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नागपंचमी: आस्था और भारतीय परंपरा

नागपंचमी: आस्था और भारतीय परंपरा


भारत के धर्म, संस्कृति में नागों की पूजा-अर्चना का विधान लोक परंपरा से सम्बद्ध है। श्रावण शुक्ल पंचमी को नागपंचमी मनाई जाती है और सांपों को पूजा जाता है। दरअसल, सांप कृषि के सहायक जीव हैं जिन्हें संरक्षित करने के लिए धार्मिक विधान बनाए गए हैं। हमारी यह परंपरा जैव विविधता संरक्षण और संवर्धन को संबल प्रदान करती है।

धर्मिक रीति-रिवाजों में कहीं भी विषधरों को पकड़कर टोकरी में बंद करने की बात नहीं कही गई है और ना ही ऐसे सांप की पूजा-अर्चना का विधान है। सांपों को उनके प्राकृतिक स्थानों में ही संरक्षित करना नागपंचमी पर्व का मूल उद्देश्य है। गलत परिपाटी के कारण इस पर्व पर हजारों सांपों की बलि चढ़ जाती है। सपेरे अनेक भ्रांतियां फैलाते हैं जो सांपों के विषदंत तोड़ कर उन्हें टोकरी में लिए घूमते-फिरते हैं।


नागों की पूजा

नाग पूजा
नाग पूजा प्राचीन काल से चली आ रही है। इन्हीं तथ्यों पर आधारित कथाएं वेद, पुराणों में भी मिलती हैं। सांपों की अनेक मिथक कथाएं भी सुनी-सुनाई जाती हैं। यजुर्वेद, अथर्ववेद के साथ पुराणों, रामायण और महाभारत इत्यादि ग्रंथों में नाग कुल का वर्णन मिलता है। नाग देवी का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड में दिया है, जिसमें कहा गया है:

"प्राचीन समय की बात है, जब भूमंडल के सभी मानव नागों के भय से आक्रांत हो गए थे। नाग जिन्हें काटते थे वे जीवित नहीं बचते थे। यह देख भयभीत होते कश्यप ऋषि ने ब्रह्मा जी से सर्प निवारक मंत्रों की रचना का अनुरोध किया। ब्रह्मा जी के आदेश से वेदबीज के अनुसार मंत्रों की रचना हुई और इसके साथ ही ब्रह्मा ने अपने मन से 'मनसा देवी' को उत्पन्न कर उन्हें मंत्र की अधिष्ठात्री देवी बना दिया। तपस्या तथा मन से प्रकट होने के कारण देवी 'मनसा' के नाम से विख्यात हुईं।"


नाग देवी

भारत में ही नहीं, दुनिया के अनेक देशों में सांप पूजनीय हैं जिनसे अनेक कथाएं जुड़ी हैं। यह माना जाता था कि पृथ्वी को शेषनाग ने अपने सिर पर धारण कर रखा है (हालांकि शेषनाग के संदर्भ में इस विश्वास का वैज्ञानिक खंडन हो चुका है)। विदेशों में नागों की पूजा अलग-अलग रूप में होती है:

• मिस्र: यहाँ के संत सर्प योनि के माने गए हैं।
• तिब्बत व चीन: चीन में नाग पूजनीय हैं जहां ड्रैगन की प्रतिमाएं आज भी हैं। ड्रैगन को चीन में जल का देवता माना गया है।
• रोम: प्राचीन कबीलों में सर्प पूजन की परंपरा आज भी है।

सांपों के संदर्भ में भ्रांतियां
सर्पों से जुड़ी अनेक कथाएं रहस्यपूर्ण हैं। कुछ कथाओं में अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन है जिनका खंडन आज हो चुका है। अक्सर सांपों को बीन बजा कर नचाया जाता है, यह भ्रांत धारणा है। बीन बजाने वाला सर्प के सिर के पास बीन घुमाता है जिससे बचने के लिए सर्प अपना सिर घुमाता है। वास्तव में सर्प के कान नहीं होते। संस्कृत में सर्प को 'चक्षुश्रुवा' कहा गया है- अर्थात आंखों से सुनने वाला।


सपेरे के सामने फन फैलाए कोबरा

नाग अपना बदला लेते हैं, ऐसा विश्वास आज भी कायम है। नाग जोड़े से पूजे जाते हैं। भूलवश नाग या नागिन किसी के हाथों मर जाए तो बचा हुआ नाग अपना बदला लेता है। ऐसी घटनाएं आए दिन सुनने को मिलती हैं। कहा जाता है कि ऐसे मरे हुए सांप को जलाना जरूरी होता है जिससे सांप की आंखों में उसे मारने वाले की खिंची तस्वीर नष्ट हो जाए। लेकिन, वैज्ञानिक इस बारे में कोई निश्चित राय कायम नहीं कर सके हैं जिससे किसी प्रामाणिक तथ्य तक पहुंचा जा सके।

