजोर, पतली और क्षणभंगुर हो जाती हैं) के लिए और अगस्ति का उपयोग हड्डियों की कमजोरी का निदान करने में किया जाता है।


अगस्ति

प्राकृतिक फलों के स्वास्थ्य लाभ के सम्बन्ध मेभी इनकी जानकारी कुछ कम नहीं हैं आज फल हमारी खाने की प्लेट्स से गायब हो गए हैं, उन्हें फ्लेवर्ड चॉकलेट्स और आइसक्रीम से प्रतिस्थापित किया गया है। जनजातीय क्षेत्र में ‘करोंदा’ (Carissa congesta) फल लौहतत्त्व से भरपूर है, जो रक्ताल्पता, दांत की समस्या, पित्त और भूख में लाभकारी है। परन्तु वर्तमान में किशोरों के बीच इस फल की लोकप्रियता के अभाव पर चिंता है। हृदय रोग के लिए ‘फालसा’ (Grewia asiatica) के फलों का रस काली मिर्च, सेंधा नमक और निम्बू के साथ सेवन करने से आराम मिलता है। ‘शेहतुत’ (Morus alba) का रस बच्चों के पोषण व कीड़ों के नाशक के साथ शरीर में ठंडक पहुंचाता है और आँखों की ज्योति बढ़ाता है इसके सम्बन्ध में भी उन्हें पता है।


करोंदा

इससे यह भी समझ आता है कि आरण्यक समाज कितना ज्ञानवान है कि उन्हें न केवल कौन सी चीज़ किस तरह काम में लाई जाये यह पता है अपितु उसका उपयोग कब कैसे और किस तरह से करना है इसका भी संपूर्ण ज्ञान है इन्हें । यह बहुत ही दुखद और विडम्बनापूर्ण है की कैसे चंद विदेशियों ने इस ज्ञानवान समाज को केवल अक्षर ज्ञान के आभाव को आधार बनाकर असभ्य और बर्बर घोषित कर दिया और उससे भी ज्यादा घातक यह रहा कि भारतीय समाज ने भी विदेशियों के इस विमर्श को ज्यों-का त्यों मान लिया । ‘सीताफल’ कफ निकालता है, इसके बीजों से जूं खत्म होते हैं। छिलकों का उपयोग सुपरफूड के रूप में किया जाता है, जिसे धोकर सुखा और पिसकर गेहूं में मिलाकर पोषणवर्धक आहार तैयार किया जाता है, क्या आप और हम इस बारे में थोड़े भी जागरूक है की हमारे आस-पास दिखने न केवल फल, बल्कि पेड़ों के पत्ते,फूल सभी कुछ हमारे लिए कितने उपयोगी और लाभदायक हैं।

यह परंपरागत ज्ञान अंधविश्वास नहीं, बल्कि परख और अनुभव से सिद्ध चिकित्सा पद्धति है, जिसे कई बार अग्निपरीक्षा से परखा गया है। आधुनिक समाज अक्सर इसे नकारता है, जिससे यह चमत्कारी चिकित्सा धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही है। इसलिए इस  परंपरागत ज्ञान का संरक्षण आवश्यक है । यह जानकर आश्चर्य होगा कि इन औषधियों में कोई साइड इफेक्ट नहीं होता और ये रोग का जड़ से इलाज करते हैं, साथ ही शरीर को पुष्ट करते हैं। यदि सतर्क न हुए, तो इस मूल्यवान ज्ञान को हमेशा के लिए खो देंगे।
 

लेख-
सोनल बाजपेई
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

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