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चिदम्बरम का नटराज मन्दिर और "आनी उथिरम" पर्व

चिदम्बरम का नटराज मन्दिर और "आनी उथिरम" पर्व

चिदम्बरम (तमिलनाडु) के नटराज मन्दिर में प्रतिवर्ष आनी उथिरम महोत्सव आयोजित होता है। यह पर्व मनुष्य का ब्रह्माण्ड के साथ सम्बन्ध स्थापित करता है। प्रस्तुत लेख नटराज के ताण्डव नृत्य और मानव शरीर में व्याप्त पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन 5 तत्वों के बीच के सन्तुलन के बारे में बतलाता है। यह लेख आत्मिक शान्ति और मन की शुद्धि का मार्ग दिखाता है।


नटराज शिव
नटराज शिव

चिदम्बरम शब्द का अर्थ चेतना का मंच या आकाश है। यह मन्दिर भारत के तमिलनाडु राज्य के चिदम्बरम शहर में स्थित है। इस मन्दिर का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। लोग मानते हैं कि थिल्लई नाम के पुराने शहर में भी एक शिव मन्दिर मौजूद था। थिल्लई नटराज मन्दिर को चिदम्बरम नटराज मन्दिर भी कहते हैं। यह भगवान शिव के नटराज रूप को समर्पित एक प्रसिद्ध हिन्दू मन्दिर है। शैव परम्परा में लोग इस मन्दिर को कोविल कहते हैं। मन्दिर की दीवारों पर भरत मुनि रचित नाट्य शास्त्र की सभी 108 नृत्य मुद्राएं मिलती हैं। नर्तक इन मुद्राओं को भरतनाट्यम की नींव मानते हैं। यह एकमात्र शिव मन्दिर है जो पंच सभा स्थल और पंच भूत स्थल दोनों श्रेणियों में आता है।


नाट्य शास्त्र की 108 नृत्य मुद्राएं

भारत की आध्यात्मिक परम्पराओं में कुछ नगर ऐसे हैं जहाँ इतिहास, दर्शन, संगीत, नृत्य और साधना एक साथ दिखाई देते हैं। तमिलनाडु का चिदम्बरम ऐसा ही एक नगर है। यह उत्सव भारतीय सौर पंचांग के तृतीय मास आषाढ़ (तमिल में 'आनी') में उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र (तमिल में 'उथिरम नक्षत्र') में मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलंडर के अनुसार यह लगभग जून-जुलाई में पड़ता है। जब महोत्सव का समय निकट आता है। उस समय चिदम्बरम नगर में चहल-पहल बढ़ जाती है। मन्दिर के ऊंचे गोपुरमों पर दीपों की पंक्तियां झिलमिलाने लगती हैं। धूप और चन्दन की सुगन्ध हवा में घुल जाती है। नादस्वरम् और तविल की ध्वनियां गलियों में फैलती हैं। हजारों भक्त नटराज स्वामी के ताण्डव के दर्शन के लिए आते हैं।

"आनी उथिरम" का पर्व मानवीय चेतना का स्मरण कराता है। शैव परम्परा में इसे आत्मा और ब्रह्माण्ड का जुड़ाव माना जाता है। चिदम्बरम मंदिर में भगवान शिव नटराज रूप में सम्पूर्ण सृष्टि की गति, सन्तुलन और विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसे लोग पंचभूत स्थलों में आकाश तत्व का केन्द्र मानते हैं। इस रहस्य को समझने के लिए मन्दिर के गर्भगृह तक पहुँचना ही पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को अपने भीतर के पंचभूतों को भी पहचानना पड़ता है।


पंच तत्व

हमारा संसार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन 5 तत्वों से बना है। ऋषियों ने इसे पंचभौतिक प्रपंच कहा है। ये 5 तत्व मानव शरीर में भी मौजूद हैं। आयुर्वेद ने इन्हें वात, पित्त और श्लेष्मा का नाम दिया है। पृथ्वी और जल से स्थिरता तथा श्लेष्मा उत्पन्न होते हैं। अग्नि से पित्त और ऊर्जा जन्म लेती है। वायु और आकाश से गति और विचार प्रवाहित होते हैं। मनुष्य का शरीर मांस और रक्त के साथ इन्हीं 5 तत्वों से बना है।