किसानों का मित्र सांप
दुनिया में सांपों की लगभग 3000 प्रजातियां पाई जाती हैं जिनमें अधिकांश विषहीन प्रजातियों के सर्प होते हैं। भारत में पाई जाने वाली लगभग 220 सांपों की प्रजातियों में से केवल 52 प्रजाति के सर्प विषैले हैं। खेती-किसानी वाले सभी देशों में सांपों को पूजनीय माना गया है जो सचमुच किसानों के मित्र जीव हैं।

सर्प एक विषाक्त जंतु है, विषाक्त जंतुओं का रक्त ठंडा रहता है इसलिए इन्हें शीत रक्त जीव (Cold-blooded) कहा जाता है। यह 45 अंश फैरेनहाइट से 100 अंश फैरेनहाइट तक तापमान सह सकते हैं। इस प्रकार के जीवों को 'उरग' (Reptiles) कहा गया है जिनकी दोमुंही जीभ होती है। सांप दीर्घायु होने के साथ कर्णविहीन होते हैं, जो जमीन में होने वाले स्पंदन (vibration) को अपने पूरे शरीर से महसूस करते हैं।


दोमुंही जीभ

सांप वास्तव में मानव के मित्र हैं जो दीमक और चूहे को चटकर उन्ही के निवास में जम जाते हैं। सर्प पानी में बड़े मजे से तैरते हैं तो पेड़ों पर चढ़कर पक्षियों के अंडे खा जाते हैं। खेती को नुकसान पहुंचाने वाले जीव जंतुओं को सांप अपना आहार बना लेते हैं। चूहा, घूस और छिपकली को लील जाते हैं। खेती को नुकसान पहुंचाने वाले जंगली सूअर, हिरण को डस लेते हैं। सर्पों के मुंह की बनावट इस तरह की होती है कि वे अपने से बड़े जानवरों को आसानी से लील लेते हैं। दीमक, चीटियां, कनखजूरा और चिड़ियों के अंडे को फोड़ कर खा जाते हैं।

मादा सांप एक बार में 50 से 60 अंडे देती है। अंडों से बच्चों के निकलने के साथ ही वह उन्हें खाने लगती है, जो भाग जाते हैं वही बचे रहते हैं। सर्पराज (King Cobra) अक्सर दूसरे सर्पों को अपना शिकार बना लेते हैं। एक सांप 18 माह तक निराहार रह सकता है।

सांपों के संबंध में अनेक भ्रांत धारणाएं हैं:

सांप दूध पीता है: नाग पंचमी में उन्हें दूध पिलाया जाता है। सपेरे पैसों के लालच में इस दिन सांप पकड़ कर उनके विषदंत निकाल कर प्रदर्शन करते हैं और उन्हें जबरन दूध पिलाते हैं। दूध पीने से सांप अक्सर मर जाते हैं।

सम्मोहन शक्ति: लोगों में यह विश्वास है कि सांप आदमी को सम्मोहित कर लेता है और उसे डस लेता है। यह विश्वास भय के कारण पनपा है। सांप के सामने भय से आदमी अपना संतुलन खो देता है; सांपों में कोई जादुई सम्मोहन शक्ति नहीं होती।


नागपंचमी पर कोबरा को दूध पिलाते हुए

सांप मनुष्यों पर तीन तरीके से हमला करता है और सभी में अपने विष का उपयोग करता है। वैसे सर्प सीधे काटते हैं और अपना विष पोले दांत के माध्यम से शरीर में पहुंचा देते हैं। कुछ सांपों की पूंछ में जहर होता है जो पूंछ से हमला करते हैं; जिस अंग में पूंछ लगती है वहां विष फैल जाता है। विरले सांप अपने शिकार को मारने के लिए हवा में विष फेंकते हैं (जैसे स्पिटिंग कोबरा)।

सर्प का विष कीमती होता है जिससे अनेक प्राणरक्षक दवाइयां बनाई जाती हैं। सांप का विष हल्का पारदर्शी, पीले रंग का श्यामल होता है जिसमें कुछ म्यूकस तथा एंजाइम भी होते हैं। सांप का विष उसके खुद के जीवन और पाचन के लिए जरूरी होता है। विषधरों को पालतू बनाने के लिए उनकी विष थैली निकाल देने पर वे ज्यादा दिन तक जीवित नहीं रह पाते हैं।

नाग पंचमी का पर्व वास्तव में सर्पों के संरक्षण का पर्व है। बदलती हुई परिस्थिति में इस दिन सांपों का जो प्रदर्शन किया जाता है, वह इनके जीवन के लिए घातक सिद्ध होता है। वास्तव में सांप जहां हैं, वहां उन्हें प्राकृतिक रूप से संरक्षित किया जाना चाहिए ताकि वे हमारे सहायक बने रहें और हमारी अनमोल जैव विविधता के अभिन्न अंग बने रहें।
लेख-
रविन्द्र गिन्नौरे,
भाटापारा, छत्तीसगढ़

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