हाली अमावस पर्व
April 27, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव
पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

गवरी मेवाड़ ही नहीं, संसार के प्राचीन जनजातीय प्रदर्शनकारी कलाओं में पहचान रखती है और उसमें नाहर के खेल गांव और बस्ती में अभय के संचार और आधि व्याधि के निवारण के लिए आयोजिए होता है।
यह लोक विश्वास बहुत बड़ा है कि नाहर के स्वांग के दर्शन से गांव की हर पीड़ा का शमन होगा और पाशविक प्रवृत्तियों का उन्मूलन। गवरी नृत्य चूंकि आखेट कालीन खेलों और प्राकृतिक गतिविधियों को समेटे होता है, ऐसे में नरसिंह - लीला का पूर्व रूप धारण किए ज्ञात होता है। यह नर भी है लेकिन सिंह के भेष में होता है।
गवरी का यह खेल सामान्य नाहर नहीं, बल्कि सींग वाले सिंह का होता है। शेर के सींग कहां होते हैं लेकिन सींगों का महत्व उसके आयुध के रूप में होता है जो कि स्वांग की एक अतिविशेषता भी है और इस प्राणी को आंखों देखी मान्यताओं से अलग करती हैं। यह गवरी की महापात्र देवी का वाहन है और उसके साथ एवं अलग से भी आता है।
रचनात्मक रूप से गवरी का नाहर सिर से पांव तक केसरिया - पीली आभादायक रंग को पोते होता है और बीच - बीच में काली पट्टिकाओ की रचनाकर सिंह के शरीर को झलकाया जाता है। दो हाथ और दो ही पांव कुछ ऐसे रंगे जाते हैं कि रंग छटा अन्य पात्रों के बनाव से अलग लगती है।

गवरी का नाहर
इसी प्रकार पेट और पीठ को भी रंगा जाता है। सिर पर आड़ी उभी केसरिया वस्त्र पट्टिकाओं का प्रयोग होता है और उसी में सींग लगाए जाते हैं। लोक में ये सींग नहीं बल्कि सिंह के खण विसान- खंभ कहे जाते हैं और इसका आशय है : विशेष लक्षण। पूंछ भी पराक्रम करने वाली।
थाली मांदल के वादन के बीच किसी वस्त्र से ढंका नाहर जोर से हाक लगाता हुआ गवरी मंडल में प्रवेश करता है और फिर गोलाकार बैठे दर्शकों पर बारी बारी नजर डालता है। कभी कांपता है तो कभी दर्शकों को कंपित करता है। माताएं अपने नवजात बच्चों को शेर के मार्ग में डाल देती हैं।

कभी-कभी भयोत्पादक भी लगता है नाहर का स्वरुप
नाहर उनको रौंदता हुआ, हारी - बीमारी, झगड़ने की प्रवृत्ति, हठ आदि को हरता हुआ आगे बढ़ता जाता है। गवरी पर पहला शोध प्रबंध लिखने वाले डॉ. महेंद्र भानावत जी कहते थे कि वे बचपन में खूब बीमार रहते थे, उनको आए दिन बने रहने वाला बुखार गवरी में नाहर देखने से गया।
मां उन्हें नाहर दिखाने ले गई थी। पहले तो वह डर गए थे लेकिन फिर सामान्य हो गए। रेडियो पर एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था। जब तक नाहर का खेल चलता है, वाद्यों का वादन बंद नहीं होता और नाहर कूद कूदकर अपनी मनोदशा और स्वाभाविक प्रकृति का परिचय देता है लेकिन दर्शक स्त्री पुरुष उससे अभय की याचना करते हैं। जयकारा लगाते हैं।

गवरी को देखने भारी संख्या में जुटती है भीड़
कहना न होगा कि जनजातीय स्मृतियों में हमारे शास्त्रीय प्रमाण रचे बसे मिलते हैं। यह नरसिंह आजू - बाजू वालों के हाथ में अपना हाथ रखकर वर भी देता है, यह वरदान का सुन्दर प्रतीक है और हस्ते होना कहा जाता है।
भय की अपनी मनोगत भूमिका होती है और कई बार भय का निवारण अन्य भय से होता है। आचार्य भरत इसलिए नाटक को निर्भय करने के सूत्र के रूप में भी देखते हैं। नरसिंह लीला भी इसी भूमिका की पोषक लगती है।
-डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू
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