आनी उथिरम की पूर्वसन्ध्या पर श्रद्धालु मन्दिर के चारों गोपुरमों के नीचे खड़े होकर ऊपर देखते हैं। इन गोपुरमों पर देव, गन्धर्व, ऋषि और नृत्य मुद्राएं अंकित हैं। मन्दिर में प्रवेश करते ही सबसे पहले पृथ्वी तत्व का अनुभव होता है। ठण्डी पत्थर की भूमि पैरों को स्पर्श करती है। मनुष्य को स्थिरता का अनुभव होता है।

पृथ्वी धैर्य और सहनशीलता का प्रतीक है। यह तत्व शरीर को स्थिरता देता है। इसके सन्तुलित होने पर मनुष्य संयमित रहता है। इसके अधिक होने से जड़ता आती है। चिदम्बरम की विशाल पत्थर संरचनाएं यही सिखाती हैं कि साधना स्थिरता पर टिकती है। आनी उथिरम के दिनों में हजारों लोग कतारों में खड़े रहते हैं। किसी के चेहरे पर अधीरता नहीं दिखती। मन्दिर लोगों के भीतर पृथ्वी तत्व को जगाता है।

रात गहराने पर दीपों की संख्या बढ़ती है। यज्ञशाला में अग्नि जलती है। कपूर और घी की लौ हवा में लहराती है। यहीं अग्नि तत्व का अनुभव होता है। आयुर्वेद के अनुसार अग्नि शरीर में पित्त का रूप लेती है। यह पाचन, दृष्टि, तेज और विवेक को जन्म देती है। चिदम्बरम में अग्नि परिवर्तन का प्रतीक है। नटराज का ताण्डव सृजन और संहार का सन्तुलन है। अग्नि पुराने विचारों को भस्म करती है। इससे नए विचारों और भावनाओं का जन्म होता है।

आनी उथिरम की रात हजारों दीप एक साथ जलते हैं। इससे मनुष्य के भीतर के भाव जागते हैं। अग्नि का सन्तुलन आवश्यक है। इसके अनियन्त्रित होने पर क्रोध, अहंकार और तृष्णा बढ़ती है। इसी कारण नटराज के ताण्डव में अग्नि उनके हाथ में है। यह उनके नियन्त्रण में है। अग्नि शुद्धि का प्रतीक है।

मन्दिर के प्रांगण से आगे बढ़ने पर जल तत्व का अनुभव होता है। चिदम्बरम के प्राचीन सरोवर और स्नानघाट महत्वपूर्ण संरचनाएं हैं। भारतीय मन्दिर परम्परा जल को स्मृति, संवेदना और करुणा का आधार मानती है। आनी उथिरम के अवसर पर भक्त स्नान करते हैं। यह शरीर की शुद्धि और मन की कोमलता का अभ्यास है। जल कठोरता को कम करके मनुष्य को झुकना सिखाता है।

मनुष्य के भीतर जल तत्व सन्तुलित होने पर दया, प्रेम और सहनशीलता जन्म लेते हैं। जल घटने से मन कठोर होता है। जल अधिक होने से आसक्ति बढ़ती है। नटराज के नृत्य की लय और प्रवाह जल का ही स्वरूप है। गति और कोमलता मिलकर जीवन को सुन्दर बनाते हैं।

रात के दूसरे प्रहर में नादस्वरम् की ध्वनि हवा में फैलती है। मन्दिर के विशाल मण्डपों में शंखनाद गूंजता है। उस समय वायु तत्व का अनुभव होता है। वायु अदृश्य है और सबसे अधिक सक्रिय भी है। आयुर्वेद वात को शरीर की गति और विचारों का आधार मानता है। वायु सन्तुलित होने पर मनुष्य जागरूक रहता है। वायु असन्तुलित होने पर भय, बेचैनी और अस्थिरता बढ़ती है।

चिदम्बरम के खुले मण्डपों में बहती हवा जीवन की गतिशीलता को दर्शाती है। नटराज की गतिशील मुद्रा वायु तत्व का स्वरूप है। उनका उठता हुआ चरण सृष्टि में गति के नियम को बताता है। जड़ता मनुष्य को जीवन से दूर करती है।

चिदम्बरम का सबसे बड़ा रहस्य आकाश तत्व है। रात के अन्तिम प्रहर में मन्दिर का वातावरण गम्भीर होता है। दीपों की रोशनी मन्द पड़ती है। हजारों लोगों के बीच शान्ति छा जाती है। सबकी दृष्टि गर्भगृह की ओर टिकती है। यहीं से चिदम्बर रहस्यम्  का अनुभव आरम्भ होता है।

नटराज की प्रतिमा के समीप पर्दे के पीछे शून्य दिखाई देता है। पहली दृष्टि में यह रिक्त स्थान लगता है। दक्षिण भारत की शैव परम्परा इसे आकाश तत्व का प्रतीक मानती है। यही विचारों और भावनाओं का अन्तिम विस्तार है। इसी अदृश्य सत्ता में सम्पूर्ण सृष्टि समाहित है। आकाश वह स्थान है जहाँ विचार, ध्वनि, प्राण और आत्मा एक होते हैं। मनुष्य के भीतर आकाश तत्व विचारों का आधार बनता है। पृथ्वी स्थिरता देती है। अग्नि विवेक देती है। जल करुणा देता है। वायु गति देती है। इन सबके सन्तुलन से मनुष्य को आन्तरिक शान्ति मिलती है।

आनी उथिरम की रात पर्दा हटने पर भक्त रिक्त स्थान के दर्शन करते हैं। चिदम्बर रहस्यम का सार इसी शून्य में पूर्णता को देखना है। नटराज का नृत्य इसी रहस्य को बताता है। उनका डमरू सृष्टि की ध्वनि है। अग्नि परिवर्तन का प्रतीक है। उनका उठता हुआ चरण मुक्ति का संकेत है। उनके पीछे का आकाश उस सत्य का प्रतीक है जहाँ अन्ततः सब कुछ समाहित होता है।


नटराज मंदिर मंडप, चिदम्बरम

ऋषियों के अनुसार मनुष्य का शरीर एक साधन है। भोग और अहंकार के लिए शरीर का उपयोग करने से पंचभूत असन्तुलित होते हैं। साधना, सेवा और आत्मबोध से यही 5 तत्व मोक्ष का मार्ग बनते हैं। इसी कारण प्राचीन आचार्यों ने त्योहारों को शरीर और विचारों के सन्तुलन का साधन बनाया है। आनी उथिरम का उत्सव भी सन्तुलन सिखाता है। स्नान मन को निर्मल करता है। दीप भीतर की अग्नि को जगाता है। धूप और संगीत प्राणों को सन्तुलित करते हैं। नटराज का ताण्डव जीवन को समझने की दृष्टि देता है।

सुबह होने पर मन्दिर के बाहर आसमान नीला होता है। भीड़ लौटने लगती है। उस रात चिदम्बरम में उपस्थित लोग अपने साथ एक विचार लेकर लौटते हैं। वे सोचते हैं कि मानव शरीर भी एक चिदम्बरम है जहाँ पंचभूत निरन्तर नृत्य करते हैं।

यही चिदम्बर रहस्यम का अर्थ है। नटराज शिव मन्दिर के साथ-साथ हमारे विचारों में भी उपस्थित हैं। पृथ्वी मनुष्य को धैर्य सिखाती है। अग्नि परिवर्तन लाती है। जल करुणा देता है। वायु गति देती है। आकाश शान्ति का अनुभव कराता है जहाँ सब कुछ एक होता है।

आनी उथिरम का यह पर्व हर वर्ष यही स्मरण कराता है कि मनुष्य अपने भीतर के 5 तत्वों को सन्तुलित करके जीवन को लयपूर्ण बना सकता है। यही चिदम्बरम का रहस्य है।

लेख:
श्रीनिवास चारी

 

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